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व्यंग्य

दूबे बनाम तिवारी
राजकिशोर


वह जुलाई की कोई तारीख थी। दो दिन से बारिश हो रही थी, पर आज धूप निकल आई थी। वायुमंडल में उमस का प्रवेश हो चुका था। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई थी और कम्युनिस्ट तीसरा मोर्चा बनाने के लिए महात्माओं और साध्वियों की खोज में लगे हुए थे। वामपंथी तय नहीं कर पा रहे थे कि प्रकाश करात समस्या हैं या समाधान।

दोपहर होने के ठीक एक घंटा पहले दूबे जी तिवारी जी के घर में घुसे। दोनों कम्युनिस्ट थे। दोनों के पास पक्की सरकारी नौकरी थी, तीन शयनकक्षों का फ्लैट था, एक कार थी और अमेरिका में पढ़ रहा नौनिहाल था। दोनों समकालीन पतन से क्षुब्ध थे और उसके खिलाफ लेख लिखते थे। दोनों को स्त्री विमर्श से चिढ़ थी। पर व्यक्तिगत जीवन में वे स्त्री तत्त्व के महत्त्व को पहचानते थे। दोनों व्यक्ति के रूप में सफल थे और कम्युनिस्ट के रूप में विफल। पर इस विफलता का विश्लेषण दोनों का अलग-अलग था। एक का कहना था कि कम्युनिस्ट भारतीय समाज को इसलिए प्रभावित नहीं कर सके कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता का पालन नहीं किया। दूसरे का मानना था कि इस भ्रष्ट समाज में कोई नैतिक जीवन कैसे जी सकता है? फिर भी, दोनों में घोर प्रेम था। वे एक-दूसरे के काम आते थे और जो भी तीसरा होता, उसकी हँसी उड़ाते थे।

दूबे जी तिवारी जी के फ्लैट में आते ही रहते थे। लेकिन इस बार सब कुछ नया-नया लग रहा था। फर्नीचर नया, बुक शेल्फ नए, परदे नए और कंप्यूटर के स्थान पर लैपटॉप। दूबे जी को द्वेष का माइल्ड अटैक हुआ। बोले, अरे तिवारी जी, देश जितना पिछड़ रहा है, आप उतना ही आगे जा रहे हैं। पढ़ाते तो हम भी उन्हीं बच्चों को हैं, जिनको आप। लेकिन कहाँ हमारा घर और कहाँ आपका!

तिवारी जी मुसकराए, पर मूँछों के बाहर नहीं। प्रश्न जितना भौतिक था, उत्तर उतना ही साहित्यिक - आपको उसका गम नहीं होना चाहिए, जो नहीं है, जैसे सुरुचि।

दूबे जी ने चुनौती को महसूस किया। बोले, भइया, शमशेर से हमको क्यों मारते हो? क्या मुक्तिबोध मर गए?

तिवारी जी - मुक्तिबोध खतरनाक कवि हैं। क्योंकि वे सिर्फ वर्णन नहीं करते, माँग भी करते हैं। वे खरे कम्युनिस्ट थे। लेकिन सवाल खड़ा करते समय वे भूल जाते थे कि हम बूर्ज्वा व्यवस्था में रह रहे हैं। वे कक्षा में ही ठीक हैं। यह ब्रह्मराक्षस बनने का समय नहीं है। किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह कम्युनिस्ट भी देश-काल से बँधा हुआ होता है। इसका अतिक्रमण करना एक हवाई आदर्श है। हम यथार्थवादी हैं।

शुरुआत ही गलत हो गई थी। दूबे जी अपने सहकर्मी से उलझने नहीं आए थे। पर ज्ञान के प्रदर्शन की प्रतिद्वंद्विता से भागने में मर्दानगी नहीं थी। वे भी किताबें सिर्फ रखते नहीं थे, पढ़ते भी थे। बोले, यथार्थवाद भारत में फेल हो गया है। गांधी जी भाववादी थे, पर उनकी घुटने तक की धोती ने देश भर को बाँध लिया। यह देश सादगी पर जान छिड़कता है।

तब तक कोल्ड ड्रिंक के आधे भरे गिलास आ चुके थे। दोनों ने एक-एक चुस्की ले कर गला तर किया। फिर तिवारी जी ने मोर्चा सँभाला - इस धोती ने ही तो भारत को सर्वनाश कर दिया। हम गरीबी पर गर्व करते रहे। एक संपन्न आधुनिक राष्ट्र नहीं बन सके।

दूबे जी - किसी की पीठ पर छुरा मारना ठीक नहीं है। गांधी जी ने यह सीख थोड़े ही दी है कि भाइयो और बहनो, गरीब ही बने रहो। तुम्हें रोटी, कपड़ा और मकान नहीं, सिर्फ मोक्ष चाहिए। वे खुद गरीब की तरह रहते थे, क्योंकि जनता की असीम गरीबी देखने के बाद आलीशान कपड़े पहनना उनके जैसे नैतिक व्यक्ति के लिए संभव नहीं था।

तिवारी जी - इस नैतिकता की ऐसी की तैसी। एक आदमी के कम खाने-पीने से देश की समस्याएँ थोड़े ही हल हो जाएँगी? कम्युनिस्ट कल्पना लोक में नहीं रहते। वे हृदय परिवर्तन पर नहीं, व्यवस्था परिवर्तन पर जोर देते हैं।

दूबे जी - कम्युनिस्ट होने के नाते मान्यता तो मेरी भी यही है। पर मैं यह भूलना नहीं चाहता कि कम्युनिस्ट नैतिकता नाम की भी एक चीज होती है। यह ठीक है कि मैं खुद अपने जीवन में इसका पालन नहीं कर सका, पर यह बात हमेशा मुझे कचोटती है कि सर्वहारा की बात करने वाला आदमी खुद शान-शौकत से कैसे रह सकता है? कम्युनिस्ट अपने निजी जीवन में आदर्शों और मूल्यों का पालन नहीं करेगा, तो वह समाज को कैसे बदलेगा?

तिवारी जी - तो क्या आप चाहते हैं कि कम्युनिस्ट भिखमंगे हो जाएँ और कटोरा ले कर जंतर मंतर पर बैठे रहे? बूर्ज्वा व्यवस्था में हम बूर्ज्वा मूल्यों से नहीं बच सकते। सवाल यह नहीं है कि आप कैसे जीते हैं। सवाल यह है कि आप किसके लिए जीते हैं।

दूबे जी के दिमाग में एक जोरदार तर्क उभरा। पर अब उन्हें पछतावा होने लगा था कि जो बात परिहास में कही गई थी, वह कटुता की तरफ ले जा रही है। तब तक एअरकंडीशनर ने कमरा ठंडा कर दिया था। ठंडी हवा के झोंकों ने उन्हें मृदु कर दिया। तिवारी जी को राजी करने के लिए बोले - अजी छोड़िए इस फालतू बहस को। अभी तो कम्युनिज्म लाने का संघर्ष शुरू ही नहीं हुआ है। हम तो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को बचाने में लगे हुए हैं। जब नदी पार करने का समय आएगा, तैरना भी सीख लेंगे।

तभी कोई जरूरी फोन आ गया। तिवारी जी बात करने लगे। दूबे जी ने राहत की साँस ली और सोचने लगे कि जिस काम से आए थे, उसे कैसे छेड़ें।


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