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व्यंग्य

बुश के समर्थन में
राजकिशोर


अगर दुनिया के दस सबसे बदनाम व्यक्तियों की सूची बनाई जाए, तो उस सूची में चचा जॉर्ज बुश का होना लाजिमी है। नहीं तो उस सूची को निष्पक्ष नहीं माना जाएगा। सूची की निष्पक्षता पर सवाल उठानेवालों में सबसे बड़ी संख्या अमेरिकी लोगों की होगी। कारण स्पष्ट है। चचा जान को हमने देर से जाना है। उनके जहीन बयानों में से कुछ ही हम तक पहुँच पाते हैं, लेकिन अमेरिकी लोगों को तो लगभग रोज ही बुश की सूक्तियों का सामना करना पड़ता है। अन्तरजाल पर ऐसे दर्जनों वेबसाइटें हैं, जहाँ इन सुभाषितों को जमा किया जाता है। मेरा अनुमान है, इससे अनेक लोगों का मनोरंजन होता होगा। लेकिन जब मनोरंजन करनेवाला व्यक्ति ह्वाइट हाउस में रहता हो, तो हँसी से ज्यादा झुँझलाहट होती है। लेकिन इस मामले में मैं अमेरिकी जनता के साथ सहानुभूति नहीं दिखा सकता। सब कुछ जानते हुए भी जब उसने चचा को दूसरी बार भी चुन लिया, तो उसके आँसू बीननेवाले हम कौन होते हैं? 'बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय' जैसी कहावत क्या यूएस इंग्लिश में नहीं होती होगी? ऐसी जरूरी कहावतों के बिना क्या किसी समाज का काम चल सकता है? अमेरिका को तो इस तरह की कहावतों की सख्त जरूरत है, क्योंकि बबूल बोते रहना वहाँ की सरकारों का सबसे प्रिय शगल हैं। अगर वे बेवकूफी में नहीं, जान-बूझ कर ऐसा कर रहे हैं, तो खुदा उन्हें कभी माफ न करे। लेकिन इस मामले में हम खुदा को क्या सलाह दे सकते हैं? अमेरिकी सरकारों की कारगुजारियों के बारे में वह हमसे बहुत ज्यादा जानता होगा।

कुछ समय से प्रबुद्ध भारतीय चचा जान से नाराज हैं। शिष्टाचार का तकाजा है कि दूसरे की थाली पर नजर न फेरी जाए। कहते हैं कि दूसरे की थाली में घी हमेशा ज्यादा नजर आता है। हमारे चचा जान की नजर भी कुछ ऐसी ही है। लेकिन ऐसा हो कैसे सकता है? सब कुछ के बावजूद हम अभी भी विकासशील देश हैं। तमाम तरह की अविकसित क्रियाएँ करते रहने के बावजूद अमेरिका विकसित देश है। सो वहाँ की क्वार्टर थाली भी हमारी फुल थाली से ज्यादा बड़ी होगी। फिर भी चचा बुश का कहना है कि भारत के तीस करोड़ लोगों की जेबों में काफी पैसा आ गया है और वे अपनी थाली का आकार लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। इसी से दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ रही है। दो-तीन दिन बाद उन्होंने फरमाया कि इंडिया के लोग पेट्रोल भी ज्यादा पी रहे हैं, इसलिए तेल की अन्तरराष्ट्रीय कीमतों में इजाफा रहा हैं। इससे खाते-पीते भारतीयों के बदन में आग लग गई। वे चचा जान को कोसने लगे। कौन नहीं जानता कि अमेरिकी दुनिया के सबसे पेटू लोगों में हैं। पुराने पेटुओं को क्या अधिकार है कि वे नए और विकासशील पेटुओं की आलोचना करें? इक्कीसवीं सदी का नारा होना

चाहिए : दुनिया के पेटुओ, एक हो।

इस विवाद को पढ़कर मैं अपने देश के बारे में सोचने लगा। अन्तरराष्ट्रीय कीमतों की मेरी जानकारी बहुत सीमित है। असल में आजकल मैं अन्तरराष्ट्रीय से ज्यादा राष्ट्रीय होना चाहता हूँ। बात यह है कि ग्लोबलाइजेशन के बाद अन्तरराष्ट्रीय लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। सो मैंने सोचा कि कुछ लोगों को तो राष्ट्रीय रहना चाहिए। सो मैं इस टोली में आ धँसा। राष्ट्रीय का मतलब है कि मुट्ठी भर लोगों के हितों के बारे में न सोचा जाए। देश के सभी लोगों के हितों के बारे में सोचा जाए। जब मैं इस मोड में विचार करने लगा, तो मुझे जान पड़ा कि चचा बुश के उपर्युक्त बयानों से हम कुछ सीख ले सकते हैं। चचा आखिर चचा हैं। परिवार के आदमी हैं। कुछ कहा है तो सोच कर ही कहा होगा। सोच कर नहीं कहा है, तब भी उनकी बात में कहीं दम दिखाई दे रहा है, तो उसे ग्रहण करना बेजा कैसे है?

वैसे मुझे चचा बुश के गणित पर शक है। वे भारत के मध्य वर्ग की साइज तीस करोड़ मानते हैं। मैं बीस करोड़ से ज्यादा पर राजी नहीं हूँ। जिसे मध्य वर्ग मान लिया जाता है, उसकी अंदरूनी हालत मुझे खूब पता है।

बहरहाल मैं सोचने यह लगा कि अगर भारत का एक औसत मध्यवर्गीय आदमी औसतन रोज एक अंडा, पचास ग्राम गोश्त (मुर्गा, बकरी, मछली, प्रॉन आदि को मिला कर), दो किलो अनाज और दो फल खाता है, आधा किलो दूध, दो प्याला चाय और दो सौ बूँद शराब पीता है, आधी सिगरेट फूँकता है, एक बटा दस कार में चलता है, साल में एक बार रेल यात्रा करता है, एक तोला सोना खरीदता है, महीने में एक बार दो सौ रुपए स्कूल फी भरता है, आधा बार सिनेमा जाता है, उसके घर में एक अदद टीवी है, एक अदद सोफा सेट है, दो बेड हैं, आधा फ्रिज है, एक अलमारी है, एक बिजला का पंखा है, तीन ट्यूबलाइटें हैं, बीस बरतन हैं, दो दर्जन कपड़े हैं, पानी का एक नल है, सौ ग्राम सोने के जेवर हैं, एक बटा पाँच मोबाइल फोन है आदि-आदि, तो देश के कुल सवा अरब लोगों को ये बुनियादी सुविधाएँ जुटाने में कितने प्रकाश-वर्ष लग जाएँगे?

मेरा गणित वह भी पूछता है कि क्या भारत के पास इतने संसाधन हैं भी कि देश के सभी लोगों को वर्तमान मध्यवर्गीय रहन-सहन के स्तर पर लाया जा सके? इतना दूध कहाँ से आएगा? इतने सोफा सेट बनाने के लिए लकड़ी कहाँ से आएगी? इतनी बिजली कौन पैदा कर सकता है?

तो क्या हमें अभी से उपयोग में संयम बरतना शुरू कर देना चाहिए? चचा की सलाह तो यही है। आप कहेंगे, वे अमेरिकियों को यह सलाह क्यों नहीं देते कि वे भी अपना पेटूपन जरा कम करें? बेशक सलाह की शुरुआत अपने घर से ही करनी चाहिए, लेकिन फेफड़े के कैंसर से पीड़ित कोई व्यक्ति धुआँधार सिगरेट पीते हुए हमें सलाह दे कि सिगरेट नहीं पीनी चाहिए, तो उसकी बात क्या कुछ कम विचारणीय हो पाती है?


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