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व्यंग्य

मेरा प्रिय प्रधानमंत्री
राजकिशोर


आज मैं वह काम करने जा रहा हूँ, जिसे करने की हिम्मत बड़े-बड़े नहीं कर पाते। बड़े-बड़ों में मेरी गिनती कोई नहीं करता। इतना इंतजार करने के बाद अब तो मैंने भी अपनी गिनती बड़े-बड़ों में करना छोड़ दिया है, फिर भी मैं यह साहसिक काम करने जा रहा हूँ। दरअसल, साहसिक काम हम जैसे लोग ही कर सकते हैं, क्योंकि बड़े-बड़ों में आजकल वही आते हैं, जो कोई साहसिक काम नहीं कर सकते। दुस्साहसिक कामों की बात अलग है। यह तो कोई भी कर सकता है और मुझे यह बताते हुए हर्ष होता है कि जिसे मैं अपना प्रिय प्रधानमंत्री घोषित करने जा रहा हूँ, वह एक दुस्साहसिक व्यक्ति है। आप समझ ही गए होंगे, मेरा संकेत डॉ. मनमोहन सिंह की ओर है। उनके दुस्साहसी होने की बात आप भी स्वीकार कर लेंगे, जब मैं यह कहूँगा कि जब सोनिया गांधी ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया, जैसे कोई भी लेखक नोबेल पुरस्कार को सहज ही स्वीकार कर लेता है और यह नहीं कहता कि मेरी क्या बिसात, मैं इतना बड़ा लेखक नहीं हूँ कि मुझे यह उच्चतम पुरस्कार दिया जाए - इससे बेहतर होता कि यह अमुक जी को या तमुक जी को दिया जाता। मनमोहन जी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन जब यह पका हुआ आम उनके झोले में आ गिरा, तो वे अपनी जेब से चाकू निकाल कर इसे छीलने-काटने-खाने लगे। मेरे खयाल से, कोई और विद्वान होता, तो कम से कम शिष्टाचारवश ही यह निवेदन करता कि मुझे काँटों में क्यों घसीट रही हैं, मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी का पद सँभालने लायक नहीं हूँ। मैं तो कोई यूनिवर्सिटी भी ठीक से नहीं चला सकता - इतना बड़ा और इतनी समस्याओं से ग्रस्त देश कैसे चला सकूँगा। लेकिन क्या पता! आजकल के विद्वानों के बारे में मैं ज्यादा जानता नहीं हूँ। हो सकता है, वे मनमोहन सिंह से ईर्ष्या ही कर रहे हों कि अगर मैडम को किसी विद्वान की ही जरूरत थी, तो मैं क्या मर गया था!

मनमोहन सिंह ही मेरे प्रिय प्रधानमंत्री हैं, इसका एक कारण यह है कि वे वर्तमान प्रधानमंत्री हैं। शराब पुरानी अच्छी मानी जाती है और नेता वह जो सत्ता में है। जवाहरलाल अच्छे प्रधानमंत्री थे या मोरारजी, इस बहस में क्या रखा है। मरे हुए लोगों के साथ हम न रात काट सकते हैं, न दिन बिता सकते हैं। उनके साथ सबसे तार्किक सलूक यह है कि उन्हें मरा हुआ मान लिया जाए, नहीं तो वे जिंदा आदमियों को मार डालेंगे। जिंदा आदमी ही जिंदा आदमी के काम आ सकता है। अगर अटलबिहारी वाजपेयी आज प्रधानमंत्री होते, तो मैं कहता कि वाजपेयी ही मेरे प्रिय प्रधानमंत्री हैं।

प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं, इसका दूसरा कारण यह है कि वे प्रधानमंत्री हैं भी और नहीं भी हैं। अगर वे सफल प्रधानमंत्री साबित होते हैं - हालांकि आज तक तो कोई ऐसा हुआ नहीं, तो उन्हें इसका श्रेय जरूर मिलेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबारों द्वारा कहा जाएगा कि देखा, एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना देश के लिए कितना हितकर रहा। फिर यह बहस छेड़ दी जाएगी कि क्यों न प्रत्येक राज्य में मुख्यमंत्री के पद पर भी किसी गैर-राजनीतिक व्यक्ति को ही बैठाया जाए और पाठकों से अनुरोध किया जाएगा कि वे एसएमएस से अपनी राय भेजें। अगर वे एक विफल प्रधानमंत्री साबित होते हैं, जिसकी संभावना रोज बढ़ती जा रही है, तो विख्यात पत्रकार इसका स्पष्टीकरण यों देंगे कि जो काम राजनीति का है, वह राजनेता ही कर सकते हैं - हम तो शुरू से ही यह मान कर चल रहे थे कि मैडम ने एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना कर हिमालयन ब्लंडर किया है। इस तरह मनमोहन सिंह एक ऐसे जुए का नाम है, जिसमें चित हो या पट, वही जीतेंगे। नागार्जुन की तरह वे कभी भी कह सकते हैं कि मैं एक गलत मुहल्ले में चला गया था।

मेरे पास कारण ज्यादा नहीं हैं - वैसे किसी को प्रिय मानने के लिए एक ही कारण काफी होता है, इसलिए मैं जल्दी से तीसरे और अंतिम कारण पर आता हूँ। वह यह है कि वे दुर्योधनों के बीच युधिष्ठिर की तरह रहते हैं। सभी लोग कहते हैं कि उनकी ईमानदारी संदेह से परे हैं। मैं तो शुरू से ही बहुत के साथ रहा हूँ। मेरा एक असमी दोस्त कहता है, 'मनमोहन सिंह ने दो बार अपने को असम का स्थायी निवासी बता कर राज्य सभा का चुनाव लड़ा, जो सरासर झूठ था, इसलिए मैं तो उन्हें ईमानदार नहीं मानता।' क्षमा करें, मैं अपने इस दोस्त से कभी सहमत नहीं हो सका, क्योंकि इस तरह की कसौटियों पर विद्वानों को कसना उनके साथ न्याय नहीं है। अगर किसी विद्वान को एसी सेकंड का किराया मिलता है और वह स्लीपर क्लास में 'सफर' (श्लेष अनिच्छित) करता है, तो क्या यह उसकी बेईमानी मानी जाएगी? मनमोहन सिंह मेरे प्रिय प्रधानमंत्री इसलिए हैं कि वे जल में कमल की तरह रहते हैं। कैबिनेट की बैठक में चारों ओर साँप फुँफकार रहे हों, तब भी वे अपनी कोमल, मधुर मुसकान को कायम रख सकते हैं और गंभीर बातें कर सकते हैं। कोई कह सकता है कि विद्वानों में इतना संयम नहीं होता, तो वे विद्वान कैसे कहलाते! इसके जवाब में मैं खींस निपोर दूँगा और कहूँगा, आप ठीक कहते हैं, सर।


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