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व्यंग्य

नैनो की विदाई पर
राजकिशोर


मैं पश्चिम बंगाल का हूँ, इसलिए अपनी प्यारी बिटिया नैनो की विदाई पर मेरी आँखें भर आई हैं। बहुत दिनों के बाद बिटिया घर आई थी। वरना तो जब से मुझे होश आया है, मैंने लोगों को यहाँ से जाते ही देखा है। जो एक बार यहाँ से जाता है, दुबारा नहीं लौटता। नैनो बिटिया के साथ तो और भी बुरा हुआ। वह बेचारी आई, कुछ ही दिन रही और अब उसे वापस जाना पड़ रहा है। आँसू रुक नहीं रहे हैं। पश्चिम बंगाल वालों को पता नहीं कब तक रोना पड़ेगा।

नैनो बिटिया ने किसी का क्या बिगाड़ा था? वह खुद से तो यहाँ आई नहीं थी। इतना बड़ा देश है। कहीं भी जा सकती थी। सभी बुला रहे थे। उसने पश्चिम बंगाल का चुनाव इस उम्मीद से किया कि यहाँ उसे प्यार-दुलार मिलेगा। ज्योति बसु बेहद गंभीर रहते थे। न ऊधो से लेना, न माधो को देना। वे जानते थे कि हमारा किला तो गाँवों में है, उसमें कौन सेंध लगा सकता है? बुद्धदेव बाबू शुरू से ही महत्वाकांक्षी रहे हैं। लेखक हैं। विद्वान भी हैं। जानते हैं कि जब तक सर्वहारा पैदा नहीं होगा, तब तक सर्वहारा की तानाशाही कैसे कायम हो सकती है? सर्वहारा चाहिए तो कारखाने लगाने होंगे। कारखाने लगाने हैं, तो उद्योगपति चाहिए। मार्क्स ने यह थोड़े ही लिखा है कि कम्युनिस्ट देश के एक हिस्से में अपनी सत्ता जमा लें, तो उन्हें इस इलाके का उद्योगीकरण जन सहयोग से करना चाहिए? इसलिए मार्क्सवादी मुख्यमंत्री ने टाटा को बुलाया और अपना सारा प्यार उन पर उँड़ेल दिया।

प्यार की मुश्किल यह होती है कि हमारे पास उसकी मात्रा तो कम होती है, पर हम उसे बाँटना ज्यादा लोगों के बीच चाहते हैं। इसी में हमारे बुद्धदेव बाबू मारे गए। उद्योगपति की अगवानी में उन्होंने किसानों को भुला दिया। जैसे कभी-कभी बारातियों के स्वागत में घरातियों की उपेक्षा कर दी जाती है। हो सकता है, बुद्धदेव ने सोचा हो कि किसान तो हमारी जेब में पड़े रहते हैं, कहाँ जाएँगे। नैनो की चमक उनकी आँखों में छा जाएगी। वे खुशी-खुशी अपनी जमीन दे देंगे। ले जाओ जी, जितनी चाहिए ले जाओ। इस जमीन पर साग-सब्जी उगे, इससे अच्छा है मोटरगाड़ी उगे। जमीन हमें बाँधे हुए हैं। मोटरगाड़ी से हम पता नहीं कहाँ-कहाँ उड़ेंगे।

हमारे वामपंथी मित्र ठीक ही कहते हैं, पश्चिम बंगाल की जमीन किसी और मिट्टी से बनी है। यह जमीन दूसरे राज्यों से अलग न होती, तो एक ही राजनीतिक समूह का शासन इतने लम्बे समय तक टिक पाता? मैं भी मानता हूँ कि प. बंगाल में कुछ खूबियाँ हैं। एक बड़ी खूबी यह है कि यहाँ के लोग अन्याय सहन करना नहीं जानते। अन्याय देखते ही वे भड़क जाते हैं। उनके हाथ खुजलाने लगते हैं। दिल्ली जैसी बसें वहाँ नहीं चलतीं कि किसी यात्री के साथ अन्याय हो रहा हो और बाकी लोग धूर्त चुप्पी बनाए रखें। सड़क पर कोई किसी को पीट रहा हो और भीड़ की भीड़ चुपचाप गुजरती रहे। रेस्त्राँ में किसी लड़की को छेड़ा जा रहा हो और बाकी लोग मजा लेते रहें। बंगाल में कोई न कोई उठ खड़ा होगा। मारपीट न कर सके, तो जबान तो चला कर रहेगा। हिकमते चीन और हुज्जते बंगाल एक जैसे मशहूर ठहरे।

सो सिंगुर में अन्याय के खिलाफ तमाम मर्दों के बरक्स एक औरत खड़ी हो गई। उसका नाम ममता है। ममता दीदी को खुद खाना बनाना नहीं आता। पर खाना ठीक न बना हो, तो वे बड़े जोर से चीखती हैं और कभी-कभी लगी हुई थाली भी पटक देती हैं। सिंगुर में उन्होंने कमसिन नैनो के साथ यही किया। लोग ममता के साथ थे। स्थानीय पंचायतें ममता के साथ थीं। न्याय भी ममता के साथ था। फिर एक मुख्यमंत्री, एक उद्योगपति, एक राष्ट्रीय दल - सब मिल कर क्या कर लेते? पांडव पाँच ही थे, पर वे सौ कौरवों पर भारी पड़े। ये लड़ाई थी दीए की और तूफान की। तूफान आ कर चला गया। दीया जल रहा है।

फिर मेरी आँखें गीली क्यों हैं? नैनो का शोक मुझे क्यों सता रहा है? मैं चाहता था कि नैनो भी रहे और न्याय भी हो। नैनो गुजरात गई है। वहाँ वह सुख से रहेगी। कारण, वहाँ के किसान एक तरह के उद्योगपति ही हैं। उनकी गोद में नैनो बिटिया खूब फूले-फलेगी। मेरा दुख यह है कि बंगाल की न्यायप्रिय जमीन पर क्यों नहीं रुक पाई। उसके लिए यहाँ जगह निकलनी चाहिए थी। असली उद्योगीकरण नहीं हो पा रहा है, तो नकली और दिखावटी ही सही। कुछ तो हो, जिससे समाज की जड़ता टूटे। वैसे, इन आँसुओं में सुख के भी कुछ कण हैं। सत्तारूढ़ वामपंथियों की समझ में शायद अब यह आ ही जाए कि आप दाएँ और बाएँ, दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। इसकी कोशिश करेंगे, तो आपका गिरना तय है। नंदीग्राम और सिंगुर में गिर पड़े हैं, तो कोई बात नहीं। कॉमरेड, फिर से उठिए और अगली बार मत गिरिएगा। नैनो बिटिया तो गई। किसी और को यह दिन न देखना पड़े।


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