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रचनावली

स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली
खंड 2

सहजानन्द सरस्वती
संपादन - राघव शरण शर्मा

अनुक्रम महारुद्र का महातांडव पीछे     आगे

कांग्रेस की उद्देश्य-प्राप्ति

जिस उद्देश्य से कांग्रेस का जन्म हुआ था और जिसका स्पष्टीकरण , जिसका खुलासा नागपुर से लेकर लाहौर तक के कांग्रेस-अधिवेशनों में किया गया था , उसकी प्राप्ति 1947 के 15 अगस्त को हो गई , वह उस दिन हासिल हो गया , ऐसा माना जाने लगा है ; हालाँकि पूर्ण स्वतंत्रता का प्रश्न अभी खटाई में पड़ा ही हुआ है , और भारत में अभी तक उसकी जगह सिर्फ औपनिवेशिक स्वराज्य या डोमिनिया राज्य का झंडा ही गवर्नरों तथा गवर्नर जनरल के मकानों पर फहरा रहा है , न कि स्वतंत्र भारत का अपना झंडा। फिर भी कांग्रेस के नेता इतना तो मानते ही हैं कि उसका वह लक्ष्य मिल गया। इसीलिए बंबई में कांग्रेस का मंतव्य उन्होंने बदल दिया।

प्रश्न होता है कि जो कांग्रेस अपनी आधी अवस्था तक , अपनी जवानी में मुट्ठीभर बुध्दिजीवियों और पूँजीपतियों की संस्था रही , उसमें यह निराला कायाकल्प कैसे हुआ , वह पीछे जनसमूह की जमात और संस्था क्यों मानी जाने लगी और बुढ़ापे में उसने अपना धयेय कैसे प्राप्त किया ? सारांश , उसका क्रम-विकास होते-होते वह इस कद्र तगड़ी-तंदुरुस्त कैसे हो पाई कि अपनी वृध्दावस्था में उसने जबर्दस्त साम्राज्यशाही को हिला-झुका दिया। यह भी सवाल स्वाभाविक है कि इसी दरम्यान उसी कांग्रेस से एकदम अलग और स्वतंत्र किसान सभा जैसी अनेक जन-संस्थाएँ और वर्ग-संस्थाएँ कैसे बन गईं , जिनका संचालन पुराने-से-पुराने और तपे-तपाए कांग्रेसी जन-सेवक ही करते हैं , मगर हकीकत तो यह है कि इन्हें आज कांग्रेस के चोटी के नेता फूटी आँखों भी देख नहीं सकते और अगर उनकी चले , तो उन्हें नेस्त-नाबूद कर के ही दम लें ? यह भी मजेदार बात है कि मेरे जैसा अधयात्मवादी किस प्रकार सबसे पहले उसी कांग्रेस में आया , वहीं से उस किसान सभा में दाखिल हुआ , अपने चिर-परिचित उस अधयात्मवाद को भूल-सा गया और सर्वथा-सर्वदा स्वतंत्र किसान सभा की सर्वात्मना रक्षा के लिए बड़ी-से-बड़ी संस्था , शक्ति और वस्तु को बेमुरव्वती से लात मारने के लिए आज तैयार बैठा है। इसका चरम परिणाम क्या होगा , यह भी एक बड़ा सवाल है। अंततोगत्वा महारुद्र का महातांडव नृत्य होगा , या और कुछ ?

कांग्रेस और स्थिर स्वार्थ

आरंभ में बेशक कांग्रेस ' भिक्षां देहि ' कहनेवालों और शासकों के सामने झोली पसारनेवालों की जमात थी। 1885 से लगायत 1928 के दिसंबर में नागपुर से पूर्व उसका काम था प्रस्ताव पास करना , रूठना बहस-मुबाहसे करना , अर्जी-प्रार्थना-पत्र भेजना , यहाँ से लेकर लंदन तक शासकों के सामने जमात बाँधकर हाथ जोड़े पहुँचना और आरजू-मिन्नत करना और अंत में कभी-कभी बेजान धमकियाँ भी दे देना। उस युग के कांग्रेसजन सिर्फ इतना ही कर सकते थे─ उनकी पहुँच यहीं तक थी। उससे आगे वे जान सकते थे , गोकि थे वे दबंग , दिमागदार , प्रतिभाशाली पुरुष और अपने समाज में प्रभाव रखनेवाले मालदार। इसका कारण था , मुल्क के ऊँचे तबके के मुट्ठीभर लोगों की ही तो दरअसल वह कांग्रेस थी। ऐसे लोग ही पढ़े-लिखे होने के कारण संगठित-सामूहिक आंदोलन और आवाज के महत्व को समझ सकते थे।

लेकिन , एक तो उनकी बिरादरी छोटी थी ; दूसरे दिमागदार और मालदार होने के कारण उनमें दब्बूपन परले दर्जे का था। स्थिर स्वार्थवाले स्वभावत: दब्बू और डरपोक होते हैं और विद्या एवं लक्ष्मी गिने-गिनाए स्थायी स्वार्थों में हैं। गुलाम बनाने पर तुले बैठे राक्षसों से लड़कर ही अपना हक हासिल किया जा सकता है। मगर सर पर गट्ठर या घड़ा रखकर कोई भी सिपाही जूझ नहीं सकता , और स्थायी स्वार्थ उस गट्ठर या घड़े के समान ही तो है। यही वजह है कि आकाओं और शासकों की मर्जी से ही जूठन हासिल किया जा सकता था , उनने किया। साथ ही , उनने एक महान कार्य और भी कर डाला , जिसका उन्हें शायद ही खयाल रहा हो या जिसे वह शायद ही संभव समझते रहे हों। मध्यमवर्ग के सबसे ऊँचे स्तर या तबकेवाले इन लोगों के इस सीमित आंदोलन के परिणामस्वरूप उनसे कुछ ही नीचे और संबध्द उच्च-मध्यम वर्ग का दूसरा तबका जाग उठा , जिसमें अधिकांश सभी प्रकार के पढ़े-लिखे लोग होते हैं।

फलत: उन्नीसवीं सदी के बीतते-न-बीतते इस दूसरे दल ने आँखें खोलीं और क्षेत्र में कूद जाना तय कर लिया। 1885 से उस शताब्दी के अंत तक कांग्रेस में जहाँ उच्च-मध्यमवर्ग के ऊपरी भाग का दबदबा रहा , तहाँ उसके बाद उसके निचले भाग ने उसमें पैर जमाना चाहा और एतदर्थ कशमकश जारी की। पूरे पंद्रह साल गुजरते-न-गुजरते लखनऊ में उस तबके के ऊपरी भाग की हार और निचले की जीत हुई। जिस प्रकार 1857 के आसपासवाले प्रथम विद्रोह के समय जो रहनुमाई , जो नायकत्व सामंतवर्ग के हाथ में आया , वह कम-बेश तीस साल तक कभी ऊपर और कभी नीचे-कभी छिपके और कभी खुलके देखा जा रहा था , और 1885 में खत्म हो गया , ठीक उसी प्रकार उस वर्ग के उच्च स्तर के हाथ में रहनेवाला नेतृत्व पूरे तीस साल बाद उसी वर्ग के निम्न स्तर को मिला। या यों कहिए कि जिस तरह सामंतवर्ग का नेतृत्व उच्च-स्तर ने छीना और बाहरी दुनिया को इसका पता तक लगने न दिया , उसी तरह उसकी लीडरी निम्न स्तर ने छीन ली , हालाँकि उसे लखनऊ का समझौता नाम दिया गया है , जो उच्च मध्यमवर्ग के उच्च एवं निम्न स्तरों या दलों के ही बीच दरअसल हुआ था। इस तरह सर फिरोजशाह मेहता प्रमृति के नेतृत्व के स्थान पर राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन का नायकत्व , उसकी रहनुमाई बाल गंगाधर तिलक आदि ने करनी शुरू कर दी , जो ज्यादा दिनों तक टिक न सकी और 1921 में नागपुर में महात्माजी के हाथों में कार्य-कारणवश-परिस्थिति के चलते-चली गई। 1916 में लखनऊ में आई और 1921 में नागपुर में चलती बनी।

जिन परिस्थितियों और जिन हालात के चलते महात्माजी राष्ट्रीय नेता के रूप में मैदान में आए , उनका विश्लेषण-विवेचन करने के पहले यहाँ हमें एक अहम मसले पर नजर दौड़ानी है। यह तो सभी समझदार मानते हैं कि गोकि 1857 वाला विद्रोह राष्ट्रीय आजादी की ही अस्पष्ट लड़ाई थी , फिर भी उसका नेतृत्व सामंतवर्ग के ही हाथों में रहने से वह कुचल दिया गया। केवल उसकी आग कुछ समय तक खुलके , पीछे छिपे-छिपे , धक-धक जलती रही पूरे तीस साल तक। उसी आग को 1885 में कांग्रेस का नाम-रूप , इसकी सूरत-शक्ल मिली। जैसे 1857 को बाहरी दुनिया ठीक-ठीक समझ न सकी , वैसे ही 1885 को भी। मगर बात थी एक ही , इस तरह तीस साल तक राष्ट्रीय संग्राम का पहला पर्व चला।

नेतृत्व और उसका विरोध

लेकिन , अगले तीस साल के दरम्यान उसके दो पर्व गुजरे , जैसाकि अभी-अभी कहा है। एकही उच्च मध्ययम-वर्ग के दो स्तरों के बीच कुश्तम-कुश्ता होने के कारण उसे दो पर्व कहना ज्यादा ठीक है। पहले पंद्रह साल तो सकुशल रहे , जैसे सामंत-नेतृत्व के तीस साल। परंतु बाद के शेष पंद्रह दोनों स्तरों के परस्पर महाभारत के चलते बेचैनी से गुजरे और अंत में उच्च-स्तर को मैदान छोड़ना पड़ा। इस तरह यद्यपि उच्च मध्यम वर्ग का नेतृत्व भी तीस साल ही का जा सकता है , तथापि इसमें पहले सामंत वर्ग के नेतृत्व जैसी बात अंत तक न रहकर पूर्व के पंद्रह साल ही रही। उस वर्ग के निम्न स्तर के शेष पंद्रह साल नेतृत्व लेने की कुश्ती में बिताए थे। इसीलिए उसका नेतृत्व स्पष्टत: सिर्फ पाँच साल ही टिक सका। इस तरह साफ देखते हैं जैसे-जैसे जन-जागरण बढ़ता गया और भारत के पूरे समाज के भीतर अनेक स्तरों में क्रमश: आजादी की चाह की आग घुसती गई , तैसे-तैसे नेतृत्व का काल घटता गया। जो भी नायकत्व किसी समय था , उसकी लेने के लिए इसके नीचे के स्तर ने जल्द-से-जल्द युध्द छेड़ा और अंत में कामयाबी हासिल की। यही कारण है कि जहाँ मालवीय और तिलक प्रभु के नेतृत्व को लखनऊ के बाद प्राय: तीन साल की साँस मिली 1919 के जमाने तक , तहाँ महात्माजी के नेतृत्व के विरुध्द ठेठ 1921 में चौरी-चौरा और दूसरी जगह सक्रिय विद्रोह का श्रीगणेश हो गया। महात्मा ने तो तिलक-मालवीय नेतृत्व के विरुध्द 1919 में जंग जारी की थी एक साल के बाद। मगर चौरी-चौरा तो 1921 के शुरू में ही आया था वह उनकी अहिंसा के विरुध्द एक निर्जीव चैलेंज , जो टिक न सका इसीलिए उसे एक क्रियात्मक सूचना का नोटिस भी कह सकते हैं , 1930-32 में एक प्रकार से विराट रूप धारण कर के उनकी सत्य-असत्य को दफना ही दिया , जहाँ तक उसकी आजादी की लड़ाई से ताल्लुक है इसे कौन नहीं जानता , जो इस समय का इतिहास जानता और भीतरी से उसका निरीक्षण करता है।

जनशक्ति की झाँकी

अच्छा , अब उन हालतों का , उन परिस्थितियों का विचार करें , जिसने महात्मा गाँधी को आंदोलन के लिए विवश किया और फलस्वरूप महाभारत का नेतृत्व उन्हें सौंपा। जैसाकि कह चुके हैं , उस महाभारत में तीन पर्व नागपुर-दिसंबर , 1921 के पूर्व पूरे हो चुके थे। इससे भी लंबी मुद्दत में सिर्फ सामंत , स्थायी स्वार्थवाले , बुध्दिजीवी और दिमागदार लोग ही मैदान में उतरे थे। बंग-भंग वाला आंदोलन देश में दूसरी जगह फैलने पर भी एकमात्र पढ़े-लिखे बाबुओं का ही था , जिसके अगुआ तिलक थे , अरविंद थे। वह जनांदोलन न था , जनसमूह का आंदोलन न था , जनता का सामूहिक आंदोलन न था। इसलिए समूचे आंदोलन में क्रमिक प्रगति होने पर भी और जन-जागरण होने पर भी अपना ध्येय और मकसद हासिल न कर सका। जैसाकि मिस्टर मांटेग्यू ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है , ब्रिटिश सरकार का मूलाधार था जनता का सहयोग ; फिर चाहे वह स्वेच्छापूर्वक हो या अनिच्छापूर्वक। यह भी सर्वमान्य बात है कि जनता के सामूहिक सहयोग के बिना कोई भी शासन टिक नहीं सकता , चल नहीं सकता। और , जब तक उसे वह सहयोग प्राप्त है , कोई भी ताकत उस शासन को डिगा-मिटा नहीं सकती। अब तक यही बात थी। बाबू सामंत और मालदार हजार उछल-कूद करने पर भी सरकार को इसीलिए डिगा न सके कि उनने जनसमूह को इस काम में अपने साथ नहीं लिया। इसीलिए सब कुछ कर-कराकर थक गए। उनके सामने और मुल्क के सामने भी चारों ओर निराशा ही नजर आती थी।

इस कठोर सत्य को महात्माजी ने देखा और खूब ही देखा। इससे पूर्व दक्षिण अफ्रीका में उन्हें जनशक्ति की झाँकी मिल चुकी थी। उनने वहाँ जनांदोलन की अपार महिमा का अस्पष्ट दर्शन किया था। भारत में भी खेड़ा , चंपारण और रॉलेट कानून के सिलसिले में उन्हें इसकी झलक नजर आई थी। उनने यह भी स्पष्ट देखा था कि मुल्क में सभी तरह के गर्जन-तर्जन आदि तो आजमाए जा चुके और नतीजा कुछ ठोस नहीं निकला ; केवल जनांदोलन की आजमाइश बाकी है।

बस , उनने गाँवों की ओर नागपुर में मुँह मोड़ा और जनांदोलन की भेरी बजाई। उन्हें आजादी लेनी थी और उसका उपाय उनके सामने दूसरा था नहीं। वे विवश थे। अपनी दृष्टि से वे इसके खतरों को भी कुछ-कुछ देखते थे─ बड़े खतरों को , जिनका सिग्नल उन्हें फौरन ही चौरी-चौरा में मिला। मगर मजबूरी थी। इतनी जल्द अलार्म सिग्नल बजेगा , उनने सोचा भी न था। उनके चलाये इस विराट जनांदोलन के फलस्वरूप शोषित-पीड़ित जनता के बहुतेरे स्वतंत्रआंदोलन महाकाय हो कर चल पड़ेंगे , इसका तो शायद उनने ख्वाब भी नहीं देखा था। इस प्रकार चौथा पर्व चला और खूब ही चला। इसने मदमत्त साम्राज्यशाही की जड़ एक बार तो बेमुरव्वती से हिला दी। बाबू लोग भी इसमें बलात खिंच आए-दिमागदार बाबू लोग! उनका इसमें विश्वास न था। क्योंकि , थे तो वे तृतीय पर्व वाले लीडरों की जमात के ही। इसीलिए एक साल के भीतर , जैसा महात्मा ने कहा था , इस जनांदोलन को सफलता न मिलने पर उन्हीं बाबुओं ने दास-नेहरू के नेतृत्व में पुनरपि वही गर्जन-तर्जनवाला अपना चिर-परिचित रास्ता पकड़ा। स्वराज्य पार्टी की असलियत यही थी।

बाबू-दल का जन-दल से संघर्ष

इस तरह जनांदोलन और बाबू-आंदोलन में परस्पर कभी कुश्ती होती और कभी ठंडक आती रही। फिर भी चुनावों के रूप में इस जनांदोलन ने ही बाबू-आंदोलन को भी ताकत दी। तो भी जन-पार्टी एवं बाबू पार्टी की रस्साकशी बराबर चालू थी। बाबू-दल वैधानिकता का कायल था , जिसके सीधो मानी हैं फूँक-फूँक कर पाँव देना। कहीं ऐसा न हो कि जन-शक्ति प्रबल हो कर बाबू दल और उसके स्वार्थों को सदा के लिए दबा दे , इसीलिए वह ' दल सँभल-सँभल पग धरिए ' को जपा करता था। पार्लिमेंटरी प्रणाली के आंदोलन का यही रहस्य है।

विपरीत इसके जन-पार्टी का नेतृत्व उससे भागता था और सीधी लड़ाई चाहता था ; लेकिन कोई इससे यह न समझ ले कि वह विस्फोटकारी जनशक्ति से आतंकित न था। उसने भी इतिहास पढ़ा और उससे सबक सीखा था। वह भी जानता था कि अनियंत्रित जन-शक्ति भी भूकंप लाती और प्रलय कर देती है। साथ ही निरी वैधानिक पध्दति की निस्सारता को बखूबी जान लेने के कारण वह जनशक्ति को एकबार पूर्णरूपेण उभाड़ना भी चाहता था , जिससे लक्ष्य-सिध्दि हो सके। उसका यह भी इरादा था कि जनशक्ति को उद्बुध्द करने के लिए जनांदोलन निर्वाध चलाकर ही उस शक्ति को नियंत्रण में रखा जा सकता है , जिससे समय पर संहारक विस्फोट रोका जा सके। वह जनता का विश्वासपात्र बनकर ही उसका स्थायी नेतृत्व एवं नियंत्रण करने के सपने देखा करता था और यह बात जनांदोलन को रोक देने से संभव न थी। क्योंकि तब विराट जनसमूह को शक करने की गुंजाइश थी कि ये नेता हमारे नहीं हैं। महात्माजी और श्री राजगोपालाचारी प्रभृति के उस समय के अपरिवर्तनवाद का यही रहस्य है। 1930, 1932 और खासकर 1934 में हिंसा-अहिंसा के नाम पर जनांदोलनों को संकुचित करने तथा रोक देने के यही मानी हैं। प्रारंभ में सभी व्यापक हड़तालों को पूर्णत: प्रोत्साहित कर के और धरना देने के मार्ग को बढ़ावा देने के बावजूद पीछे छात्रों की हड़तालों , मजदूरों के धरने आदि को महात्माजी के द्वारा जली-कटी सुनाने का यही आशय है। यही कारण है कि 1936-38 आते-न-आते बाबू-दल की वैधानिकता की विजय हो गई और पीछे चलकर 1939 तथा 1942 के जनांदोलन उसी के पोषक के रूप में ही चलाएगए-उसी के पुछल्ले बना दिएगए। इस प्रकार दोनों में जो पारस्परिक भयंकर विरोध 1921 के बाद जान पड़ता था , वह मिट गया और दोनों में सामंजस्य हो गया। 1947 के 15 अगस्त वाले स्वराज्य का यही तथ्य है , उसकी यही असलियत है।

अगस्त-क्रांति सही या गलत

यहाँ पर एक स्पष्ट बात कहने के लिए भी जी चाहता है। 1942 में अगस्त-क्रांति हुई , यह बातचीत तभी से चालू है और आज भी उसकी अहमियत बड़े जोर से बखानी जाती है। इसमें झगड़ने का न तो समय है और न इसकी जरूरत ही है। मगर प्रश्न तो यह है कि यह क्रांति जनशक्ति को ─ उस अनियंत्रित जनशक्ति को , जो प्रलयंकर विस्फोट लाती है , महारुद्र का महातांडव करवाती है─ बढ़ानेवाली पूर्ण रूप से पल्लवित-पुष्पित करनेवाली थी , या कि बाबू-दल की वैधानिक शक्ति को ही ? जन शक्ति को भी उसने कुछ बढ़ाया हो सही ; लेकिन उससे भी लाख गुना यदि बाबू-शक्ति को , बाबुओं के वैधानिक बल को बढ़ाया हो , तो मानना ही होगा कि जिस अगस्त-क्रांति का हमें गौरव है , फक्रहै , उससे हम आगे बढ़ने के बजाय सब मिलकर पीछे ही गए। अप्रिय होने पर भी यह अत्यंत विचारणीय बात है। और , यह तो मानना ही होगा कि बाबुओं की वैधानिक शक्ति इससे इतनी बढ़ी कि साम्राज्यशाही ने घुटने टेक उनके लिए गद्दी खाली कर दी। उन्हीं बाबुओं की संस्था-पार्टी-कांग्रेस के विरोध में खड़े होने की आज हिम्मत किसे है ? क्रांतिकारी शक्तियों को ये बाबू आज फूटी आँखों भी देख नहीं सकते। ये शक्तियाँ बिखरी हुई हैं , जिससे इन बाबुओं के दमन-दबाव का जमकर सामना करने में असमर्थ हैं। चीन , हिंद-चीन , हिंद-एशिया , मलाया और बर्मा में तो अगस्त-क्रांति जैसी कोई चीज हुई नहीं और सर्वत्र क्रांतिकारी जनशक्तियाँ इन बाबुओं एवं उनकी सरकारों के छक्के छुड़ा रही हैं। चीन तो शायद शीघ्र ही इन बाबुओं के शिकंजे से बाहर चला जाएगा। बाकियों में भी कुछ ऐसा ही होनेवाला है। हाँ , इसमें कुछ देर हो सकती है। बर्मा आदि देशों में बाबू-दल विप्लवी शक्तियों को मिलाने के लिए काफी आगे बढ़ा भी है─ इतना आगे , जिसकी कल्पना भी भारत की ' राष्ट्रीय ' सरकार कर नहीं सकती। बर्मा को तो बिना उस क्रांति के ही पूर्ण स्वतंत्रता मिल चुकी है , जबकि अगस्त-क्रांति का क्रीड़ा-स्थल हमारा भारत अभी तक ब्रिटेन का उपनिवेश ही है। इसी प्रकार की बहुतेरी बातें हमें सोचने को बाध्य करती हैं कि अगस्त का तूफानी आंदोलन गलत कदम था या सही।

किसान सभा विप्‍लवी शक्तियों की प्रतीक

हाँ तो , हम उसी चौथे पर्व पर आयें और आगे बढ़ें। जब बराबर के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संघर्षों में , असहयोग और चुनावों में सरकार पछाड़-पर-पछाड़ खाने लगी-वही सरकार , जो पशुबल और प्रभुत्व में अपना सानी नहीं रखती थी ; सो भी निहत्थी जनता के दृढ़ संकल्प के सामने , तो बलातगाँवों की जनता को भान होने लगा कि हममें अपार शक्ति है , जिसे भूल गए थे। 1930-32 के सत्याग्रह और 1934 के केंद्रीय चुनाव ने इस पर कसकर मुहर भी लगा दी। 1936-37 के चुनाव ने तो स्पष्ट ही बता दिया कि ग्रामीण जनता के पास अपरंपार शक्ति है , जो किसी को झुका सकती है। इसी भाव ने , जनशक्ति के इसी ज्ञान ने किसान-आंदोलन को जन्म दिया। जनांदोलन का मूल तो गाँवों में ही था , उसके मूलस्तंभ किसान ही थे। अहसयोग-आंदोलन का कार्यक्रम प्रधानत: उन्हीं को ध्यान में रखकर तैयार हुआ था। अधिकांशत: किसान-आंदोलन में खिंचे भी। फलत: अपनी अजेय शक्ति का ज्ञान विशेष रूप से उन्हीं को हुआ। उनने सोचा कि अगर हम अपार बलशाली साम्राज्यशाही को पछाड़ सकते हैं , तो इन जमींदार-मालगुजारों और सूदखोरों की क्या हस्ती ? ये तो उसी साम्राज्यशाही के बनाए हुए हैं। जब हमने हाथी या सिंह को पछाड़ लिया , तो बिल्ली या चुहिया की क्या बिसात ? यदि संगठित जनांदोलन ने सरकार को मात किया , तो संगठित किसान-आंदोलन ही जमींदारों को करारा पाठ पढ़ाएगा , यह निष्कर्ष किसानों और उनके सेवकों ने स्वभावत: निकाला। 1927-28 से ही यह आंदोलन किसान सभा के रूप में जन्म लेकर क्रमश: पुष्ट और शक्तिशाली होता गया , ज्यों-ज्यों किसानों को अपनी अपारशक्ति के भान की मजबूती होती गई। 1936-37 के बाद तो 1938-39 में या उससे पूर्व एक बार किसान सभा ने बिहार में , युक्तप्रांत में या अन्यत्र सामंतशाही शक्तियों एवं उनके हिमायतियों को जड़ से हिला दिया। आज जमींदारी मिटाने की व्यापक चिल्लाहट उसी का परिणाम है।

इस प्रकार राष्ट्रीय आजादी के महाभारत के चतुर्थ पर्व में होनेवाले कांग्रेस के जनांदोलन ने ही अनिवार्य रूप से किसान-आंदोलन को जन्म देकर बलवान बनाया। यह आंदोलन या किसान सभा उन्हीं विप्लवी या विस्फोटकारी शक्तियों का प्रतीक है , जो भीषण भूकंप लाती हैं और महारुद्र का महातांडव कराती हैं। समय-समय पर सोशलिस्ट पार्टी , फारवर्ड ब्लाक आदि विभिन्न वामपंथी दलों का जन्म उन्हीं प्रलयंकर शक्तियों को समयोचित पथ-दर्शन कराने के लिए ही हुआ है और इन दलों के नेता कर्मठ कांग्रेसजन ही रहे हैं या हैं , जैसे किसान सभा के नेता भी वही रहे हैं और आज भी हैं।

ग्रामीण सर्वहारा जागरण

राष्ट्रीय महाभारत का पाँचवाँ पर्व किसान सभा प्रभृति की शक्ल में क्रांतिकारी शक्तियों का यह प्रादुर्भाव ही है। नियमानुसार ये शक्तियाँ बाबुओं की प्रतिगामी शक्तियों के साथ घोर-संघर्ष करती हुई आगे बढ़ती ही जा रही हैं। यदि माता की उत्तराधिकारिणी पुत्री या पिता का उत्तराधिकारी पुत्र होता ही है , तो कांग्रेस और उसके जनांदोलन से उत्पन्न किसान-आंदोलन तथा किसान सभा प्रभृति को अनिवार्य रूप से कांग्रेस का उत्तराधिकारी बनके उसकी गद्दी है। इसे कोई शक्ति रोक नहीं सकती। तभी वास्तविक राष्ट्रीय आजादी की स्थापना भी होगी।

महाभारत का पंचमपर्व 1949 तक ही पूरा हो गया। 1927-28 से शुरू हो कर प्राय: पंद्रह साल तक किसान-आंदोलन सर्वाधिक शोषित-पीड़ित किसान जनता के उच्च-स्तर तक ही सीमित था। फलत: यह भी एक प्रकार से मध्यमवर्गीय आंदोलन ही था। खाते-पीते या साधारण किसान ही इसमें अधिकांश भाग लेते थे और यही स्वाभाविक भी था। मगर 1942 के बाद तो किसान सभा में गाँवों के एक प्रकार के सर्वहारा लोग ही प्रधानत: आने लगे। अब वहाँ उन्हीं की प्रधानता पाई जाती है , उन्हीं की आवाज सुनी जाती है और यही छठा पर्व है और यही अंतिम भी होना चाहिए , अंतिम है। समाज के सबसे ऊपर के तबके या स्तर से शुरू कर के आजादी की यह आग , उसकी यह लगन और तन्मूलक जागरण धीरे-धीरे सबसे नीचे के स्तर में घुस रहा है और घुस गया है। उनके भीतर बेकली पहुँच चुकी है। गाँवों के अर्ध सर्वहारा जाग रहे और अपने हकों तथा कर्तव्यों को , तत्संबंधी कर्तव्यों को पहचान रहे हैं , पहचान चुके हैं। शहरों और कारखानों के पूर्ण सर्वहारा लोगों के साथ उनका सम्मिलित-सम्मेलन होना अभी बहुत हद तक बाकी है। उसमें थोड़ा समय लग सकता है। हो सकता है , 15 वर्ष की अवधि इसमें भी लगे , जिसमें छह-सात साल तो गुजर चुके हैं। उतने ही वर्ष , संभव है , और लगें और 1957 का समय इसे पूरा होने में आ जाए। ठीक है , 1757, 1857 और 1957 अपना महत्व इस संबंध में रखते भी हैं। वह सम्मेलन पूर्ण हुआ और बेड़ा पार।

शोषितों का महातांडव

लेकिन , एक बात अब सत्य है। समस्त समाज के सबसे निचले स्तर में आजादी की तड़प की यह आग पहुँचकर धू-धू जलने लगी है , निरंतर तेज होती जा रही है। यह कभी भड़केगी और बुरी तरह भड़केगी। गत गर्मियों में पटने में एक विराट किसान रैली हुई थी। कुछ चतुर जमींदारों ने उसमें एकत्रित किसानों को गौर से देखा था। दस साल पूर्व की रैलियों को भी उनने उसी तरह देखा था। इस बार उनका कहना था कि इसमें तो ज्यादातर भुक्खड़ किसान ही या खेत-मजदूर ही थे। इससे सिध्द है कि नीचे आग जा चुकी है , जो कभी-न-कभी विस्फोट लाएगी , ठीक वैसे ही , जैसे भूमि के नीचे की आग भूकंप लाती है। ये भुक्खड़ करवटें बदलेंगे और उनके ऊपर लदे सभी स्तर और इस प्रकार समस्त समाज ही उलट जाएगा , धँस जाएगा। यह अवश्यंभावी है , अनिवार्य है। यह चीज कार्य - कारणवश हो कर रहेगी , सो भी शीघ्र ही , 1957 तक जरूर ही , यदि उससे पूर्व न हुई। परिणाम में यह जीर्ण-शीर्ण और शोषण-चीत्कारों से पूर्ण समाज ध्वस्त हो कर उसके स्थान पर शोषणहीन समाज बनेगा और संसार-भारत मंगलमय होगा। आज की भाषा में शोषित-पीड़ित जनता के इसी करवट बदलने को विप्लव या क्रांति कहते हैं। हम इसे ही प्राचीन भाषा में महारुद्र का महातांडव नृत्य कहते हैं। कहते हैं कि जब महारुद्र व्यापक अन्याय-अत्याचारों एवं कर्णभेदी क्रंदनों से ऊबकर महातांडव नृत्य करते हैं , तो उनके पाँवों की चोटों से यह जमीन जहन्नुम जाने लगती , बाँहों की चपेटों से चाँद , सूरज और तारे कहाँ-के-कहाँ पड़ाक-पड़ाक जा गिरते , आकाश की धज्जियाँ उड़ जातीं और जटा की सटासट्ट मारों से स्वर्ग-बैकुंठ टूट-टाट के मिट्टी में मिलेंगे , ऐसा दीखता है। यद्यपि महारुद्र का यह तांडव उन्हीं अन्याय , अत्याचारों और क्रंदनों के मिटाने के लिए ही होता है , तथापि उसका प्रारंभिक परिणाम उल्टा ही दीखता है─

' मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशय पद्‍म ,
पदंविष्णोर्भ्राम्याद्-भुजपरिघ-रुग्ण-ग्रहगणम्।
मुहुर्द्यौ र्दौस्थ्यं यात्यनिभृत जटा ताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता। '

और , शायद उसी तांडव की तैयारी कराने के लिए ही , नहीं-नहीं , संभवत: उसी के साक्षात दर्शन के वास्ते ही मैं कोरे अध्यात्मवाद की निष्क्रिय दुनिया से भटक कर इस सक्रिय संसार , सक्रिय वेदांतवाद में आ फँसा हूँ , कौन कहे!

किसान कौन है ?

आज बहुतों को यह पूछने की इच्छा होती है कि वे किसान कौन हैं , जिनके नाम पर तथा जिनकी तरफ से हम बोलते और काम करते हैं और जिन्हें हम पूरे क्रांतिकारी बनाना चाहते हैं ? इस समय तो मध्यम श्रेणी के और बड़े-बड़े खेतिहर ही अधिकांश में किसान सभा और उसके काम के साथी हैं और अभी सभा की वर्तमान दशा में दूसरी बात हो भी नहीं सकती। साफ शब्दों में कह सकते हैं कि वही दोनों तरह के खेतिहर किसान सभा का उपयोग अपने हित और लाभ के लिए कर रहे हैं। साथ ही हम भी सभा को मजबूत करने के लिए या तो उन दोनों का उपयोग तब तक करते या करने की कोशिश करते हैं , जब तक खेतिहरों में सबसे निचले दर्जेवालों और उनके ऊपरवालों में अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थों और जरूरतों की पूरी जानकारी नहीं हो जाती और उनमें वर्ग-चेतना नहीं आ जाती। लेकिन , सच पूछिए तो , अर्ध सर्वहारा या खेत-मजदूर हो , जिनके पास या तो कुछ भी जमीन नहीं है या बहुत ही थोड़ी है और टुटपुँजिए खेतिहर , जो अपनी जमीन से किसी तरह काम चलाते और गुजर-बसर करते हैं , यही दो दल हैं , जिन्हें हम किसान मानते हैं , जिनकी सेवा करने के लिए हम परेशान और लालायित हैं और अंततोगत्वा वही लोग किसान सभा बनाएँगे , उन्हें ही ऐसा करना होगा। जबकि दूसरे लोग किसान सभा में रहते हुए भी किसान सभा के नहीं हैं , ये दोनों सभा में हैं और सभा के हैं। फलत: हमारी यह हमेशा कोशिश होनी चाहिए कि उनके पास पहुँचें , उन्हें उत्साहित करें , और किसान सभा में उन्हें लाएँ। जब तक हम इस यत्न में सफल नहीं हो जाते , तब तक हमारा काम बराबर अधूरा और अपूर्ण ही रहेगा। समाज के जो स्तर और दल जितने ही गरीब और नीचे हैं , उतने ही वे हमारे निकट हैं। इसीलिए जो सबसे नीचे के या खेत-मजदूर और हरिजन हैं , वे हमसे अत्यंत निकट हैं। उनके बाद टुटपुँजिए खेतिहर आते हैं और बस वहीं पर किसानों का वर्ग खत्म हो जाता है। हम मध्यम खेतिहरों को सिर्फ तटस्थ बना सकते हैं , ताकि शत्रु का पक्ष न लें। लेकिन हमारी आखिरी लड़ाई में वे साथ देंगे , यह आशा ही नहीं कर सकते।

लेकिन , अफसोस है कि ये असली किसान समाज के ऊपर तबकेवाले हम लोगों में विश्वास नहीं करते-उन्हीं हम लोगों में , जो किसान सभा के विकास की वर्तमान दशा में अधिकांशत: उसमें काम करते और उसे चलाते हैं। यह है भी ठीक ही। इसलिए हमारा यह अनिवार्य कर्तव्य है कि हम अपने अमल और बर्ताव के द्वारा उनके प्रति अपनी नेक-नीयती का सबूत दें और इस तरह अपने को उनका प्रिय पात्र बनाएँ।

 


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