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व्यंग्य

नक्सलवादियों से बातचीत
राजकिशोर


माननीय प्रधानमंत्री काफी दिनों से नक्सलवादियों से बातचीत करना चाहते थे। पर कोई जुगाड़ नहीं बैठ रहा था। इसके लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाया गया। टास्क फोर्स ने नक्सलवादियों के एक समूह को प्रधानमंत्री से बातचीत करने के लिए तैयार कर लिया।

वे पाँच थे। देखने में सामान्य और सभ्य इन्सान लग रहे थे। सिर्फ पाँचवाँ कुछ अलग-सा जान पड़ता था। उसकी बाईं भुजा बार-बार फड़कने लगती थी। सिक्यूरिटीवालों ने उस पर आपत्ति की थी, पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने जाँच के बाद उसे क्लियर कर दिया था। रा.सु. सलाहकार का कहना था कि यह एक नॉर्मल मेडिकल कंडीशन है, इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं है।

प्रधानमंत्री ने अपनी मशहूर मुस्कान के साथ शिष्टमंडल के सदस्यों का स्वागत किया। नक्लसवादियों ने उन्हें तहे-दिल से धन्यवाद दिया। इसके बाद बातचीत शुरू हुई।

प्रधानमंत्री - मुझे पता है कि आपके और हमारे विचारों के बीच काफी दूरी है। लेकिन मैं दूरियों को बढ़ाने में नहीं, उन्हें पाटने में यकीन करता हूँ।

नक्सलवादी - हम भी इसी इरादे से आए हैं। अगर बातचीत से काम हो जाए, तो हमें जंगलों में पड़े रहने का कोई शौक नहीं है।

प्रधानमंत्री - मुझे एक भेद खोलने की अनुमति दीजिए। एक जमाने में मुझे नक्सलवादियों से सहानुभूति थी। अगर रिजर्व बैंक, विश्व बैंक, फाइनांस मिनिस्ट्री वगैरह की जिम्मेदारी मुझ पर न आ गई होती, तो शायद मैं भी नक्सलवादी हो जाता।

पाँचवें की बाईं भुजा बहुत जोर से फड़की। चौथे ने उसकी पीठ पर हाथ रख उसे सँभालने की कोशिश की।

नक्सलवादी - फिर आपने अमेरिका द्वारा लादी गई बाजार-केंद्रित अर्थनीति को मंजूर कैसे कर लिया?

प्रधानमंत्री - माफ कीजिए, यह मेरा नहीं, देश का फैसला था।

नक्सलवादी - यह असत्य है। क्या इस मामले में आपने कभी देश की राय ली?

प्रधानमंत्री - संसद हमारे साथ है और संसद देश का प्रतिनिधित्व करती

है।...वैसे मैं भी आप लोगों से पूछ सकता हूँ कि नक्सलवाद की राह पर चलने के पहले आप लोगों ने क्या देश से समर्थन हासिल कर लिया था?

नक्सलवादी - देश की जनता हमारे साथ है। हम जिनके बीच काम करते हैं, वे हमसे पूरी तरह सहमत हैं।

प्रधानमंत्री - संसद जनता से बाहर नहीं है। तभी तो मैं आप लोगों से अपील करना चाहता हूँ कि चूँकि हम दोनों ही देश हित में काम कर रहे हैं, इसलिए हमें मिल-जुल कर काम करना चाहिए।...अच्छा, यह बताइए कि आप लोग चाहते क्या हैं?

नक्सलवादी - हम समाजवाद चाहते हैं।

प्रधानमंत्री - इस पर हमारा आपसे कोई मतभेद नहीं है। हमारे संविधान में समाजवाद को मान्यता दी गई है। कांग्रेस पार्टी भी समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध है।

नक्सलवादी - हम अमूर्त समाजवाद नहीं, ठोस समाजवाद चाहते हैं। हम निजी पूँजी को समाप्त करना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री - निजी पूँजी रही कहाँ अब? अब तो कॉरपोरेट पूँजी है, जो वास्तव में शेयरहोल्डरों का पैसा है। इसमें बैंकों का भी धन लगा है।

नक्सलवादी - हम इस कॉर्पोरेट कल्चर का विरोध करते हैं। हम मल्टीनेशनल्स का विरोध करते हैं। हम सामंतवाद के खिलाफ हैं। हम चाहते हैं कि दलितों और आदिवासियों को इज्जत और बराबरी के साथ जीने का हक मिले। सभी तरह का शोषण खत्म हो। आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा हो।...

प्रधानमंत्री - हम आपकी सभी बुनियादी माँगों से सहमत हैं। बल्कि उसी दिशा में काम भी कर रहे हैं। यह सब तभी संभव है जब तेजी से विकास हो। आपसे मेरी गुजारिश है कि विकास में बाधा न पैदा करें। विकास न होने पर कोई भी बड़ा राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

पाँचवें की भुजा फिर फड़की। इस बार किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया।

नक्सलवादी - विकास तो हम भी चाहते हैं, पर ऐसा विकास किस काम का, जो अमीरों को और अमीर तथा गरीबों को और गरीब बनाए!

प्रधानमंत्री - इस बात से हम भी चिंतित हैं। मैं दर्जनों बार कह चुका हूँ कि विकास का लाभ सभी को मिलना चाहिए।

नक्सलवादी - सवाल कहने का नहीं, करने का है। व्यवहार में तो सब कुछ उलटा हो रहा है। हम मानते हैं कि बूर्ज्वा सरकारें समाजवादी अजेंडा को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है।

प्रधानमंत्री - तो फिर आपको रोका किसने हैं? आप चुनाव लड़ कर आइए और देश को अपने मुताबिक चलाइए।

नक्सलवादी - इस चुनाव प्रणाली में जनता के सच्चे प्रतिनिधि चुन कर नहीं आ सकते। आप लोगों ने इसे पैसेवालों और अपराधियों की कुश्ती बना रखा है।

प्रधानमंत्री - आपकी आपत्ति सही है। हमें चुनाव प्रणाली को सुधारने के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा।

नक्सलवादी - करना चाहिए, करना होगा, कर रहे हैं...यह सब सुनते-सुनते जनता ऊब चुकी है। उसका धीरज खत्म हो गया है। हम ठोस नतीजे चाहते हैं।

प्रधानमंत्री - देखिए, मेरे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि रातों-रात सब ठीक हो जाए...

नक्सलवादी - जब तक ठोस नतीजे नहीं निकलते, लोग लड़ने के लिए मजबूर हैं।

प्रधानमंत्री - लोकतंत्र में किसी को संघर्ष करने से मना नहीं किया जा सकता। बस हिंसा नहीं होनी चाहिए।

नक्सलवादी - हिंसा हम नहीं, पुलिस करती है। जमींदार करते हैं, शोषक जमातों के गुर्गे करते हैं। हम तो सिर्फ प्रतिरोध करते हैं।

इस तरह बातचीत घंटे भर तक जारी रही। कोई नतीजा नहीं निकला। अंत में तय हुआ कि अगली बातचीत तीन महीने बाद होगी।

अगले दिन दिल्ली के अखबारों ने दो खबरें ब्रेक कीं। पहली खबर यह थी कि बातचीत के लिए राजी करने के लिए नक्सलवादियों को काफी मात्रा में हथियार दिए गए थे। दूसरी खबर के अनुसार, जो बातचीत के लिए आए थे, वे असली नक्सलवादी नहीं थे। टास्क फोर्स ने फर्जी आदमियों को नक्सलवादी बता कर प्रधानमंत्री से मिलवा दिया था।


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