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व्यंग्य

ईमानदारी बनाम समझदारी
राजकिशोर


बहुत दिनों से कॉमरेड से मुलाकात नहीं हुई थी। उसकी खबर जरूर आती रहती थी। खबर हमेशा खुशनुमा नहीं होती थी। इसलिए मैं उसे परेशान नहीं करना चाहता था। मेरा नियम यह नहीं है कि जब कोई मुसीबत में हो, तो उसे अकेला छोड़ देना चाहिए। लेकिन कॉमरेड का मामला अलग है। मैं जब भी उसकी सहायता करने की कोशिश करता हूँ, वह थोड़ा और परेशान हो जाता है। उसे राजनीति करनी है। अतः नैतिक सवालों में घसीटना उसे दुखी करना है। इसलिए भरपूर प्यार के बावजूद मैं उससे थोड़ा दूर-दूर ही रहता हूँ। कह सकते हैं कि हमारे संबंध के बने रहने में इस दूरी का भी महत्व है। लेकिन दूरी की खूबसूरती इसी में है कि उसे बीच-बीच में झकझोर दिया जाए। इसीलिए कभी वह मेरे घर आ जाता है, कभी मैं उसके घर चला जाता हूँ।

उस शाम कॉमरेड के घर पहुँचा, तो पता चला कि वह सो रहा है। यह नई बात थी। क्रांतिकारी दिन में तो क्या, रात को भी नहीं सोते। इस मामले में वे साधु की तरह होते हैं। साधु के बारे में कबीर की मान्यता यह है कि वह रात भर जागता है और रोता रहता है। फर्क यह है कि क्रांतिकारी रोता नहीं है, रुलाने की योजनाएँ बनाता रहता है। लेकिन मेरा कॉमरेड दोनों से ही भिन्न है। वह ठीक समय पर जगता है और ठीक समय पर सोता है। बीच में जनवाद के मूल्यों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करता रहता है। इसलिए यह जान कर मुझे हैरत हुई कि जब पूरी दिल्ली दफ्तर से निकल कर घर जा रही है, वह खर्राटे भर रहा है। मैंने भाभी से कहा कि उसे जगा दो, आया हूँ तो भेंट करके ही जाऊँगा। भाभी जगाने गई, पर खाली हाथ लौट आई। उसने कहा, गहरी नींद में हैं। आपका नाम लिया, तो बोले, उसे यहीं भेज दो। फिर आँखें मूँद लीं।

मैं गया। वह अब भी सो रहा था। भाभी चाय वहीं ले आई। शायद यह चाय की खुशबू थी जिसने कॉमरेड को आँख खोलने पर मजबूर कर दिया। उसने उलाहना दिया, अकेले-अकेले चाय पीते शर्म नहीं आ रही है? मैंने कहा, उठो तो तुम्हें भी चाय मिल जाएगी। कॉमरेड बोला, सोने दो, यार। बहुत दिनों के बाद ऐसी गाढ़ी नींद आई है। मैंने जानना चाहा, आखिर बात क्या है? कोई अच्छी घटना हुई है क्या? क्या पोलित ब्यूरो में तुम्हें शामिल किया जा रहा है? उसने बताया, नहीं, उससे भी बड़ी घटना हुई है। हमें एक ईमानदार प्रधानमंत्री मिल गया है। मैं चकराया, क्या यह तुम्हें अब मालूम हुआ है। कॉमरेड बोला, हाँ। तुमने पढ़ा नहीं, कॉमरेड करात का बयान आ गया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि हम प्रधानमंत्री का बहुत सम्मान करते हैं; उनकी ईमानदारी सन्देह से परे है। इसीलिए मैं निश्ंिचत होकर सो रहा था। इससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है कि देश का नेतृत्व ईमानदार हाथों में है। तब तक उसके लिए भी चाय आ गई। लेकिन वह उठा नहीं। लेटे-लेटे ही चाय की चुस्की लेता रहा और मुझसे बात करता रहा।

- फिर प्रधानमंत्री से तुम लोगों का विवाद क्या था?

- विवाद? कैसा विवाद? मतभेद को तुम विवाद नहीं कह सकते।

- अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर तुम्हारी पार्टी ने प्रधानमन्त्री को क्या नहीं कहा?

- यह हमारी ईमानदारी थी कि हमने अपने दृष्टिकोण को छिपाया नहीं। यह प्रधानमंत्री की ईमानदारी थी कि वे भी अपने दृष्टिकोण पर अडिग रहे। वे अब भी अपने दृष्टिकोण पर अडिग हैं जैसे हम अपने दृष्टिकोण पर अडिग हैं। वे हमारी ईमानदारी की प्रशंसा भले न करें, पर हम उनकी ईमानदारी की तारीफ करते हैं।

- लेकिन अर्थनीति के सवाल पर भी तो तुम दोनों के बीच गंभीर मतभेद हैं। प्रधानमंत्री का कहना है कि इस मतभेद की वजह से देश का विकास रुका हुआ है।

- वे ठीक कहते हैं।

- वे ठीक कहते हैं?

- हाँ, सौ बार हाँ। यह भी हम दोनों की ईमानदारी का सबूत है। वे अर्थव्यवस्था को एक दिशा में ले जाना चाहते हैं, हम दूसरी दिशा में ले जाना चाहते हैं। वे भी अपने स्तर पर ईमानदारी से सोचते हैं, हम भी अपने स्तर पर ईमानदारी से सोचते हैं। इसीलिए तो हमारा साथ निभता जा रहा है। हमारा संबंध अवसरवाद पर नहीं, ईमानदारी पर टिका हुआ है। हम उनकी आलोचना ईमानदारी से करते हैं, वे हमारी आलोचना ईमानदारी से करते हैं। यह ईमानदारी ही बिरला सीमेंट की तरह हमें सख्ती से जोड़े हुए है। यह साथ पूरे पाँच साल तक चलता रहेगा। यह सरकार अपने पूरे टर्म तक बनी रहेगी।

- उसके बाद?

- उसके बाद हम उनकी ईमानदारी का फिर मूल्यांकन करेंगे। हो सकता है, हमें उनकी पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ना पड़े। आखिर हम अपनी ईमानदारी के साथ दगा तो नहीं कर सकते।

- तो अभी अपनी ईमानदारी के साथ दगा क्यों कर रहे हो? प्रधानमंत्री का बाहर से समर्थन करते रहो और भीतर कोई हस्तक्षेप मत करो। एक ईमानदार प्रधानमंत्री को अपना काम शान्ति से करने दो।

इस बार कॉमरेड तैश में आ गया। वह एक झटके में उठ बैठा और बोला, तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। राजनीति में ईमानदारी ही सब कुछ नहीं होती। समझदारी का भी महत्व है। समझदारी में गड़बड़ी हो, तो ईमानदारी अकेले क्या कर लेगी? मुझे भी तैश आ गया। मैंने कहा, तो तुम्हारा कहना यह है कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी में सन्देह नहीं है, पर उनकी समझदारी पर हमें भरोसा नहीं है। इसीलिए तुम्हारी पार्टी समय-समय पर हस्तक्षेप करती रहती है।

कॉमरेड बोला, इस बारे में मैं कुछ कहना नहीं चाहता। देखते हैं, कॉमरेड करात अपने अगले इंटरव्यू में क्या कहते हैं!

मुझे हँसी आ गई - यानी तुम्हें अपनी ही समझदारी पर भरोसा नहीं है। यह हुई न ईमानदारी की बात।


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