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कहानी

मकान
कामतानाथ


चाभी ताले में फँसा कर उसने उसे घुमाया तो उसने घूमने से कतई इनकार कर दिया। उसने दुबारा जोर लगाया परंतु कोई परिणाम नहीं निकला। अपनी जेबें टटोलना शुरू कर दीं। ऊपर वाली जेब में उसे स्टील का बाल प्वाइंट पेन मिल गया। उसने उसे जेब से निकाल कर चाभी के माथे में बने सूराख में डाल कर, मुट्ठी की मजबूत पकड़ में लेकर पेंचकस की तरह जोर से घुमाया। खटाक की एक आवाज के साथ ताला खुल गया। कुंडी खोलने में भी उसे काफी परेशानी हुई। जिन दिनों वह यहाँ रहता था शायद ही कभी यह कुंडी बंद हुई हो। इसीलिए उसे हमेशा ही बंद करने और खोलने, दोनों में ही, परेशानी होती थी। कुंडी खोल कर उसने दरवाजे में जोर का धक्का दिया। दरवाजे के पल्ले काफी मोटे और भारी थे। उनमें पीतल के छोटे-छोटे फूल जड़े थे, जिनमें छोटे-छोटे कड़े लगे थे, जो दरवाजा खुलने-बंद होने में एक अजीब जलतरंगनुमा आवाज करते थे। दरवाजा खोल कर वह दहलीज में आ गया। घुसते ही उसने देखा, फर्श पर कुछ कागज आदि पड़े थे। उसने झुक कर उन्हें उठा लिया। दो लिफाफे, एक पोस्ट कार्ड और एक तह किया हुआ कागज था। शायद पोस्टमैन डाल गया हो, उसने सोचा, उसने उनके भेजने वालों के नाम पढ़ने चाहे परंतु वहाँ प्रकाश बिल्कुल नहीं था और कुछ भी पढ़ सकना असंभव था।

उसने आगे बढ़ कर जीने के पास का स्विच टटोला। अँधेरे में स्विच ढूँढ़ने में उसे कुछ कठिनाई हुई। वैसे जब वह यहाँ रहता था तब कितना ही अँधेरा क्यों न हो कभी ऐसा नहीं हुआ कि पहली बार में ही उँगली अपने आप स्विच पर न पहुँच गयी हो, उसे आश्चर्य हुआ कि स्विच ऑन करने पर भी प्रकाश नहीं हुआ। हो सकता है जीने का बल्ब फ्यूज हो गया हो, उसने सोचा। तभी उसने गौर किया कि नीचे का पाइप जोरों से बह रहा है। लगभग एक वर्ष से मकान बंद था। इसके मायने इतने दिनों से यह पाइप लगातार बह रहा है। उसने अंदर वाले दरवाजे की कुंडी टटोली। उसमें ताला नहीं था। अटैची उसने वहीं दहलीज में रखी रहने दी और कुंडी खोल कर अंदर आ गया। अंदर का स्विच दबाने से भी रोशनी नहीं हुई। केवल आँगन में हल्की चाँदनी की बर्फियाँ कटी हुई थीं जो ऊपर लोहे के जंगले से छन कर आ रही थीं।

वह वापस दहलीज में आ गया जहाँ मेन स्विच लगा था। हो सकता है वही ऑफ हो, उसने सोचा और जेब से माचिस निकाल कर उसके प्रकाश में उसे देखा। परंतु मेन स्विच ऑन था। जीने का बल्ब भी ठीक ही लगा, तभी उसे ध्यान आया कि किसी के भी न रहने पर बिजली का बिल इतने दिनों से अदा नहीं हुआ होगा, अतः हो सकता है बिजली कंपनी वालों ने कनेक्शन ही काट दिया हो। तब क्या होगा? वह रात कैसे काटेगा? देखा जायेगा, उसने सोचा और दुबारा माचिस जला कर अंदर आ गया ताकि कम-से-कम पाइप तो बंद कर दे। परंतु पाइप में टोंटी ही नहीं थी। उसमें दाना निकले हुए मकई के गुट्टे का टुकड़ा खोंस कर उसे कपड़े से बाँधा गया था। कपड़ा सड़ कर फट गया था जिससे पानी बहने लगा था। उसने उसे वैसे ही पड़ा रहने दिया और अटैची हाथ में लेकर सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर के खंड में आ गया।

ऊपर छत पर काफी चाँदनी थी। छल्ले से चाभी खोज कर उसने कमरे का ताला खोला और अंदर कमरे में आ गया। यहाँ का स्विच भी उसने ऑन कर के देखा परंतु कोई नतीजा नहीं निकला। अटैची एक किनारे रख कर माचिस जला कर वह इधर-उधर देखने लगा। तभी उसे अल्मारी में एक मोमबत्ती दिखाई दे गयी जिसे पहले किसी ने जलाया था। उसने उसे जला कर वहीं दीवाल में बने हुए ताक में चिपका दिया।

दीवाल से लगे पलँग पर बैठ कर उसने सिगरेट जला ली और नीचे से उठा कर लाये हुए पत्र देखने लगा। पहले उसने तह किये हुए कागज को देखा। वह बिजली के बिल की फाइनल नोटिस थी। कोई दस महीने पुरानी। तब उसने पोस्टकार्ड देखा। उसका एक कोना फटा हुआ था। उसने जल्दी-जल्दी उसे पढ़ा। पत्र उसके ननिहाल से आया था, जिसमें उसे उसके मामा के मरने की सूचना दी गयी थी। वह मामा के वजूद को भी भूल चुका था। ननिहाल गये हुए भी उसे आठ-दस वर्ष हो चुके थे। कार्ड वहीं खाट पर डाल कर वह लिफाफे खोलने लगा। एक किसी शादी का निमंत्रण था। उसने उसे ही पहले खोला। किसी 'राजकुमार' की शादी पर उसे बुलाया गया था। उसने अपनी स्मरण शक्ति पर बहुत जोर दिया परंतु उसे लगा कि न तो वह किसी राजकुमार से परिचित है और न ही कार्ड पर छपे किसी अन्य नाम से। पता सीतापुर का था। उसे ध्यान आया कि सीतापुर में उसके पिता की बुआ के कोई संबंधी रहते हैं। कौन, यह वह नहीं जानता था। परंतु वे लोग जरूर उससे परिचित होंगे क्योंकि निमंत्रण उसी के नाम से आया था। आज से कोई आठ वर्ष पहले पिता की पहली बरसी पर माँ के कहने पर उसने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाया था। उनके पते उसने ताऊ के लड़के से, जो उससे उम्र के काफी बड़ा था, लिये थे, उसके बाद से आज तक वह उन लोगों से नहीं मिला था। माँ के मरने की उसने किसी को भी सूचना नहीं दी थी। इस प्रकार पते तो अलग, उन लोगों के चेहरे भी वह अब तक भूल चुका था। उसने कार्ड पर छपी तारीख देखी। वह कोई तीन महीने पुरानी थी।

उसने दूसरा लिफाफा खोला। वह उसके अपने मित्र विपिन का था जो पिछले दिनों इंग्लैंड चला गया था और वहीं किसी अंग्रेज लड़की से शादी कर ली थी। उसने लिखा था कि कुछ दिनों के लिए बहन की शादी पर वह स्वदेश लौट रहा है, वह उससे जरूर मिल ले। यह पत्र भी तीन-चार महीने पुराना था। विपिन उसका बचपन का मित्र और सहपाठी था। उसे अफसोस हुआ कि वह उससे मिलने से वंचित रह गया। गलती उसकी अपनी थी। अपने ट्रांस्फर के बारे में उसने विपिन को कोई सूचना नहीं दी थी। हो सकता है विपिन यहाँ आया भी हो और घर में ताला लगा देख कर लौट गया हो।

गली की ओर का दरवाजा खोलकर वह बालकनी पर आ गया। एक कोने में घर की बेकार चीजों, जैसे खाली बोतलों, टूटी अँगीठियों और कनस्तरों आदि का ढेर लगा था। उसके बगल में एक पुरानी बाल्टी में लगा तुलसी का एक सूखा पेड़ रखा था जो शायद इतने दिनों तक पानी न मिलने से सूख गया था। यह पेड़ उसकी माँ ने लगाया था। जब तक वह जिंदा थीं वह रोज इसमें पानी देती थीं। माँ की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और उसके ट्रांस्फर के बाद छोटे भाई की पत्नी यह काम करती थीं। अब छोटे भाई का ट्रांस्फर हुए भी एक वर्ष होने आ रहा था। और इस प्रकार खाली घर में पड़ा हुआ यह पेड़ पानी के अभाव में सूख गया था।

वह बालकनी की दीवार पर थोड़ा झुक कर सिगरेट पीने लगा। गली में बिजली का सरकारी बल्ब जल रहा था। परंतु काफी सन्नाटा था। उसने कलाई पर बँधी हुई घड़ी देखी। पौने नौ हुए थे। अभी से इतना सन्नाटा! उसे आश्चर्य हुआ। जब वह यहाँ था तो रात देर तक गली में रौनक रहती थी। मुरली बाबू के दरवाजे की शतरंज तो बारह बजे और कभी-कभी उसके बाद तक चलती थी। पता नहीं मुरली बाबू अभी जीवित हैं या नहीं। उनके घर के सामने बिल्कुल सन्नाटा था। तभी उसने देखा, कोई आदमी साइकिल लिये हुए गली में आ रहा था। वह गौर से देखने लगा। गली के एक-एक व्यक्ति को वह पहचानता था। जन्म से लेकर तीस-बत्तीस वर्ष तक वह इसी मकान में रहा था। परंतु वह कोई अजनबी व्यक्ति निकला, जिसे वह पहली बार देख रहा था। वह उसके मकान से आगे जा कर बच्चू बाबू के मकान के सामने रुक गया। साइकिल गली में खड़ी कर के उसने दरवाजे की कुंडी खटखटायी। गोद में बच्चा लिये हुए किसी महिला ने दरवाजा खोला और वह व्यक्ति साइकिल उठा कर अंदर चला गया। शायद कोई किरायेदार हो, उसने सोचा।

वह दुबारा अंदर आ गया। खाना वह स्टेशन में आते समय होटल में खा आया था। रात उसे मकान में काटनी थी। बारिश के दिन आ गये थे। भाई ने मकान छोड़ते समय उसे बेच देने का सुझाव रखा था क्योंकि वह तो मुस्तकिल तौर से दूसरे शहर का हो गया था, भाई के भी वापस इस शहर में ट्रांस्फर होने की कोई उम्मीद नहीं थी। और फिर मकान की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही थी। ऊपर के कमरों की छतें चूने लगी थीं। परंतु उसने भाई का सुझाव नामंजूर कर दिया था। उसे उसने लिख दिया था कि मकान खाली करके चाभी वह उसे भिजवा दे। अगली बरसात से पहले आकर वह उसकी मरम्मत करा देगा। इसी उद्देश्य से वह वहाँ आया था।

उसने देखा, कमरे की दो ओर की दीवारों पर पानी बहने के निशान बने थे जो शायद अभी तक नम थे। इसके मायने दो-एक बारिशें यहाँ हो चुकी हैं। दीवार में एक जगह क्रैक भी आ गया था।

उसने छत पर निकल कर मौसम का जायजा लिया। आसमान साफ था और हवा में कोई खास ठंडक नहीं थी। उसने चारपाई बाहर छत पर निकाल ली और अटैची से दरी, चादर और तकिया निकाल कर बिस्तर लगा लिया। परंतु उसे नींद नहीं आ रही थी। न ही लेटने की इच्छा हो रही थी। वैसे उसके पास अटैची में दो-एक पुस्तकें थीं, जिनमें से एक को उसने लगभग आधा सफर में पढ़ा भी था और वह उसे आगे पढ़ना चाहता था। परंतु बिजली न होने के कारण दिक्कत थी। मोमबत्ती का प्रकाश काफी नहीं था। अतः उसने बिस्तर लगा कर कपड़े बदल लिये और पाजामा बनियान पहन कर बिस्तर पर लेट गया। थोड़ी देर लेटने पर उसे लगा कि उसे सफर की कुछ थकान है। लेटे-लेटे ही उसने हाथ-पैरों को इधर-उधर झटका और तब सिगरेट सुलगा कर पीने लगा।

पिता ने जब यह मकान खरीदा था तब वह पैदा भी नहीं हुआ था। उस समय वह कच्चा था। बाद में पिता ने उसे तुड़वा कर नये सिरे से पक्का बनवाया था। उस समय वह कोई पाँच-छह वर्ष का रहा होगा। कच्चे मकान की उसे बिल्कुल भी याद नहीं है। परंतु जब कच्चा मकान टूट कर नया बन रहा था, उस समय की कुछ-कुछ याद उसको है। सामने गली में ईंटों के ढेर लगे रहते थे। वह उन पर चढ़कर खेला करता। एक बार गिर भी गया था और उसके सिर में काफी चोट आ गयी थी, जिसका निशान आज तक उसके सिर में है। खच्चरों पर लदकर बालू, सीमेंट, मौरंग आदि आया करती और वह वहीं खड़ा-खड़ा खच्चरों को गिना करता और तब जा कर माँ को बताया करता कि कितने खच्चर आज आये हालाँकि खच्चरों को वह घोड़े कहा करता था। उस समय घोड़े और खच्चर में फर्क करने की तमीज उसके पास नहीं थी।

एक बार, उसे याद है, दीवार या छत का कोई हिस्सा अपने आप टूट गया था या तोड़ दिया गया था और उसने दौड़ कर माँ से कहा था कि नया मकान गिर पड़ा है। माँ ने उसकी बात सच मान ली थी और हड़बड़ाहट में गली से बाहर निकल आयी थीं, उन दिनों पिता ने उसी गली में एक अन्य मकान किराये पर ले लिया था और सब लोग वहीं शिफ्ट कर गये थे। आफिस से शायद उन्होंने छुट्टी ले रखी थी और नंगे बदन धोती पहने सारा दिन गली में खड़े मजदूरों और कारीगरों को आदेश देते रहते या फिर बड़े-बड़े रजिस्टरों में गुम्मे सीमेंट या मजदूरों की मजदूरी का हिसाब लिखते रहते।

पूरी गली में उसका मकान अपने ढंग का एक बना था। अंदर दालान में खंभों के ऊपर दीवार में फूल-पत्तियों की जालियाँ बनायी गयी थीं। दरवाजों के ऊपर मेहराबों तथा रोशनदानों में भी जालियाँ काटी गयी थीं। हालाँकि जब वह बड़ा हुआ तो उसने अपने कमरे के रोशनदानों की इन जालियों को दफ्ती से ढक दिया था क्योंकि उनसे धूल अंदर भर जाती थी। बारिश में पानी की बौछार से उन पर रख सामान, पुस्तकें आदि भीग जाती थीं। इसके अलावा उन्हें साफ करने में भी बड़ी कठिनाई होती थी। बाहर से सदर दरवाजे में तो न जाने कितनी कारीगरी की गयी थी। पुराने जमाने में मंदिरों जैसी मेहराब बनी थी। उसके अंदर दोनों ओर अर्ध-गोलाकार शक्ल में बड़ी-बड़ी मछलियाँ बनी थीं, जिनके बीच एक बड़े-से ताक में गणेशजी की मूर्ति बनी थी। बाद में उसी गणेशजी की मूर्ति के ऊपर गौरैयाँ अपने घोंसले बनाने लगी थीं। पिता जब तक जीवित रहे, उन्होंने यह घोंसले कभी नहीं बनने दिये। जब भी उनकी निगाह जाती, वे घोंसला उखाड़ कर फेंक देते। परंतु उनकी मृत्यु के बाद तो चिड़ियाँ उनमें अंडे-बच्चे भी देने लगीं। दरवाजे के दोनों ओर खंभे बनाये गये थे, जिनमें फूल-पत्तियाँ, देव और किन्नरियों की मूर्तियाँ आदि काटी गयी थीं। दरवाजे की चौखट में भी, जो खासी चौड़ी थी, काफी कारीगरी की गयी थी। दरवाजे पर गणेशजी की मूति के नीचे पिता ने उसका नाम लिखवा दिया था - 'शंकर निवास'। ऐसा शायद उन्होंने इसलिए किया कि उस समय उसके और छोटे भाई नहीं थे। अंदर दहलीज में सीमेंट के फर्श पर सोरही बनी थी। इस बात को लेकर पिताजी के मित्र अकसर आपस में मजाक किया करते थे कि जगत बाबू ने सोरही इसलिए बनवायी कि मियाँ-बीवी बैठ कर आपस में खेला करेंगे। उसके बाद माँ-बाप ने कभी खेला या नहीं, वह नहीं जानता, परंतु वह जरूर छुटपन में अपने दोस्तों के साथ वहाँ बैठ की सोरही खेला करता था।

यह सब तो बना था, परंतु उस समय मकान कई मामलों में अधूरा रह गया था। ऊपर के किसी भी हिस्से में प्लास्टर नहीं हुआ था। एक छोटे कमरे की छत भी नहीं पड़ी थी। आँगन में जँगला नहीं लगा था। बाहर सदर दरवाजे में पल्ले नहीं लगे थे। ऊपर तिमंजिले पर जाने के लिए सीढ़ी नहीं बनी थी। सामने बाल्कनी की दीवार नहीं बनी थी। छत से आने वाली किसी भी नाली में पाइप नही लगा था। यह सब शायद इसलिए रह गया था, क्योंकि पिता के पास पैसों की कमी पड़ गयी थी। काफी दिनों तक यह इसी तरह पड़ा रहा। फिर कुछ पिता जी के रि़टायर होने पर पूरा हुआ और कुछ उसकी नौकरी लग जाने के बाद। वैसे कुछ चीजें आज भी अधूरी ही पड़ी हैं।

एकाएक वह डर गया। विचित्र-से कोई दो पक्षी कहीं से आ कर उसकी खाट के ऊपर मँडराने लगे थे। और तब वे सामने वाली दुछत्ती की छत के पटरों के बीच किसी सूराख के घुस गये। उसे समझने में कुछ देर लगी कि वे चमगादड़ थे। उसका दिल अचानक तेजी से धड़कने लगा। वह उठकर बैठ गया और उसने नयी सिगरेट जला ली। पहली बार ये चमगादड़ जब पिताजी जीवित थे, तब आये थे और इन्हीं धन्नियों में कहीं घुसे थे। पिता ने दूसरे दिन ही धन्नियों के नीचे नीम की ढेर सारी पत्तियाँ जला कर धुआँ किया था और तब सीमेंट मौरंग से उनमें बने हुए सारे सूराख बंद कर दिये थे। माँ ने शायद उसके अगले इतवार को सत्यनारायण की कथा भी करवायी थी। उसके बाद चमगादड़ दुबारा नहीं दिखाई दिये थे। अब शायद वे स्थायी रूप से यहाँ रहने लगे थे। तभी वे फिर निकल आये। इस बार चार थे। काफी देर वे आँगन में ही इधर-उधर उड़ते रहे। फिर छत के ऊपर आकाश में कही चले गये।

उसने गौर किया, नीचे का पाइप अभी बह रहा था। बाहर के दरवाजे भी, उसे ध्यान आया, उसने बंद नहीं किये थे। अंदर कमरे में जा कर उसने दुबारा मोमबत्ती जलायी और जलती मोमबत्ती लेकर वह नीचे उतर आया। बाहर के दरवाजे खुले हुए थे। उसने उन्हें भेड़ कर अंदर से कुंडी लगा दी। तब अंदर का दरवाजा खोल कर मोमबत्ती पाइप के पास बनी छोटी-सी दीवार पर रख कर इधर-उधर कोई कपड़ा खोजने लगा। एक कोने में उसे फटा हुआ कोई कपड़ा मिल गाया। शायद कोई पुरानी बनियान थी। उसी से उसने एक लंबी पट्टी-सी निकाली और मुद्दे की खुखरी को पाइप में खोंस कर उसे कपड़े से कसने लगा। पानी गिरना बिल्कुल बंद तो नहीं हुआ, परंतु काफी कम हो गया।

वह वापस ऊपर आने लगा, तभी ध्यान आया कि बाहर का दरवाजा इतनी देर खुला पड़ा रहा है, हो सकता है, कोई अंदर घुस कर बैठ गया हो। वह एक बार फिर डर गया। परंतु उसने यह सोच कर अपने मन को तसल्ली दी कि इस वीरान घर में कोई क्यों घुसेगा। फिर भी उसने तय किया कि वह एक बार सारे घर को देख आयेगा। मोमबत्ती अभी काफी शेष थी। कम-से-कम आधेक घंटे वह जल सकती थी, उसने अनुमान लगाया।

आधी सीढ़ियों से ही वह वापस नीचे उतर आया। पहले उसने बाहर का कमरा खोला। इसे पहले, जब सब लोग यहाँ रहते थे, तो 'दरवाजे वाला कमरा' कहा जाता था। जब तक वह इंटर में नहीं पहुँचा था, तब तक यह कमरा उसके पिता के कब्जे में था। उन्होंने इसमें एक तख्त, एक छोटी मेज और दो-चार कुर्सियाँ डाल रखी थीं। दीवालों पर देवी-देवताओं के चित्र लगा रखे थे। अलमारियों में उनके मतलब की अनेक वस्तुएँ, जैसे रिंच, हथौड़ी, प्लास, शतरंज की बिसात और मोहरे आदि रखे रहते। आतशदान के ऊपर कपड़े के दो बस्तों में उनकी पुस्तकें आदि बँधी रखी रहतीं। एक कपड़े में भागवत, महाभारत, रामायण आदि रहतीं, दूसरे में अलिफलैला, गुलसनोबर आदि।

इसी कमरे में पिता अपने मिलने वालों के साथ बैठ कर बातें किया करते थे। दीवाली पर मेज-कुर्सी आदि सब अंदर हटा दी जातीं। फर्श पर दरी और चादर बिछा दी जाती और लक्ष्मी-पूजन के बाद से तीन दिन तक लगातार फ्लश खेली जाती। अधिकतर तो गली के लोग ही रहते। वैसे कभी-कभी बाहर के लोग, पिता के आफिस के सहयोगी आदि भी आ जाते, वह भी अकसर रात में पिता के लाख मना करने के बावजूद आकर वहीं बैठ जाता। कभी-कभी रात भर बैठा रहता, क्योंकि पिता और उनके अन्य मित्र बाजी जीतने से उसे पैसे दिया करते थे। रात भर में वह दो-तीन रुपये की रेजगारी जमा कर लेता।

परंतु जब वह इंटर में पहुँचा, तो पिता अपना सामान अन्यत्र उठा ले गये। शुरू में इस बात को लेकर उसमें और पिता में काफी संघर्ष चला। पिता कहते - सामान वहीं रखा रहने दो, तुम्हारा क्या लेगा! परंतु वह अपने कमरे में रिंच, हथौड़ी आदि रखने के लिए कतई तैयार नहीं था। आखिर पिता ने हार मान ली और उसने कमरे पर अपना अधिकार जमा लिया। उसके आने के कुछ दिनों के अंदर ही कमरे का हुलिया बिल्कुल बदल गया। आतशदान पर नकली फूलों के गुलदस्ते लग गये। देवी-देवताओं के चित्रों के स्थान पर फिल्म स्टारों के चित्र और सीन-सीनरियाँ लग गयीं। अलमारी में रिंच और प्लास की जगह ज्योमिट्री और अलजेबरा की पुस्तकें सज गयीं। बाद में वह इसी कमरे में तख्त पर सोने भी लगा। अकसर छुट्टियों वाले दिन वह अपना खाना भी वहीं मँगा लेता। कभी छोटा भाई दे जाता, कभी माँ।

इस कमरे में रहते हुए उसे जीवन की वह पहली अनुभूति हुई थी जिसे 'किशोर प्रेम' कहा जाता है। उन दिनों वह बी.ए. प्रीवियस में पढ़ा करता था। सामने वाले मकान में एक नये किरायेदार आये थे। नये क्या, काफी दिनों से वहाँ रह रहे थे। पुरुष आर.एम.एस. में काम करता था। वह, उसकी पत्नी, एक छोटा बच्चा और उसकी किशोर बहन, जिसका असली नाम तो वह आज भूल गया है परंतु घर में उसे बिट्टी कहा करते थे, उस मकान में रहते थे। बिट्टी की आयु पंद्रह-सोलह की रही होगी। उसकी आँखें काफी बड़ी और खूबसूरत थीं। बदन भरा हुआ और आकर्षक था।

अचानक एक दिन उसने गौर किया कि जब वह अपने कमरे में बैठ कर पढ़ता-लिखता तो बिट्टी अपनी खिड़की पर खड़ी हो कर उसे देखा करती। उसे कुछ विचित्र-सी अनुभूति हुई थी। बाद में उसने अपनी मेज घुमा कर इस प्रकार लगा ली कि बिल्कुल उसकी खिड़की के सामने पड़ती। अकसर दोनों एक दूसरे को देर तक देखते रहते। फिर पता नहीं कब और कैसे बिट्टी उसके घर भी आने लगी, उसकी माँ के पास। दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते दोनों एक-दूसरे से मिल गये। जान-बूझ कर तो नहीं, हाँ अनजाने में एक-आध बार दोनों के शरीर भी छू गये। उन दिनों वह शेली और कीट्स पढ़ा करता था और प्रेम की एक बहुत ही आदर्शवादी कल्पना उसके दिमाग में थी। पूरे एक वर्ष तक ऐसा रहा कि जब भी वह यूनिवर्सिटी से लौट कर आता, वह अपनी खिड़की पर खड़ी रहती। परंतु दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई। माँ के सामने जरूर एक-आध बार इंडायरेक्ट ढंग से कुछ बात हुई। परंतु कोई खास नहीं। हाँ, एक बार जरूर एक घटना हुई थी, जिसकी याद आज भी उसे हल्का-सा कहीं गुदगुदा जाती है। रात कोई ग्यारह बजे होंगे। वह बत्ती बुझा कर लेटा ही था कि दरवाजे पर एक हल्की-सी दस्तक हुई। उसने उठ कर दरवाजा खोला तो देखा, बिट्टी खड़ी थी। दरवाजा खुलने के साथ ही वह अंदर आ गयी और चुपचाप खामोश खड़ी हो गयी। उसकी समझ में नहीं आया क्या बात करे? तभी उसने पूछा - क्या बात है?

बिट्टी फिर भी खामोश रही। तब बोली - आपके पास एनासिन तो नहीं है। भइया-भाभी पिक्चर गये हैं। मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है।

- एनासिन? मेरे पास तो नहीं है। कहो तो बाहर से ला दूँ। उसने कहा। बिट्टी फिर कुछ देर के लिए खामोश हो गयी। तब बोली - नहीं, रहने दीजिए और चुपचाप वापस लौट गयी।

उसके जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि बिट्टी शायद एनासिन के लिए नहीं आयी थी। वह कुछ और कहना चाहती थी। बातों के बीच की खामोशी ने शायद उससे कुछ कहा भी था। परंतु वह समझ नहीं सका था। अपनी इस मूर्खता पर उसे बहुत अफसोस हुआ था। उस सारी रात वह सो नहीं सका था। इंतजार करता रहा था कि शायद बिट्टी फिर आये। परंतु वह नहीं आयी। यही नहीं, इसके बाद कई दिनों तक वह अपनी खिड़की पर भी नहीं दिखाई दी।

इस घटना के कुछ दिनों बाद ही बिट्टी का विवाह हो गया। और वह गुड़िया की तरह सज कर अपनी ससुराल चली गयी। वहाँ से लौटने के बाद एक-दो बार वह जरूर अपनी खिड़की पर दिखाई दी। उसके घर भी आयी। परंतु तभी उसके भाई का ट्रांसफर कहीं और हो गया और वे लोग मकान छोड़ कर चले गये। उन लोगों के जाने के काफी दिनों बाद तक उसे बिट्टी की याद आती रही। उसका मन किसी काम में न लगता। घंटों वह पढ़ने की मेज पर बैठ कागज पर बिट्टी का नाम लिखा करता। उसकी ससुराल इसी शहर में थी। अकसर वह साइकिल ले कर उधर से चक्कर भी काटा करता परंतु बिट्टी उसे नहीं मिली। हाँ, एक-आध बार बाजार आदि में उसने उसे अपने पति के साथ इधर-उधर आते-जाते देखा। महीनों इस तरह बिट्टी का ख्याल उसे सताता रहा। उसे लगता, जैसे उसकी अपनी सबसे कीमती चीज किसी ने उससे छीन ली है परंतु धीरे-धीरे सब कुछ फिर सामान्य हो गया।

मोमबत्ती लेकर उसने कमरे में प्रवेश किया। वहाँ काफी गर्द और कूड़ा था। तख्त अब भी अपनी जगह पड़ा था। मेज-कुर्सियाँ शायद भाई अपने साथ ले गया था। अलमारियाँ भी खाली पड़ी थीं। केवल आतशदान के ऊपर गणेश-लक्ष्मी की मिट्टी की पुरानी मूर्तियाँ रखी थीं, जिनका रंग उड़ चुका था। दीवालों पर कुछ चित्र भी लगे थे। एक चित्र आठ देशों के राष्ट्र निर्माताओं, लेनिन, हो ची मिन्ह, गांधी, सुकर्नो, माओ आदि का था जिसे उसने कभी किसी पत्रिका से काट कर स्वयं मढ़ा था। चित्रों का उसे विशेष शौक था। अपने आप वह उन्हें छठे-आठवें महीने निकाला-बदला करता था। परंतु यह चित्र काफी पुराना था। इसे उसने बाद में कभी क्यों नहीं बदला, इसका कोई कारण उसके पास नहीं था।

दीवालों में जगह-जगह लोना लगने लगा था। अलमारियों की चौखट में कई जगह दीमक लग गयी थी। दायीं तरफ वाली दीवाल में काफी सीलन थी। यह सीलन बहुत पुरानी थी। इसका कारण था म्युनिस्पैल्टी का पाइप, जो बाहर गली में उसकी दीवाल से मिल कर लगा हुआ था। जिन दिनों वह इस कमरे में रहा करता था, यह पाइप एलार्म का काम देता था। रेलवे वाले राधे चाचा अपना लोहे का पुराना कड़ेदार डोल लेकर ठीक साढ़े चार बजे पाइप पर पहुँच जाते ओर 'गंगा बड़ी कि गोदावरी कि तीरथ राज प्रयाग, सबसे बड़ी अयोध्या जहाँ राम लीन औतार' का अलाप इतनी जोर से खींचते कि कानों में रुई खोंस कर सोने वाला व्यक्ति भी सोता नहीं रह सकता था। इस अलाप के साथ ही अपने सिर पर पानी की पहली धार अपने ढाई किलो वाले पीतल के लोटे से डालते और 'हर हर गंगे महादेव' की सम पर उतर आते।

इस पाइप की ही वजह से उसके बाहर वाले चबूतरे का काफी प्लास्टर उखड़ गया था। क्योंकि अकसर लोग उस पर कपड़े छाँटने का काम करते थे। कुछ लोग तो बाकायदा साबुन लगा कर फचाफच धोबी घाट खोल देते। पिता, जब तक वह जीवित रहे, अगर कभी किसी को ऐसा करते देख लेते, तो काफी सख्त बातें सुना कर उससे तुरंत चबूतरा धुलवा कर दुबारा कभी ऐसा न करने की कड़ी ताकीद कर देते परंतु उनकी मृत्यु के बाद तो वहाँ बाकायदा धोबी घाट बन गया था और अकसर लोग कपड़े छाँटने के बाद बिना उन्हें धोये ही साबुन का झाग वहाँ छोड़ कर चले जाते।

उसने आगे बढ़ कर दीवाल को दाहिने हाथ की तर्जनी से छुआ तो लाल चूने का ढेर-सा मुसमुसा प्लास्टर अपनी जगह गिर पड़ा। जाने किसके कहने पर पिता ने इस कमरे में लाल चूने का प्लास्टर कराया था। केवल दीवालों तक। छत और फर्श सीमेंट के थे। बल्कि छत में खासी फूल पत्तियाँ बनायी गयी थीं, जिनके बीच बड़े-बड़े लोहे के कड़े लटकाये गये थे। इन कड़ों को हाथ से खींचने वाला पंखा लगाने के लिए लगाया गया था। पिता की काफी साध थी कि वह पंखा लग जाये। परंतु उनके जीवन में उनकी यह साध पूरी न हो सकी। मकान बनवाने में ही काफी कर्ज उनके ऊपर हो गया था जिससे वह जीवन भर उबर नहीं पाये थे।

कमरे से बाहर निकल कर उसने उसके दरवाजे की कुंडी लगा दी और दहलीज से होता हुआ अंदर दालान में आ गया। अंदर दो दालानें थीं -- एक दूसरे से नब्बे अंश का कोण बनाती हुई। पहली दालान छोटी थी। इसमें एक ओखली बनी हुई थी, जिसमें माँ कभी-कभी दाल वगैरह कूटा करती थीं। वैसे इस दालान का कोई खास उपयोग नहीं था सिवाय जूते-चप्पल उतारने के, या ईंधन रखने के। या फिर जब वह इंटर में पहुँचा था और पहली बार घर में एक पुरानी नीलामी की साइकिल आयी थी, उसके रखने के। हाँ, इसमें मिली हुई दूसरी दालान का, जो अपेक्षाकृत काफी बड़ी थी, बड़ा विविध उपयोग होता था। शादी-ब्याह के मौकों पर इसमें औरतों का गाना-बजाना, रतजगे और स्वाँग होते थे। इसी में लोगों को खाना खिलाया जाता था। गर्मी के दिनों में घर के लोग यहीं दोपहरी काटा करते थे क्योंकि धूप यहाँ जाड़ा, गर्मी, बरसात कभी नहीं आती थी। इसी दालान में उसके छोटे भाई का जन्म और पिता की मृत्यु हुई थी। यहीं फर्श पर उसके पिता की लाश बीस घंटे तक रखी रही थी और उसने सारी रात उसके बगल में बैठ कर जागते हुए बितायी थी।

इस दालान से मिली हुई एक छोटी कोठरी थी, जिसके अंदर दिन में भी अँधेरा रहता था। उसके अंदर एक बड़ी अलमारी थी तथा दीवाल में एक ओर लकड़ी के दो बड़े-बड़े टाँड़ बने थे। इन टाँड़ों पर उन दिनों न जाने कितने बर्तन, पीतल की बड़ी-बड़ी परातें, बटुए, बाल्टे, कड़ाहियाँ, थाली, लोटे आदि भरे रहते थे। लोग उन्हें शादी-ब्याह में माँगने आया करते थे। उसे आश्चर्य हुआ कि आज वे सब कहाँ चले गये। उसके पास तो उनमें से एक भी नहीं है। भाई के पास भी नहीं है। जाने कैसे इसी घर में वे कहीं बिला गये। इसी कोठरी में बड़े बाल्टों में साल-भर के लिए अनाज भर कर रखा जाता था। यह उसे बहुत पुरानी याद है, वरना जब से वह हाई स्कूल में पहुँचा है तब से तो महीने-महीने का राशन उसे राशन वाले की दुकान में लाइन लगा कर लाना पड़ता था। इसी कोठरी में ऊपर एक दुछत्ती बनी थी जिसमें प्राकृतिक प्रकाश नाम की कोई चीज सर सी.वी. रामन के सिद्धांत के बावजूद कभी नहीं पहुँची। इसके अंदर घुसना भी एक कमाल हुआ करता था क्योंकि उसका रास्ता छत में एक चौकोर सूराख काट कर बनाया गया था। आज तो शायद वह उसमें घुस नहीं सकता। हाँ, जब छोटा था, तो जरूर गेहूँ के बाल्टे पर चढ़ कर, जो ठीक उस सूराख के नीचे रखा रहता था, घुस जाता था। यह दुछत्ती क्यों बनायी गयी, वह कभी समझ नहीं पाया। शायद पिता ने सोचा रहा हो कि कभी इस घर में सोने-चाँदी की ईंटें हुईं तो उन्हें जतन से छुपा कर रखना होगा। परंतु उसे जिन चीजों का ध्यान इस दुछत्ती में होने का है वह कुछ इस प्रकार थीं - टूटे संदूक पुराने कनस्तर, खाली बोतलें, पुराने जूते, टूटे छाते, बाँस के डलवे आदि। उसने सोचा, कोठरी का दरवाजा खोल कर अंदर जाये परंतु फिर टाल गया।

इसी कोठरी के बगल में एक कमरा था, जिसे 'मुन्नू दादा वाला कमरा' कहा जाता था क्योंकि उसके चचाजाद भाई, जिनका नाम मुन्नू था, कभी इसमें रहा करते थे। उनकी सारी पढ़ाई-लिखाई, पालन-पोषण, शादी-ब्याह सब उसके पिता ने किया था। शादी के बाद मुन्नू दादा अपनी पत्नी के साथ इसी कमरे में रहा करते थे। उन थोड़े दिनों के लिए इस कमरे का हुलिया बदल गया था। अन्यथा यह खाली पड़ा रहता था। उन दिनों इसकी खिड़कियों में पर्दे लग गये थे। अंदर दीवालों पर कैलेंडर तथा अन्य चित्र लगे थे। एक कोने में भाभी का श्रृंगारदान रखा रहता था। दो एक मेज-कुर्सियाँ भी आ गयी थीं।

मुन्नू दादा की शादी, जो इसी शहर में हुई थी, मुहल्ले की कुछ नामी-गरामी शादियों में से एक थी। यह इसलिए था क्योंकि उनकी बारात में हाथी-घोड़े आदि शामिल थे। डेढ़-दो दर्जन स्त्री-पुरुष हाथों में रंगीन कागजों की झाँकियाँ लेकर चल रहे थे, जिनमें नोट चिपके थे। साथ ही मुहल्ले से निकलने वाली किसी बारात में पहली बार पुलिस बैंड आया था। भाँड़ ओर तवाइफें भी थीं। माँ ने इन सब बातों के लिए मना किया था परंतु पिता हठी किस्म के आदमी थे, शुद्ध मध्यवर्गीय संस्कारों से ग्रस्त। उन्होंने अपने प्रोविडेंट फंड से कर्ज लिया था। महाजनों से भी कुछ उधार लिया था और जिसे घर फूँक तमाशा देखना कहते हैं, वही किया था। यह सब इसलिए ताकि रिश्ते और मुहल्ले वाले कोई यह न कह सकें कि भतीजे की शादी पर जगत बाबू कंजूसी कर गये। परंतु इसके बाद जो महाजनों का घर पर आने का सिलसिला शुरू हुआ तो पिता की मृत्यु के बाद तक समाप्त नहीं हुआ। एक महाजन तो उनकी मृत्यु के तीसरे-चौथे दिन ही आ धमका था क्योंकि उसके प्रोनोट की तारीख निकल रही थी और उसे भय था कि कहीं उनका बेटा प्रोनोट बदलने से इनकार न कर दे।

शादी कुछ और मायनों में भी उसके खानदान में महत्व रखती थी। क्योंकि द्वाराचार के समय किसी बात को लेकर मुन्नू दादा ने अपने ससुर को झापड़ मार दिया था। ससुर ने तो कुछ नहीं कहा था परंतु लड़की वालों की तरफ से और लोग काफी बिगड़ गये थे। बात लाठी-बंदूक तक पहुँची थी। आखिर किसी तरह से निपटारा हुआ और मुन्नू दादा अपनी दुल्हन लेकर घर लौटे।

परंतु इसके बाद मुन्नू दादा अधिक दिनों घर में नहीं रहे। उनकी पत्नी और उसकी माँ में कुछ अनबन रहने लगी। पहले तो घर में ही दो चूल्हे जले। और तब पहली बार नीचे के हिस्से में बनी कमरे से लगी हुई रसोई का इस्तेमाल हुआ अन्यथा जब से मकान बना था, वह खाली पड़ी हुई थी। परंतु यह सिलसिला भी ज्यादा दिनों नहीं चला। जल्दी ही मुन्नू दादा घर छोड़ कर चले गये और धीरे-धीरे दोनों परिवारों में आना-जाना तक बंद हो गया। इस घटना के दस-पंद्रह वर्षों बाद जब वह बड़ा हुआ और होली-दिवाली पर उसने मुन्नू दादा के यहाँ आना-जाना शुरू किया तो संबंध एक बाद फिर से बनने लगे।

वह आँगन में खड़ा था। इसी आँगन में शादी-ब्याह के अवसरों पर मंडप बनाया जाता था। उसके ब्याह के समय भी यही मंडप बना था और हालाँकि शादी-ब्याह की रस्मों से उसे बेइंतहा दर्जे तक चिढ़ थी फिर भी तेल-उबटन वाले कुछ स्वाँगों में उसे भाग लेना पड़ा था।

मुन्नू दादा वाले कमरे की कुंडी बंद थी। उसने उसे खोला नहीं, केवल खिड़की के सीखचों से, जिसमें दरवाजे नहीं थे, अंदर झाँक कर देखा। अंदर अँधेरा और सीलन थी, दीवाल पर गेरू से स्वस्तिक-सा कुछ बना हुआ था।

कुछ देर वह इसी तरह खिड़की के सींखचे पकड़े खड़ा रहा। तब वापस मुड़ गया। बाहर दहलीज में आ कर उसने नीचे के हिस्से के दरवाजे की कुंडी लगा दी और सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ ऊपर आ गया। सीढ़ियाँ चढ़ रहा था तो मोमबत्ती का पिघलता हुआ गर्म-गर्म मोम उसकी उँगली पर गिर पड़ा और वह जल गया। उसने मोमबत्ती दूसरे हाथ में पकड़ ली और जली हुई उँगली मुँह में डाल कर चूसने लगा। ऐसा करने से उसे कुछ राहत मिली।

ऊपर पहुँचते ही वह एक बार फिर डर गया। उसके बिस्तर पर एक मोटी-सी काली बिल्ली बैठी थी। उसे देखते ही वहाँ से कूद कर वह दीवाल पर जा कर बैठ गयी और वहाँ से उसे अपनी चमकदार आँखों से देर तक घूरती रही। उसने उसे भगाया तभी वह वहाँ से हटी।

एक क्षण वह वहीं छत पर खड़ा रहा। तब मकान के ऊपर वाले भाग का निरीक्षण करने लगा। पहले उसने पीछे वाले हिस्से का कमरा खोला। यह काफी बड़ा था। परंतु लोग इसमें रहते नहीं थे। ज्यादातर इससे स्टोर का काम लिया जाता था। रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाला राशन, आटा, दाल, चावल आदि इसमें रखा जाता था। एक अलमारी थी, जो तरह-तरह के अचारों के मर्तबानों में भरी रहती थी। रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले बर्तन भी इसी कमरे में रहते थे। उसी जमाने की लकड़ी की एक बड़ा-सा संदूक जिसमें देशी घी का बर्तन, तेल, मसाला आदि चूहों से बचाने के लिए रखे जाते थे। अब भी एक कोने में पड़ी थी। उसका ऊपर का ढक्कन, जो बीच से आधा खुलता था, टूट गया था। उसने निकट जा कर मोमबत्ती की रोशनी में उसमें झाँक कर देखा, उसमें कुछ कंडे और लकड़ी के टुकड़े पड़े थे।

दीवाल पर 'हरछट' बनी हुई थी। यह कौन-सी देवी हैं, वह आज तक नहीं जान पाया। माँ किसी खास दिन यह पूजा किया करती थीं। जब भी यह त्यौहार आता था, माँ सुबह से उपवास करके बड़ी लगन से पीड़े में रुई भिगो कर दीवाल पर यह चित्र अंकित करती। देवी का पेट चौकोर होता। चारों कोनों पर छोटे-छोटे दो पैर होते। ऊपर नुकीला बर्फी नुमा सिर होता। पेट के अंदर माँ जाने क्या-क्या सूरज-चाँद, गंगा-यमुना, सूप-चलनी आदि बनातीं। वह सोचता, यह देवी, जिनके पेट में सारा संसार समाया होता है, जरूर बड़ी शक्तिशाली होती होंगी। फिर आज तक उसने उनका नाम कहीं और क्यों नहीं सुना? इन्हीं देवी के साथ-साथ माँ एक और चित्र बनाती थीं। वह भी कुछ इसी तरह प्रकार का होता था और उसे ऐसे स्थान पर बनाया जाता था कि देवी और धोबन एक दूसरे को देख न सकें। हिन्दू समाज में धोबन का भी बहुत महत्व है। क्योंकि उसे याद है कि किसी और त्यौहार पर धोबन माँ को सुहाग देने आया करती थीं। माँ कहती थीं कि धोबन का सुहाग अमर होता है। सारे संसार को सुहाग बाँटने पर भी उसका सुहाग कम नहीं होता। मगर बावजूद इसके कि माँ हर वर्ष धोबन से सुहाग लिया करती थीं, और उसके अलावा भी अपने सुहाग की रक्षा के लिए कितने ही तीज-त्यौहार मनाती थीं, व्रत रखती थीं, उनकी मृत्यु विधवा होकर हुई थी।

इस कमरे की छत भी चूती थी। यह तो उन्हीं दिनों से चूती थी जब वह यहाँ रहा करता था। छत की धन्नियाँ भी बोल गयी थीं। उसने मोमबत्ती के प्रकाश में देखा, दीवालों पर पानी बहने के निशान थे। बीच की एक धन्नी भी काफी नीचे झुक आयी थी। यही एक कमरा था जिसमें पिता ने स्लैब न डलवा कर धन्नियाँ डलवायी थीं। इसके पीछे भी शायद कहीं पैसों का अभाव था।

कमरे से वह उसके बगल कोठरी में आ गया, जिसकी छत उसकी नौकरी लग जाने बाद पड़ी थी। इससे खाना पका करता था जिसकी वजह से इसकी सारी दीवालें और छत धुएँ से काली पड़ गयी थीं। बहुत दिनों तक इसमें दरवाजा भी नहीं था, जिसके कारण अकसर बंदर इसमें घुस कर खाने-पीने का सामान उठा ले जाते थे। बाद में जीने का नीचे वाला दरवाजा वहाँ से उखड़वा कर यहाँ लगवा दिया गया। जीने वाला दरवाजा उसके बाद आज तक नहीं लग सका।

कोठरी से निकल कर छत पर से होता हुआ वह गली की तरफ वाले कमरे में आ गया, जिसमें अटैची रखी थी। इससे मिला हुआ कमरा और था जो शुरू में काफी छोटा था परंतु बाद में उसकी शादी के अवसर पर उसे तोड़ कर और बड़ा किया गया। विवाह के बाद वह इसी कमरे में रहने लगा था। रहने तो खैर पहले से ही लगा था परंतु विवाह के बाद यह कमरा उसका निजी कमरा हो गया था और उसकी पत्नी के अलावा शायद ही कभी कोई इसमे आता हो। पत्नी का सारा सामान भी इसी कमरे में रखने लगा था। इसका भी एक दरवाजा बाहर बाल्कनी पर खुलता था।

उसके विवाह के अवसर पर मकान में इस प्रकार के छोटे-मोटे कई परिवर्तन हुए थे। जैसे ऊपर छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। मकान में बिजली का कनेक्शन लिया गया था। ऊपर गली की तरफ वाले दोनों कमरों में प्लास्टर हुआ था। बाल्कनी की दीवाल बनी थी। और एक बार फिर घर का घटता हुआ कर्ज दुबारा बढ़ गया था।

इस कमरे से होता हुआ वह फिर बाल्कनी पर आ गया। गली में लगा हुआ बिजली का बल्ब अब तक बुझ चुका था। केवल एक हल्की चाँदनी गली के फर्श और मकानों की दीवालों पर बिखरी हुई थी। इक्का-दुक्का किसी-किसी घर में प्रकाश हो रहा था। अन्यथा ज्यादातर मकानों की बत्तियाँ गुल थीं।

काफी देर तक वह इसी तरह खड़ा रहा। गली में घटने वाली कितनी ही छोटी-बड़ी अनेक घटनाओं, शादी-ब्याह, लड़ाई-झगड़े प्रेम-विद्रोह, जन्म-मृत्यु का वह साक्षी था, सारी बातें उसे एक-एक कर याद आ रही थीं। कितने और नये लोग आ गये होंगे। कुछ अजीब-सी अनुभूति में डूबा सम्मोहित-सा वह बाल्कनी पर खड़ा रहा।

थोड़ी देर ऐसे ही खड़े-खड़े उसने एक सिगरेट पी। तब वहाँ से हट आया। लौटते समय उसने बाल्कनी का दरवाजा बंद किया तो वह आसानी से बंद नहीं हुआ। दोनों पल्ले भिड़ा कर उसे जोर से धक्का देना पड़ा। झटके की आवाज से साथ दरवाजा बंद हो गया परंतु साथ ही ढेर-सा प्लास्टर छत से टूट कर फर्श पर गिर पड़ा। मोमबत्ती, जिसे वह पहले ही बुझा चुका था, उसने अल्मारी पर रख दी और छत पर आ कर अपने बिस्तर पर लेट गया।

इस मकान को बनवाने में पिता आर्थिक रूप से टूट गये थे। और बार-बार टूटे थे। परंतु यही मकान कई बार उनकी परेशानियों में आड़े भी आया था। कई बार उसे गिरवी रख कर उन्होंने बड़े-बड़े काम निकाले थे। आखिरी बार तो यह हाथ से निकलते-निकलते रह गया था। आखिर इसे छुड़ाने के लिए उन्हें देहात की सारी जायदाद बेचनी पड़ी थी। लेटे-लेटे उसने अनुमान लगाया कि इसकी मरम्मत में उसे कितना खर्च करना पड़ सकता है। लगभग एक हजार रुपये वह लेकर आया था। परंतु एक हजार में एक कमरे की स्लैब पड़नी भी मुश्किल थी। जिस जर्जर हालत को यह मकान पहुँच चुका था, यहाँ आते समय उसने इसकी कल्पना नहीं की थी। वैसे यहाँ उसके बहुत से मित्र थे, जिनसे जरूरत पड़ने पर वह कर्ज ले सकता था। लेटे-लेटे वह उनके बारे में सोचने लगा।

देर तक उसे नींद नहीं आयी। एक बार तो उसकी आँख करीब-करीब लग गयी थी परंतु तभी सिरहाने वाली दीवाल पर बिल्ली आ कर रोने लगी और उसकी नींद उचट गयी।

सुबह उसकी आँख देर से खुली। नहा-धो कर उसने कपड़े बदले और मकान में ताला लगाकर बाहर निकल आया। वह अपने किसी मित्र के यहाँ जा रहा था परंतु उससे कर्ज लेने नहीं बल्कि मकानों का सौदा कराने वाले किसी दलाल का पता पूछने।


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हिंदी समय में कामतानाथ की रचनाएँ