हिन्दी काव्य-परंपरा में अपने काव्य बुनावट और बनावट के कारण शमशेर पृथक और अद्वितीय स्थान रखते हैं। इसीलिए 'हिन्दी में शमशेर होने के अलग मानी हैं' भी कहा जाता है। अमूमन यह कहा जाता रहा है कि, 'परंपरा को पचाकर ही परंपरा का विकास किया जाता है', तो निश्चित ही उन्होंने इस पाचन-प्रक्रिया को अपने जीवन (काव्य) में बख़ूबी उतारा और अपनी अद्भूत पाचन-शक्ति के बल पर परंपरा का विकास करते हुए नूतन मानकों को स्थापित भी किया है, ("भाषा एक जीवन परंपरा है।" - एक साहित्यिक की डायरी, पृ. 25) जो शमशेर की कविताई के साकूत मूल्यांकन में एक विमृश्य आयाम हो सकता है। वास्तविक अर्थों में उन्होंने परंपरा को पचाया है, तभी तो काव्य की एक नवीन परिपाटी का प्रणयन संभव हो पाया है। 'प्रयोग के लिए प्रयोग' के युग में काव्य-सृजन करने वाले और 'दूसरा तारसप्तक' से लोगों का ध्यानाकर्षित करने वाले इस कवि में 'प्रयोग' के बनिस्बत 'परंपरा' के निर्वाह को अधिक देखा जा सकता है।
ग़ौरतलब है कि शमशेर का काव्य संस्कृत की गद्यात्मक काव्य की परिपाटी के अनुरूप होने के बावजूद भी पद्यमय, संगीतमय और गेय है। शमशेर के इस गद्यात्मक काव्य को संगीत के लगभग सभी तालवाद्यों-साज़ोसामान के साथ गाया और बजाया जा सकता है। क्योंकि वहाँ पर वह प्रवाह, काव्यात्मकता, लयात्मकता, मार्दवता और पदान्वय प्रकट व गतिमान है। रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने सम्भवतः इसी तथ्य को रेखांकित करने के लिए लिखा है कि, "शमशेर की कविताओं में संगीत की मनःस्थिति बराबर चलती रहती है। एक ओर चित्रकला की मूर्त्तता उभरती है, और फिर वह संगीत की अमूर्त्तता में डूब जाती है। चित्रकला, संगीत और कविता घुल-मिल कर उनके यहाँ रचना संभव करते हैं। भाषा में बोलचाल के गद्य का लहज़ा, और लय में संगीत का चरम अमूर्त्तन इन दो परस्पर प्रतिरोधी मनःस्थितियों को उनकी कला साधती है।" (हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 205) प्याज़ की जितनी तह छिलते जाओगे..., वैसे ही और उसी अनुपात में आँसुओं की नई तासीर निकलती जाएगी। शमशेर की कविता के संबंध में यही सर्वशः सच है।
गेयत्व के लिए तुकबंदी की चलताऊ परिपाटी को शमशेर ने ध्वस्त कर मुक्त छंद के रूप में एक वज़नी परिपाटी कायम की है, जहाँ शब्द और अर्थों का नवीनवत विधायन हुआ है। कहने की आवश्यकता नहीं कि संस्कृत काव्य-परंपरा अर्थात् भारतीय कवि दृष्टि में काव्य को गद्य और पद्य के रूप में ग्रहण किया गया है। शमशेर ने कमोबेश रूप में उसी परंपरा और प्राकर्म का नूतन रूप में निर्वाह किया है, लेकिन शब्द और अर्थ की सत्ता में वे एक नवीन परंपरा को प्रस्तुत करने वाले पहले और अब तक के आख़िरी कवि कहे जा सकते हैं। शमशेर की कविता के शब्द और अर्थ में पारस्परिक साहचर्य होने के बावजूद भी उनमें ग्लाइडर की सी स्थिति विद्यमान है, जो काव्यानुभूति और जीवनानुभूति के मुआफ़िक अपनी गतिशीलता को स्थिरत्व प्रदान करती है।
शमशेर के शब्दों में प्रचंड व्यावर्तन होने के बावजूद भी वह पाठक तक सीधे महीन-से-महीनतर अर्थों को संप्रेषित करने में सक्षम है। शमशेर के शब्दों की शमशेरियत ही तो वह शक्ति है, जो उन्हें औरों से अलहदा करती है। शमशेर की कविता और उन कविताओं में प्रयुक्त शब्द, अर्थों के अनगिनत वलयों को प्रकट करते हैं। जहाँ तक हमारी निगाहें पहुँच पाती हैं, वहाँ से आगे उनकी कविताओं के अर्थों के प्रस्फुटन की अधिक गुंजाइश होती है। पाठक, आलोचक शमशेर के काव्य-रत्नाकर में जिस अनुपात में गोते (समझ और संवेदना) लगाएँगे, उतने ही अर्थरत्न हासिल कर पाएँगे। लेकिन इस शब्द-सागर में गोता लगाने की प्रक्रिया में जीवनानुभूति की नितांत आवश्यकता है। क्योंकि 'साहित्य विवेक मूलतः जीवन विवेक है।' जिसकी जीवनानुभूति जितनी व्यापक होगी, शमशेर को समझने में उतनी ही आसानी होगी और वही कविता के साथ मुंसिफ़ी कर सकता है। बिना जीवनानुभूति के शमशेर के शब्दों को पकड़ पाना दुष्कर कार्य है। वैसे शमशेर की मानें तो 'शब्द कहाँ हैं?'
शमशेर की कविताई समझने के लिए जो व्यक्ति शब्दकोशों के ब्रह्मांड का विचरण कर अन्विति की तलाश करता रहेगा, वह निहित वास्तविकता के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं कर सकेगा। उसके लिए शमशेर के अनुभवों से गुज़रना और सह्रदयी (सह-अनुभूति) होना अनिवार्य है। इससे भी बढ़कर बक़ौल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, 'काव्य में केवल अर्थग्रहण से काम नहीं चलता, बिम्बग्रहण आवश्यक होता है।' शमशेर की कविता में केवल अर्थ नहीं समूचा संवेदन सजग अभिव्यक्ति पा गया है। उस संवेदन को और कवि के गतिमान मनोभावों को पकड़ना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। 'सावन' कविता की कुछ पंक्तियों का मुलाहज़ा हो - "शरमाओ न धड़कन की तरह दिल में/तुम तो/धड़कन का इ ला ज हो/तुम तो हो महज अता-पता मेरा/अरे/वह नाम कहाँ हो/जो बूझ लिए जाओ शरमाओ मत।" इसमें कवि के मनोभाव अत्यंत तीव्र भावावेग में प्रस्तुत हुए हैं। यहाँ व्यक्त संवेदन के कई मानी हो सकते हैं। यक़ीनन इन पंक्तियों पर सह्रदयी विरमण वायोलिन से निकलने वाली धुनों से कई मायनों में सुंदर अर्थ को संकेतित कर सकता है। लेकिन थोड़ी-सी भी ग़फ़लती अर्थापन के अनुरणन को विपरीत स्थिति में ले जा सकती है। शमशेर की कविता में शब्द और अर्थ का संक्रमण कर जाना ही, उनकी काव्यगत विशेषता है। शब्द और अर्थ के विन्यास को 'कवि घंघोल देता है' और बिम्ब कई वृत्तों में उभारता है। शब्द और अर्थ-वैभिन्य की ही तरह शमशेर के बिम्ब भी स्थिर नहीं हैं, क्योंकि शमशेर की मानें तो 'जो स्थिर है, शव है।' ऐसे में पाठक का सदसद्विवेक ही अर्थापन में साधक और उसका अतिस्वन (सूपर सॉनिक) बाधक हो सकता है। शमशेर के कवि की मनःस्थिति को तब पकड़ा जा सकता है - 'जब मथेगा प्रेम सागर'। लेकिन मंथन के लिए आवश्यक है, कवि के संज्ञान से जुड़ना!
शमशेर की कविता से रू-ब-रू होने के लिए 'दो पंक्तियों के बीच' निहित अर्थवत्ता की शिनाख़्त जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है, उनके विज़न और विचारधारा की तफ़्तीश! लेकिन कवि मलयज ने शमशेर के लिए कहा है कि, 'शमशेर मूड्स के कवि हैं, किसी विज़न के नहीं।' प्रश्न यह उठता है कि क्या बिना विज़न/जीवन-दृष्टि के भी भला कोई कविता रचना संभव हो पाता है? जहाँ तक बात विचारधारा की है, शमशेर ने सन् 1951 के दूसरे तारसप्तक में प्रकाशित उनकी 20 कविताओं के साथ दिये गये वक्तव्य में अपनी विचारधारा और पक्षधरता को रेखांकित किया है। बक़ौल शमशेर - "उसको (यानी कि अपने चारों तरफ की ज़िंदगी को) ठीक-ठाक यानी वैज्ञानिक आधार पर (मेरे नज़दीक वह वैज्ञानिक आधार मार्क्सवाद है) समझना और अनुभूति और अपने अनुभव को इसी समझ और जानकारी से सुलझा कर, स्पष्ट करके, पुष्ट करके अपनी कला-भावना को जगाना। यह आधार इस युग के हर सच्चे और ईमानदार कलाकार के लिये ज़रूरी है।" ('दूसरा सप्तक', पृ. 80) मेरे विचार में विचारधारा से ही क़िस्म-क़िस्म के विज़न पनपते हैं। अतः शमशेर में केवल 'मूड्स' नहीं बल्कि उसके साथ-साथ विज़न भी मौजूद है, तभी तो शमशेर लमहे-लमहे के भीतर (बीच) के प्रवाह को पकड़ने और उसे अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम हैं। शमशेर के एक और वाक्यांश का मुलाहज़ा हो - "अनलेस यू आर इंटरेस्टेड इन द डीपर प्रोबलम्स ऑफ सोसायटी यू आर नॉट कंप्लीट, आपका ड्राइंग रूम लिटरेचर हो जाएगा।" यद्यपि यह वक्तव्य मोहन राकेश के संबंध में दिया गया है ; तथापि ग़ौरतलब है कि कवि जब 'प्रोबलम्स' और 'कंप्लीटनेस' की बात करता है, तो बिना प्रतिबद्धता और विज़न के वह कैसे संभव हो पाएगा? शमशेर ने एक ज़गह लिखा है - "कलाकार स्वयं को बदलेगा, बदलेगा, एक माध्यम बनाने के लिए, अपने को एक अत्यधिक sensitive माध्यम, सक्षम दृष्टा, poet in ancient sense, a maker घोर रूप से - तभी... और इसी हद तक वह अपने पाठक को - अपना जितना भी छोटा या बड़ा परिवेश है, उसे प्रभावित कर सकेगा, कुछ बदलने के लिए।" ऐसे में बदलने की चाह और विज़न के अतर्संबंध को अलग से विवेचित करने की आवश्यकता नहीं।
शमशेर के विज़न को स्पष्ट करने के लिए उनकी 'बाढ़ 1948' शीर्षक से प्रकाशित कविता को देखा जा सकता है। तथ्यतः यह कविता कसमसाहट से भरपूर है। इस कविता में कवि ने एक विशेष विज़न के तहत तमाम तथाकथित प्रचलित मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया है। मुक्तिबोध ने मठ और गढ़ को तोड़ने की बात की थी लेकिन यहाँ पर शमशेर लफ़्फाज़ क़िस्म की प्रवृत्ति से बचने की माँग करते हुए जीवन के बुनियादी सच से बावस्ता कराते हैं। यह कविता एक ओर प्रलय से घिरे व्यक्ति की मनोदशा का चित्रण करती है, वहीं दूसरी ओर जिजीविषा को भी प्रकट करती है - एक विज़न के तहत।
वक़्त को जी भर जी जाने की अदम्य क्षमता रखने वाले इस शख़्स की कविताएँ तमाम तरह के बैरियरों को फँलागते हुए, जीवनगत यथार्थ को एक पारदर्शी प्लैटफार्म पर प्रस्तुत करती हैं। शमशेर की कविता में प्रयुक्त शब्द और उन शब्दों में निहित अर्थों की संभावनाओं को कई वृत्तों में देखा जा सकता है। मानो शमशेर के लिए शब्द कभी अँटते ही नहीं, वे उनके समक्ष बिछ जाते हैं और पाठकों के लिए अनगिनत अन्वितार्थों की शिनाख़्त कठिन प्रस्तर से गुज़रने जैसा प्रतीत होता है। शमशेर के लिए शब्द का चयन मानो संपूर्ण सृष्टि की सहर की मुआफ़िक जान पड़ता है। और इस सहर के अनंतर कोई शब्द प्रयुक्त होता है - बहुत सोच-समझ कर। लेकिन प्रयुक्त होते हुए, वह कई क्षणों को जीता है और तत्पश्चात एक रूपाकार धारण करता है। प्रयुक्त शब्द का लबोलहज़ा भले ही परिपाटी का निर्वाह करने वाला हो, लेकिन अर्थ-वैभिन्य में वह कई नूतन संदर्भों को उजागर करने वाला होता है। ऐसे में कविता में अभिव्यक्ति पा गये शब्दों की भावभूमि की तफ़्तीश में किसी भी तरह का अनुयोग कितना उचित है? इसीलिए शमशेर लिखते हैं - "उसने मुझसे पूछा, तुम्हारी कविताओं का/मतलब क्या है?/मैंने कहा, कुछ नहीं।/उसने पूछा, फिर तुम इन्हें क्यूँ लिखते हो?/मैंने कहा, ये लिख जाती हैं।/उसने मुझसे पूछा, इन शब्दों का/क्या मतलब है?/मैंने कहा ; शब्द!/कहाँ हैं?" कविता में व्यक्त शब्दों में एक मौन वास्तव्य करता है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है अथवा जिसके साथ समरस हुआ जा सकता है, या कहें केवल आस्वादन किया जा सकता है। उस मौन को व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। इसीलिए अज्ञेय भी लिखते हैं - "मुझे तीन दो शब्द/कि मैं कविता कह पाऊँ/एक शब्द वह/जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ/और दूसरा ;/जिसे कह सकूँ/किन्तु दर्द मेरे से/जो ओछा पड़ता हो।/और तीसरा ;/खरा धातु/पर जिसको पाकर पूछूँ/क्या ना बिना इसके भी काम चलेगा?/और मौन रह जाऊँ।" ('सदानीरा' भाग-1, पृ. 284) उल्लेखनीय है कि इस मौन के साथ राजशेखर द्वारा वर्णित 'सतृणाभ्याहारी' तादात्म्य स्थापित नहीं कर सकता। तादात्म्य स्थापित करने के लिए सह्रदयी होना अत्यंत अनिवार्य है। तभी कविता का अर्थ और मर्म प्रकाशित भी होगा और प्रभावित भी करेगा। इस प्रक्रिया से गुज़रते हुए रसोद्रेक से व्यक्ति का मन पूर-पूर हो उठता है व हिलोरे लेने लगता है और रसिक पाठक अनायास ही कह उठता है - 'पीपल पात सरिस मन डोला...'(गोस्वामी तुलसीदास)। और किसी भी कला का यही चरम सत्य है। शमशेर की कविता को पढ़ते हुए मन की स्थिति इसी चौपाई जैसी हो जाती है। अत्यंत चलताऊ और फ़िल्मी अंदाज़ में कहा जाए तो हमारी स्थिति 'मन डोले मेरा तन डोले रे, दिल का गया करार रे, कौन बजाए बाँसुरियाँ!' जैसी हो जाती है। इसका एक कारण शमशेर की कविता में विद्यमान तेजस्क्रिय गीति तत्व और संगीत की मात्राएँ, तालबद्ध शिल्प भी है। जब मिलता है दरिया सागर से, फिर वह दरिया नहीं रह जाता। हम शमशेर के काव्य-जगत में प्रवेश कर शब्द-सागर के अर्थ-वैभिन्य के बावजूद भी कवि के भावबोध के साथ अंतर्संबंध स्थापित करते हुए तदाकार और समरस हो जाते हैं। मन का डोलना और वह भी पीपल के पत्ते की तरह डोलना शमशेर सहज संभव बना देते हैं। सम्भवतः इसीलिए अंग्रेज़ी समीक्षा का हवाला देते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं - "कलाओं का चरम साध्य संगीत की स्थिति को उपलब्ध कर लेना है, यानी रचना में वस्तु और रूप एक दूसरे में विलीन हो जाएँ। शमशेर की कविता में संगीत की मनःस्थिति बराबर चलती रहती है। एक ओर चित्रकला की मूर्त्तता उभरती है, और फिर वह संगीत की अमूर्त्तता में डूब जाती है।" ('हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास', पृ. 205)
उपरोक्त तथ्य से अलहदा कविता के साथ तादात्म्य स्थापित करने के संबंध में एक और तर्क यह भी हो सकता है कि, कला में रेखांकित क्षणों को जीने की अदम्य लालसा/लिप्सा ही उसमें निहित मर्म तक पहुँचाने में मददगार होती है। वास्तविक अर्थों में कविता मुक्ति की कामना और साधना है। इसी के मद्दे नज़र शुक्ल जी ने भी कहा है कि, 'मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं।'
लेव तोल्सतोय ने 'बाह्य संकेतों से' अपने 'अनुभूत भाव' को सम्प्रेषित करने के उद्देश्य में कला के आरंभ की छानबीन की है, वहीं प्लेखानव ने निश्चित बिम्बों में 'अपनी पार्श्विक यथार्थता के प्रभाव के अन्तर्गत अनुभूत भावों और विचारों' में कला के आरंभ की तफ़्तीश की है। शमशेर ने एक ओर शब्दसेतु के सहारे अपनी अनुभूति की तीव्रता को तात्कालिकता और प्रसरणशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, वहीं दीग़र तथ्य यह कि 'क्रांतियाँ, कम्यून,/कम्युनिस्ट समाज के/नाना कला विज्ञान और दर्शन के/जीवंत वैभव से समन्वित/व्यक्ति मैं' कहकर अपने अंतःकरण की भावात्मक अभिव्यंजना के समानांतर पार्श्विक यथार्थता और वैचारिकी को भी प्रस्तुत किया है। कवि के भाव-विचार-अनुभूति-स्वप्न-स्मृतियाँ-संज्ञान चाक्षुष बिम्ब का रूप धारण कर पाठक के अंतर्मन तक की यात्रा तय करते हैं, तदनंतर अंतर्मन में आलोड़न की प्रक्रिया से गुज़रकर ठोस रूप धारण करते हैं। यह है शमशेर के काव्य का सत्य एवं सौंदर्य!
ब़हरहाल, सौंदर्य के अनूठे चितेरे होने के बावजूद भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं थे। 'अज्ञेय से...' कविता का मुलाहिज़ा हो - "जो नहीं है/जैसे कि सुरूचि/उसका गम क्या?/वह नहीं है।/किससे लड़ना?" कविता में एक अंडरटोन प्रवाहमान है और वह पूरी तीव्रता (इंटेन्सिटी) के साथ मौजूद है। शमशेर के शब्द-विधान की यही विशेषता उनके काव्यगत सौंदर्य को उदात्त रूप प्रदान करती है। इसी संदर्भ में शमशेर की एक और कविता 'एक आदमी दो पहाडों को कुहनियों से ठेलता' जो सन् 1956 में प्रकाशित हुई थी और जिसका उल्लेख न के बराबर हुआ है, की ओर ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है - "एक आदमी दो पहाडों को कुहनियों से ठेलता/पूरब से पच्छिम को नापता/बढ़ रहा है/कितनी ऊँची घाँसे चाँद-तारों को छूने-छूने को है/जिनसे घुटनों को निकालता हुआ बढ़ रहा है/अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ/फिर क्यों/दो बादलों के तार/उसे महज़ उलझा रहे हैं?" कविता का सौंदर्य विरोधाभास से उभरता है। कविता की पंक्ति 'कुहनियों से पहाड़ों को ठेलना' जहाँ व्यक्ति के संघर्ष-बोध को दर्शाती है, वहीं 'पूरब से पच्छिम को नापता' पूरब और पश्चिम के जीवन-मूल्यों के पार्थक्य को रेखांकित करते हुए, दोनों की सभ्यता-संस्कृति में विद्यमान भावनात्मकता और चेतनात्मकता की गहरी खाई को पाटने और पूरबवासियों की उलझनों को भी संकेतित करती हुई संघर्ष और सौंदर्य की अपनी तरह की अनूठी कविता है। इस तरह इनकी अन्य कविताओं में भी कई अर्थों, प्रसंगों, स्थितियों के अनगिनत रूप व परवलय (पैराबोला) देखे जा सकते हैं।
अपर्याप्तता के विरूद्ध विद्रोह को यदि कला कहा जाए, तो शमशेर ने कला में निखार लाने के लिए भी कई स्तरों पर विद्रोह किया है। काव्य-परम्परा का निर्वाह करते हुए भी नूतनता को उनकी कविताओं में सहजवत देखा जा सकता है। कविता में कवि का व्यक्तिगत यथार्थ एवं जीवनानुभूति के तरल अंश मौजूद होते हैं। जीवन-जगत् के यथार्थ को जिस रूप में अन्य कवियों ने प्रस्तुत किया है, शमशेर हर रूप/स्तर पर भिन्न हैं। मार्क्सवाद का पक्षधर कवि जब कहता है - "कवि घंघोल देता है/व्यक्तियों के जल/हिला-मिला देता है/कई दर्पनों के जल' तो वह पारखी निगाहों से स्वप्न, प्रकारान्तर से दिवास्वप्न (फैंटसी) रचता नज़र आता है। पूँजी के जनतांत्रिक और प्रवाहमयी युग में सत्ता के केन्द्रीकरण के चलते मरजीवा मार्क्स का समतामूलक समाज का नज़रिया कितना सफल हो सकता है? कह पाना कठिन है। लेकिन कवि उपरोक्त कविता में उसी आदर्श को गढ़ता दिखाई देता है। वहीं एक आयाम यह भी नज़र आता है कि शमशेर लौकिक और दीर्घकालिक सत्य उजागर करने वाले कवि हैं। अतः उनके आदर्श समाज का सपना किसी भी समय और संदर्भ का भेदन करते हुए दिग्दिगंत लागू होने वाले क्षणों को घंघोल देता है। यहाँ प्रस्तुत आदर्श तुलसी के आदर्श की परिकल्पना से हर मायने में भिन्न और समय का अतिक्रमण करने वाला है। बक़ौल शमशेर कवि स्वयं को 'एक अत्यधिक sensitive माध्यम, सक्षम दृष्टा' के रूप में प्रकट करता है। यही विज़न शमशेर को अन्यों से अलहदा और ख़ास कर देता है। लेकिन यदि आइ. ए. रिचर्ड्स के काव्य-सृजन से संबंधित वक्तव्य 'Very likely the unconscious processes are more important than the conscious.' के मद्दे नज़र शमशेर के 'कवि घंघोल देता है' का मूल्यांकन किया जाय, तो इसमें चेतन-अचेतन की कशमकश दिखाई देती है। इसीलिए यह कलाकार का सजग स्वप्न है या दिवास्वप्न या विज़न या आदर्शोन्मुख यथार्थ तय कर पाना कठिन हो जाता है। शमशेर को 'मौन का कवि' कहने के पीछे सम्भवतः यही कारण रहा होगा कि पाठकों के लिए कुछ भी तय कर पाना मुश्किल-सा प्रतीत होता है। कुछ भी हो सकता है और 'कुछ नहीं' भी हो सकता है की स्थिति बरकरार है। उनके शब्द-काव्य संधान में एक तरह से 'फिसलन से भरी हुई है।' और 'मैं/एक गुमशुदगी को प्यार/करता हूँ' तो यह गुमशुदगी उनकी कविता में भी विद्यमान है।
बावजूद इसके शमशेर के काव्य की एक और अन्यतम विशेषता यह भी है कि 'काल से होड़' लेते हुए भी वह स्वयं को हर रूप में अवयस्क होने से बचाती है। अरस्तू ने लिखा है - "But the poets imitations or pictures of life are not unreal - 'twice removed from reality' - As Plato believed. On contrary, they reveal truths of a permanents or universal kind." ('एन इंट्रोडक्शन टू इंग्लिश क्रिटिसिज़्म', मैकमिलन, 1989, पृ. 12) इसमें व्यक्त सर्वत्रव्यापीपन शमशेर की कविताई में दृष्टिगोचर होता है। शेक्सपियर के लिए कहा गया है कि, 'समूचे दोज़ख, समूची धरती और समूचे स्वर्गलोक को उसने छाना है।' तो यह बात शमशेर पर भी प्रकारान्तर से लागू होती है। शमशेर ने अभिव्यक्ति के लिए पूरे ब्रह्मांड की सहर की है और अत्यंत कुशलता से शब्द-चित्र प्रस्तुत किये हैं। उनकी कविताओं में नानाविध नूतन प्रतिमानों को देखा जा सकता है। मुक्तिबोध ने भी अपनी परम अभिव्यक्ति के लिए 'खोजता हूँ पठार... पहाड़... समुंदर' कहकर लगभग ब्रह्मांड की ही सहर की है और मानवता के इतिहास से अंधेरे को अनावृत्त करने की पूरी शिद्दत से कोशिश की है। वहीं शमशेर वैश्वक संदर्भों की महीन-से-महीन परतों के समानांतर 'अपनी यादों की पुस्तक' खोलते हैं और जीवन को गति प्रदान करते हैं। शमशेर की इसी विशेषता की वज़ह से उनकी कविताएँ प्रसंगानुरूप मुहाविरा बन जाया करती हैं। शायद इसीलिए भी कि शमशेर इस बात के हिमायती रहे हैं कि 'रचना की महत्ता तभी है, जब रचना भीतर से पूरी तरह पकने के बाद निकलती है, तो वह सही बात कहते हुए सही बिंदु पर और सही दिशा में आगे बढ़ती है।'
अंतर्मन में आलोड़न 'मानस-तल में कसमस', बाहर जीवन में परिस्थितियों की कशमकश होते हुए भी ज़िंदगी के शफ़क़ टुकड़ों से तदाकार तभी संभव है, जब हम शमशेर के अनुभवों से, 'कटु-मादक-तम' से गुज़रते हैं और अंतर-बाहर दोनों का मेल करते हैं। वाद्ययंत्र अनायास झंकृत हो उठते हैं, दिलो-दिमाग के स्पंदनों की 'इंटेन्सिटी' भी बढ़ जाती है और फिर हमारा मन हल्की-सी बयार से भी पीपल के पत्ते की तरह डोलने व शमशेर के ताल से ताल मिलाने लगता है। यही तो है शमशेर की शमशेरियत!
Peepal Paat Saris Mann Dola: Shamsher ko Padhate Huye"
published in 'Setu' (ISSN 2249-2860) July-December 2014,
Issue-17 (pp 75-81). Editor: Dr. Devendra Gupta,
Aashray, Khalini, Shimla-171 002 (HP)