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यात्रावृत्त

एक बार फिर सागर तीरे
कुमार रवींद्र


20 जनवरी 2008

हम मुंबई पहुँच गए हैं ‑ हम यानी सरला और मैं। स्टेशन पर सतीश और आशू लेने आ गए थे। आशू का घर मुंबई के उपनगरीय स्टेशन बोरीवली में ही। कुछ घंटों के विश्राम के बाद शाम को जुहू बीच पर हम आ गए हैं। तीस साल के अन्तराल के बाद एक बार फिर सागर-दर्शन कर रहा हूँ मैं। सागर के दूसरे छोर पर सूर्यास्त हो रहा है। लाल दहकता अग्नि-स्नान करता पश्चिमी क्षितिज और उसके नीचे उसे अपने में समोता ललछौंहा-कुछ सुनहला होता महाकार लहराता सागर। सूर्य का लोहित बिंब उसमें डूबता-उतराता, धीरे-धीरे उसमें समाता। निसर्ग के सौन्दर्य-बोध की साक्षी देता, अनुभूति के कितने ही अछूते आयामों को खोलता-मूँदता यह महादृश्य। सरला का सागर-दर्शन का यह पहला अनुभव है। उसकी सुखानुभूति, उसका उल्लास सरला के चेहरे पर। उम्र कै ढलान पर सुखानुभूतियाँ न तो उतनी प्रखर होती हैं और न ही उतनी उत्तेजक-मुखर। किंतु रमा-सतीश से बात करते हुए सरला का चहकता स्वर इस बात का संकेत दे रहा है। प्रकृति के इस महासुख के भोक्ता हैं हम दोनों पति-पत्नी यानी सरला और मैं, मेरे बहन-बहनोई रमा और सतीश तथा हमारा भाँजा आशू यानी आशुतोष।

जुहू बीच पर उत्सव का-सा माहौल। हर वय, हर वर्ग के लोगों की चहल-पहल। कुछ युवा जोड़े समुद्र की लहरों में भागते-दौड़ते, लहरों के प्रवाह को अपने पैरों से धकियाते-उछालते। जल की फुहारों में भींजते उनके हँसते चेहरों पर डूबते सूरज की ललौंछ दमक। एक ओर कुछ बच्चे तट की गीली रेत पर क्रीड़ारत - रेत का घरौंदा बनाते, उसे तोड़ते और फिर पूरे मनोयोग से बनाते : इस तरह सृष्टि की निर्माण-विनाश-पुनर्निमाण की अनवरत चल रही त्रिमुखी भूत-वर्तमान-भविष्य की युगानुयुगीन लीला की बानगी देते। अचानक कुछ लोग कीर्तन-नर्तन करने लगे हैं पास ही रेती पर। 'हरि बोल - हरि बोलट' के समवेत स्वर-नाद के साथ उनकी नृत्यातुर आकृतियाँ बड़ी चित्ताकर्षक लग रही हैं। धीरे-धीरे उस समूह में शामिल होते और भी लोग। और फिर नृत्य का एक बृहदाकार चक्रवाल। उस सामूहिक नृत्य-गायन का अपना एक 'हिप्नोटिक इफेक्ट'। जी करने लगा है उम्र-भर की सारी वर्जनाएँ तोड़कर उसी में समा जाएँ। हाँ, उस लीला में बिला जाएँ। किंतु जिन्दगी भर की सँजोई ये मन की बेड़ियाँ इतनी आसानी से कहाँ टूटने वाली हैं। हृदयाकाश में विचरती अनुभूतियों की छोटी-छोटी कौंधें इन वर्जनाओं को किंचित हिला तो जाती हैं, पर इन्हें तोड़ नहीं पातीं। इनका ध्वंस करने के लिए तो अनुभूति की कोई बहुत बड़ी कौंध चाहिए, जो आत्मा पर जड़ी सभी अर्गलाओं को एक झटके में तोड़ दे। साँसों की छोटी-छोटी झिर्रियों से झाँकती कीर्तन की ध्वनियाँ-आकृतियाँ अच्छी लग रहीं हैं मन को। अभी तो इतना ही सुख सही।

शाम हो चुकी है पूरी तरह। सागर में सूर्य की सम्पूर्ण जल-समाधि के बाद का हलका अँधियारा लहरों-लहरों समुद्रतट पर पसर रहा है। पूर्व के आकाश में पौष त्रयोदशी का चाँद अचानक अपनी आभा बिखेरने लगा है। मन में एक युगल रूपक उभर रहा हैः सूर्यवंश के राम की जलसमाधि का और उसके उपरान्त हुए अवतार-पुरुष कृष्ण की जमुना की रेती पर चन्द्रिका पर्व में रची रासलीला का। जीवन में राम का आत्मोत्सर्ग और कृष्ण का अनन्य भावोल्लास, दोनों ही ज़रूरी। इन दोनों स्थितियों का सम्यक समाहार ही जीवन को संपूर्णता दे पाता है। किंतु हम तो एकांगी ही जीते हैं, एकांगी ही जी पाते हैं। कुछ बिरले ही हैं जो विविधांगी इस जीवन को उसकी संपूर्णता में साध पाते हैं। विचारों के इस हस्तक्षेप ने उस वक़्त की रसानुभूति को विच्छिन्न कर दिया है। यही तो है मनुष्य की नियति। नीचे की रोशनियों से घिरे हम सागर और चाँदनी के उस समवेत रास को भला कब तक समोते अपने भीतर। प्रभुपाद के शिष्यों की टोली का नर्तन का वेग, उसका आस्वाद भी शिथिल हो गया है और हम लौट चले हैं महानगर मुंबई की सड़कों की सायंकालीन गहमागहमी की ओर।

इस्कॉन टेंपिल नज़दीक ही है यानी लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ही। उसके पहले ही कुछ ही दूरी पर पृथिवी थियेटर्र रंगकर्मियों की मक्का। आशू की नाटकों में रुचि हिन्दी रंगमंच के उस ख्यात तीर्थस्थल को देखने की उत्सुकता मुझमें भी। नाटक शुरू हो चुका था, पर नाट्यकर्म में रुचि रखनेवालों की आवाजाही बनी हुई है। कुछ हमारी तरह के विशुद्ध प्रशंसक-दर्शक भी। नाट्यकर्मी भी कुछ, जो अपनी मुद्राओं, अपनी वेशभूषा में अलग दिखते थियेटर के छोटे-से प्रांगण में बैठे-खड़े। एक विचित्र माहौल। पृथिवी थियेटर एक लघु कलाक्षेत्र मुंबई जैसी व्यवसायिक नगरी के महासिंधु में एक छोटा-सा इन्द्रधनुषी द्वीप, जिसकी मनोवृत्तियाँ-गतिविधियाँ आम दृष्टियों से बिल्कुल भिन्न। सोच-सोच कर मैं चकित-विस्मित हो रहा हूँ कितने-कितने रूप हैं मानुषी महत्त्वाकांक्षा के, व्यक्ति की वासनाओं के। ऐसा ही एक रूप मुझमें भी तो, जब मैं यह सब लिख रहा हूँ। अपने को पहचानने, अपनी पहचान को अलग पहचनवाने की यह आदिम इच्छा कितनी सम्मोहक है, कैसी सुखद भी। आत्म-मुग्धता का यह एहसास- यह भी तो एक पहचान है मनुष्य होने की।

मुंबई का इस्कॉन टेंपिल दिल्ली के इस्कॉन टेंपिल जैसा भव्य नहीं है। मंदिर में प्रवेश करते समय सिक्योरिटी चेकिंग प्रभु की ईशता भी आतंक से मुक्त नहीं। कैसी है यह हमारी महान सभ्यता कि हमारी आध्यात्मिक चेतना भी असुरक्षित हो गई है। हम साँझ की आरती के समय पहुँचे थे। किन्तु दूर से ही उसे देख पाए। मंदिर के मुख्य स्थल में प्रवेश यानी प्रभु के विग्रह के निकट जाकर उनके सम्मुख होने के सौभाग्य से हम वंचित रहे। चारों ओर से मुख्य प्रांगण की घेराबंदी - उसमें बंदी प्रभु। धर्म का भी हमारी इस सभ्यता में विद्रूप हो जाना। हाँ, यही तो है हमारी विकास-यात्रा। प्रभु को, देवता को भी हमसे भय हो गया है।

शापर्स स्टॉप, जुहू में आशू ने कार पार्क की थी। हम थोड़ी देर के लिए उस मल्टीप्लेक्स को अवलोकने उसमें प्रवेश कर गए हैं। तमाम आधुनिक सामग्रियों का वैभवपूर्ण प्रदर्शन देख-देख कर हम भ्रमित होते रहे उस महाहाट में। मनुष्य की अस्मिता को दीन-हीन करने, हर व्यक्ति को निर्धन-निरीह करने के लिए कैसी-कैसी मायाएँ विरची गईं हैं हमारी वर्तमान सभ्यता के द्वारा, मैं उस चकाचौंध के बीच भ्रमण करते हुए बराबर यही सोचता रहा। महाभारत काल के मय दानव द्वारा विरची इन्द्रप्रस्थ की मायानगरी भी तो ऐसी ही रही होगी।

22 जनवरी 2008

गोवा प्रदेश का करमली रेलवे स्टेशन। यहाँ से पणजी हमें टैक्सी से जाना है। हम यानी सरला और मैं एवं रमा और सतीश। इस ढली उम्र में हम चारों आए हैं युवा जोड़ों की इस 'हनीमून' तथा रोमांस-स्थली में। हाँ, सत्तर साल का मैं, लगभग सढ़सठ साल की सरला, उतने के ही सतीश; रमा सतीश से लगभग दो साल छोटी। पता नहीं इतनी देर में क्यों सूझी हमें गोवा की रमणस्थली में आने की ? जवानी संघर्षों के बीच कब निकल गई, पता ही नहीं चला। लँगड़ाती देह और उम्र के आखिरी पड़ाव पर ही सही, मन में सँजोए-समोए रोमांस को जी लिया जाए। वास्तव में मन की कोई उम्र नहीं होती। मन कभी नहीं बुढ़ाता। बस इच्छाओं और वासनाओं की आकृति बदल जाती है।

हम पणजी दोपहर के बाद पहुँच पाए हैं। रात भर की ट्रेन की अधसोयी-अधजागी यात्रा से निवृत्त होने में कुछ समय लगना था ही। होटल लॉ ग्रैंड यानी पणजी में अपने अस्थायी आवास-स्थल में भोजनादि की कोई व्यवस्था न होने से लंच के लिए हमें बाहर जाना पड़ा। लौटकर थोड़ा विश्राम और फिर हम निकल पड़े हैं आसपास के बाज़ार को देखने। पणजी पुर्तगाली समय का पंजिम मांडवी नदी के किनारे बसा हुआ एक साफ-सुथरा शहर है। पश्चिम भारत के गोमन्तक पर्वत क्षेत्र में स्थित यह भू-भाग कितने ही पौराणिक प्रसंगों की रंगस्थली रहा है। विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम द्वारा समुद्र से प्राप्त की गई यह भूमि लगभग साढ़े तीन सौ साल तक पुर्तगाली उपनिवेश रही। पूरे प्रदेश में पुर्तगाली प्रभाव हर क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देता है। किंतु मुझे याद आ रही है वासुदेव कृष्ण की और उनकी रणछोड़राय कीर्ति से जुड़ी द्वापर युग की एक घटना की। इसी क्षेत्र में तो कहीं वे मथुरा से पलायन कर अपने अग्रज बलराम के साथ कालयवन और उसकी दुर्दान्त सेना को छकाते फिरते रहे होंगे। यहीं कहीं तो रही होगी वह गुफा, जिसमें देवासुर संग्राम के बाद शिथिल-देह मुचकुन्द अपनी लंबी निद्रा में बरसों-बरसों लीन पड़े रहे होंगे। उसी गुफा में तो हुई थी महाराज मुचकुन्द की अधजागी आँखों से निकले अग्नि-ज्वाल में कालयवन के भस्मीभूत होने की घटना। पश्चिमी घाट के इस भू-भाग के पहाड़ों की मिट्टी कहीं इसी कारण तो लोहितवर्णी नहीं बनी हुई है। सोलह कलाओं से युक्त भगवान कृष्ण की लीलाओं का एक प्रसंग इसी समुद्रतटीय प्रदेश में घटित हुआ था, यह सोचकर ही मन रोमांचित हो आया है।

गोवा के जिस हिस्से में हम हैं, वहाँ से मांडवी नदी मुश्किल से पाँच-सात मिनट की दूरी पर है। शाम को सात बजे हमें मांडवी नदी के सागर-संगम भाग में क्रूजर पर संतरण हेतु पहुँचना है। तब तक हम आसपास के बाज़ार में घूमते रहे। गोवा अपनी काजू की पैदावार के लिए प्रसिद्ध है। काजू से बनी 'फेनी' शराब तो मुख्य आकर्षण है गोवा का। फेनी में तो हमारी रुचि नहीं है, किन्तु थोड़ा-बहुत काजू और कुछ छोटी-मोटी सजावट की वस्तुएँ, जिन्हें हमारे गोवा-भ्रमण की याद में बच्चों को दिया जा सके, यही कुछ हमें खरीदना है। पास ही पुलिस हेडक्वार्टर्स की बिल्डिंग है और उसी के सामने है गवर्नमेंट हैंडीक्राफ्ट्स का शो-रूम। हमने वहीं से सजावट की कुछ चीजें खरीद ली हैं। साढ़े छह बजे हम मांडवी के तट पर आ गए हैं। थोड़ी देर में ही हम क्रूजर में प्रवेश के लिए बने एक पिंजरेनुमा कॉरीडार में खड़े हो गए हैं। आधे घंटे के बाद हम क्रूजर के खुले टॉप डेक पर पहुँच गए हैं। यहीं बैठने की व्यवस्था। सामने मंच, जिस पर नृत्य-गान की प्रस्तुतियाँ होनी हैं। एक घंटे के उस नौका-संतरण में गोवानीज़ संस्कृति की झलक देते तीन 'डांस आइटम' प्रस्तुत किए गए। बीच-बीच में दर्शकों द्वारा भी मंच पर डांस करने का मौका - पहले बच्चों, फिर युवा जोड़ों और फिर पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग डांस-प्रस्तुतियाँ हुईं। मंच-संचालक एक युवक। वह अधिकांशतः अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग करता रहा। संचालन चुस्त-दुरुस्त-जोशीला और सभ्य-शालीन भी। अच्छा लगा। हम मात्र दर्शक बने रहे इस उत्साह और उल्लास के माहौल के। कुछ अति-उत्साही युवकों ने कुर्सियों को एक ओर कर डेक के फ्लोर पर भी मंच के समानांतर डांस के लिए जगह बना ली, जहाँ वे बाद तक डांस करते रहे। 'मौजाँ-मौजाँ' की धुन से भरी-गूँजती वह नृत्य-संध्या अनूठी रही। इधर के वर्षों में इस 'मौजाँ-मौजाँ' संस्कृति का खूब प्रचार-प्रसार हुआ है मध्यम वर्ग में समृद्धि के आने से। मेरा मन एक ओर तो इसके उल्लास से उत्फुल्ल है, किंतु दूसरी ओर इसे अस्वीकार भी कर रहा है। भारत जैसे अभाव-पीड़ित देश में इस प्रकार का उल्लास-प्रदर्शन मुझे सदैव ही बड़ा छिछला-नकली-अनर्गल और अविश्वसनीय लगता रहा है। हर माहौल का अपना एक सम्मोहन होता है और हम भी इस सम्मोहन से बच नहीं पाए। हमारे बिल्कुल बगल में बैठा हुआ था एक सद्यःयुवा जोड़ा। युवक-युवती दोनों ही श्याम वर्ण के, किंतु अत्यन्त आकर्षक। तीखे नाक-नक्श, सुडौल देह-यष्टि, कपड़े भी बिल्कुल सादा, किंतु सहज-शालीन। मंच की गतिविधियों से लगभग बेख़बर, मुस्कराते, एक-दूजे को मौन निहारते बड़े रम्य लगे मुझे वे। थोड़ी देर के बाद दोनों उठकर डेक की रेलिंग से लगकर खड़े हो गए और नीचे तेजी से प्रवाहित जल और दूसरे छोर पर स्थित गोवा सेक्रिटेरिएट की रोशनियों और जल में उनकी सुनहरी परछाइयों से जैसे मौन संभाषण करते रहे। युवक ने युवती के कंधों पर हाथ रख लिया और दोनों दीन-दुनिया से अलग-थलग और बेख़बर अपने आन्तरिक रोमांस के आलोक में खोए रहे। मैं अभिभूत देखता रहा उनकी इस देह-समाधि को। आत्मलीनता की यह भाव-स्थिति ही तो है असली यौवन-सुख। कभी हम भी तो ऐसे ही आत्मलीन हो जाते थे। काश, हम वैसे ही बने रहते। होटल के अपने कमरे में लेटा हुआ उस युवा जोड़े की भाव-समाधि के बारे में सोचता-सोचता मैं पता नहीं कब सो गया।

23 जनवरी 2008

10 बजे पूर्वाह्न

हमारी गोवा-यात्रा का दूसरा दिन। आज नार्थ गोवा के भ्रमण पर। सबसे पहले पणजी के मियामार बीच पर। बीच साधारण, किंतु उसके ठीक सामने चौराहे पर एक प्रतिमा है, जिसमें एक हिन्दू-एक कैथोलिक युवा आकृतियों की आकाश को छूने का उपक्रम करती भंगिमा दर्शाती है गोवा राज्य की मिली-जुली हिन्दू-क्रिश्चियन सांस्कृतिक-सामाजिक संरचना को। यात्रापथ में मुख्य रूप से नारियल के वृक्ष हैं, किंतु बीच-बीच में अशोक, पीपल और कनेर की संयुक्त वृक्षावली पूरे वातावरण को ताज़गी से भर रही है। मकानियत अधिकांशतः लाल खपरैल की छतों वाली, पुर्तगाली स्थापत्य का हवाला देती।

लगभग आधे घंटे की यात्रा के बाद आ गया है कोकोआ बीच। नारिकेल-कुंजों से सुशोभित इस छोटी-सी 'क्रीक बीच' का प्रमुख आकर्षण है यहाँ स्थित 'वाटर स्पोर्ट्स सेंटर' से मोटर-नौका पर सागर-संतरण। 'क्रीक' से बाहर होते ही आ जाता है अरब सागर का लहराता वक्ष, जिस पर तेज गति से भागती नौका जब आगे बढ़ती है और जब तेज हवा के झोंकों के साथ सागर-जल की फुहारें हमें दुलराती-परसती हैं, तो एक अतीन्द्रिय हुलास से मन भर उठता है। साथ ही जल के महाकार देवा की विविधभंगी आकृति के सीधे साक्षात्कार से अभिभूत-आतंकित भी। एक घंटे के उस सागर-विहरण में हमारी नौका हमें डॉल्फिन मछलियों की क्रीड़ास्थली तक ले आई है। डॉल्फिन युगलों को यहाँ लहरों के मध्य उछलते-विहरते देखकर हम उल्लास और विस्मय से भर उठे हैं। हमारे संतरण-पथ में हमें तट पर दिखाई दिए पुर्तगाली उपनिवेश-काल के प्रतीक आग्वाद किला और गोवा का सेल्यूलर जेल, जो याद दिलाते हैं उस काल के आतंकभरे तंत्र की। उसके पास ही स्थित है सत्तर करोड़ की कीमतवाला प्रसिद्ध जिम्मी बँगला, जिसे आज कई फिल्मों का शूटिंग-स्थल होने की ख्याति प्राप्त है।

उत्तर गोवा के अगले बीच यानी 'वागतार बीच' तक पहुँचने के यात्रापथ में ही आया प्रसिद्ध नाथपंथी साधुओं के एक आदिगुरु चौरंगीनाथ का मन्दिर। एक शांत ग्राम्य परिवेश में स्थित उस मंदिर की भव्यता हमें एक पवित्र एहसास से भर गई।

'वागतार बीच' का सागर-तट खुला-खुला, चट्टानी एवं विस्तृत है सभ्यता के आक्रामक प्रवाह से काफी कुछ अछूता। पणजी से लगभग तीस किलोमीटर दूर इस आदिम समुद्रतट पर चट्टानों के विविध रूपाकार बिखरे पड़े हैं। उन्हें देखकर मुझे प्रख्यात अंग्रेजी कवि टेनीसन की कविता 'लोटस ईटर्स' में वर्णित समुद्रतटीय छवियों की याद आ गई। ग्रीक महाकवि होमर के महाकाव्य 'ओडेसी' के महानायक ओडीसियस यानी यूलीसीज के द्वीप 'इथाका' के जैसे चट्टानी इस भू-भाग में प्रकृति की सुषमा बिखरी पड़ी है। फोटोग्राफरों के लिए तो यह तट स्वर्ग-तुल्य है। सतीश और सरला ने अपने-अपने कैमरे में उस सम्मोहक सौन्दर्य को सँजोया। चट्टानों की उन आदिम आकृतियों के बीच लहरों का निरन्तर बहता संगीत हमें आमंत्रित करता रहा कि हम उसमें समूचे समा जाएँ। किंतु सिंधु-प्रवाह के प्रति हमारी जिज्ञासा हमारी देह की सीमाओं की भी हमें याद दिला गई। काश, हम कोई जलपाखी होते, तो जल में भरपूर डूबते-उतराते। हम तटीय चट्टानों पर बैठकर लहराते जल को अपने पाँवों से ही केवल परसकर उस पुलक को मन में समोते रहे, जो निसर्ग ने वहाँ सहज बिखेर रखी थी। दूर सागर के सीने पर जलपाखियों का उड़ना, लहरों पर थमना, फिर उड़ना हमारी असमर्थताओं को मुँह चिढ़ाता रहा। वहीं तट पर दिखे हमें एक कतार में खड़े सात ताड़वृक्ष, जिन्हें देखते ही हमारे मन में कौंध गया रामकथा का एक बहुश्रुत प्रसंग, जिसमें प्रभु श्रीराम ने बालि-वध से पूर्व सुग्रीव को अपनी सामर्थ्य का प्रमाण देने हेतु एक कतार में खड़े सात ताड़वृक्षों को एक ही वाण से बींध दिया था। हम सभी उस प्रसंग की याद में कुछ क्षणों के लिए खो गए। समय का अंतराल जैसे मिट गया था और हम पहुँच गए थे त्रेता युग के उसी परिवेश में, जहाँ ऋष्यमूक पर्वत के वनांचल में यह घटना घटित हुई थी। रमा इस अनुभूति से भरी बार-बार उस दृश्य को यादों में सँजोतीं रहीं। वहीं विचरते दिखे हमें कुछ गौरांग युगल, जिनकी लगभग नंगी पुष्ट देह-यष्टि देखकर मुझे बाइबिल के शापग्रस्त आदि-युगल आदम और हव्वा की याद आने लगी। सहास्राब्दियों पूर्व वे भी अदन के स्वर्गिक बगीचे से निष्कासित होकर इसी प्रकार के किसी समुद्रतटीय चट्टानी बंजर प्रदेश में भटकते रहे होंगे। हो सकता है यही वह भूमि हो और यहीं खड़े होकर उन्होंने धरती के नैसर्गिक सौन्दर्य को पहली बार निहारा हो। विरासत में मिली उसी सौन्दर्यानुभूति को तो हम आज अपनी साँसों में सँजो रहे हैं।

लंच-ब्रेक के बाद हम बढ़ चले हैं अन्जुना बीच की ओर। यह बीच काफी गहराई में है और ऊपर से ही उसका विहंगम दृश्य अवलोक कर हम धन्य होते रहे। ढलती धूप में उस सिंधुतटीय सुषमा को कैमरे की आँख से निरखना अभूतपूर्व एहसासों से हमें भ्रता रहा।

24 जनवरी 2008

आज हम दक्षिण गोवा की यात्रा पर हैं। और सबसे पहले हम आए हैं बॉम जीसस चर्च देखने। और यहाँ हम खड़े हैं सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर की समाधि के सामने। बाल जीसस को समर्पित इस चर्च में चिरनिद्रा में लीन सेंट जेवियर की देह आज भी वैसी ही अक्षुण्ण ताबूत में रखी है, जैसी वह आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व देहावसान के समय रही होगी और वह भी बिना किसी 'ममीफिकेशन' के। हम चकित खड़े हैं उस पुण्य देह के सामने। चकित-चमत्कृत। मुख्य कक्ष में प्रभु यीशु के बाल स्वरूप की प्रतिमा। पूरे हाल में हलके प्रकाश में विभिन्न ईसाई संतों के जीवन-प्रसंगों को जीवंत करती काष्ठ में उकेरी चित्राकृतियाँ। अद्भुत शांति की अनुभूति और पवित्रता का एहसास देता समूचा परिवेश। लाल पत्थर से बना यह बैसिल्का गोवा का सबसे प्राचीन यीशु-मंदिर है।

सड़क के दूसरी ओर है सत्तरहवीं सदी में निर्मित एकदम झक श्वेत-शुभ्र से-कैथीड्रल। इस कैथीड्रल में ईसाई धर्म-परम्परा से परिचित कराती चित्र-वीथी इसका प्रमुख आकर्षण है। अंदर मुख्य हाल में शिशु यीशु को गोद में लिए वर्जिन मेरी की मनमोहक प्रतिमा है। चर्च का शांत वातावरण सम्मोहक हिन्दू मंदिरों के भीड़-भड़क्के वाले सामाजिक परिवेश से बिल्कुल अलग। मेरा मन चर्च और मंदिर के इस अंतर को आँकता रहा। उनमें आस्था के दो अलग-अलग स्वरूपों को जाँचता रहा।

हमारा अगला पड़ाव मंगेश गाँव - प्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की पूर्वज-भूमि। यहीं कभी उनका बचपन बीता होगा। रास्ता घुमावदार पतली सड़कों का। हरी-भरी प्राकृतिक सुषमा के बीच सफेद, साफ-सुथरे, लाल खपरैल की छतों वाले घरों को निहारते हम आगे बढ़ रहे हैं। वनस्पति अधिकांशतः बाँस, नारियल एवं अशोक वृक्षों की - कई स्थानों पर घने फूलोंवाले वृक्षों की लगातार कतार। उनके पार बीच-बीच में दिखते लाल अग्निवर्णी कच्चे बंजर पहाड़। मैं अंदर सँजो रहा हूँ इस पूरी दृश्यावली के सौन्दर्य को। मंगेश ग्राम में स्थित है प्राचीन मंगेश मंदिर। मंदिर का चित्रमय स्थापत्य अत्यन्त आकर्षक अंदर भी स्वच्छता एवं पवित्रता का एहसास देता माहौल। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों का अपना-अपना स्थापत्य एवं शिल्प है, जो बहु-विविधा भारत भूमि की समृद्धि की बानगी देता है। सोच-सोचकर एक अद्भुत अनुभूति से भर रहा है मेरा मन। कुछ ही आगे चलकर है कवले ग्राम स्थित शांता दुर्गा मंदिर। इसका और मंगेश मंदिर का शिल्प एक जैसा ही है। अंतर केवल प्राचीनता और नवीनता का ही है। देवी की प्रतिमा अत्यंत सौम्य एवं गौरवपूर्ण है। दोनों ही मंदिर गोवा के ग्राम्य परिवेश की स्वच्छता एवं पवित्रता का एहसास कराते हैं। दोपहर ढल रही है और हम पहुँच गए हैं कॉवलेम ग्राम। यहाँ के दो मुख्य आकर्षण हैं गोवा के इतिहास एवं संस्कृति से परिचित कराता संग्रहालय और दूसरा है पुर्तगाली शासन काल का संरक्षित एक निजी बँगला। समय कम है, इसलिए हम दोनों में से केवल एक को ही देख सकते हैं। अधिकांश यात्रियों ने संग्रहालय देखा। हमने भी यही किया। संग्रहालय में मानवाकार छवियों के माध्यम से आदियुग से लेकर वर्तमान पुर्तगाली उपनिवेश काल और आज के गोवा राज्य के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दी गई हैं। सीमेंट से बने 'बिग फुट म्यूजियम' में गोवा की एक किंवदंती-कथा को उकेरा गया है। महोदर नाम के एक समृद्ध व्यक्ति की अपने मित्र द्वारा ठगे जाने के बाद इसी स्थान पर एक पत्थर पर एक पैर से खड़े होकर तपस्या करने की कथा। महाकार उस व्यक्ति का पद-चिह्न यहीं शिला में अंकित। शिल्पकार महेन्द्र द्वारा एक पड़ी चट्टान पर उकेरी महान संत मीराबाई की बृहदाकार शिल्पाकृति भी इसी स्थान पर है। उस महाकृति को 'लिमका बुक ऑफ रिकार्ड्स' में स्थान दिया गया है। संग्रहालय गोवानीज़ संस्कृति की बख़ूबी जानकारी पाने के लिए एक अनिवार्य केन्द्र।

कोलवा बीच हमारा आखिरी पड़ाव है गोवा-यात्रा का। मड़गाँव में स्थित है यह बीच और यही है हमारा गोवा से प्रस्थान-बिन्दु भी। चमकीली चाँदी जैसी मोटी बालू वाली उन्नीस किलोमीटर लंबी यह बीच इस क्षेत्र की सबसे लंबी बीच है। सूर्य पश्चिमी आकाश में ढलान पर है। लहरों पर विपुल स्वर्ण-राशि बिखेर रहा है वह और हम एक सुखद अचरज में डूबे निहार रहे हैं पश्चिमी क्षितिज से लेकर बलुहे तटीय विस्तार तक बिखरे सोनल अनंत को। तमाम किसिम की क्रीड़ाएँ, गतिविधियाँ चल रहीं हैं तट पर। समुद्र के उच्छाल विस्तार पर 'पैराग्लाइडिंग' का आनंद लेते युवा। उन्हें देखकर हमें अफ़सोस हुआ कि काश, हम भी युवा होते। हमारी वृद्ध-असमर्थ देह, किंतु मन सँजो रहा है आकाश तक की इन छलाँगों के पुलक को। वहाँ स्थित एक रेस्टोरेंट में बैठे घूँट-घूँट कॉफी का स्वाद लेते हम देख रहे हैं सागर की बहुरंगी क्रीड़ाओं को।


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हिंदी समय में कुमार रवींद्र की रचनाएँ