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कविता

गीत
शमशेर बहादुर सिंह


शाम का आखिरी गाना -
                  तुम आना न आना :
वो नाम तो मन को रटाना - न रुकेगा
                        शाम का गाना -
                  न चुकेगा
           शाम का आखिरी गाना।
ये ताना-सा ताना है कोई : समझाना-बुझाना
      कि मन बहलाना :
           - वो शाम का आखिरी गाना,
           शाम का गाना।

 

     बीत गयीं जग की सन्ध्याएँ,
     जगती की सुंदर सन्ध्याएँ।
           कहने को इक दुनिया आयी; -
           आप न आये न आये, न आये!
     क्‍या भूलें क्‍या याद दिलायें;
     कौन दिलाये, किसको दिलाये!
एक है आज तो भूलना, याद दिलाना -
     शाम का आखिरी गाना!
[1946]

 

 


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