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व्यंग्य

जेसिका लाल की बहनें
राजकिशोर


एक पच्चीस-छब्बीस साल की देहाती युवती को पुलिस मुख्यालय में, और वह भी पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के ठीक सामने, पाकर बाहर बैठा चौकीदार हैरत में पड़ गया। वह जब से सर्विस कर रहा है, ऐसा कभी नहीं हुआ था। 'अरे, अरे, तुम यहाँ कैसे? तुम्हें अन्दर किसने घुसने दिया?' युवती पहले से ही गुस्से में थी। उसने कहा, 'तुम्हे इससे क्या मतलब? गार्ड हो, गार्ड की तरह रहो। मुझे कमिश्नर साहब से मिलना है। बहुत जरूरी काम है।' 'क्या काम है?' 'तुम जान कर क्या करोगे? तुम्हारे बस की बात नहीं है। मुझे अन्दर जाने दो।' 'ऐसे कैसे जा सकती हो? टाइम लिया है?' 'टाइम माँगती, तो क्या मिल जाता?' यह कह कर वह भीतर जाने की कोशिश करने लगी। गार्ड ने उसकी बाँह पकड़कर रोका। दोनों में छीना-छपटी होने लगी। युवती ने शोर-मचाना शुरू कर दिया। शोर अन्दर पहुँचा। 'क्या बात है? क्या बात है?' कहते हुए परेशान-से कमिश्नर साहब बाहर निकल आये। गार्ड ने पूरी वफादारी के साथ सारा किस्सा बताया। कमिश्नर ने कहा, इसे छोड़ दो, फिर युवती से कहा, बेटी, भीतर चलो।

अपने छोटे-से, सजे-सजाए किले में लौटने के बाद पुलिस कमिश्नर ने पहले युवती के लिए पानी मँगाया, फिर पूछा, 'अब बताओ, बात क्या है?' युवती फफक-फफक कर रोने लगी। शांत हुई तो कहने लगी, 'अंकल, मेरा नाम कविता है। मैं त्रिलोकपुरी से आई हूँ। गुंडों ने मेरी छोटी बहन के साथ बलात्कार किया। उसके बाद उसकी जान ले ली। लाश नहर किनारे फेंक दी।' कमिश्नर ने धीरता के साथ कहा, 'तो यहाँ क्यों आई हो? जाकर लोकल थाने में रिपोर्ट करो। जो करेंगे, वही लोग करेंगे।' 'उन्हीें की तो शिकायत करने आई हूँ। यह कोई कल की बात थोड़े है। तीन साल हो गए। चार में से दो गुंडे गिरफ्तार हुए। हफ्ते भर पुलिस की जेल में रहे। एक पर मुकदमा चला। लेकिन वह सबूत की कमी की वजह से छूट गया। अब वह मुझे तंग करता है। धमकाता है कि तुम्हारे साथ भी वही होगा, जो तुम्हारी बहन के साथ हुआ था।' 'तो इसकी भी रिपोर्ट थाने में ही होगी। वहीं जाओ।' 'कमिश्नर साहब, मैं अपने लिए नहीं आई हूँ। मेरा जो होगा, सो होगा। बहुत हुआ तो इलाका ही छोड़ दूँगी। मैं अपनी बहन के लिए न्याय माँगने आई हूँ। आप दिल्ली के सबसे बड़े अफसर हैं। आप चाहें, तो सब कुछ हो सकता है।' कमिश्नर साहब ने अफसोस-भरा चेहरा बनाया, 'नहीं बेटी, अब कुछ नहीं हो सकता। अदालत ने सबूत के अभाव में बरी कर दिया है, तो कौन क्या कर सकता है?'

कविता मुसीबत की मारी हुई थी। उसने धीरज नहीं खोया। बोली, 'अंकल, मैं अनपढ़ नहीं हूँ। मैंने इग्नू से बीए किया है। कल ही मैंने पेपर में पढ़ा कि जेसिका लाल का हत्यारा भी सबूत के अभाव में छूट गया था। इस पर हल्ला-गुल्ला मचा तो पुलिस ने फिर से मुकदमा दायर किया है। अब सारा केस फिर से खुलेगा। हो सकता है, मनु शर्मा को इस बार सजा मिल ही जाए। यह सब पढ़ कर मैंने सोचा कि अगर जेसिका की हत्या का मुकदमा दोबारा खुल सकता है, तो मेरी बहन का मुकदमा क्यों नहीं खुल सकता? जेसिका का तो सिर्फ मर्डर किया गया था। मेरी बहन के साथ तो बलात्कार भी हुआ था। अंकल, आप चाहें तो हमारा मुकदमा भी दोबारा खुल सकता है।'

अब सारा मामला पुलिस कमिश्नर की समझ में आ गया। तो यह लड़की जेसिका लाल से बराबरी करना चाहती है! वे जरा गुस्से में आ गए। बोले, 'लेकिन जेसिका मर्डर केस में तो कोर्ट के ऑर्डर हैं। हमें कुछ कार्रवाई करनी ही थी। नहीं तो अदालत की तौहीन हो जाती...तुम्हारा मामला पूरी तरह से खत्म हो चुका है। तुम निश्ंिचत होकर घर जाओ। रोने-कलपने से तुम्हारी बहन वापस थोड़ी ही आ जाएगी?' युवती ने हिम्मत करके पूछा, 'तो क्या दोबारा मुकदमा चलाने पर जेसिका लाल की जिंदगी वापस आ जाएगी?' 'मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहता। इस मामले में सबूतों को जान-बूझ कर नष्ट किया गया है। कुछ चीजों की इन्क्वायरी भी नहीं हुई है। इन सब चीजों की दोबारा जाँच की जा सकती है। कुछ नई बात सामने आई तो मुकदमा भी फिर से चलाया जा सकता है। तुम्हारा मामला अलग है।'

अब तक युवती निराश-सी होने लगी थी। फिर भी उससे बोले बगैर नहीं रहा गया, 'अंकल, आप जाँच तो कराइए। हमारे मामले में भी कुछ नई बातें सामने आ सकती हैं। जिस बदमाश ने रेप किया था, वह अब सरेआम कहता फिरता है कि हाँ, मैंने रेप किया था। मर्डर भी किया था। अब यही सब उसकी बहन के साथ भी करूँगा। देखें, कोई क्या कर लेता है? दस-बारह लोगों ने उसके मुँह से यह बात सुनी है। उनमें से कुछ गवाही देने के लिए भी तैयार हैं। आखिर सभी की माँ-बहनें हैं।' 'बेटी, तुम समझ नहीं रही हो। अदालत में जाकर वे मुकर गए तो? हमारी सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।' युवती ने कहना चाहा कि गवाह तो जेसिका लाल कांड में भी मुकर गए थे, पर अब तक वह पूरी तरह से निराश हो चुकी थी। उसकी आँखों से आँसू फिर बहने लगे थे।

जब वह अपना मासूम चेहरा लिए पुलिस कमिश्नर के केबिन से निकली और पुलिस मुख्यालय के बाहर आई, तो देखा, सैकड़ों मर्द-औरतें नारा लगा रहे थे : दिल्ली पुलिस दलाल है। रिश्वत खाकर मालामाल है। जेसिका लाल के हत्यारे को फाँसी दो। फाँसी दो, भाई फाँसी दो। उसे लगा कि उसके चारों तरफ दुनिया घूम रही है। अपने को गिरने से बचाने के लिए वह वहीं बैठ गई।


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