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व्यंग्य

वह स्कूल खोलेगा
राजकिशोर


वह आजकल बहुत उत्तेजित है। ट्रांसपोर्ट के अपने कारोबार से वह ऊबा हुआ है। इस क्षेत्र में जितना कुछ किया जा सकता था, वह कर चुका। इस समय उसके पास तीस ट्रक हैं। इनमें से प्रत्येक ट्रक उसके लिए एक छोटी टकसाल है। लेकिन इन टकसालों में अब कोई चार्म नहीं रहा। शुरू में हर नए ट्रक में उसे लक्ष्मी माता के दर्शन होते थे। अब लगता है कि खटाल में एक और भैंस आ गई है। बोर... महाबोर...। वह सोचेगा, अब कुछ नया करना ही होगा। कोई ऐसा काम, जिसमें पैसा भी हो और प्रतिष्ठा भी।

वह कुछ दिनों तक अखबार ध्यान से पढ़ेगा। अंग्रेजी बहुत थोड़ी जानने के बावजूद वह शहर के सभी अंग्रेजी अखबार मँगाएगा ही नहीं, पढ़ने की कोशिश भी करेगा। धीरे-धीरे वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि इस समय देश शिक्षा के संकट से गुजर रहा है। स्कूलों में प्रवेश नहीं मिलता। बड़े-बड़े लोगों को सिफारिश भिड़ानी पड़ती है। 60-70 प्रतिशत अंक पानेवालों से तो किसी भी अच्छे कॉलेज में बात तक नहीं की जाती। उन्हें कहा जाता है, जाओ, हिन्दी, संस्कृत, पाली आदि विभाग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आजकल नए-नए विश्वविद्यालय खुल रहे हैं। इनमें से कुछ तो विदेश से भी मान्यता हासिल कर चुके हैं। इन प्राइवेट विश्वविद्यालयों में ली जानेवाली फीस विश्वविद्यालयों से सिर्फ तीस से चालीस गुना ज्यादा है। वह इस विषय पर गंभीरता से सोचेगा।

शिक्षा से कभी उसका कोई खास सम्बन्ध नहीं रहा। हाई स्कूल किसी तरह कर लिया था। तभी वह अपने पिता की टायर-ट्यूब ठीक करने की दुकान में काम करने लगा था। काम करते हुए ही उसने बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर ली थी। नम्बर ज्यादा नहीं आए, तो क्या। वह ग्रेजुएट होने का दावा तो कर सकता था। कारोबार के नए क्षेत्रों पर विचार करते समय उसे एहसास होगा कि काश, उसे शिक्षा के बारे में कुछ और मालूम होता। इस सिलसिले में वह अपने शिक्षित मित्रों की खोज करेगा। उन्हें खाने पर बुलाएगा। उनसे समझने की कोशिश करेगा कि किसमें ज्यादा फायदा है - स्कूल खोलने में या कॉलेज खोलने में, किसमें कितनी पूँजी की जरूरत होगी, जमीन कितनी चाहिए, स्टाफ कितना लगेगा, सैलरी कितनी देनी होगी, कोई लफड़ा तो नहीं है? सभी ओर से कंविंस्ड हो जाने के बाद वह फैसला करेगा कि कॉलेज के धन्धे में बाद में पड़ेंगे, पहले स्कूल ही खोल लें। इस बिजनेस की पूरी जानकारी हो जाने के बाद ही कॉलेज सेक्टर में जाना ठीक रहेगा। हाथी के शिकार करने के पहले लोमड़ियों के शिकार का तजुरबा हासिल करना जरूरी है। नहीं तो घर के रहेंगे न घाट के।

सबसे पहले वह रियासती दर पर सरकारी जमीन हासिल करने के लिए कोशिश करेगा। इसके लिए वह जान लड़ा देगा। शिक्षा विभाग में संपर्कों का पता लगाएगा। इसी दौरान वह स्थानीय विधायक से दोस्ती गाँठेगा। उसके घर आना-जाना शुरू करेगा। फिर दोनों में मिलीभगत की शुरुआत होगी। विधायक से नेट मुनाफे में दस परसेंट और हर साल दस एडमिशन पर बात फाइनल हो जाएगी। विधायक दिन-रात एक कर सस्ती दर पर जमीन दिला देगा। सरकार शर्त लगाएगी कि स्कूल की दस प्रतिशत सीटें बीपीएल परिवारों के लिए आरक्षित रहेंगी। वह हँसते-मुस्कुराते इस शर्त को मंजूर कर लेगा। तब तक वह जान चुका होगा कि यह क्लॉज बेकार है - कोई भी स्कूलवाला इस शर्त का पालन नहीं करता।

फिर वह बिल्ंिडग बनाने के चक्कर में पड़ेगा। वह हिसाब लगाएगा कि अपनी बिल्ंिडग बनाना ठीक है या किराए पर जगह लेना। किराएवाला विकल्प उसे ज्यादा जमेगा। मिली हुई जमीन के चारों ओर चारदीवारी बना कर उसे छोड़ देगा। बस एसबस्टस की छत लगा देगा। फिर उसे गोदाम के रूप में कई फर्मों को किराए पर दे देगा। शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मुट्ठी गरम कर वह निश्ंिचत हो जाएगा कि इस बारे में सरकार की ओर से कोई पूछताछ नहीं होगी। गोदाम के किराए से आनेवाली रकम से वह स्कूल के लिए ली गई बिल्ंिडग का किराया भरेगा। अब स्टाफ की खोज शुरू होगी। एक रिटायर टीचर को वह प्रिंसिपल बनाएगा। उसे आधी सैलरी देगा। कुछ अच्छे स्कूलों से वह अच्छे टीचर तोड़ेगा, ताकि स्कूल के विज्ञापन में लिखा जा सके कि हमारी फैकल्टी में अनुभवी और प्रतिष्ठित स्कूलों के पूर्व-शिक्षक शामिल हैं। बाकी जगहें उन शिक्षिकाओं से भरी जाएँगी जो नौसिखुआ होंगी और जिनके लिए तीन से पाँच हजार तक की तनखा काफी होगी। इन्हें जितना वेतन दिया जाएगा, उससे काफी ज्यादा स्कूल रजिस्टर में चढ़ाया जाएगा। छात्रों के लिए दो बसें किराए पर ली जाएँगी।

फिर एक दिन उद्घाटन समारोह होगा। शिक्षा मंत्री को प्रमुख अतिथि बनाया जाएगा। वे अपने भाषण में कहेंगे कि मुझे यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि समाज सेवा की भावना से प्रबुद्ध नागरिक शिक्षा का विस्तार करने के लिए आगे आ रहे हैं। कुछ देर तक विद्या के महत्व पर प्रकाश डालने के बाद वे कहेंगे कि मैं तो गाँव के स्कूल में पढ़ा हूँ, सो मेरा मन कर रहा है कि इस नए भव्य स्कूल की पहली कक्षा में एडमिशन ले लूँ, लेकिन मेरी उम्र को देखते हुए पि्रंसिपल साहब शायद मुझे दाखिला नहीं दें। इस पर श्रोताओं में हँसी की लहर फैल जाएगी।

इसके बाद का किस्सा मुख्तसर होगा। उसका स्कूल चलने लगेगा। वह एक के बाद एक कई स्कूल खोलेगा। क्रमशः उसके ट्रकों की संख्या घटती जाएगी और स्कूलों की संख्या बढ़ती जाएगी। एक दिन उस पर अपने ही एक स्कूल की शिक्षिका के यौन शोषण का आरोप लगेगा और वह गिरफ्तार हो जाएगा। लेकिन दूसरे ही दिन छूट जाएगा। टीवी के खोजी पत्रकार पता लगाते रह जाएँगे कि वह शिक्षिका आखिर कहाँ चली गई।


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