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व्यंग्य

सच का सामना
राजकिशोर


एक सच कई दिनों से मेरा पीछा कर रहा है। बहुत दिनों तक मैंने सच का पीछा किया था। समझ लीजिए, बचपन से ही। अब इस काम में मेरी रुचि नहीं रही। मैंने हर क्षेत्र में पाया कि सच बहुत भयानक है। राजनीति में, आर्थिकी में, समाज में, शिक्षा व्यवस्था में, नौकरी के तंत्र में, पत्रकारिता में, मीडिया में, बुद्धिजीवियों में, धर्माचायों में, श्रमिक नेताओं में, विवाह में, विवाह के बाहर, प्रेम में, अप्रेम में, श्रद्धा में, श्रद्धाहीनता में, कार्यालयी दोस्तियों में, साहित्यिक दुश्मनियों में, अधेड़ों में, युवाओं में, बच्चों में, व्यवसाय में, उद्योग में, ठेकेदारी में और यहाँ तक कि वात्सल्य में भी। सच की खोज करते-करते मैं घबरा गया। अन्त में मैंने यूटोपिया की शरण ली। पर वहाँ भी घपला था। किसी भी यूटोपिया को मैंने परफेक्ट नहीं पाया। सब में कुछ न कुछ गड़बड़ी थी। तब मैंने निश्चय किया कि सच और झूठ के चक्कर से बाहर निकल आना चाहिए। जैसे हम आलू या गोभी को लेते हैं, वैसे ही मैं आदमियों को लेने लगा। वे भी मुझे आलू या गोभी की तरह ही लेते थे। इस तरह जो समीकरण बना, वह ज्यादा यथार्थ, ज्यादा कामकाजी था। इस रास्ते में शुरू में बहुत उलझन थी, पर एक बार मूल सिद्धान्त को मान लेने के बाद जीना आसान हो जाता है। लेकिन सच के दायरे से बाहर निकल आने के बाद आप सच से मुक्त थोड़े ही हो जाते हैं। जब आप सच का पीछा करना छोड़ देते हैं, तब सच आपका पीछा करना शुरू कर देता है।

शुरुआत एक छोटी-सी घटना से हुई थी। हम लोग एक पार्टी में बैठे थे। खाना जितना लजीज था, संगत उससे कहीं ज्यादा लजीज थी। मेरे सिवाय सभी अपने-अपने क्षेत्र के मास्टर थे। अचानक किसी के मुँह से यह सवाल उछला, क्यों न हम लोग एक-एक कर बताएँ कि हमने अपनी जिंदगी में किसे तहे-दिल से प्यार किया है? विषय बहुत मजेदार था। प्यार होता ही मजेदार है। दो-चार मिनट की खामोशी के बाद हरएक ने बताना शुरू किया कि उसने किसे सबसे ज्यादा प्यार किया था। किसी ने कहा, कला को, तो कोई बोला, साहित्य को। किसी को अपनी बीवी सबसे प्यारी लगी थी, तो किसी ने उस लड़की के बारे में बताया जो उसकी जिंदगी में आई, पर परिवार में नहीं आ सकी। किसी ने अपने शिक्षक का नाम लिया, तो किसी ने अपनी माँ को यह ओहदा दिया। एक ने अपने एक दोस्त को सबसे ज्यादा प्यार किया था, तो एक किसी फिल्म अभिनेत्री पर मरता था। क्रिकेट और टेनिस का भी जिक्र हुआ। सिर्फ दो आदमी कुछ बोल नहीं पाए। उस महफिल में एक ही स्त्री थी। वह बहुत फ्रैंक और बिंदास थी। पर उसकी जबान खुली ही नहीं। दोस्तों ने बहुत इसरार किया, पर उसकी आँखों में खालीपन भरा हुआ था। जब जिदें बढ़ चलीं, तो वह वॉशरूम की तरफ चली गई। लौटी, तो लगा, वह खूब रो कर आई है। उसकी आँखों का सूनापन और बढ़ गया था।

दूसरा मैं था। मेरे पास भी कोई जवाब नहीं था। मैंने कुछ कहने के लिए कई बार मुँह खोला, फिर रुक गया। मैं समझ रहा था कि अभी तक जिन लोगों ने अपने-अपने प्रेम-पात्रों का नाम लिया था, उनमें से किसी ने भी पूरा सच नहीं कहा था। या वह सच कहा था, जो सिर्फ उनकी निगाह में सच था। पर मैं इस मौके पर झूठ नहीं बोलना चाहता था। या, यों कहिए कि मैं जो भी बोलना चाहता था, वह उसी क्षण झूठ लगने लगता था।

बस उसी समय से सच का सामना मेरे गले लग गया। चार-पाँच दिनों तक सवाल वही था जो वहाँ पूछा गया था यानी तुमने सबसे ज्यादा किसे प्यार किया है? फिर उसका रूप बदल गया। अब सच की चुनौती यह थी : क्या तुमने किसी को प्यार किया भी है? मैंने अपने आपको कभी कोई उत्तर दिया, कभी कोई। व्यक्तियों से लेकर साहित्य, अध्ययन, बौद्धिकता और समाज, राष्ट्र, विश्व, मानवता आदि से होते हुए लोकतंत्र, समाजवाद, बराबरी आदि विषयों के इर्द-गिर्द मँडराता रहा। सत्य को प्यार किया है या नहीं, इस पर तो पूरे दो दिन सोचता रहा। लेकिन कोई सन्तोषजनक जवाब नहीं मिल सका। फिर यह हैरत होने लगी कि ऐसा कैसे हो सकता है कि मैंने इतना लंबा जीवन जिया और किसी को प्यार ही नहीं किया हो! यह अगर सच है, तो शर्म की बात है। प्यार पर ही तो यह दुनिया टिकी हुई है। जिसकी जिंदगी में प्यार नहीं आया, उसका जीना न जीना बराबर है।

अन्त में उत्तर मैंने खोज ही लिया। वह बहुत सीधा-सादा था। मैंने अपनी डायरी में लिखा : हाँ, मैंने एक आदमी को तहे-दिल से प्यार किया है। वह मैं खुद हूँ। उसके बाद कुछ देर तक डायरी के उस पन्ने को घूरता रहा। फिर लिखा : नहीं, अपने आपको भी मैंने तहे-दिल से प्यार नहीं किया।


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