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व्यंग्य

चौराहे पर लड़की
राजकिशोर


संसद मार्ग के चौराहे पर बारह साल की एक लड़की लगातार बारी-बारी से रो और सिसक रही थी। वह कई वर्षों से यहीं पर थी। उसके बाल रूखे और अस्तव्यस्त हो रहे थे। गोरे गालों का रंग बदल गया था। वे काले-काले लग रहे थे। उन पर आँसुओं की धार की लकीरें बन गई थीं। आसपास के लोगों ने उसकी तकलीफ देखकर उसके लिए एक छोटी-सी कुर्सी का इंतजाम कर दिया था। कभी-कभी कोई दयालु खाने के लिए लड़की के हाथ में कुछ रख देता। लड़की बार-बार कहती थी कि मैं घर जाना चाहती हूँ। पर यह कैसे संभव था? सड़क के कई तरफ तैनात गुंडे यह नहीं चाहते थे कि वह वहाँ से हटे। वह जैसी भी थी, जिस हालत में थी, उसका उपयोग था।

मनमोहन सिंह को उस सड़क से गुजरते देख लड़की कसमसाने लगी। उसने जोर से धाड़ मारी - अंकल! दयालु प्रधानमंत्री रुक गए। नजदीक आए। पूछा - क्या बात है, बेटी? तुम कौन हो? लड़की से कुछ बोला नहीं गया। वह अंकल को सिर्फ देखती रही। उसके होठ काँप रहे थे। पर शब्द नहीं निकल पा रहे थे। सिंह अंकल ने उसके रूखे गाल थपथपाए। पूछा - तुम्हारा नाम क्या है? लड़की ने कहा - मेरा नाम महिला विधेयक है। मैं कई वर्षों से यहाँ सड़ रही हूँ। मेरी उम्र फकत बारह साल है, पर अभी से बूढ़ी लगने लगी हूँ। आप संसद में बिल पास करा कर मुझे मुक्त कराइए ना!

मनमोहन सिंह - यह क्या इतना आसान है, बेटी? हम तो चाहते हैं, यह बिल कल ही पास हो जाए। हमारी महान नेता सोनिया जी भी इसे लेकर बहुत फिक्रमंद हैं। लेकिन किया क्या जाए। कांग्रेस के बहुत-से एमपी इसके खिलाफ हैं। वे ऊपर-ऊपर से कह देते हैं, सोनिया जी का हर फैसला हमें मंजूर है, पर भीतर से विपक्षी सांसदों से मिल कर षड्यंत्र करते हैं कि बिल पास न हो। कुछ दिन और धीरज रखो, कुछ न कुछ कर लेंगे।

अंकल चल दिए, बेटी बिलखती रही। कई दिनों के बाद लालू प्रसाद वहाँ से गुजरे। उनके पीछे-पीछे चलने वालों में एक अकाउंटेंट भी था जो हिसाब लगा रहा था कि आज भारतीय रेल का शुद्ध लाभ किस बिन्दु पर पहुँच गया। लालू प्रसाद को रोकना नहीं पड़ा, एक धूल-धूसरित बालिका को देखकर वे खुद लपक पड़े। पहले उसके बगल में खड़े होकर फोटू खिंचवाया, फिर लड़की से पूछा - बिहार की लगती हो? कौन जिला तुम्हारा?

लड़की ने बताया कि वह किसी खास जिले या राज्य की नहीं है। इस पर लालू प्रसाद ने कमेंट किया - रूटलेस हो? इधर काफी लोग अपना रूट खो रहा है। लड़की ने कहा - रूट तो मेरा बहुत मजबूत है। लेकिन सिर्फ महिलाओं के बीच। वे बराबर चीखती-चिल्लाती रहती हैं कि इस बिल को तुरन्त पास कराओ, पर कोई सुन नहीं रहा है। सब हाँ-हाँ करते हैं। ना कोई नहीं करता। पर बात भी आगे नहीं बढ़ती। पता नहीं अड़चन कहाँ है!

लालू प्रसाद के चेहरे पर कोई तनाव नहीं आया। बल्कि एक मानीखेज मुसकान उभरी। बोले - तुम नाहक सत्याग्रह कर रही हो। जब तक लालू कैबिनेट में नंबर एक नहीं बनता, तब तक नेता लोग अपना ललाट खुजलाते रहेंगे। यह सवर्ण राजनीति का दाद है। दिलीप कुमारवाला दाग नहीं, चमड़ीवाला दाग, जो खुजलाता रहता है, पर जाता नहीं है। इसे ठीक करने में बड़े-बड़े डॉगडर फेल हो जाते हैं। इसे तो कोई जमीन से जुड़ा आदमी ही ठीक कर सकता है। देखा नहीं, बिहार में हमने एक लेडी को इतने साल मुख्यमंत्री बना कर रखा। और किसी नेता ने यह हिम्मत की है? थोड़ा दिन और इंतजार करो। मेरी तरह। तुम्हारा और मेरा, दोनों का काम एक साथ होगा।

लड़की क्या कहती! वह जन नेता को खरामा-खरामा जाते देखती रही।

अखबारों में छपी तस्वीरों से आडवाणी को पता चला कि मनमोहन और लालू प्रसाद यहाँ से गुजर चुके हैं तो वे भी गांधीनगर का अपना दौरा बीच में ही छोड़कर वहाँ पहुँच गए। वे मोड़ तक इस तरह आए जैसे उन्हें इस मुसीबतजदा लड़की के बारे में कुछ पता न हो। मोड़ पर अपनी चाल धीमी कर उन्होंने बाईं तरफ नजर दौड़ाई तो उनकी आँखों में चौंकने का भाव झलका। वे पहले से अधिक गंभीर होकर उस लड़की की तरफ बढ़ चले। उससे प्रारंभिक सवाल-जवाब शुरू हुआ था कि गले में केसरिया दुपट्टा बाँधे स्वयंसेवक पता नहीं किधर से अचानक प्रकट हो गए और नारे लगाने लगे - बहनों का उद्धार करेंगे, हम भारत से प्यार करेंगे। एक तिहाई अस्थान दो, संसद में सम्मान दो। महिला बिल को पास करो, और नहीं उपहास करो।

आडवाणी ने उन्हें रोका, तो वे रुक गए। फिर लौह-पुरुष उनमें से एक का भोंपू अपने हाथ में लेकर भाषण देने लगे - हम महिला विधेयक का सम्पूर्ण समर्थन करते हैं। हमने कोशिश भी की थी कि यह जल्दी से जल्दी पास हो जाए। लेकिन कांग्रेस ने अन्त तक यह स्पष्ट नहीं किया कि इस बिल पर उसका रुख क्या है। आज भी वह दुविधा में है। मुझे शक है कि उसका इटालियन नेतृत्व भारतीय महिलाओं का दर्द समझता भी है या नहीं। (उस लड़की की ओर देखकर) लेकिन बहन, घबराओ नहीं, इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा। लेकिन पहले कांग्रेस बिल को पेश तो करे। फिर हमारे हाईकमान की बैठक होगी और हम उचित समय पर उचित निर्णय लेंगे। बिल का स्वरूप देखे बिना हम इस मामले में अपने को कमिट नहीं कर सकते। लेकिन मैं यह हमेशा के लिए स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हम आरक्षण के बढ़ते हुए दायरे का विरोध करते हैं, पर महिला आरक्षण का भरपूर समर्थन करते हैं। मैं मानता हूँ कि इक्कीसवीं सदी महिलाओं की है। भाजपा के नेतृत्व को इसके लिए अपने को अभी से तैयार करना चाहिए। (इस पर एक अखबार ने अगले दिन लिखा कि ऐसा कहकर आडवाणी जी ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के पुनर्निवाचित अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर वार किया है। उनका संकेत यह था कि श्री सिंह मूलतः मर्दवादी हैं। यह खबर छपने के बाद राजनाथ सिंह ने स्पष्टीकरण दिया कि वे लिंगनिरपेक्ष हैं। और उनकी नजर में महिलाओं और पुरुषों, दोनों के लिए समान स्थान है।)

आडवाणी की भीड़ के विदा हो जाने के बाद लड़की एकदम खामोश हो गई। वह आसमान की ओर देखने लगी। पीटीआई के एक संवाददाता के अनुसार, अब भी वह आसमान की ओर ही ताकती रहती है।


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