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कविता

धूप
शमशेर बहादुर सिंह


धूप     थपेड़े मारती है      थप्-थप्
        केले के हातों से पातों से
केले के थंबों पर

 

खसर-खसर एक चिकनाहट
       हवा में मक्‍खन-सा घोलती है

 

नींद-भरी आलस की भोर का
कुंज     गदराया है
यौवन के सपनों से
अभी अनजान मानो

 

नावें उछलती हैं लहरों में बादलों के
हलकी   हलकी   मगन मगन
कि सीटियाँ-सी व्‍योम बजाता है चारों ओर
बेमानी तानें-सी आप ही आप गुनगुनाता है

 

चुंबन की मीठी पुचकारियाँ
      खिला रहीं कलियों को फूलों को हँसा रहीं

 

घाँसों को गुदगुदियों न्हिला रहीं
 

नाच  हैं   खिल्   खिल्   खिल्
 

कुसुमों-से चरनों का लोच लिये
            थिरक रही हैं
            भीनी भीनी
            सुगंधियाँ

 

क्‍यों न उसाँसें भरे
           धरती का हिया


धूप की चुस्कियाँ
       पिये जाय, आँख मीच, सोनीली माटी


               कन्-कन् जिये जाय
 

थप्-थप् केले के पातों पर हातों से
       हाथ् दिये जाय
                    थप थप्...

 


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