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कविता

दिन किशमिशी-रेशमी, गोरा
शमशेर बहादुर सिंह


दिन
किशमिशी रेशमी गोरा
       मुसकराता
आब
मोतियों की छिपाए अपनी
       पाँखड़ियों तले

 

सुर्मयी गहराइयाँ
      भाव में स्थिर
जागते हों स्‍वप्‍न जैसे
माँगते हों कुछ...
      खिलौना जागता-सा
            मौन कोई

 

क्‍या वही तो तू नहीं है मन?

×      ×
 

गोद यह
रेशमीगोरी, अस्थिर
अस्थिर
       हो उठती
      आज
किसके लिए?

×      ×

          जा
    ओ बहार
          जा!
    मैं जा चुका कब का
          तू भी...
    ये सपने न दिखा!

 

जाविदानी है अगर्चे तू
जाविदानी है अगर्चे जिन्दगी
        फिर भी
रह म कर!

 

 


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