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व्यंग्य

महँगाई में प्रधानमंत्री
राजकिशोर


प्रधानमंत्री आज दफ्तर जाते समय बहुत प्रसन्न थे। सुबह-सुबह उन्हें पढ़ने को मिला था कि लंदन के एक अखबार ने भारत की वृद्धि पर खुशी जाहिर की है। हालाँकि उस अखबार ने थोड़ी आलोचना भी की है कि भारत में साक्षरता, सड़क, बिजली आदि की हालत बहुत खराब है। लेकिन प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ तजुर्बेदार भी थे। वे जानते थे कि 'शुद्ध मुनाफा' तो हो सकता है, पर 'शुद्ध तारीफ' नहीं हो सकती। फिर उनके प्रधानमंत्री हुए कुल ढाई साल ही तो हुए थे। उनके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि एक सुबह लोग उठें और देखें कि पूरे देश में बिजली है और देश के हर आदमी के पास एक निजी पुस्तकालय है। हर पाँच किलोमीटर पर एक पेट्रोल पंप, एक होटल और एक एटीएम है। सुबह आठ बजे देश के सारे नौजवान और नवयुवतियाँ अपने को चिकना-चुपड़ा बना कर अपनी-अपनी गाड़ियों में दफ्तर के लिए निकल पड़े हैं। होगा, होगा, यह भी होगा, थोड़ा इंतजार तो करो। भारत के लोगों में यही तो बुरी आदत है। जब वे इंतजार करने पर आते हैं, तो सैकड़ों साल तक इंतजार कर सकते हैं। जब वे अधीर होते हैं, तो पाँच साल में ही सरकार की खाट खड़ी कर देते हैं।

अपनी नई उद्भावना पर प्रधानमंत्री के चेहरे पर एक इंच मुस्कान आई, फिर उन्होंने अपने को सँभाल लिया कि कहीं किसी की नजर पड़ गई कि क्या होगा - लोग कहेंगे कि एक तरफ देश में किसान आत्महत्या कर रहे थे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री अपनी कार में बैठे मुस्करा रहे थे। कहीं दैनिक पत्रों में यह बहस न शुरू हो जाए कि प्रधानमंत्री आखिर किस बात पर मुस्करा रहे थे। फिर तो दस-पंद्रह दिनों तक राष्ट्रीय मीडिया इसी रहस्य की तहकीकात करता रहेगा, इस विषय पर टीवी चैनलों पर बहस होगी, बड़े-बड़े स्तंभकार इस पर टिप्पणी करेंगे। यह भी हो सकता है कि कोई पत्रिका इस मामले को बड़े पैमाने पर उठा कर देश के आठ महानगरों में 'राष्ट्रीय' सर्वेक्षण ही करा डाले कि आपकी राय में प्रधानमंत्री किस बात पर मुस्कराए थे - (क) आर्थिक वृद्धि दर के बढ़ने पर, (ख) दिल्ली के नए मास्टर प्लान पर, (ग) कावेरी नदी जल विवाद के फैसले पर, (घ) देश में इतने राजनेताओं के होते हुए भी अपनी अपरिहार्यता पर या (च) इनमें से किसी भी बात पर नहीं।

अपने कार्यालय में पहुँचते ही प्रधानमंत्री ने सभी प्रमुख नौकरशाहों को बुलाया। जैसी कि उन्हें उम्मीद थी, सभी ने शब्दावली बदल-बदल कर उन्हें बधाई दी कि लंदन के अखबार ने उनके आर्थिक नेतृत्व की इतनी सराहना की है। प्रधानमंत्री कई घंटे तक इस खबर का आनंद ले चुके थे, फिर भी उन्हें बार-बार एक ही बात सुन कर बोरियत नहीं हो रही थी। उनकी दशा उस छात्र की तरह हो रही थी, जो बोर्ड की परीक्षा में प्रथम आया हो और जिसे बधाई देने के लिए हर कोई टूटा पड़ रहा हो। लेकिन प्रधानमंत्री की बैठक कोई मुशायरा तो होती नहीं है, इसलिए बधाई और आत्म-खुशी के माहौल को बदलना जरूरी हो गया। प्रधानमंत्री ने कुछ और गंभीर हो कर पूछा - क्या इस विषय पर मुझे 'राष्ट्र के नाम संदेश' देना चाहिए? यह सुनते ही मीटिंग में एक तटस्थ सन्नाटा छा गया। वे सभी खुर्राट अफसर थे। उनमें से प्रायः 'इंडिया शाइनिंग' के जमाने में इसी तरह की बैठकों में भाग ले चुके थे।

लेकिन देश का सबसे शक्तिशाली आदमी (वैसे, इस पर अफसरों में मतभेद था; कुछ का कहना था कि इस जुमले का असली हकदार कोई और है और वह 'लाभ के पद' पर नहीं है) कुछ पूछ रहा हो और उसके मातहत मुँह सिले बैठ रहें, यह कायदा नहीं है, इसलिए एक-एक कर, दबी हुई आवाजें सुनाई पड़ने लगीं - 'सर, आइडिया अच्छा है'; 'लोगों को बहुत दिनों से कोई अच्छी खबर नहीं मिली है', वे खुश हो जाएँगे'; 'आखिर हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हैं; जो बात सरकार जानती है वह जनता को भी पता चलनी चाहिए'; 'तब तो यह सीधे-सीधे राइट टु इन्फॉर्मेशन का मामला बनता है', 'नहीं तो यह आरोप भी लग सकता है कि सरकार जनता को अँधेरे में रख कर विकास करवा रही है'; 'अपोजीशन भी सवाल कर सकता है कि भारत के जिस भेद को लंदन के अखबार ने खोल दिया है, वह भेद सरकार ने संसद से क्यों छिपाए रखा? यह संसद की अवमानना है'...

एक नौजवान अफसर बहुत देर से बोलने के लिए मौके का इंतजार कर रहा था। बीच-बीच में उसके होंठ खुलने की कोशिश भी करते थे, पर कोई न कोई धाकड़ अधिकारी उसे ओवरटेक कर लेता था। प्रधानमंत्री खुद भी अल्पसंख्यक वर्ग के थे, इसलिए अल्पसंख्यक की वेदना को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने उस युवा अफसर की तरफ देख कर कहा - शायद आप कुछ कहना चाहते हैं। जवाबी थोड़ा खुश हुआ, थोड़ा झेंपा, फिर बोला - सर, मेरे दिमाग में एक दूसरी बात थी...'थी या है?' यह कह कर प्रधानमंत्री जरा मुसकराने को हुए कि उन्होंने अपने को रोक लिया - अफसरों से मजाक करना ठीक नहीं है, यह बहुत खतरनाक प्रजाति है। मुसकराने का काम जवाबी ने किया और माफी माँगते हुए बोला - 'सर, मेरा खयाल यह है कि अगर आपको 'राष्ट्र के नाम संदेश' देना ही है, तो महँगाई की बढ़ती हुई समस्या पर देना चाहिए। मुझे लगता है, यह मुद्दा जल्द ही गंभीर बनने वाला है। लोग कसमसा रहे हैं।'

खुर्राट अफसर इस मामले में भी पीछे नहीं रहना चाहते थे। प्रधानमंत्री के चेहरे पर बढ़ रही गंभीरता को देख कर एक बुजुर्ग-से अफसर ने धीमे से कहा, मानो कोई भूली हुई बात याद करने की कोशिश कर रहा हो, 'मेरा ड्राइवर भी कह रहा था कि आजकल उसका बजट गड़बड़ा रहा है...।' एक दूसरे अफसर ने बुरा-सा मुँह बनाया, 'दरअसल, आजकल लोगों की एंबीशंस बहुत बढ़ गई हैं। सभी फल-दूध-सब्जी खाना चाहते हैं। अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं।...मेरा ड्राइवर पहले स्कूटर पर आता था। अब उसने एट हंड्रेट खरीद ली है। महँगाई बढ़ेगी नहीं?'

प्रधानमंत्री को लगा कि मामला नियंत्रण से बाहर जा रहा है। उन्होंने घोषणा की, 'इस बारे में मैं चिदंबरम साहब से बात करूँगा। यह पीएमओ का नहीं, फाइनांस मिनिस्ट्री का मामला है।'

आज की पहली बैठक यहीं खत्म हो गई।


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