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व्यंग्य

सूखे के समय
राजकिशोर


सूखा पीड़ितों के लिए राहत सामग्री जुटाने के लिए जब मैं दयाल साहब के घर पहुंचा, तो वे नहा रहे थे। उस समय नौ बज कर पंद्रह मिनट हुए थे। दयाल साहब के कर्मचारी ने (नौकर कहने से कर्मचारी कहना मुझे बेहतर लगता है, हालांकि दोनों शब्दों का मूल अर्थ एक ही है) मुझे बैठकखाने में आदर के साथ बिठाया और तुरंत एक गिलास ठंडा पानी पेश किया। थोड़ी देर बाद वह फलों का रस ले आया, तब भी दयाल साहब नहा रहे थे। मुझे शक हुआ कि कहीं वह महीने भर का कोटा आज ही तो नहीं निपटा रहे हैं। फिर थोड़ी देर बाद उनका कर्मचारी भाप छोड़ती हुई चाय का बड़ा-सा प्याला लाया, तब भी दयाल साहब नहा रहे थे। अब मुझे शक हुआ कि कहीं यह मुझसे न मिलने का बहाना तो नहीं है!

दस बज कर बीस मिनट पर दयाल साहब बाथरूम से प्रसन्नचित्त निकले। दो सुदर्शन तौलियों में लिपटे वे भारत के भविष्य की उस सुंदर तसवीर की तरह लग रहे थे जिसके विविध रूप हमारे आशावादी विद्वान और संपादक हमारी मायूसी को दूर करने के लिए अकसर पेश करते रहते हैं। मुझे अपनी समझ पर झेंप आ गई। दयाल साहब ने मुझसे दोस्ताना हाथ मिलाने के बाद सामने के सोफे पर बाबा रामदेव की मुद्रा में बैठते हुए कहा, 'आज छुट्टी का दिन है। सो सोचा, जम कर नहा लूँ। घंटे भर पानी में पड़ा रहा। बड़ी दिव्य अनुभूति होती है!' फिर ठठा कर हँसे, 'अगर मैं कवि होता, तो कहता, जैसे भगवान विष्णु क्षीर सागर में लेटे रहते हैं, मुझे भी वैसा ही अनुभव हो रहा था।' मुझे मुसकराना जरूरी लगा, 'बस लक्ष्मी जी की कमी थी।' दयाल साहब एक बार फिर ठठा कर हँसे, मानो यह कोई मजाक हो।

तभी उनके दोनों मोबाइलों पर धड़ाधड़ फोन आने लगे, जैसे सभी को पता था कि वे कितने बजे स्नानघर से निकलेंगे। मुझे धीरज रखने का इशारा करते हुए दयाल साहब ने सभी से दो-दो मिनट बात की और पाँचवाँ फोन निपटाने के बाद दोनों मोबाइल बंद कर दिए। कर्मचारी को बुला कर आदेश दिया कि कोई भी फोन आए, तो कहना कि साहब बाथरूम में हैं। फिर मेरी ओर मुखातिब हुए, 'यार, ऐसा है कि परसों से पेरिस में विश्वव्यापी जल संकट पर इंटरनेशनल सेमिनार हो रहा है। मुझे उसके एक सेशन की सदारत करनी है। इसी सिलसिले में दिन भर फोन आते रहते हैं।... और तुम्हारा क्या हाल है? आजकल क्या लिख रहे हो?'

मैं कहना चाहता था, आजकल कोई कुछ नहीं लिख रहा है, सभी एक-दूसरे को दुहरा रहे हैं। कुछ बोलूँ, इसके पहले ही दयाल साहब ने पूछ लिया, 'लेकिन यह रोनी सूरत क्यों बना रखी है? लगता है, कई दिनों से बाथरूम में गए ही नहीं हो।'

वह फिर हँसे। मैं फिर झेंपा। फिर भी कुछ कहना जरूरी था, 'दरअसल, जब से सूखे की खबर आई है, मैं हफ्ते में एक बार ही नहा रहा हूँ। दिन में दो बार भीगे तौलिए से बदन पोंछ लेता हूँ।'

दयाल साहब अचानक गंभीर हो गए। बोले, 'मैं तुम्हारी भावना की कद्र करता हूँ। पर सूखे से निपटने का यह कोई तरीका नहीं है। तुमने यह फिकरा नहीं सुना कि मरों के साथ कोई मर नहीं जाता?'

मैं चुप रहा, वे बोलते रहे।

'सूखे की समस्या अब स्थानीय समस्या नहीं रह गई है। इस पर बहुत बड़े पैमाने पर विचार-विमर्श होना चाहिए। मैं तो मानता हूँ कि इस सब्जेक्ट पर अभी तक कायदे का कुछ रिसर्च हुआ ही नहीं है। पेरिस कान्फ्रेंस में मैं खुद एक बहुत बड़ा रिसर्च प्रपोजल रखने जा रहा हूँ। मेरा प्रस्ताव है कि संसार भर में जहाँ-जहाँ भी पिछले दस सालों में सूखे की टेंडेंसी देखी जा रही है, वहाँ की क्लाइमेटिक कंडीशंस का विस्तृत अध्ययन करने के लिए एक इंटरनेशनल कमीशन सेटअप किया जाए। अब फुटकर स्टडीज और फुटकर समाधानों से काम चलनेवाला नहीं है। मेरा मन है कि अगर यह कमीशन बन जाए, तो अगले पाँच-सात साल इसी काम में अपने को होम कर दूँ।'

मैं फुसफुसाया, 'मेरे कुछ पर्यावरणवादी मित्रों का कहना है कि अगर देश भर में छोटी-छोटी नहरों का जाल बिछा दिया जाए, तो कम से कम खेती का तो नुकसान नहीं होगा। बताते हैं कि हमारी खेती का बहुत बड़ा हिस्सा अब भी मानसून पर निर्भर है। यह देश हित में नहीं है। नहरें बिछाने का काम, पिछले साठ वर्षों में बड़ी आसानी से किया जा सकता था।'

दयाल साहब की भृकुटि तन गई, 'सो तो है, सो तो है। हमने खेती की उपेक्षा करके बहुत बड़ा अनर्थ किया है। मैं तो कहता हूँ कि इस मामले में हम सभी अपराधी हैं। मेरा बस चले तो ऐसे सभी एक्सपर्ट्स को फाँसी पर चढ़ा दूँ, जिन्होंने भारत की गरीब जनता के साथ इतना बड़ा धोखा किया है।...'

मैं दंग। दंग से ज्यादा स्तब्ध। लगा कि सूखा पीड़ितों के लिए राहत भेजने की बात छेड़ने का यही मौका है। तभी दयाल साहब बोले, 'सोचता हूँ, पेरिस में यह मुद्दा भी क्यों न उठा दूँ कि सूखा राहत कार्यक्रमों के लिए एक इंटरनेशनल फंड बनाया जाना चाहिए - वाइल्डलाइफ फंड की तरह। ब्यूटीफुल आइडिया! आज ही इस पर काम करता हूँ।'

मैंने महसूस किया, इस समय मुझसे ज्यादा अप्रासंगिक आदमी कोई नहीं है।


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