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व्यंग्य

तीन सिद्धान्तवादी
राजकिशोर


कहाँ हैं वे भारत निंदक, जो दिन-रात शिकायत किया करते हैं कि भारत की राजनीति पूरी तरह से सिद्धान्तहीन हो गई है? कहाँ हैं वे देश के दुश्मन, जिन्हें लगता है कि भारतीय राजनीति में कोई मूल्य बचे ही नहीं? कहाँ हैं वे विश्व शक्ति के रूप में उदीयमान भारत के आलोचक, जिनका मानना है कि भारत के नेता सिर्फ अपने परिवार के बारे में सोचते हैं और राष्ट्र हित की परवाह नहीं करते?

समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने बिना कोई किन्तु-परन्तु लगाए बयान दे दिया कि इस समय हमारे लिए पार्टी नहीं, राष्ट्र हित महत्त्वपूर्ण है। है किसी दूसरे नेता में ऐसा दम कि वह इस पाए की बात कह सके? अपने पचास साल के राजनीतिक कॅरियर में माननीय मुलायम सिंह ने पहली बार ऐसा उद्घाटक बयान देने का साहस किया है। राजनीतिक विश्लेषकों से, जिनमें से सभी के सभी न जाने क्यों दिल्ली में ही रहते हैं, निवेदन है कि वे समाजवादी नेता के इस बयान को साधारण न समझें। इसके द्वारा उन्होंने यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है कि उनकी पार्टी हमेशा राष्ट्र हित का पक्ष नहीं लेती। वह राष्ट्र हित के विरुद्ध भी जा सकती है। इसलिए परमाणु करार का समर्थन करने का मन बनाते हुए मुलायम सिंह ने साफ-साफ कह दिया कि वे राष्ट्र हित में अपनी पार्टी की नीतियों की परवाह नहीं करेंगे। पार्टी की घोषित नीति को वे पीछे छोड़ देंगे और परमाणु नीति का समर्थन करने के बहाने कांग्रेस के नजदीक आ जाएँगे। साफ है कि मुलायम सिंह की पार्टी के चरित्र में कुछ ऐसा है जिसका राष्ट्र हित से मेल नहीं खाता। क्या ऐसी पार्टी को विसर्जित नहीं कर देना चाहिए? पूछने पर शायद नेताजी यह कहें कि देश हित की माँग हुई तो हम ऐसा भी कर सकते हैं और कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी का विलय कर सकते हैं।

जिस कांग्रेस ने सिद्धान्तवादी होने का दाग अपने ऊपर अभी लगने नहीं दिया और जो कभी सांप्रदायिक कभी असांप्रदायिक, कभी समाजवादी कभी बाजारवादी और कभी आरक्षण विरोधी कभी आरक्षण समर्थक बनती रही, उसमें भी अचानक सिद्धान्तवादी होने का जज्बा जाग पड़ा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार एक सैद्धान्तिक स्टैंड लिया है कि सरकार रहे या जाए, अगले चुनाव में हम हारें या जीतें, परमाणु करार तो हो कर रहेगा। कांग्रेस के किसी नेता ने इसके पहले कभी दिखाई थी ऐसी सैद्धान्तिक दृढ़ता? जवाहरलाल नेहरू का कहना था, मैं ही सिद्धान्त हूँ। इंदिरा गांधी मानती थीं कि वे ही सिद्धान्त हैं। नरसिंह राव बहुत बड़े विद्वान थे। सो उनके रहते सिद्वान्त की जरूरत ही क्या थी? वैसे, हमारे ज्यादातर विद्वान सिद्वान्तहीनता के इसी सिद्धान्त को माननेवाले हैं। सोनिया गांधी को अपने सिद्धान्तों का पता नहीं है। इसलिए वे सिद्धांत वगैरह के चक्कर में पड़ती ही नहीं। उनका स्पीच राइटर जो लिख दे, वही सोनिया जी का सिद्धांत है।

मनमोहन सिंह अलग धातु के बने हुए हैं। वे सिद्धान्त नहीं बघारते, चुपचाप काम करते रहते हैं। राव ही उन्हें राजनीति में ले आए थे। विद्वान ही विद्वान की वकत पहचानता है। मनमोहन सिंह ने भी राव से मौन का महत्व समझा। इसका मतलब यह नहीं कि जब राष्ट्र हित का निर्णायक सवाल खड़ा हो जाए, तब भी अपना पक्ष न चुना जाए। मनमोहन सिंह ने अपना पक्ष चुन लिया। जिस तरह इंदिरा गांधी ने पहला परमाणु परीक्षण कर और अटलबिहारी वाजपेयी ने दूसरा परमाणु परीक्षण कर इतिहास में अपना-अपना नाम लिखवा लिया, उसी तरह मनमोहन सिंह भी अमर होना चाहते हैं। वे अर्थशास्त्री हैं और इसलिए जानते हैं कि देश की आर्थिक समस्याओं को हल करना उनके बस की बात नहीं है। लेकिन वे परमाणु शक्ति के रहस्य को खूब जानते हैं। देश के करोड़ों लोगों में बिजली खरीदने की क्षमता हो या नहीं, मनमोहन सिंह चाहते हैं कि उनके जाने के बाद देश में बिजली की बाढ़ आ जाए। अमेरिका भी यही चाहता है। अमेरिका चाहता था कि भारत ग्लोबीकरण की नीति पर चले। मनमोहन सिंह ने ऐसा कर दिखाया। अब अमेरिका चाहता है कि भारत कोयले से नहीं, पानी से भी नहीं, हवा से तो बिलकुल नहीं, बल्कि परमाणु शक्ति से बिजली पैदा करे, तो मनमोहन सिंह का सिद्धान्त प्रेम जाग पड़ा। चुनाव के ग्यारह महीना पहले उनकी जेब में एक ही नुस्खा है - परमाणु समझौता करो, बाकी समस्याएँ अपने आप हल हो जाएँगी।

अब बचे वामपंथी। वे तो शुरू से ही सिद्धान्त के मारे हुए हैं। जब कोई और दल सिद्धान्त की बात तक नहीं करता था, वामपंथी सिद्वान्त ही पहनते थे और सिद्धान्त ही ओढ़ते थे। सबसे पहले उन्होंने ही पहचाना था कि पूँजीवादी व्यवस्था में समाजवादी रास्ते पर नहीं चला जा सकता। अब पश्चिम बंगाल के मार्क्सवादी मुख्यमंत्री ने साफ-साफ कह दिया है कि समाजवादी व्यवस्था का निर्माण हमारे लिए संभव नहीं है, इसलिए हम पूँजीवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी सारी शक्ति झोंक देंगे। यह सिद्धान्तवाद नहीं तो और क्या है? इसीलिए वामपंथियों ने तब तक सरकार गिराने की जिद नहीं पकड़ी जब तक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था जारी रही। लेकिन अमेरिका विरोध? वामपंथ के फटे हुए झोले में यही तो एक मुद्दा बचा है। उसे कैसे छोड़ दें? एक तौलिए से ही तो अपनी लाज ढके हुए हैं। यह भी उतार दें? तब हमें कोई सिद्धान्तवादी कैसे कहेगा?


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