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व्यंग्य

एक अल्पसंख्यक का पत्र
राजकिशोर


प्रिय प्रधानमंत्री जी, लोकतंत्र के इतिहास में आपका यह वाक्य अमर रहेगा कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। इसका बाकी हिस्सा कि 'खासकर मुसलमानों का' अमर रहेगा या नहीं, मुझे इसमें संदेह है। संदेह इसलिए कि आपने राजनीतिक दृष्टि से एक अनुपयुक्त नाम ले लिया है। 'इस्लाम' या 'मुसलमान' शब्दों का प्रयोग करते समय आजकल बहुत सावधान रहना चाहिए। या तो आप मुसलमानों के प्रति अपने प्रेम के कारण मारे जाएँगे या उनके प्रति अपनी घृणा के कारण। इस्लाम-विरोध के कारण बुश लगातार अलोकप्रिय होते जा रहे हैं। आपने सोचा होगा कि मुसलमानों के प्रति प्रेम जाहिर कर मैं लोकप्रिय हो जाऊँगा। लेकिन नतीजा उलटा ही हुआ है। उन लोगों द्वारा संसद को कई दिनों तक ठप किया गया, जो मानते हैं कि देश के उन्हीं संसाधनों पर मुसलमानों का हक है, जिनकी हिन्दुओं को कोई जरूरत नहीं है। और, हक भी नहीं है, क्योंकि वे भारतीय मूल के नहीं हैं। देश में और भी अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

आपके इस पूरे वक्तव्य से वे भी हैरान होंगे कि प्रधानमंत्री को हो क्या गया है? बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के बीच बढ़ रही भयानक दूरी को कम करने के बाद अब वे क्या अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यकों से ही लड़ाना चाहते हैं? अब, संसाधनों पर पहले हक के लिए कोई और अल्पसंख्यक समुदाय लड़ेगा, तो जाहिर है, मुसलमान उससे नाराज हो जाएँगे। मुझे पूरा यकीन है कि आप मुसलमानों के लिए कुछ खास करने नहीं जा रहे हैं - न किया है, न करेंगे - लेकिन उनके पहले हक की बात आप जिस शैली में कर बैठे हैं, उससे उनके मुँह दिखाने की जगह नहीं रह गई है। उनके हिन्दू पड़ोसी भी उन्हें घूर कर देखते हैं।

जहाँ तक देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक होने की बात है, मैं आपसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ। लोकतंत्र के सिद्धान्त में यह एकदम नई बात लगती है, पर इसकी हैसियत सनातन सत्य की है। अब तो विद्वान लोग भी कहने लग गए हैं कि लोकतंत्र बहुमत पर अल्पमत का शासन है। यह अल्पमत समाज के विशिष्ट वर्ग का होता है। यह वर्ग हमेशा अल्पसंख्यक ही होता है। इस अर्थ में जवाहरलाल, इंदिरा गांधी और मोरारजी भाई से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह, इंदर कुमार गुजराल और नरसिंह राव तक सभी अल्पसंख्यक वर्ग या समुदाय में आते हैं। यह वह तबका है - भारत के करीब दस-पन्द्रह प्रतिशत लोगों का - जो देश पर शासन करता है। सुविधाओं की सभी देवियाँ इसी वर्ग के चारों ओर नाचती रहती हैं। आर्थिक नीतियाँ इसी वर्ग के हित में बनाई जाती हैं। ऐसा नहीं होता, तो डीडीए जैसी सरकारी नगर विकास या आवास विकास संस्थाएँ शहरों में नहीं, जहाँ मकानों की वैसे ही बहुतायत होती है, गाँवों में मकान बनातीं, जहाँ झोंपड़ियों की संख्या मकानों से ज्यादा है।

इस वर्ग की पहचान क्या है? व्यक्ति अंग्रेजी जानता हो, ऊँची जाति का हो और सुख-सुविधाओं से संपन्न हो। बेशक जाति की शर्त कभी-कभी ढीली कर दी जाती है, क्योंकि लोकतंत्र की कार्य प्रणाली ही ऐसी है कि विशेष परिस्थिति में कोई भी सत्ता पर कब्जादार हो जाए जैसे चरण सिंह, चन्द्रशेखर या देवगौड़ा हो गये थे। कल हो सकता है, लालू प्रसाद या मायावती प्रधानमंत्री हो जाएँ। ये सभी मूलतः उसी सुख-सुविधा सम्पन्न वर्ग के सदस्य ही हैं जिसका समाज के संसाधनों पर पहला हक है। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह आदि को ओबीसी माना जाता है, पर सच यह है कि ये अपने ओबीसी समुदाय से विद्रोह कर उस एलिट वर्ग में शामिल हो चुके हैं, जिसके द्वारा किए गए या किए जा रहे शोषण को कोस-कोस कर ये अपने समुदाय के नेता बने थे। मेरा ख्याल है, मायावती भी अब दलित नहीं रह गई हैं। उन्होंने अपने दलित समुदाय का दलन करने वाले वर्ग की सदस्यता ले ली है।

तो सर, मामला यह है, जैसा कि आप अपनी जीवनशैली पर गौर करके भी समझ सकते हैं, कि अल्पसंख्यक वर्ग ही समाज पर शासन करता है। इस वर्ग में राजनेताओं और नौकरशाहों के अतिरिक्त पूँजीपति, भूसामंत, टेक्नोशाह, सरकार का समर्थन करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग, टीवी और अखबार वाले भी शामिल हैं। किसी भी देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक इसी वर्ग का होता है। इनके उपभोग के बाद जो कुछ बचता है, उसे बाकी लोगों में बाँट दिया जाता है। लेकिन इस सच्चाई को कोई स्वीकार नहीं करता। कहते सभी यही हैं कि लोकतंत्र तो बहुमत का शासन है। शायद इसलिए कि ऐसा न कहें, तो वे अपना अल्पसंख्यक शासन चला नहीं सकते।

अब अमेरिका और बिट्रेन को ही देखिए। वहाँ का बहुमत चाहता है कि वहाँ से अमेरिकी-ब्रिटिश सेनाएँ वापस आ जाएँ और उस देश को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए, पर अल्पमत में होते हुए भी हुक्मरान लोग इराक में अभी भी जमे हुए हैं। ऐसे ही, भारत में बहुसंख्यक लोग शान्ति चाहते हैं, पर मुट्ठी भर लोग उपद्रव और हिंसा का वातावरण बनाए हुआ हैं। सरकार अगर अल्पसंख्यकों की तानाशाही को रोकने की कोई गंभीर कोशिश नहीं कर रही है, तो इसका मतलब मेरे लिए तो यह है कि देश के अल्पसंख्यक शासक वर्ग का इन अल्पसंख्यकों गुंडों के साथ कोई गुप्त समझौता जरूर है।

इसलिए आप न घबराइए, न शरमाइए। दहाड़कर बोलिए कि जब तक देश में समाजवाद नहीं आ जाता, संसाधनों पर पहला हक तो अल्पसंख्यकों का ही रहने वाला है, क्योंकि अब तक की रीत यही है। सर, मैं भी उन्हीें अल्पसंख्यकों में हूँ जो मानते हैं कि बहुमत का शासन न केवल संभव, बल्कि अपरिहार्य है। इसलिए मैं जानता हूँ कि मेरी किसी बात का असर आप पर होने वाला नहीं है। आप उस अल्पसंख्यक वर्ग में हैं जो बसें और रेलगाड़ियाँ चलवाता है, पर उनमें सफर नहीं करता।


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