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व्यंग्य

महँगाई देवी
राजकिशोर


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने डिनर अभी समाप्त ही किया था कि चोबदार ने सलाम ठोक कर सूचना दी - सर, गुप्तचर विभाग के प्रमुख आपसे मिलना चाहते हैं। कहते हैं, बहुत जरूरी काम है। प्रधानमंत्री के शांत चेहरे पर तनाव की एक हलकी-सी झाँई आई। उनकी भंगिमा से ऐसा लगा कि वे कुछ और कहने वाले थे, पर झख मार कर उन्हें यह बोलना पड़ा - फोन पर बात कराओ।

वायरलेस फोन के दूसरे सिरे पर गुप्तचर विभाग का प्रधान था। प्रधानमंत्री ने पूछा - क्या वामपंथियों ने अपना समर्थन वापस ले लिया है?

उत्तर आया - नो, सर।

- क्या पाकिस्तान ने हमला कर दिया है?

- जी नहीं, यह भी नहीं।

- क्या मैडम के यहाँ किसी ने मेरी शिकायत की है?

- नो, सर।

- फिर क्यों मुझे परेशान करने चले आए? कल सुबह दफ्तर में मिलना।

- सर, एक बहुत जरूरी खबर थी...

- मैंने कहा न, कल मिलना।

जिस आदमी को यह नहीं मालूम कि जरूरी खबर क्या है और गैरजरूरी खबर क्या है, वह प्रधानमंत्री कार्यालय में मुलाकातियों की भीड़ में लाइन लगाए बैठा था। सोलहवें नंबर पर उसकी बुलाहट हुई। प्रधानमंत्री ने मानो कुछ अवमानना भाव से पूछा - बताइए, कौन-सी जरूरी खबर है कि आप रात के समय हमारे घर पहुँच गए? गुप्तचर ने अपने लम्बे सिर को थोड़ा झुका कर कहा - सर, देश के कुछ हिस्सों में महँगाई देवी प्रकट हुई हैं। लोग डर के मारे काँप रहे हैं और गाने-बजाने के साथ उनकी पूजा कर रहे हैं ताकि उनका कोप शांत हो।

प्रधानमंत्री - महँगाई देवी? मैं पहली बार इनका नाम सुन रहा हूँ।

गुप्तचर - सर, ये कई बार प्रकट हो चुकी हैं। जब भी दर्शन देती हैं, सरकार के पलटने का खतरा उपस्थित हो जाता है। चूँकि यह आपके लिए सबसे बड़ा खतरा है, इसलिए मैंने सोचा, आपको तुरन्त खबर करनी चाहिए। मेरे पास पक्की सूचना है कि महँगाई देवी जहाँ-जहाँ भी प्रकट हुई हैं, उनकी आकृति रोज-रोज बढ़ रही है। आशंका है कि वे कुछ और इलाकों में भी प्रकट होंगी। जनता के मन में डर फैल गया है।

प्रधानमंत्री - लेकिन इनके प्रकट होने से जनता कैसे प्रभावित होती है? भारत तो देवी-देवताओं का देश ही है। एक और देवी सही!

गुप्तचर- आपकी बात सही है। जब तक संतोषी माता की महिमा थी, लोग अपने जीवन से संतुष्ट रहते थे। वे ज्यादा की चाह नहीं करते थे। पर महँगाई देवी काली की तरह कोप की देवी हैं। ये जहाँ प्रकट होती हैं, चीजों के भाव बढ़ने लगते हैं। चावल, गेहूँ, आलू, प्याज, दाल, चीनी सब कुछ महँगा होने लगता है। लोगों में सरकार-विरोधी भावनाएँ पनपने लगती हैं। प्रधानमंत्री ने दुअन्नी आकार की अपनी मुस्कान छोड़ी - थैंक यू। ऐंड नोट इट कि मैं माइथोलॉजी से नहीं डरता। जाओ, पता लगाओ कि यह अफवाह भाजपा के लोग तो नहीं फैला रहे हैं? वे देवी-देवताओं के चक्कर में बहुत रहते हैं।

गुप्तचर विभाग का प्रमुख एक बार फिर निराश हुआ। वह एक अनुभवी और खुर्राट अफसर था। उसने कई सरकारों को आते-जाते देखा था। वह बहुत ही पका हुआ सरकारी कारिंदा था। इसलिए उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रहता था कि कोई सरकार रहती है या जाती है। लेकिन जब तक कोई सरकार बनी रहती थीं, वह बड़ी निष्ठा के साथ उसका साथ देता था। उसकी दूसरी खूबी यह थी कि वह एक सरकार के समय की बातें दूसरी सरकार को नहीं बताता था। इसके बावजूद, या शायद इसी कारण, हर आने वाली सरकार उसकी इज्जत करती थी और उसके पद के साथ छेड़छाड़ नहीं करती थी।

हर गुप्तचर जानता है कि उसकी सूचनाओं का मूल्य क्या है और इस मूल्य की परख कौन कर सकता है। सो हमारा यह गुप्तचर-शिरोमणि सीधे 10, जनपथ जा पहुँचा, जहाँ भारत सरकार का नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लाक दोनों जाकर एक हो जाते थे और वहाँ के ड्राइंग रूम के फर्श पर दंडवत की मुद्रा में पड़े रहते थे। सोनिया गांधी को जैसे ही उसके आने की सूचना मिली, उन्होंने उसे तुरन्त बुला लिया। वे जानती थीं कि राज-काज कैसे चलता है। उसमें प्रकट की अपेक्षा गुप्त का महत्त्व हमेशा अधिक होता है। गुप्तचर ने मुख्तसर में उन्हें महँगाई देवी के प्रकट होने का सारा किस्सा सुनाया और अंत में कहा - मैडम, आपको तुरन्त कुछ करना चाहिए। खबर यह भी है कि वीपी सिंह अपने मित्रों से विचार-विमर्श कर रहे हैं कि इस मुद्दे को कैसे मुद्दा बनाया जाए। वामपंथी भी कसमसा रहे हैं।

सोनिया गांधी को गंभीर होने में समय नहीं लगा। उन्होंने गुप्तचर को धन्यवाद दिया और ताकीद की कि यह देवी जैसे ही कुछ और स्पॉट्स पर प्रकट हों, वह उन्हें तुरन्त इनफॉर्म करे। इसके बाद उन्होंने अपने भाषण लेखक को बुलाया और उसने कहा - सरकार के खिलाफ एक कड़ा - ज्यादा कड़ा भी नहीं - बयान तैयार करो। मैं कांग्रेस के सभी मुख्यमंत्रियों से मिलना चाहती हूँ। सेन्ट्रल मिनिस्टर्स को भी उसमें बुलाना है। इसकी तैयारी कराओ। या तो महँगाई देवी रहेंगी या मैं। यह मनमो...फिर पता नहीं क्या सोच कर रुक गईं।

बयान जारी हुआ, मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन भी बुलाया गया, और भी कई टोटके आजमाए गए। इस सबमें इतना समय लग गया कि महँगाई देवी अपने आप अदृश्य हो गईं। सुनते हैं, जाते-जाते उनकी मुखमुद्रा ऐसी थी मानो वे कह रही हों कि तुम्हारी नीतियाँ ऐसी ही रहीं, तो मुझे फिर आना पड़ेगा।


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