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व्यंग्य

झाँकी हिन्दुस्तान की
राजकिशोर


मास्टर ब्रजभूषण घर से बड़े उत्साह से चले थे कि बच्चों को भारत की संसद और राजनीति के बारे में बताऊँगा, ताकि उनका सामान्य ज्ञान बढ़ सके। हाल ही में वे एक ट्रेनिंग कोर्स करने दिल्ली गए थे, जहाँ उन्हें मालूम हुआ कि राष्ट्रीय शैक्षिक परिषद पाठ्यक्रम को अद्यतन और सामयिक बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रही है। उन्होंने परिषद द्वारा प्रकाशित नई किताबें भी देखी थीं। दसअसल, वे भी पिटी-पिटाई किताबें पढ़ा-पढ़ा कर थक चुके थे और सचमुच में कुछ नया करना चाहते थे।

मास्टर साहब जब भारत की राजनीति और संसद की एक मोटी-मोटी रूपरेखा पेश कर चुके, तो उन्होंने अपने झोले से, जो उन्हें दिल्ली में कोर्स शुरू करने के पहले भेंट किया गया था (गाँव लौटने तक उसकी जिप खराब हो गई थी), एक चित्र निकाला। बच्चों को वह चित्र दिखाते हुए वे बोले - बच्चो, इन्हें पहचानते हो, ये कौन हैं? पूरी क्लास चिल्ला उठी- मनमोहन सिंह। प्रधानमंत्री। मास्टर साहब ने पूछा, आगे? पूरी क्लास ने फिर एक स्वर में कहा, पहले लीडर थे, अब डीलर हैं। ये अमेरिका से डील करना चाहते हैं।

मास्टर ब्रजभूषण ने अपने झोले से फिर एक तस्वीर निकाली और बच्चों से पहचानने को कहा। बच्चे खिलखिला कर हँसने लगे। बोले - ये भी डीलर हैं। इनका नाम अमर सिंह हैं। मनमोहन सिंह अमेरिका से डील करना चाहते हैं, ये किसी से भी डील कर सकते हैं। एक विद्यार्थी ने कहा - ये ऐश्वर्या राय के साथ घूमते-फिरते हैं। अमिताभ बच्चन और मुकेश अंबानी से इनकी दोस्ती है। मुलायम सिंह इनको अपना नेता मानते हैं। मास्टर ब्रजभूषण को अपने बच्चों पर गर्व हुआ। उन्होंने एक और तस्वीर निकाली। यह तस्वीर मायावती की थी। बच्चों ने कहा - ये भारत की अगली प्रधानमंत्री हैं। इस बार ही बन जातीं, लेकिन मनमोहन सिंह ने बनने नहीं दिया। रुपया खिला कर सांसदों को अपने वश में कर लिया। एक बच्चा अलग से बोला - सर, ये भी डीलर हैं। इन्होंने लेफ्ट के साथ मिल कर अपनी गोटी फिट कर रखी थी। मुलायम सिंह के आदमियों से डील करके उन्हें तोड़ भी लिया था। पर आखिरी वक्त में ये सब बदल गए। पापा कह रहे थे कि अमर सिंह ने ज्यादा पैसा खिला दिया होगा।

उसके बाद अजित सिंह का नंबर आया। उनकी तस्वीर देखते ही लड़के खुल कर हँसने लगे। बोले, ये बहुत पुराने डीलर हैं। जो भी सत्ता में आता है, उसके साथ डील कर लेते हैं और मंत्री बन जाते हैं। एक छात्र कहने लगा - चौधरी चरण सिंह इनके फादर थे। मोहन भैया (स्कूल का बुजुर्ग चपरासी) बता रहे थे कि चरण सिंह ने भी एक बार कांग्रेस से डील की थी। दूसरे छात्र ने कहा - अजित सिंह मेरे मामा के इलाके के हैं। मामा जी बता रहे थे कि इतनी बार पार्टी बदल चुके हैं कि याद रखना मुश्किल हो जाता है कि आजकल किस पार्टी में हैं। देवगौड़ा की तस्वीर दिखाने पर एक लड़के ने कहा - ये साउथ के अजित सिंह हैं। इन्हें एक बार प्रधानमंत्री की पोस्ट दी गई थी। पर सँभाल नहीं पाए। अपने घर कर्नाटक लौट गए। बीजेपी से डील करके अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनवा दिया। अब इन्होंने सीपीएम से डील कर ली है।

मास्टर ब्रजभूषण प्रमुदित होते रहे। यहाँ तक कि ममता बनर्जी के बारे में भी एक छात्र को मालूम था। उसने कहा - किसी भी पार्टी से इनकी डील नहीं हो पाई, इसलिए ये संसद में गईं ही नहीं, घर बैठी रहीं।

प्रकाश करात को किसी ने पहचाना, किसी ने नहीं। एक ने कहा - ये राजनीति में नए आए हैं। धाकड़ डीलर हैं। बताते हैं, चीन से इनकी डीलिंग है। अमेरिका को भारत से उखाड़ना चाहते हैं। सरकार ने इनकी नहीं सुनी, तो ये सरकार को ही गिराने में लग गए। पहले ये सोनिया गांधी को अपना नेता मानते थे। अब मायावती को अपना नेता मानने लगे हैं। इनका कहना है, देश का प्रधानमंत्री वही बनेगा जिसे हम चाहेंगे।

कक्षा का समय समाप्त होने को आ रहा था। सो आखिर में मास्टर साहब ने एक मोटे-से, बूढ़े आदमी की तसवीर निकाली। लड़कों ने उन्हें तुरन्त पहचान लिया। बोले - ये लोक सभा के हेडमास्टर हैं। पर कोई इनकी बात नहीं मानता। ये कहते रहते हैं, सिट डाउन, सिट डाउन, पर कोई सीट पर बैठता नहीं। सब बोलते रहते हैं। एक ने बताया - अपनी ही पार्टी से इनकी डील नहीं हो पाई। पार्टी कह रही थी, अपना पद छोड़ दो। ये कह रहे थे, और चाहे जो करा लो, पोस्ट छोड़ने को मत कहो। इनको पार्टी ने निकाल दिया है।

मास्टर ब्रजभूषण ने कक्षा की राय पूछी - यह अच्छा हुआ या बुरा? पूरी कक्षा चिल्ला उठी - सर, अच्छा-बुरा आजकल कौन देखता है? जिसकी जहाँ डील हो जाए, उसके लिए वही अच्छा है।


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