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कविता

नींबू माँगकर
चंद्रकांत देवताले


बेहद कोफ्त होती है इन दिनों
इस कॉलोनी में रहते हुए
जहाँ हर कोई एक-दूसरे को
जासूस कुत्ते की तरह सूँघता है
अपने-अपने घरों में बैठे लोग वहीं से कभी-कभार
टेलीफोन के जरिए अड़ोस-पड़ोस की तलाशी लेते रहते हैं
पर चेहरे पर एक मुस्कान चिपकी रहती है
जो एक-दूसरे को कह देती है - 'हम स्वस्थ हैं और सानंद
और यह भी की तुम्हे पहचानते हैं, खुश रहो',

यहाँ तक भी ठीक है
पर अजीब लगता है की घरू जरूरतों के मामले में
सब के सब आत्मनिर्भर और बढ़िया प्रबंधक हो गए है
पुरानी बस्ती में कोई दिन नहीं जाता था
कि बड़ी फजर की कुंडी नहीं खटखटाई जाती
और कोई बच्चा हाथ में कटोरी लिए नहीं कहता 'बुआ
माँ ने चाय-पत्ती मँगाई है'
किसी के यहाँ आटा खुट जाता
और कभी ऐन छौंक से पहले
प्याज, लहसुन या अदरक की गाँठ की माँग होती

होने पर बराबर दी जाती माँगी चीज
चाहे कुढ़ते-बड़बड़ाते हुए
पर यह कुढ़न दूसरे या तीसरे दिन ही
आत्मीय आवाज में बदल जाती
जब जाना पड़ता कहते हुए
भाभी! देख थोड़ी देर पहले ही खत्म हुआ दूध
और फिर आ गए हैं चाय पीने वाले
रोजमर्रा की ऐसी माँगा-टूँगी की फेहरिस्त में
और भी कई चीजें शामिल रहतीं
जैसे तुलसी के पत्ते या कढ़ी-नीम
बेसन-बड़े भगोने, बाम की शीशी
और वक्त पड़ने पर दस-बीस रुपए भी
और इनके साथ ही आपसी सुख-दुःख भी बँटता रहता
जो इस पृथ्वी का दिया होता प्राकृतिक
और दुनिया के हत्यारों का भी

पर इस कॉलोनी में लगता है
सभी घरों में अपने-अपने बाजार हैं और बैंकें भी
पर नींबू शायद ही मिले
हाँ! नींबू एक सुबह मैं इसी को माँगने दो-तीन घर गया
पद्मा जी, निर्मला जी, आशा जी के घर तो होने ही थे
नींबू क्यूँकि इसके पेड़ भी है उनके यहाँ
पर हर जगह से 'नहीं है' का टका-सा जवाब मिला
मैंने फोन भी किए
दीपा जी ने तो यहाँ तक कह दिया
'क्यों माँगते है आप मुझसे नींबू'
मै क्या जवाब देता
बुदबुदाया - इतने घर और एक नींबू तक नहीं
उज्जैन फोन लगाकर
कमा को बताया यह वाकया
वहीं से वह बड़बड़ाई
वहाँ माँगा-देही का रिवाज नहीं
समझाया था पहले ही
फिर भी तुम बाज नहीं आए आदत से अपनी
वहाँ इंदौर में नींबू माँगकर तुमने
यहाँ उज्जैन में मेरी नाक कटवा ही दी
हँसी आई मुझे अपनी नाक पर हाथ फेरते
जो कायम मुकाम थी और साबूत भी

 


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