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रचनावली

स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली
खंड 2

सहजानन्द सरस्वती
संपादन - राघव शरण शर्मा

अनुक्रम कांग्रेस-तब और अब पीछे    

मौलिक मतभेद

छह दिसंबर , 1948 को मैंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से और इसीलिए उसकी अखिल भारतीय कमिटी से लेकर नीचे की सभी कमिटियों की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। हो सकता है , लोग इसकी वजह जानना चाहें। इसीलिए संक्षेप में उसे बता देना उचित मानता हूँ।

1920 के दिसंबर में नागपुर के अधिवेशन से लेकर आज तक मैंने कांग्रेस कभी नहीं छोड़ी और यथाशक्ति उसकी सेवा की है। बीच में नेताजी श्री सुभाषचंद्र बोस के साथ ही मेरे जैसे ही कुछ तुच्छ व्यक्तियों को भी कांग्रेस से हटाया गया था जरूर ; मगर इसमें हमारी मजबूरी थी। हम उस समय कांग्रेस छोड़ना चाहते न थे। आजादी की जंग के दरम्यान ऐसा करना हम देश के साथ गद्दारी समझते थे चाहे उसकी नीति के संबंध में हाई कमांड के साथ हमारा मौलिक मतभेद क्यों न था। उसी समय कांग्रेस के प्रमुख नेता साम्राज्यशाही से समझौता करने को परेशान थे। इसीलिए उनने बंबईवाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के बैठक में किसानों , मजदूरों एवं शोषित जनता की सीधी लड़ाइयों को बंद कर देना तय कर दिया , बावजूद समस्त प्रगतिशीलों एवं वामपंथियों के सम्मिलित विरोध के। वे यह भी चाहते थे कि कांग्रेस में एक ही विचारधारा रहे। यह खतरनाक बात थी। सुभाष बाबू के नेतृत्व में हमने इसका खुला प्रतिवाद किया। जिससे हाईकमांड हम सबों पर टूट पड़ा। लेकिन इतना तो हुआ कि कांग्रेस में एक ही विचारधारा लाने की कोशिश बंद हुई ; कुछ समय तक तो जरूर ही।

आजादी की लड़ाई और उसका नेतृत्व

कांग्रेस की दो बातें बुनियादी तौर पर महत्वपूर्ण रही हैं─ आजादी की लड़ाई और उसका नेतृत्व। नागपुर में कांग्रेस ने जब करवट बदली , तो जंगे आजादी को साम्राज्यशाही के विरोध में सीधी लड़ाई और प्रत्यक्ष युध्द को-आगे रखा। यह परंपरा 1949 तक चली आई। यह बात 1921, 1930, 1932 और 1942 में साफ देखी गई। 1934 और 1934-39 में उसने अप्रत्यक्ष या वैधानिक संघर्ष की ओर पाँव बढ़ाया सही , फिर भी यही कहकर कि यह उसी प्रत्यक्ष युध्द का पोषक है , अंग है─ उसी की तैयारी है। यह जंगे आजादी उसकी पहली बुनियादी और मौलिक चीज रही है। इसी के साथ नेतृत्व का भी प्रश्न रहा है। इस युध्द का कांग्रेस का और इसीलिए उसके द्वारा मुल्क का नेतृत्व किसके हाथों में रहे , कौन , कब , किस ओर मुल्क को , और कांग्रेस को भी , कैसे चलाए , यह सवाल उसकी दूसरी बुनियादी बात रही है। एक ही विचारधारावाला झमेला इसी दूसरी बात का बाहरी रूप था , जो उठकर दब गया और पहली ही आगे रही─ ऊपर रही 1945 वाले असेंबली के चुनावों के पूरे होने तक। इसको कहने में अत्युक्ति नहीं है कि इन 25 वर्षों के दरम्यान सब मिलाकर कांग्रेस एक योग-संस्था रही है , योगियों की चीज रही है─ उन धुनी मतवाले और लगन के पक्के लोगों की जमात रही है , जिनने मुल्क की आजादी अपने सामने रखी और उसके लिए सर्वस्व स्वाहा कर दिया , प्राणों तक की बाजी लगा दी और यम यातनाएँ झेलीं। योगी और साधक भी कभी-कभी चूकते हैं। मगर इससे क्या ? योगी , योगी ही होते हैं। इस बीच भोगी लोग भी उसमें आसन जमाने की कोशिश करे थे , आ घुसते थे। फिर भी वह बेशक योग-संस्था ही रही।

कांग्रेस भोगवाद की ओर

लेकिन , 1945 के चुनावों की सफलता के बाद उसमें पतन के चिद्द दीखने लगे और 15 अगस्त , 1945 के आते-न-आते वह खाँटी भोग-संस्था , भोगियों की जमात , उनका मठ बन गई। महात्माजी के उस समय के व्यथापूर्ण उद्गार इसे साफ बताते हैं। यही कारण है , उनने अपने बलिदान के एक दिन पूर्व- 29 जनवरी को बेलाग ऐलान किया था कि कांग्रेस तोड़ दी जाए और उसका स्थान लोकसेवक संघ ले ले। सारांश , कांग्रेस-जन योगी बने रहकर अब उसे लोकसेवक संघ के रूप में बदल दें। यही बात वे लिखकर भी दे गए-इसी की वसीयत कर गए। मगर भोगी लोग इसे कब मानते ? उनने महात्मा की महान आत्मा को रुलाया और कांग्रेस की भोगवादिता पर कसकर मुहर लगा दी। महात्मा चाहते थे कांग्रेस चुनावों के पाप-पक में न फँसे ; मगर उनके प्रधान चेलों ने न माना। कांग्रेस भोगियों का अव बन गई है , यह तो चोटी के नेता लोग साफ स्वीकार करते ही हैं। कौन-सी सार्वजनिक सभा नहीं है , जिसमें वे यह बात कबूल नहीं करते , सो भी साफ-साफ धिक्कार के साथ!

भोगवादिता के साथ ही कांग्रेस में एक ही विचारधारावाला प्रश्न भी बड़ी तेजी से उठा और महात्मा की महायात्रा के फौरन बाद ही दिल्लीवाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी ने फैसला हो गया कि उसके भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों के लिए अब गुंजाइश नहीं रही! ठीक ही है , ये राजनीतिक दल तो योगवादी ठहरे न ? उन्हें तो शोषित-पीड़ित जनता की आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता दिलानी है न ? इसीलिए उन्हें निरंतर संघर्ष चलाना है न ? फिर भोगियों के साथ उनकी पटे तो कैसे ? यह फैसला मेरे जैसों के लिए नोटिस थी कि कांग्रेस से भागो , भागो , भागो! फलत: एक प्रकार से मैंने तय कर लिया था कि अब इसमें नहीं रहना है। क्योंकि ' जहाँ साँप का बिल , तहीं पूत का सिरहाना! ' मगर कोई जल्दबाजी न थी। इसीलिए जब कांग्रेस के नए प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करने की बात आई , तो मैंने प्रांतीय कांग्रेस के अधिकारियों से छह-सात मास पूर्व ही लिखकर पूछा कि सर्वात्मना स्वतंत्र किसान सभावादी मेरे जैसा आदमी क्या उस पर हस्ताक्षर कर सकता है ? यदि मैं हस्ताक्षर करूँ , तो क्या यह अनुचित होगा। मैंने और भी प्रश्न किए ; मगर आज तक उत्तार नदारद! सिर्फ यही कहा गया कि आपका पत्र दिल्ली मँगा लिया गयाहै!

कांग्रेस की गलाघोंटू नीति

इधर कांग्रेस कमिटियों का वायुमंडल ऐसा विषाक्त हो गया है कि जैसे गला घुट जाए! कम-से-कम मुझे तो ऐसा ही लगता है। एक नमूना पेश करता हूँ। कांग्रेसी वजारतें 1937 में भी बनी थीं और , 1939 तक हमने रेवड़ा जैसे सैकड़ों बकाश्त-संघर्ष चलाए। लेकिन कांग्रेस के निकालने या अनुशासन की धमकी कभी न दी गई। यहाँ तक कि हमारे आदमियों ने असेंबली में भी कांग्रेस पार्टी की बात किसानों के मामले में न मानी। फिर भी उन पर अनुशासन की तलवार न गिरी। मगर आज बड़ी मुस्तैदी से बकाश्त-संघर्ष रोका जाता है और ऐलान होता है कि कांग्रेसजन उसमें हर्गिज-हर्गिज न पड़ें। यह संघर्ष ही किसानों एवं किसान सभा की जान ठहरी और कांग्रेस में रहकर हम वही न करें , जान गँवा दें , यह कैसे होगा ? यदि हमारी जमीन-जायदाद पर कोई लुटेरा धावा करे , तो भारतीय दंड-विधान की आत्म-रक्षावाली धाराओं के अनुसार हम मारपीट एवं खूनखराबी भी कर सकते हैं और कांग्रेस में भी रह सकते हैं। मगर कांग्रेस के ही सिध्दांतनुसार शांतिपूर्ण लड़ाई , सत्याग्रह या संघर्ष करें , तो हमपर अनुशासन की तलवार पड़ेगी। यह अजीब बात है! यदि यह विषाक्त एवं गलाघोंटू वायुमंडल नहीं , तो आखिर है क्या ? तब जानबूझकर हम गला घुटने दें क्यों ? आत्महत्या करें कैसे ?

कहा जाता है , कांग्रेस की ही सरकार है। मगर है दरअसल सरकार की ही कांग्रेस , या यों कहिए कि सरकारी कांग्रेस। ठोस सत्य यही है। एक ताजा दृष्टि काफी है। हाल में प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष ने बयान दिया कि ऊख की कीमत फी मन दो रुपए से कम हर्गिज न हो। प्रांतीय कार्यकारिणी ने और खुद प्रांतीय कांग्रेस कमिटी ने भी सर्वसम्मति से तय कर दिया कि दो रुपए से कम कीमत न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि चीनी के कारोबार के लिए भी घातक है। मगर सरकार ने क्या किया ? युक्तप्रांत में एक रुपए दस आने और बिहार में एक रुपए तेरह आने तय कर दिया और दिल्ली की सरकार ने इसी पर मुहर लगा दी! नहीं-नहीं , दिल्ली और यू.पी. की सरकारें तो सवा रुपए ही चाहती थीं। अब बोलिए कि कांग्रेस की सरकार है या सरकार की ही कांग्रेस ? ऐसी दशा में कांग्रेस में रहना स्पष्ट ही सरकारपरस्त बनना है। और , मेरे जैसा आदमी यह कैसे करेगा ? क्या किसान-मजदूर राज्य हो गया कि ऐसा करूँ ? जब कांग्रेस परस्ती के मानी सीधेसरकार परस्ती होगई , तब मेरे लिए वहाँ स्थान कहाँ ? पटना के प्रधान न्यायाधीश के शब्दों में अधिकार ने शासकों को नीचे गिरा दिया , दूषित बना दिया। फिर पतित परस्ती कैसी ?

यह सभी बातें मन में महाभारत मचा ही रही थीं। इतने में ऊँट की पीठ पर अंतिम तृण आ गया। दानापुर सब-डिवीजन में जो असेंबली का उप-चुनाव जनवरी के मध्य में हुआ , उसके लिए उम्मीदवार चुनने में कांग्रेसी कर्णधारों ने देश-सेवा की गर्दनिया दे , त्याग-बलिदान को ताक पर रख , खूनी जातीयता को ही तराजू बनाया और उसी पर तौलकर अपना उम्मीदवार घोषित किया। सभी जातियों के त्यागी , योगी धुनी लोग दानापुर इलाके में भरे पड़े हैं। मगर किसी की पूछ न हुई , हालाँकि लाख अनुनय-विनय की गई। हंसों का निपट निरादर कर के कौवे की पुकार हुई और कम-से-कम मेरे लिए यह असह्य था─ ऊँट की कमर पर अंतिम तृण था।

-1949 ई.

ढकाइंच का भाषण

किसान बंधुओं ,

आइए , अपना घर देखें। मरखप कर हमने आजादी हासिल की। मगर आजादी का यह सिक्का खोटा निकला। आजादी तो सभी तरह की होती है न ? भूखों मरने की आजादी , नंगे रहने की आजादी , चोर-डाकुओं से लुट-पिट जाने की आजादी , बीमारियों में सड़ने की आजादी भी तो आजादी ही है न ? तो क्या हमारी आजादी इससे कुछ भिन्न है ? अंग्रेज लोग यहाँ के सभी लोहे , कोयले , सीमेंट और किरासिन तेल को खा-पीकर तो चले गए नहीं। ये चीजें तो यहीं हैं और काफी हैं। फिर भी मिलती नहीं! जितनी पहले मिलती थीं उतनी भी नहीं मिलती हैं! नमक की भी वही हालत है। कपड़ा यदि मिलता है तो पारसाल से डयोढ़े दाम पर साहु बाजार में और उससे भी ज्यादा पर चोरबाजार में। क्या पारसाल से इस साल किसान के गल्ले वगैरह का दाम एक पाई भी बढ़ा है ? ऊख का दाम तो उलटे घट गया। तब खुद सरकार ने कपड़े का दाम इतना क्यों बढ़ा दिया ? जब चोरबाजार में सभी चीजें जितनी चाहो मिलती हैं तब तो उनकी कमी न होकर नए शासकों में ईमानदारी , योग्यता और नेकनीयती की कमी ही इसका कारण हो सकती है। लोगों में इन गुणों की कमी ठीक ही है ; क्योंकि ' यथा राजा तथा प्रजा ' ।

हमें आए दिन पुलिस और हाकिमों की झिड़कियों को सहना पड़ता है , बिना घूस के कोई भी काम हो नहीं पाता और मिनिस्टरों के पास पहुँच नहीं। रात में बदनाम चोर-डकैतों के मारे नाकोंदम है , खैरियत नहीं और दिन में इन नेकनाम डकैतों के डाके पड़ते हैं। मालूम होता है जनता की फिक्र किसी को भी नहीं है। खाना नहीं मिलता-महँगा होता जा रहा है। फिर भी ये मिनिस्टर बड़ी उम्मीदें बाँध रहे हैं कि वोट तो अगले चुनाव में इन्हें और इनके कठमुल्ले ' खाजा टोपी ' धारियों को जरूर ही मिलेंगे। जन साधारण को ये गधों से भी गए-बीते समझते जो हैं। यही है हमारी नई आजादी का नमूना और इसी का दमामा बजाया जाता है। किसान समझता था और मजदूर मानता था कि आनेवाली आजादी यदि चीनी-मिश्री जैसी नहीं तो गुड़ जैसी मीठी होगी ही। मगर यह तो हर हर माहुर साबित हुई जिससे हमारे प्राण घुट रहे हैं।

घुटके मर जाएँ!

जो नेता आज गद्दीनशीन हैं वह चिल्लाते थे कि नागरिक स्वतंत्रता सबसे जरूरी है ─ उसकी रक्षा मरकर भी करेंगे। मगर उनने गद्दी पर बैठते ही उसी के खिलाफ जैसे जेहाद बोल दिया है। तीस दिन और बारह महीने सभाओं , मीटिंगों और जुलूसों पर रोक लगी है। सिर्फ पुलिस की नहीं , अब तो जिलाधीशों की आज्ञा के बिना आप कभी कुछ नहीं कर सकते। अखबार तो प्राय: सभी उन्हीं की हुआँ में हुआँ मिलाते हैं। जो कुछ बोलते भी हैं सिर्फ दबी जुबान से। नहीं तो जुबाँ खींच ली जाए ऐसा डर लगा है। जो खुलकर बोलते हैं वे लटका दिए जाते हैं।

सांप्रदायिकता के दंगों को दबाने के लिए सार्वजनिक रक्षा के नाम पर कानून बनाया गया। मगर उसका प्रयोग नागरिक स्वतंत्रता के विरुध्द सरासर हो रहा है। दिनोंदिन उसे और भी सख्त बनाकर करेले को नीम पर चढ़ाया जा रहा है! नागरिक स्वतंत्रता के मानी रह गए हैं सिर्फ लीडरों की बातों को दुहराना और शासक जो कहें उसी को सही-दुरुस्त बताना , ' ऊँट बिलैया ले गई , तो हाँ जी-हाँ जी कहना। ' थोड़े में ' न तड़पने की इजाजत है न फरयाद की है। घुट के मर जाएँ मर्जी यही सैयाद की है। ' रामगढ़ कांग्रेस के बाद जिस भाषण की स्वतंत्रता के नाम पर कांग्रेस ने लड़ाई छेड़ी थी वह आज उसी कांग्रेस के राज्य में शूली पर लटका दी गई है। फिर भी उम्मीद की जाती है कि लोगों के दिलों में बेचैनी की आग धक धक नजले!

वहाँ और यहाँ

सोवियत रूस को जारशाही से वैसी ही आजादी 1917 के मार्च में मिली थी जैसी हमें 1947 के अगस्त में प्राय: तीस साल बाद ब्रिटिश साम्राज्यशाही से मिली मानी जाती है। मगर क्या उसके साथ हमारी कोई तुलना है ? रूस के बारे में महामना लेनिन ने अपने ' अप्रैलवाले मंतव्यों ' में लिखा है कि ' दुनिया के मुल्कों में रूस सबसे अधिक स्वतंत्र है। रूसी जनता की हिंसा लापता है और यहाँ की जनता आँख मूँद कर रूसी सरकार में , जो पूँजीपतियों की है , विश्वास करती है। ' भारत तो संसार में आज सबसे कम स्वतंत्र है। उसकी जुबान और लेखनी पर जंजीरें जकड़ी हैं। जनता की हिंसा भी जोरों से जारी है , चाहे अमन कानून के नाम पर शासकों के द्वारा या चोर-लुटेरों के द्वारा। यहाँ नेहरू सरकार बेशक पूँजीपतियों की है और अभी तक शायद जनता का इसमें विश्वास भी है। मगर वह आँख मूँद कर तो नहीं ही है। उसकी जड़ हिल चुकी है और जनता ने खुले और छिपकर इस सरकार को कोसना-लथाड़ना शुरू कर दिया है! वर्तमान शासक यह जान भी गए हैं।

राजनीतिक पंडागिरी

उन्हें भय है कि आगे उनकी पूछ न होगी। इसीलिए एक ओर जहाँ साम्यवाद एवं अराजकता के नाम पर दमन का दौर-दौरा है तहाँ दूसरी ओर उनने राजनीतिक पंडागिरी भी शुरू कर दी है जो बड़ी भयं कर होगी , अगर फौरन रोकी तथा दफनायी न गई। वह खूब समझते हैं कि फासिस्टी दमन से देर तक भूखी , नंगी , कराहती जनता को दबा रखना असंभव है। इसीलिए दमन के साथ ही बापू के नाम पर राजनीतिक मूर्तिपूजा उनने जारी कर दी है। स्थान-स्थान पर महात्माजी की मूर्तियाँ बन चुकी और तेजी से बन रही हैं , जिनके पंडे वही ' खाजा टोपी ' वाले बन रहे हैं! गाँधीजी की आत्मा को खून के आँसू रुलानेवाले ये बाबू दिन-रात उनकी सत्य , अहिंसा को एक ओर बेमुरव्वती से कत्ल करते हैं। दूसरी ओर उनकी जय बोलते और ' रघुपति राघव राजा राम ' गा कर भोली जनता पर मिस्मरिज्मवाला जादू चलाना चाहते हैं। इनके कुकर्मों से जनता ऊबी है। लेकिन धार्मिक पंडों से क्या कम ऊबी है ? फिर भी यदि उन पंडों के पाँव पड़ती और चढ़ावा चढ़ाती है तो इन नए राजनीतिक पंडों को भी पैसे और वोट का चढ़ावा जरूर चढ़ाएगी , इसी खयाल से महात्मा जी के नाम पर यह पंडागिरी चालू हो रही है जो निहायत ही खतरनाक होगी। धार्मिक पंडागिरी में तो सुधार हो सकता है , वह मिट सकती है। मगर इसमें सुधार की गुंजाइश कहाँ ? इसलिए यह पनपने ही न पाए , यही करना होगा। इसके विरुध्द अभी से जेहाद बोलना होगा नहीं तो किसान-मजदूर मर जाएँगे यह ध्रुव सत्य है। ये बाबू पंडे ' गाँधीजी की जय ' और ' रघुपति राघव ' को अपना राजनीतिक हथकंडा बनाने जा रहे हैं , याद रहे। इसलिए हमें इसे मटियामेट करना होगा।

निरी मक्कारी

जो समझते हैं कि ये बातें महात्माजी के प्रति इन बाबुओं की भक्ति की सूचक हैं वे भूलते हैं। इन्हें उस भक्ति से क्या ताल्लुक ? इन्हें तो अपना पाप छिपाना और उल्लू सीधा करना ठहरा और इनने देखा कि अगर कंठी-माला और राम नाम के पीछे सारे कुकर्म छिप जाते हैं तो हम भी नए किस्म के राम नाम और नई कंठी-माला तैयार करें। इनकी यह निरी राजनीतिक कलाबाजी है। यह जयजयकार , यह रामधुन और यह चरखा धुन की कोरी आधुनिक कंठी-माला है। इन्हीं सब चीजों के पीछे राजनीतिक महापाप छिपे-धुलेंगे ऐसा इनने मान लिया है। धार्मिक साधु-फकीरों से ही धूर्ततापूर्ण राजनीतिक फकीरी का पाखंड इनने चालाकी से सीखा है। महात्मा ने लाख मना किया कि माउंटबेटन योजना को लात मारो और भारत को छिन्न-भिन्न मत होने दो। तो क्या इन बाबुओं ने उनकी एक भी सुनी ? बापू ने कहा कि कांग्रेस को तोड़कर लोक सेवक संघ बनाओ और इस तरह चुनावों में होनेवाले घोरतम कुकर्मों में उसे मत सानो। परंतु क्या इन राजनीतिक कलाबाजों ने उधर कान भी किया ? 1947 के 15 अगस्त के बहुत पहले क्या इनने गाँधीजी की अहिंसा को ठुकराकर उन्हें मर्मांतिक वेदना नहीं पहुँचाई थी ? तब उनके प्रति भक्ति का क्या सवाल ? जीते पिता के ठुकराने और निरंतर निरादर करने के बाद मरने पर उसका पिंडा-पानी करना इसे ही कहते हैं। यही तो मक्कारी है , और किसानों का भला तब तक न होगा जब तक इस मक्कारी का पर्दाफाश अमली तौर पर नहीं करते।

बाबू मठाधीश!

इनकी राजनीतिक पंडागिरी का एक और पहलू भी देखिए। मठ-मंदिरों और धार्मिक संपत्तियों के नियंत्रण एवं सुसंचालन के नाम पर इनने बिहार में धर्मादाय संपत्ति बिल तैयार किया है जिसे कानूनी जामा पहनाने के लिए भी ये आतुर हैं। हमने वह बिल पढ़ा है। यदि उसे कानूनी रूप मिला तो वर्तमान महंतों एवं पंडे-पुजारियों का स्थान ये ' खाजा टोपी ' धारी बाबू ले लेंगे और उनकी समस्त संपत्ति या तो चुनावों में लगेगी या इनके तथा इनके चेले-चाटियों के पेट में समाएगी , वह ध्रुव सत्य है। मठ-मंदिरों के प्रभाव से भी चुनाव में काफी फायदा उठाया जाएगा। जिनने राजनीति और अर्थनीति में सभी कुकर्म खुलकर किए , जो ऐसा करने में आज जरा भी नहीं हिचकते , वह धर्मनीति को सीधे फाँसी लटकाकर सारी संपत्ति को द्रविड़ प्राणायाम के द्वारा डकार जाने में साँस भी न लेंगे।

मठ-मंदिरों को मिटा देना है तो साफ कहिए। द्रविड़ प्राणायाम की क्या जरूरत ? उन्हें यदि वर्तमान पंडे-पुजारी और महंत मिट्टी में मिला रहे हैं तो बाबू लोग उससे भी बुरा करेंगे। अप्रत्यक्ष संगठित लूट प्रत्यक्ष लूट से कहीं बुरी है। क्योंकि पकड़ी नहीं जा सकती है। यह बिल अप्रत्यक्ष लूट का रास्ता साफ करता है। सुधार तो इससे होगा नहीं।

पंजाब में सिख-धर्म के मठ-मंदिरों का संशोधन-सुधार जैसे संगठित सिखों ने किया और संघर्ष के द्वारा उन्हें गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के हवाले किया , वही बात हिंदू-मुस्लिम मठ-मंदिरों के बारे में होगी। तभी इनका उध्दार होगा। जो साधु-फकीर और पंडित राष्ट्रवादी , जनवादी और सर्वभूतहितवादी हैं , और आज ऐसों की कमी नहीं है , उनकी ही राय से उन्हीं के तत्वावधान में मठ-मंदिरों का उध्दार या संहार जो भी उचित हो होना ठीक है। बाबूभैयों और दूसरों को इसमें टाँग अड़ाने का हक नहीं । हाँ , ये सुझाव पेश कर सकते और सहायता दे सकते हैं। मगर इसका श्रीगणेश वे साधु-फकीर और पंडित ही करेंगे , उन्हीं का यह हक है।

यह भी बात है कि धर्म का प्रश्न पेचीदा और खतरनाक है। आज यह सवाल नहीं कि ये मठ-मंदिर भले हैं या बुरे। चाहे ये जो भी हों , जैसे भी हों इनके पीछे हजारों वर्षों की अनंत लोगों की भावना है जो बड़ी ही मजबूत है। धीरे-धीरे उसमें खराबी आई है सही। फिर भी यह अपनी जगह पर है और उसके संबंध में कुछ भी उलट-फेर करने के पूर्व जनता के सामने वह प्रश्न जाना चाहिए। आज जो असेंबली है उसके सदस्यों के चुनाव के समय यह सवाल उठाया गया न था। फलत: जनता ने इसके बारे में अपनी कोई राय न दी। इतने महान प्रश्न पर जब तक जनमत न लिया जाए असेंबली को कोई हक नहीं है कि बोले , सो भी बुनियादी परिवर्तन के लिए। यह भी सही है कि जब तक बुनियादी परिवर्तन न हों , कुछ होने जाने का नहीं। जो धार्मिक बातों के पंडित नहीं , जो इस मामले में अधिकारपूर्वक बोल नहीं सकते , वही इसी के लिए कानून बनाएँ यह सरासर गलत है। उन्हें इसमें हाथ डालने का हक नहीं है। फिर भी राजनीतिक लाभ के लिए इसमें दखल देने पर तुले बैठे बाबुओं को हम आगाह दें कि अलग , अलग दूर , दूर।

संस्कृत शिक्षा

ये बाबू आज शिक्षा के साथ भी मखौल कर रहे हैं , खासकर संस्कृत-शिक्षा के साथ। मिडिल स्कूलों में दो-चार संस्कृत की किताबें पढ़ाने से संस्कृत का उध्दार होने के बजाय वह अधकचरी बन जाएगी और देश में अधकचरे संस्कृतज्ञों की बाढ़ लाएगी। फिर तो प्रगाढ़ विद्वानों और संस्कृत के महारथियों को कोई पूछेगा तक नहीं। आज संस्कृत साहित्य के अगाध समुद्र के महामंथन की आवश्यकता है जिससे अमूल्य रत्न निकलें। घर-घर , गाँव-गाँव मथानी चलाने से वह काम न चलेगा। मुल्क में सैकड़ों संस्कृत विश्वविद्यालय हों जिनसे संबध्द लाखों संस्कृत विद्यालय एवं महाविद्यालय और हजारों अन्वेषण शालाएँ हों , जहाँ साहित्य , आयुर्वेद आदि के संबंध में सभी प्रकार के अन्वेषण , सब तरह की खोज निर्बाध चले। एतदर्थ प्रत्येक प्रांतीय सरकारों को करोड़ों रुपए हर साल खर्च होंगे। संस्कृत के मुख-चुंबन मात्र की जगह सर्वांग प्रगाढ़ आलिंगन की आवश्यकता है। उसे पुष्ट-प्रौढ़ बनाने की जगह दूषित कलुषित करने का यह प्रयत्न निंदनीय है। यह सही है कि कुछ नामधारी पंडितों को टुकड़े मिलेंगे और लोगों की धार्मिक भावना की तुष्टि भी होगी। इस तरह शासकों के पोषकों का एक नया दल देश में तैयार होगा जो हाँजी , हाँजी करेगा। मध्यमा परीक्षोत्तीर्ण लोग आगे बढ़ने के बजाय टुकड़खोरी में लगेंगे। संस्कृत विद्या शान और सम्मान की वस्तु रही है , न कि महज टुकड़खोरी की। उसे उस उच्च स्थान से गिराने का राजनीतिक कुयत्न बर्दाश्त के बाहर है। मैं संस्कृत का सदा से प्रेमी रहा हूँ और जीवन का सुंदर भाग उस साहित्य के मंथन में गुजारा है। इसी से मुझे इस बात का दर्द है।

बेसिक शिक्षा

संस्कृत शिक्षा की दुर्दशा के प्रसंग से शिक्षा संबंधी ही एक और बात याद आती है जिसका ताल्लुक पूरी शिक्षा से है। मेरा मतलब बेसिक शिक्षा से है जिस पर हमारे नए शासकों का बड़ा जोर है। उसका प्रचार गाँधीजी के नाम पर किया जा रहा है इसका मुझे दर्द है। फिर भी मैं जानता हूँ कि गाँधी-मंदिर के ये पंडे उनकी पूजा कहाँ तक करते हैं। चाहे जो हो , यह बेसिक या बुनियादी शिक्षा शैतान की तरह फैल रही है और डर है , मुल्क की दिमागी तरक्की को ले डूबेगी , यदि फौरन से पेशतर इस पर रोक न लगी। जो मुल्क अपने बच्चों के छह घंटे में कमबेश चार घंटे केवल चर्खा , तकली , धुनकी , पूनी आदि में लगाएगा वह मस्तिष्क के विकास और ज्ञान की दृष्टि से रसातल जाएगा। इसमें शक नहीं। हमें आज लाखों-करोड़ों इंजीनियरों , मिस्त्रियों , डॉक्टरों आदि की आवश्यकता है , हर चीज के लक्ष लक्ष विशेषज्ञों की जरूरत है। लेकिन यदि बच्चों के दिमाग को अच्छी तरह विकसित होने न दिया गया तो आगे का तो रास्ता ही बंद समझिए। यदि छोटे बच्चों की मानसिक एकाग्रता के अभ्यास के लिए एकाध घंटे सूत कातना सिखाया जाए तो बात दूसरी है। मगर आज तो शिक्षा का बंटाधार होने जा रहा है। पुराने शासकों ने राष्ट्रीयता से भयभीत हो शिक्षा पर अपने ढंग से यहाँ जंजीर जकड़ी जो अभी तक ज्यों की त्यों है। नए शासक उस पर गाँधीवादी ढंग की यह दूसरी जंजीर कसने जा रहे हैं। इससे मुल्क के ज्ञान का दिवाला निकलेगा अवश्य। संभव है , नौकरियों के अपनाने की घुड़दौड़ में किसी छोटे-मोटे दल को इससे लाभ हो ─ शिक्षा पर जंजीर जकड़ने की इस नई प्रणाली से विशेष फायदा हो। फिर भी मुल्क को तो इसका बागी बनाना ही होगा।

शिक्षकों की दुर्दशा

शिक्षा का एक और पहलू भी है जो नए शासकों की मनोवृत्ति पर प्रकाश डालता है। मुद्दत से इस गुलाम मुल्क के शिक्षकों की हालत निहायत बदतर रही है , खासकर वेतन की दृष्टि से। इस कमरतोड़ महँगी के जमाने में भी आठ , दस , बारह या पंद्रह रुपए मासिक वेतन वे पाते रहे हैं जो एक बाबू के जलपान के लिए भी पूरा न था। यह शर्म की बात थी और स्वराजी शासक इसे फौरन मिटाएँगे यह आशा थी। तीन-चार साल की निरंतर चीख-पुकार और हड़ताल की धमकी के बाद भी जो कुछ आज किया गया है वह जले पर नमक जैसा ही है। हम यह न भूलें कि बिहार के प्राइमरी शिक्षकों को जो फीस छात्रों से मिलती है वह उनकी आय है और वह शीघ्र ही बंद होगी।

ऐसी दशा में 20, 25 या 30 रुपए मासिक वेतन की क्या कीमत है ? ट्रेंड मिडिल या अंट्रेंड मैट्रिक को 20 रु. देना जले पर नमक नहीं तो आखिर है क्या ? अंट्रेंड ग्रेजुएट को 50 रु. मिलेंगे। क्या खूब! जब हम यह याद करते हैं कि चीनी की मिलों के मेहतर को भी पूरे 55 रु. मासिक मिलते हैं तो ग्रेजुएट के 50 रु. पर शर्म से जमीन भी धाँस जाती है , हो सकता है हमारे नए मालिक और हाकिम इसमें भी शान ही समझें।

चीनी की मिलों में तो ' मुफ्त का माल और दादा का फातिहा ' हुआ है न ? किसानों की ऊख का दाम पूरा न देकर और चीनी का दाम काफी बढ़ा कर चीनी की मिलों के मजदूरों का वेतन बढ़ाया गया है। यह भी न भूलें कि तीन-चौथाई चीनी किसान ही खर्चते हैं। मामूली श्राध्द , विवाह या निमंत्रण में गरीब किसान भी दस बीस सेर चीनी खर्चता है जो सैकड़ों बाबुओं के चाय-नाश्ते में कई महीने के लिए काफी है। इस प्रकार चीनी के दाम की बढ़ती और ऊख के मूल्य की घटती ने दुधारी तलवार की तरह किसानों का कत्ल करके चीनी के मजदूरों का पेट भरा है। वह सीधा और मूक ठहरा न ? वह बकरी और मुर्गी है न ? इसी से आसानी से उसे दोनों ओर से जिबह किया जा सका है। यदि वैसी मुर्गी और भी होती तो उसी के खून से शिक्षकों को भी , जो अधिकांश किसान-मजदूरों के ही बच्चे हैं , कम-से-कम 55 रु. दिए जाते और उनका पेट भरा जाता। मगर अफसोस कि वह मिली ही नहीं। फिर भी गल्ले की बिक्री पर इसी वेतन के लिए टैक्स लगेगा और सेस भी बढ़ेगा! ठीक ही है , गल्ला बहुत ही सस्ता जो है! किसान मालामाल जो हो गया है! तभी तो बढ़ा हुआ सेस चुकाएगा और महँगा गल्ला खरीद कर खाएगा। याद रहे कि 80 फीसदी किसानों और खेत-मजदूरों की अपनी उपज से साल-भर गुजर नहीं होती। उन्हें गल्ला खरीदना ही पड़ता है।

पुलिस के सिपाही

इस प्रकार जहाँ एक ओर शिक्षकों की गरीबी और बेबसी के साथ मखौल की जाती है तहाँ दूसरी ओर पुलिस के सिपाहियों , जमादारों , हवलदारों और जेल के वार्डरों के साथ भी बेरुखी का ही बर्ताव होता है। क्या हमारे स्वराजी शासक बताएँगे कि चीनी की मिलों के मजदूरों से भी हलकी मेहनत और कम जिम्मेदारी इन पुलिसवालों और वार्डीरों पर है ? दिन-रात की पहरेदारी और चोर-बदमाशों के भाग जाने की जवाबदेही किन पर है ? 50 रु. या 60 रु. मासिक पाकर कौन सिपाही भरपेट रोटी और घी-दूध खा सकेगा और इस प्रकार तगड़ा बन कर अपने सामने से भागनेवाले चोर-डकैत को ललकार कर पकड़ लेगा ? ऐसी दशा में उनके लिए 50 रु. या 60 रु. वेतन रखने में शर्म न आए तो दोषी कौन ? और यदि इसी वेतन को बढ़ाने तथा आत्मसम्मान के रक्षार्थ वे कुछ भी करें तो बागी करार दिए जाएँ! अफसरों का जो बर्ताव उनके साथ है वह तो झल्लाहट पैदा करता है , कलेजे में डंक मारता और टीस लाता है। फिर भी जुबान खोलने की , चीखने की , कराहने की भी मनाही है। यदि ऐसा करने की गुस्ताखी की तो फाँसी का तख्ता और जेल के सीखचे तैयार पड़े हैं , खबरदार! बस , खून की घूँट पीकर रह जाना पड़ता है! उनके दिलों पर क्या गुजरती है , कौन बताएगा ?

होमगार्ड्स या रक्षावाहिनी

होमगार्ड्स के नाम पर स्वराजी सरकार ने एक दूसरी ही रक्षावाहिनी तैयार करने की ठानी है। नाम तो बहुत ही सुंदर है। पर काम भी जब ऐसा ही हो तब न ? महामना लेनिन ने राष्ट्रीय जनसेना ( National Miltia) पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। कहा है कि नौकरीपेशा फौजियों की जगह जनसेना ही रहे। यदि वही बात यहाँ भी होती तो क्या कहना ? मगर एक तो खूब ठोंक-पीट कर पक्के सरकारपरस्त ही इसमें लिए जाते हैं। जो सरकार के विरुध्द चूँ भी कभी करेंगे ऐसे लोगों से दूर रहा जाता है। दूसरे ट्रेनिंग कैंपों में हरेक के पीछे खुफिया लगे रहते हैं जो उन्हीं में से होते हैं। यह तो मध्यमवर्गीय लोगों की एक नयी फौज और पुलिस तैयार की जा रही है जिसमें मध्यमवर्गीयता की भावना कूट-कूट कर भरी जा रही है। वर्तमान पुलिस और फौज से नए शासक घबराते हैं , भयभीत हैं। भविष्य में खतरे का भी अंदेशा है। इसीलिए शायद रक्षावाहिनी के नाम पर नई सेना खड़ी की जा रही है जो उनके लिए संकट की घड़ी में काम आए! जो लोग आजाद हिंद फौज पर विश्वास न कर सके वही जनता की सेना संगठित करेंगे यह विश्वास राजनीति का बच्चा ही कर सकता है। लेकिन इतना तो सही है कि जब खतरे की घंटी बजेगी तब यह रक्षावाहिनी पिघल जाएगी और काम न दे सकेगी। रूसी जार की सेना में घुड़सवारों का प्रधान दल कज्जाकों का था जो जार के पूरे पालतू थे। मगर 1917 की फरवरीवाली क्रांति में उनने भी ऐन मौके पर साथ छोड़ दिया। सचमुच ही क्रांति की हवा वह जादू की लकड़ी है जो छूते ही सबों को पलट देती है। वह ऐसी गर्मी है जो पत्थर को पिघलाती है।

छात्रों में लहर

जिन छात्रों पर हमारे नेताओं का नाज था उनमें भी घोर असंतोष की लहर आज हिलोरें मार रही है। बिहार के कॉलेजों के छात्रों की हड़ताल इसका प्रकट रूप था। पटना में विशेष रूप से जो नजारा दीखा वह भूलने का नहीं। साम्राज्यशाही के विरुध्द शान के साथ जूझनेवाले बहादुर छात्रों को पालतू समझने की नादानी करनेवाले नए मालिकों की आँखें खुलीं जरूर और असलियत का नंगा रूप उनकी आँखों के सामने आ गया अवश्य। कहा जाता था कि इस हड़ताल और हठ के फलस्वरूप छात्रों का एक साल चौपट हो गया। लेकिन कहनेवाले भूल जाते थे कि स्वराजी शासकों को गद्दीनशीन करने में यदि इन्हीं छात्रों ने कई साल चौपट किए और इस पर खुशी जाहिर की गई तो उनके खिलाफ अलार्म बजाने में भी एक साल जाए तो बला से। गर्व में चूर नेताओं को तमाचे तो लगें और वे देखें कि कितने गहरे पानी में हैं। पटने में छात्रों ने जिस क्रांतिकारी एवं संगठनवाली मनोवृत्ति का परिचय दिया वह ऐतिहासिक वस्तु है। इतिहास साक्षी है कि दुनिया के छात्र सदा ऐसा ही करते रहे हैं। वे स्वदेशी , विदेशी किसी गुलामी को बर्दाश्त नहीं करते हैं।

व्यापक असंतोष

कहा जाता है , कि साम्राज्यवादी युध्द के बाद का समय क्रांतिकारी होता है। यही कारण है कि देश में व्यापक असंतोष है। किसानों , छात्रों , पुलिस और अधयापकों के अलावे रेलवे , डाक-तार , खानों और कारखानों के मजदूरों के कलेजों में तो सचमुच ज्वलंत असंतोष की लहर उमड़ रही है। हाल की घटनाएँ इसका सबूत हैं। हड़तालें होती हैं , टूटती हैं , उनकी सूचनाएँ दी जाती हैं , रोकथाम होती है। मगर हालत नाजुक है। देर-सवेर किसी दिन विस्फोट हो सकता है। फोड़ा फूटेगा और मवाद बाहर आएगा। दरअसल नौकरीपेशा लोगों की हालत बुरी है। चीजों की कीमत चार से छह गुनी हो गई है। लेकिन वेतन तो सब मिला कर दूना भी शायद ही हुआ है। मलेरिया तो कुनीन की चार गोलियों के बजाय एक-दो से भागेगा नहीं। तीन गज के बजाय एक गज से कुरता भी न बनेगा। धोती-साड़ी भी एकाध गज की हो नहीं सकती। पावभर की जगह एक छटांक से पेट का काम चलने का नहीं। गरीबों को जाड़ा कम सताए सो भी नहीं। वह तो और भी परेशान करता है। फिर तो वे मन ही मन कर्म , तकदीर , भगवान , सरकार और मालिकों को कोसते हैं , उन पर जलते-कुढ़ते हैं और अन्त में हार कर जैसे हो दिल का बुखार निकालते हैं। हड़तालों का यही रहस्य है। मजदूर और नौकरीपेशा लोग गधो नहीं हैं कि उकसाने से सामूहिक रूप से काम छोड़ दें। भूख , बर्खास्तगी और जेल का खतरा मुँह बाए सामने खड़ा जो रहता है। जारशाही ने हड़तालों के विरुध्द क्या नहीं कर रखा था ? फिर भी फरवरी की क्रांति के समय भयानक हड़तालें हुईं जिनने जारशाही को उदरसात करके ही दम ली। और इतिहास का पुनरावर्तन होता ही है।

अप्रत्यक्ष करों की वृध्दि

स्वराज्य पदार्पण ने गरीब जनता पर कमरतोड़ करों को लादना शुरू किया। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। इस साल रेलों का किराया डयोढ़ा-दूना कर दिया गया। फिर भी रेलों में आदमी पर आदमी की जैसे बोराबंदी होती है। डाक का खर्च बराबर बढ़ता गया है और पहली अप्रैल से कार्ड का दाम पौन आना तथा लिफाफे का दो आना होगा। कपड़े , चीनी , पेट्रोल आदि पर भी कर लदा है। जानकारों का कहना है कि नेहरू का बजट तो धनियों का है , न कि जन साधारण का। स्टांप का खर्च भी पहले ही बढ़ा है। बैलगाड़ियों , साइकिलों , लादनेवाले जानवरों पर कर लगाने की बात पहले से ही है। हाँ , करों को घटाया इस तरह गया है कि कारखानेदार और धनी लोग लाभ उठाएँ। महीन कपड़े का कर घटा है।

कहा जाता है , मुद्रा वृध्दि को रोकने के लिए नेहरू सरकार आसमान-जमीन एक कर रही है। मगर इन अप्रत्यक्ष करों की वृध्दि से मुद्रा प्रसार और भी बढ़ता है। चीजों की कीमत बढ़ती जो है। जिस चीज पर कर लगे वह कपड़ा , चीनी आदि महँगी तो होगी ही और मुद्रा प्रसार रोकने के मानी हैं कि चीजें सस्ती हों। एक ओर मजदूरों का वेतन बढ़ाते हैं। दूसरी ओर जरूरी चीजों पर कर बढ़ाकर इन्हें महँगी करते हैं। फिर वेतन बढ़ाना भी बेकार होता है ─ गज स्नान होता है। प्रत्यक्ष या सीधो करों को बढ़ाइए , जैसे आय कर को। सो तो उन्हें घटाते हैं। यह भी अजीब बात है कि हाल ही में केंद्र के खाद्यमंत्री श्री जयराम दास ने फरमाया था कि चीनी का दाम अभी ज्यादा है , उसे घटाए जाने की सोच रहे हैं। लेकिन फी बोरे डेढ़ रुपए की बढ़ती कर दी गई।

सत्यनाशी सेल्स टैक्स

सैकड़ों प्रकार के अप्रत्यक्ष करों से काम न चलने पर सरकार ने एक नए खतरनाक टैक्स को जन्म दिया है जिसे सेल्स टैक्स कहते हैं और जिसकी बाढ़ सुरसामुख की तरह हो रही है। यह हर चीज पर लगता है। शायद ही कोई वस्तु बची हो। इसका जहरीला असर जीवन के हर पहलू पर पड़ता है। क्योंकि जीवनोपयोगी सभी वस्तुएँ इसके पेट में आ जाती हैं। यही कारण है कि इसकी आय दिनोंदिन बढ़ती जाती है। इसमें धोखा देने की भी पूरी गुंजाइश है। इसीलिए चालाक बनिए रोज हजारों की खरीद-बिक्री करके भी सरकार को एँगूठा दिखा देते हैं। अफसरों की केवल थोड़ी-सी पूजा कर देते हैं। हाँ , ईमानदार लोग पिस जाते हैं , उनकी परेशानी बढ़ जाती है। अफसरों का गुस्सा भी उन्हीं पर उतरता है। अगर यह कर कायम रहा तो लोगों को तबाह कर देगा। इसीलिए इसका तो खासतौर से जोरदार विरोध होना चाहिए। अन्न पर अब तक यह न था। अब उस पर भी लगने को है। फिर तो किसानों को रुलाएगा।

बिहार सरकार को यदि रुपए की कमी है तो छोटानागपुर की कोयले , अबरक आदि की खानों पर कब्जा क्यों नहीं कर लेती ? बड़ी दिक्कत से अगले साल सब मिलाकर सरकारी आय प्राय: 24 करोड़ होगी। लेकिन सिर्फ छोटानागपुर की इन खानों से ही कमबेश उतनी ही आय फौरन होगी जो उत्तरोत्तर बढ़ेगी , ऐसा जानकारों का कहना है। फिर पैसे की कमी होगी ? क्या ? मगर इसमें पूँजीपतियों तथा नेहरू सरकार के रंज होने का खतरा जरूर है।

जमींदारी खत्म न होगी

जमींदारी मिटाने का प्रश्न मुद्दत से सामने है। नए शासक खयाली पुलाव के रूप में कई साल से हमारे सामने इसे रखते आ रहे हैं। असेंबलियों में प्रस्ताव पास हुए। फिर कानूनी मसविदा बना और पास हुआ। लेकिन वह बड़े लाट के यहाँ त्रिाशंकु की तरह उलटा लटका तप कर रहा है। कहा है , उसमें कुछ संशोधन करके कानूनी रूप दिया जाएगा। कभी कहा जाता है , पाँच हजार की आय से कमवाली जमींदारी न मिटेंगी। फिर आवाज आती है सरकार खुद ही जमींदारियों का प्रबंध करेगी। फिर सुनते हैं , तीन ही महीने में जमींदारी खत्म होगी।

लेकिन यह सब लीडरों की विशुध्द माया है। ये लीडर जमींदारी मिटा नहीं सकते। यदि जमींदारी के लिए मूल्य या मुआवजे की बातें ये भले आदमी नहीं करते रहते तो मिटा सकते थे। मगर मूल्य देने में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है नए सर्वे की जब तक सभी जमींदारियों का सर्वे नहीं हो जाता कि किसकी कितनी जमीन है , कैसी है और उसकी आय कितनी है तब तक मूल्य कैसे दिया जाएगा ? एक ही जमींदार की जमींदारियाँ कई जिलों में हैं। प्रांतव्यापी सर्वे के बिना किसी की आय का पता चलेगा कैसे जिसके हिसाब से मूल्य दिया जाए ? और यह सर्वे तो वर्तमान दशा में असंभव है। इसे पूरा करने में बहुत साल लगेंगे , यह जानकारों का कहना है। यह एक बाधा है।

दूसरी बाधा है कि यह मूल्य बाजार दर से सोलहों आना नगद देना होगा। मुआवजे का यही अर्थ है। यह नहीं कि आप जो चाहें वही दे दें और नगद दें या उधर। नहीं-नहीं , बाजार दर से पूरा दाम कौड़ी-कौड़ी नगद चुकाना पड़ेगा। मुआवजे के बारे में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट का यही फैसला है। मुआवजे के मानी में जो अंग्रेजी का शब्द ' कंपेन्सेशन ' आया है उसका यही अर्थ है जो बदला जा सकता नहीं। याद रहे कि यह मुआवजा सिर्फ बिहार में चार अरब से कम न होगा। वह छह अरब और उससे भी ज्यादा हो सकता है जिसे चुकाना बिहार सरकार की शक्ति के बाहर है। यहाँ तथा अन्य प्रांतों में उसे नगद चुकाने पर मुद्रावृध्दि ऐसी होगी कि चावल शायद रुपए का आधा सेर बिकने लगे।

तीसरी बाधा छोटानागपुर की कीमती खानों को लेकर है। ये खानें पूँजीपतियों के हाथों में हैं जिनसे छीनकर उन्हें रंज करने को नेहरूजी तैयार नहीं हैं। इसीलिए खानों की जमींदारी अछूती रखने की पेशबंदी हो रही है। अगले चुनाव में करोड़पतियों से हमारे नेता पैसे कैसे लेंगे यदि उन्हें नाखुश किया ? और फंड के करोड़ों रुपयों के बिना चुनाव लड़ा कैसे जाएगा ? उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की बात फिलहाल जो दस साल के लिए टाली गई है उसके भीतर ऐसे ही कारण हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से जो समझौता हुआ है उसमें भी यह मुख्य शर्त होगी। तब खानों को कैसे ले सकते हैं ? और जमींदारी मिटा के क्या होगा यदि 20-25 करोड़ की इस आय को छोड़ ही देना है ?

जमींदारियों का प्रबंध सरकार करे ऐसी तैयारी जो आज की जा रही है वह भी जमींदारी न मिटाने के पाप को छिपाने के ही लिए। इससे भोले किसान समझेंगे कि जमींदारी मिट गई। मगर खासमाहाल के किसान कम पामाल नहीं हैं। जमींदारों के अमले कलक्टर की मातहती में गजब करेंगे और करैला नीम पर चढ़ जाएगा। हम लाखों जमींदारों को हटाकर उनकी गद्दी पर कलक्टरों और माल मंत्री को बिठाने का विरोध सारी शक्ति लगा कर करेंगे। हमें जमींदारी मिटानी है , न कि उसकी शक्ल बदलनी और तमाशा करना है। हम जानते हैं कि जब सरकार जमींदारियों को हथियाने की धमकी देगी तो डर से जमींदार कहेंगे कि जो भी हो सके हमें कीमत दी जाए। इसी के लिए यह तैयारी है। मगर हम इसके विरोधी हैं। जमींदारों को कीमत के रूप में एक कौड़ी भी न देकर उनके लिए अच्छे गुजारे का प्रबंध हो और उनके योग्य काम उन्हें दिया जाए , हम यही चाहते हैं। उनके पढ़ने-लिखने , दवा-दारू , रहन-सहन में कोई कठिनाई न रहे हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जरूर।

लेकिन जमींदारी न मिटने पर जिन लाखों लोगों की बहालियाँ इसीलिए हुई थीं उनका क्या होगा , यह प्रश्न होगा। मगर इसका उत्तर वही दें जिनने ये बहालियाँ कीं। शायद इन नए नौकरों से अगले चुनाव में काफी सहायता लेने की तैयारी थी जिस पर पानी फिरा चाहता है। संभव है , इन्हें कहीं और फँसाया जाए। नहीं तो बहाल करनेवालों की छाती पर भूत की तरह ये खुद चढ़ेंगे और इस तरह नेताओं को लेने के देने पड़ेंगे।

जमीनों की छीना-झपटी

जमींदारी तो मिटी नहीं। लेकिन किसानों की जमीनों की छीना-झपटी तेज हो गई। जमींदारी जाने के भय से जमींदारों ने जोर मारा है कि जितनी भी हो सकें जमीनें हथिया लें। बकाश्त के बढ़ते झमेले का यही रहस्य है और बकाश्त बोर्ड इसी पर पर्दा डालने के लिए ही है। यदि किसानों ने संगठित रूप से इसका जल्द सामना न किया तो उनकी अधिकांश जमीनें छिन जाएँगी जरूर मुझे भय है। इसके लिए सीधी लड़ाई एकमात्र रास्ता रह गई है। सो भी सत्याग्रह नहीं , जेल भी नहीं। अब तो लाठियों और गोलियों का ही सामना करना पड़ेगा , याद रहे। इधर कुछ दिनों से स्वराजी शासक जो कुछ इस संबंध में कर रहे हैं वह तो इसी बात का सबूत है कि हवा का रुख किधर है।

लेकिन जमींदारों के साथ ही सरकार भी इस छीना-झपटी में शामिल है। फार्म बनाने के नाम पर बंजर और पड़ती जमीनों को छोड़ टटुपुँजिए किसानों एवं गरीबों की जमीनें छिनी जा रही हैं। हमें यह चीज बंद करवानी है। अन्न कम पैदा होता है और भुखमरी का सवाल है। जमीनें छिन जाने पर ये गरीब कहाँ जाएँगे ? क्या इसी भुखमरी के लिए ही वे अंग्रेजों से लड़ते रहे हैं ? बंजर जमीनों को फार्मों के लिए सरकार ही आबाद कर सकती है। तब आबाद जमीनों को लूटने के क्या मानी ?

इतना ही नहीं। पड़ोस में बक्सर के पूर्व आधे दर्जन गाँवों की खेतीवाली जमीनों में मिलें खोलने की तैयारी हो चुकी थी जो बड़ी दिक्कत से रोकी जा सकी। पता नहीं फिर भी वह सर उठाएगी या नहीं। यदि उठाए तो हमें पूरी ताकत से लड़ना होगा। वे मिलें डुमराँव में या अन्यत्र बंजर जमीनों में अच्छी तरह बन सकती हैं। तब किसान के खेत उन्हीं के लिए क्यों छीने जाएँ ? यही बात मुल्क में आज लाखों मिलों को लेकर जारी है जिससे करोड़ों किसान और गरीब प्यारी जमीनों और घर-बार से हाथ धोते हैं। वे कहाँ बसेंगे , क्या खाएँगे , यह पूछनेवाला भी कोई नहीं। जब तक उन्हें दूसरी जगह खेत देने और बसाने का पूरा प्रबंध नहीं हो जाता , हम ये मिलें बनने न देंगे और लड़ेंगे , ऐसा दृढ़संकल्प किए बिना काम न चलेगा।

पानी के करते बे पानी

एक ओर यह है। दूसरी ओर प्राय: हर साल गंगा , गंडक , कोसी आदि नदियों की बाढ़ों से उनके नजदीक और दियारे में बसनेवाले किसान बरबाद हो जाते हैं। यह बात पहले इतनी भी भीषण न थी जितनी इधर दिनोंदिन होती जा रही है। खूबी यह कि उनकी रक्षा का उपाय स्वराजी शासक भी कुछ नहीं कर रहे हैं। बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए सरकार से लाखों रुपए दिए जाने की घोषणा जरूर होती है। मगर वे रुपए एक तो दाल में नमक के समान भी नहीं होते और जले पर नमक का काम करते हैं। दूसरे वे कुछ स्वार्थी नेताओं और उनके दलालों के ही पेटों में चले जाते हैं। यह पक्की बात है। हमें इसपर अपना गुस्सा जाहिर करना जरूरी है।

दूसरी ओर सिंचाई का प्रबंध न होने से लाखों एकड़ जमीनों में फसल होती ही नहीं , या नाममात्र को ही होती है। जहाँ सम्मेलन हो रहा है वह ढकाइच और पास-पड़ोस के गाँव इस बात के नमूने हैं। यदि नहर से पानी मिले , पुनपुन , पैमार काव जैसी छोटी-बड़ी नदियों को बाँधकर उन्हीं का पानी खेतों में पहुँचाया जाए , बिजली के कुओं का प्रबंध हो और बरसात के रत्ती-रत्ती पानी को जमा करने का इंतजाम सरकार करे तो सिंचाई का प्रश्न हल हो , पैदावार चौगुनी हो और जमीनें दोफसिला जरूर बन जाएँ। अधिक अन्न उपजाने का यही रास्ता है। कहीं पानी न मिलने से और कहीं पानी के मारे ही किसान बेपानी हो रहे हैं। यह शीघ्र बंद होना जरूरी है। नहरों के इलाके में लंबी मुद्दत के सट्टे के लिए जो नियम हैं वे निहायत बेहूदे हैं। उन्हें फौरन बदलना होगा। नहीं तो किसान घूसखोरी से तबाह होते ही रहेंगे। बिजली के नए कुओं के नियम तो और भी गतरबूद हैं। बिना पानी दिए भी रेट वसूली का कायदा है। नाजायज पानी के बारे में भी बहुत बेढंगे नियम हैं। सबों को फौरन बदलवाना होगा। तभी अधिक अन्न उपजेगा।

ऊखवाले किसान

उधर ऊखवाले किसानों के गले पर छुरी चल रही है। उनकी ऊख का दामपूरा-पूरा देना तो दूर , अधूरा भी नहीं दिया जाता है। इस साल मैंने खर्च का हिसाब लगाकर सरकार को साफ बता दिया कि चार रुपए मन उसका दाम चाहिए। धीरे-धीरे दो-चार साल में वही घटाकर रुपए या आठ आने तक कैसे किया जा सकता है और फिर भी किसान को लाभ ही होगा यह भी बता दिया। मगर सरकार ने निहायत बेशर्मी और बेदर्दी से वह दाम पारसाल से भी घटा दिया। युक्तप्रांत की सरकार तो और भी नीचे चली गई। किसानों को बता दूँ कि पारसाल उन्हें सवा रुपए मन के ही लिए तैयार होकर ही गन्ना उपजाना चाहिए। नहीं तो पछताएँगे। दो रुपए मन गन्ने का दाम देकर भी चीनी का दाम 30 रु. मन करना ठीक था। यदि बढ़ाया था तो किसानों को और भी पैसे देने थे-फी मन आठ आने तो जरूर ही। पारसाल ऐसा न किया गया। इस साल तो और भी घटा। आगे ज्यादा घटेगा और गन्ने की खेती के विकास के अभाव में चीनी का कारोबार खत्म होगा यह पक्की बात है। सरकार ने सेस के नाम पर कई करोड़ रुपए किसानों से ही लिए हैं ─ उन्हीं के दाम में से ये रुपए आए हैं। फिर भी ऊख के विकास और अधिक उपज के लिए क्या हुआ , यह सवाल डटकर करना होगा। तभी खब्बू मलों की नींद टूटेगी।

भावली की नगदी

भावली की नगदी के जो मुकदमे हुए उनने किसानों को न घर का रखा , न घाट का। बंशी में मछली की तरह फँसा कर किसान जिबह कर डाले गए। अपीलों का सिलसिला चालू है और नगदी फैसले के बावजूद भी भावली की वसूली हो रही है। फिर भी गाँधीवादी शासकों के कानों पर जूँ नहीं रेंगती। किसान लुटते हैं तो बला से। लीडरों ने रद्दी कानून बनाए तो बला से। सरकार ने नियम-नोटिसें गलत निकालीं तो उससे क्या ? मरते तो हैं किसान। भावली की जमीनों में लाश तो उनकी जलाई-दफनाई जा रही है।

लड़ाई का दूसरा पर्व

आर्थिक मसलों के साथ ही हमें भीतर और बाहर के राजनीतिक सवालों पर भी धयान देना जरूरी है। दरअसल राजनीति हमारी जान है। फलत: उसके समझे बिना हम मर जाएँगे , तबाह हो जाएँगे , यह तयशुदा बात है।

मुद्दत की भिड़ंत और जुझार के बाद हमारे मुल्क ने अंग्रेजी जुआ उतार फेंका यह सभी जानते हैं। हम कहते थे , ललकारते थे कि तुम रहोगे या हम ; दोनों रह नहीं सकते। हुआ भी वही। वे जो हमारी छाती पर कोदो दलते थे चोर की तरह भाग निकले। खूब ही दबाया , जलाया , दिल खोल कर दमन किया। मुल्क को दमन की आग की जलती भट्ठी बना दी। फिर भी भागते ही बना , सो भी चोरों की तरह।

लोग समझते थे , अब विपदा की रात का बिहान हुआ , हमारे कष्ट भागेंगे। जो समझदार थे , जिन्हें आजादी के युध्दों का इतिहास ज्ञात था , वे ऐसा तो नहीं मानते थे कि जनता के कष्टों का खात्मा होगा। मगर इतना तो वे भी मानते थे कि मुसीबतें बढ़ेंगी नहीं ; उनमें बहुत कमी होगी। लेकिन आज सभी हैरत में हैं कि उलटी बात हुई और जनसाधारण पर आफत के पहाड़ टूट पड़े। फिर भी यह तो होना ही था। किसान-मजदूर माने बैठे थे कि अब लड़ना न होगा। लेकिन उनकी आँखों ने भी असलियत को ताज्जुब के साथ देखा। आज वे भी मानते हैं कि अभी बड़ी जुझार बाकी ही है। रूस में आजादी आने के बाद जब लेनिन ने समझाना चाहा कि श्रमजीवियों को और भी जूझना है तो लोग कहते थे कि उसका माथा फिर गया है। वे मानते थे कि अब हमारे अपने ही लोग-स्वजन ही-शासक हैं। कुछ ही देर बाद उन्हें भी स्वजनों का नंगा रूप देखने को मिला और लोग लड़ने को आमादा हुए। यहाँ भी स्वजनों की असली सूरत साफ नजर आ रही है। फलत: महाभारत के पहले पर्व के बाद दूसरा जरूरी है यह मान्यता किसान-मजदूरों की हो चली है। आजादी के फलस्वरूप जो सर्वत्र होता है भारत में भी हो रहा है। इतिहास की पुनरावृत्ति हो रही है। यदि द्वितीय पर्व के आरंभ में हमने देर की तो मर जाएँगे याद रहे। यों तो दूसरा पर्व जारी ही है। किसानों और मजदूरों की अनवरत लड़ाइयाँ वह पर्व ही तो हैं। उन्हीं को व्यापक और संगठित रूप देना शेष है।

वैधानिकता का मोह

बहुतेरे माने बैठे हैं कि हमारी शेष लड़ाई वैधानिक ही होगी। अक्टूबरवाली क्रांति के पहले लेनिन ने भी ऐसा ही कहना शुरू किया था। मगर उसकी पैनी दृष्टि ने वास्तविकता को जल्दी ही देखा। आजादी मिलने के बाद , इतिहास साक्षी है , वैधानिकता का मोह सभी देशों में सर पर सवार हुआ और किसान-मजदूर उसी मृगमरीचिका के पीछे मारे गए। वे शासनशक्ति को हथिया न सके। लेनिन ने भी उसी सनातन पक्ष को अपनाना चाहा था। मगर उसकी आँखें जल्द खुलीं। हम समझते हैं वही अंतिम परीक्षा थी। कमानेवाली जनता को शासन की गद्दी पर बिठाने की तमन्नावालों को वह मोह-माया सदा के लिए त्याग देना चाहिए। अधिनायकतंत्र और फासिज्म के उदय के बाद तो विधानवाद के लिए कहीं स्थान रह ही न गया। आजादी की रक्षा के नाम पर भारत में एकतंत्र शासन को भी फीका बना देनेवाला जो अंधा दमन चालू है हमारी आँखें खोलने के लिए वही पर्याप्त है। इधर चुनावों के जो कुछ कटु अनुभव हुए हैं वे चिल्लाकर बताते हैं कि वैधानिकता के दिन लद गए। अधिकारारूढ़ दल गद्दी कायम रखने के लिए कोई भी काम गाँधीजी के नाम पर कर सकता है। वह किसी भी हद तक नीचे जा सकता है। इसलिए चुनावों के द्वारा बहुमत तभी हो सकता है जब क्रांतिकारी ताकतें शत्रुओं की कमर तोड़ दें। शासनचक्र को अछूता रख कर सिर्फ मंत्रियों के बदलने से किसान-मजदूर राज्य कभीकायमनहोगा। समस्त शासन चक्र मटियामेट कर नयी सृष्टि बनानी होगी। नहीं तो नये मंत्री उसी चक्र को चलाने में ही फँसेंगे। मार्क्सवाद यही है और उसके सिवाय दूसरा रास्तानहीं।

कांग्रेस-तब और अब

कांग्रेस के कर्णधार कहने लगे हैं कि वे किसान-मजदूर राज्य कायम करेंगे। जिन्हें कल तक इसी राज्य के नाम पर छींक आती थी , माथे में चक्कर आता था वही जब किसान-मजदूर राज्य का नाम लेते हैं तो गुस्सा आता है। कल तक के इसके कट्टर शत्रु ऐसा कहने में शर्माते भी नहीं। जब तक किसान और मजदूर अपने राज्य के लिए संगठित न किए जाएँ , वर्ग-संघर्ष के आधार पर पूर्णरूप से तैयार न किए जाएँ , वह राज्य धोखे की टट्टी होगा। वह राज्य पूरी तैयारी के बिना आएगा नहीं और आने पर टिकेगा नहीं और वर्ग-संघर्ष से लाख कोस दूर भागनेवाली कांग्रेस उसे ला नहीं सकती। उसका काम था अंग्रेजी सरकार को हटाना और यहाँ के पूँजीपतियों के हाथ में शासन सौंपना। यह काम हो चुका। इसीलिए उसका निर्वाण आवश्यक है। वह कृतकृत्य जो हो चुकी। बापू ने अपने महाप्रयाण से एक दिन पूर्व यही कहा भी था। 15 अगस्त , 1947 के पूर्व जो कांग्रेस आजादी के दीवानों की जमात थी , योग संस्था थी उसके बाद निश्चय ही वह भोग संस्था बनने लगी यह कटु सत्य महात्मा की तीक्ष्ण दृष्टि ने देखा और चाहा कि वह जिस शान से जीवित रही उसी शान से दफना दी जाए। तिल-तिल करके उसकी दुर्दशा और मौत उन्हें बर्दाश्त न थी। योगियों की जमात बदल कर भोगियों का मठ बने यह सोच कर भी वह तिलमिला उठे और कांग्रेस को समाधिस्थ करने को कहा। मगर महंती के भूखे चेलों ने गुरु की एक न सुनी। छोटे से बड़े तक कांग्रेसी कौन कुकर्म नहीं करते ? अखबारों के पन्ने इससे रंगे रहते हैं। हाईकोर्ट ने शासकों और उनके चेलों की पीठें नंगी कर जो कोड़े लगाए हैं और कचहरियों एवं न्यायालयों के कामों में उनकी दस्तंदाजी पर जो डाँट-फटकार बताई है वह इस बात का सबूत है कि कांग्रेस का कितना पतन है। गद्दीनशीनों की गद्दी बनाए रखने और उन्हें तथा उनकेपिछलग्गुओं की टुकड़खोरी का साधन मात्र वह रह गई है। इसीलिए किसान-मजदूर राज्य के लिए लड़नेवाले उससे निकल भागे हैं। एक ने किसी किसान से कहा कि अपने ही हाथों बनाई कांग्रेस से अलग होना ठीक नहीं। उसने उत्तर दिया कि अपने ही हाथों बनाए घर से लोग भाग खड़े होते हैं जब प्लेग के चूहे घर में गिरते हैं। विशुध्द जातीयता के हामी लोगों की वहाँ बड़ी पूछ है। आगे चलकर चुनावों में इस जातिवाद की नाव पर चढ़कर तथा अनेक कुकर्मों के डांड , पतवार के बल पर ही वे चुनाव का तूफानी समुद्र पार करने की आशा रखते हैं। फिर भी उसीकांग्रेस के कर्णधार किसान-मजदूर राज्य कायम करने की बातें करने में जरा भी नहीं शर्माते।

साम्यवाद का हौआ

एक ओर तो चिल्लाते हैं कि किसान-मजदूर राज्य स्थापित करेंगे। दूसरी ओर वही लीडर साम्यवाद से इतने भयभीत हैं कि सोते-जागते उसी के सपने देखते और उससे बचने की तरकीब सोचते हैं। यही तो वंचना है। साम्यवाद कोई दूसरी चीज नहीं है सिवाय विशुध्द किसान-मजदूर राज्य के। साम्यवाद होने पर हरेक आदमी से उतना ही वही काम लिया जाएगा जिसे वह जितना कर सके। लेकिन बदले में उसकी सभी आवश्यकताएँ पूरी की जाएँगी , यही साम्यवाद कहलाता है। तब इसी का हौआ क्यों खड़ा किया जाता है ? साम्यवाद धर्म को मिटाता है , यह तो उसके शत्रुओं का झूठा प्रचार है। सोवियत रूस में धर्म को मिटाने का नाम भी वहाँ की सरकार कहाँ करती है ? वहाँ तो हरेक को आजादी है कि धर्म माने या न माने। हाँ , साम्यवादी सरकार धर्म की घूँटी किसी को नहीं पिलाती और न उसके पक्ष-विपक्ष में प्रचार करती है जो ठीक ही है। साम्यवाद में अमीर-गरीब नाम की चीज नहीं होती-सभी सुखी होते हैं यह सुंदर बात है। सभी नागरिकों को समान रूप से पूरा अवसर मिलता है सर्वांगीण समुन्नति का। फिर उसका विरोध कैसा ?

साम्यवाद आ रहा है

यह साम्यवाद भारत के दरवाजे खटखटा रहा है। 20-25 वर्षों की कशमकश के बाद चीन में उसकी विजय पूरी होने ही को है। बर्मा में साम्यवाद एवं पूँजीवाद के बीच जीवन-मरण की भिड़ंत जारी है। चीन और बर्मा के मध्यवर्ती देशों की भी कमबेश यही हालत है। लक्षण है कि ये सभी देश जल्द पूँजीवाद को गर्दनिया दे साम्यवाद को अपनाएँगे। तब भारत की पारी आएगी। चाहे हमारे लीडर लाख चीख-पुकार मचाएँ। मगर यह बात होकर रहेगी। आज यह प्रश्न नहीं है कि हम साम्यवाद को पसंद करते हैं या नहीं। आज तो वह चट्टान जैसी ठोस चीज के रूप में हमारे सामने खड़ा है। चीन की 95 प्रतिशत जनता च्यांग कै शेक को सलाम करके मावसेतुंग का साथ दिल खोल कर क्यों दे रही है , यदि साम्यवाद बुरी चीज है और साम्यवादी लोग शैतान हैं ? जनता के ही बल से तो साम्यवादियों की विजयों पर विजएँ हो रही हैं। यह भी नहीं कि वह साम्यवाद सोवियत रूस से चीन में लाया जा रहा है। उसका वृक्ष चीन में ही ठेठ बीज से अंकुरित होकर वृक्ष के रूप में सामने आ रहा है। भारत में भी यही होना है। 1939 और 1945 के दरम्यान भारत में पूर्व से एक बवंडर आया जो अंग्रेजी शासन को डुबाकर चलता बना। पुनरपि उसी पूर्व से दूसरा तूफान आ रहा है जो शीघ्र पूँजीवाद को भी यहाँ से भगाएगा और शोषित-पीड़ित जनता के हाथों में शासन सौंपेगा। यही जमाने का रुख है ─ यही समय की पुकारहै।

साम्राज्यवादियों से गठबंधन

ऐसी दशा में समाजवाद का नारा लगानेवाले नेहरू जब अपनी वैदेशिक नीति में ब्रिटेन तथा अमेरिका के साम्राज्यवादियों से गठबंधन करते हैं तो बड़ी झल्लाहट होती है। वीतनाम और मलाया में साम्राज्यवादी नग्न नृत्य करते और जनता की आजादी के युध्द को खून में डुबाते हैं तो नेहरू तमाशा देखते हैं। मगर हिंद-एशिया के लिए दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का सम्मेलन करते हैं जिसमें वीतनाम और मलाया को न पूछ न्यूजीलैंड तथा आस्ट्रेलिया के प्रतिनिधि बुलाए जाते हैं। जापान के विरुध्द चीन की स्वतंत्रता के नाम पर युध्द करनेवाले च्यांग कै शेक से हाथ मिलाने के लिए कभी जो नेहरू चुंकिंग तक पहुँचे आज उसी चीन में पूर्ण स्वतंत्रता का पर्दापण होते देख उनके पास एक शब्द भी बधाई का नहीं है। बल्कि उन्हें घबराहट होती है। किसान मजदूर राज्य के हामी नेहरू की यह अनोखी मनोवृत्ति है। विदेशियों पूँजीपतियों और सामंतों की सत्ता को खोदकर उसके मूल में मठा देनेवाले मावसेतुंग , शाबाश यह कहने की हिम्मत उन्हें नहीं। क्योंकि डालर देवता इससे नाखुश होंगे , यही न ? स्टर्लिंग भगवान क्रुध्द होंगे यही न ? अमेरिका और इंगलैंड के सरमायादार बुरा मानेंगे यही न ? गत महायुध्द में तुर्की जैसे देश उदासीन थे। आज वे भी साम्राज्यवादियों के क्रीड़ा क्षेत्र बन चुके। फिर भी भारत समुद्र के मालिक नेहरू तटस्थता का ही स्वप्न देखते हैं। युध्द की दृष्टि से भारत सागर का और भारत का भी बड़ा महत्तव है , खासकर तृतीय महायुध्द की दृष्टि से , जो सीधो साम्यवाद एवं साम्राज्यवाद के बीच होगा और जो भारत की सीमा पर या इसी के पास-पड़ोस में होगा। फिर भी नेहरू सरकार तटस्थ रहेगी। क्या यह भी बात है कि अगला युध्द अटलांटिक या प्रशांत महासागर में होगा ? यह तो कोई सोचता भी शायद ही हो। तब तटस्थता का क्या सवाल ? भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के संबंध में भी जो नेहरू ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से सौदा करने में जरा भी न हिचके और भारत को घुमा-फिराकर ब्रिटेन का उपनिवेश ही बना डाला ; जो नेहरू इसीलिए भारतीय कारखानों का राष्ट्रीयकरण करने से बाज आए कि ब्रिटिश प्रभु रंज होंगे ; छोटानागपुर की खानों की भी जमींदारी मिटाने के सिलसिले में लेने से जिस नेहरू ने इसीलिए मना कर दिया है कि देशी-विदेशी थैलीशाह रंज होंगे वही तटस्थ हैं और बीच का रास्ता चुन चुके , यह कौन मानेगा ?

भेड़िया आया

भेड़िया आयावाली कहानी हम जानाते हैं और यह भी जानते हैं कि आखिर भेड़िया आया कहनेवाले पर भेड़िया का सफल आक्रमण होकर रहा। हमारे शासकों एवं नेताओं की भी आज वही भेड़िया आयावाले की दशा है। जहाँ देखो , सुनो , पढ़ो वे चीखते हैं , कम्युनिस्ट , कम्युनिस्ट , कम्युनिस्ट! हर काम में , हर मौके पर उन्हें कम्युनिस्टों का ही भूत नजर आता है। जो भी संघर्ष का काम है , हक के लिए लड़ने का काम है उसमें उन्हें कम्युनिस्टों का ही हाथ दीखता है। यहाँ तक कि चोरी-डकैती में भी वही देखते हैं। हथियार बंद चोरी-डकैतियों की भरमार है। उस काम के लिए हथियार जुटाने में लुटेरे लोग व्यस्त हैं। फिर भी ऐसे सभी काम कम्युनिस्टों के ही बताए जाते हैं और ' बदनाम करके लटका दो ' के अनुसार कम्युनिस्टों को पीस डालने में सरकार की सारी ताकत लग रही है। खूबी यह कि आमतौर से उनकी पार्टी गैर कानूनी नहीं की गई है। नेहरू के दमन का यह नया रूप है। जितना जोर कम्युनिस्टों के विरुध्द है चोर-डकैतों के खिलाफ वैसा जेहाद बोला गया है क्या ?

हम कम्युनिस्टों के वकील नहीं। वे अपनी वकालत खुद करते हैं , कर सकते हैं ─ जबान से और कामों से भी। वे दूसरों की वकालत चाहते भी नहीं। वे गलतियाँ भी कर सकते हैं ─ करते हैं। लेकिन क्या नेहरू और उनकी सरकार भूलों पर भूलें नहीं करती ? भूलता कौन नहीं ? तो भी मजलूमों की आवाज बुलंद करनान तो भूल है , न पाप। लेकिन जब अंग्रेजों के शासन के समय यही नेहरू मजलूमों की आहों को ऊँची करते थे तो हमारे आका उसे भूल और जुर्म करार देते थे-कहते थे कि यह उनकी आह नहीं है बनावटी चीज है। नेहरू की सरकार भी वही कर रही है। इतिहास तो दुहराया जाता है न ? दिलों को टटोलने की बात है , न कि गुस्सा करने की। जो नेहरू खुद लंबी तनख्वाह लेते , उनके दूसरे संगी-साथी-केंद्र में और प्रांतों में भी-कांग्रेस के कराची के हुक्म को ठुकराकर लंबे-से-लंबे वेतन और भत्तो लेते , जिनके गवर्नर , गवर्नर जनरल तथा विदेश स्थित दूत न सिर्फ लंबी तनख्वाहें लेते , वरन 20-25 हजार से लेकर 50 हजार की मोटरों पर सैर करने में शर्माते नहीं और जिनके लिए विदेशों से अच्छे-से-अच्छे फर्नीचर मँगाए जाते हैं , सारांश जो भारी वेतन , ठाट-बाट और फिजूलखर्ची में ही शान समझते हैं , वही नेहरू 20 रुपए के मासिक वेतन को 60 रुपए और 100 रुपए के 300 रु. करने-करवाने के संघर्ष को जब जुर्म , राष्ट्रीय अपराध और पाप करार देकर कम्युनिस्ट , कम्युनिस्ट चिल्लाते हैं तो लोगों का जी चाहता है कि कम्युनिस्टों को गले लगा लें। जो हड़ताल नेहरू खुद करवाते रहे वही आज जुर्म हो गई है। ठीक ही है ,' ऊधो बनिआए की बात ' है।

मगर नेहरू और उनके दोस्त एक बात याद रखें। उनने जो कम्युनिज्म और कम्युनिस्ट का हौआ खड़ा किया है उससे कम्युनिस्टों का लाभ और उन्हीं की हानि होगी यह ध्रुव सत्य है। वे इस तरह इन चीजों को जनप्रिय बना रहे हैं। जो कल तक कम्युनिस्टों के घोर शत्रु थे उनके दिलों में भी इस धुआँधार दमन और हौवे के करते उनके प्रति हमदर्दी हो रही है , याद रहे। एक जमाना था जब रूस के किसान-मजदूर बोलशेविक और बोलशेविज्म का नाम भी न जानते थे। फिर भी मजलूमों के हकों के लिए जमकर बोलने-लड़नेवालों को जार के कठमुल्ले और मालदार बार-बार यही कहते थे कि यह तो बोलशेविक है। परिणाम यही हुआ कि सभी धीरे-धीरे बोलशेविकों को बहादुर और अच्छे समझ खुद बोलशेविक बन गए। वही बात जब भारत में हो जाएगी तब नेहरू को पता चलेगा।

दमन का तांडव

कम्युनिस्टों की क्या बात ? आज तो किसान-मजदूरों के विरुध्द नग्न दमन का निर्लज्ज नृत्य हो रहा है। सभी प्रांतों में किसान मजदूर और उनके सहस्र-सहस्र सेवक जेलों में सड़ रहे हैं , सीखचों में कराहते हैं , लाठी-गोलियों के निशान बन चुके और बन रहे हैं। यह नंगा नाच न सिर्फ जमींदारों और थैलीशाहों के लठियल करते हैं , खुद जमींदार-मालदार करते हैं , बल्कि सत्ताधारी अधिकारी करते हैं। अकेले बिहार में कितनी औरतें मारी गईं , कितने के पेट से बच्चे चोट खाकर बाहर जा गिरे , कितनी बच्चों के साथ ही सो गईं सदा के लिए , कितने पर लाठियाँ गिरीं और गोलियाँ बरसीं , कौन कहे , कौन गिनाए ? बकाश्त संघर्ष में औरतों को अंग्रेज और उनकी पुलिस छूने से डरती थी। मगर आज नेहरू और श्री कृष्णसिंह की स्वराजी सरकार सब कुछ करती है बेहिचक। इसीलिए , जैसा कि कहा जा चुका है , अब तो संघर्ष का रूप ही बदल गया है। अब तो लाठी-गोली का सामना करनेवाले ही बकाश्त के या दूसरे संघर्ष कर सकते हैं। लेकिन यदि शोषण-शून्य समाज बनाना है , समाज से रोग , भुखमरी , गरीबी को मार भगाना है तो दूसरा उपाय है भी नहीं।

जमीन की कमी और आधुनिक खेती

जमींदारी मिटाने की बात से जो लोग घबराते हैं उन्हें भूलना न चाहिए कि जमीन का एक ही काम है कि मुल्क के सभी लोगों को सुंदर खाना दे और कारखानों के लिए पूरा कच्चा माल पैदा करे। आवश्यकता-भर गेहूँ , बासमती , सागभाजी , फल , मेवे और घी-दूध जब तक न पैदा हो स्वराज्य क्या ? किसान-मजदूर राज्य क्या ? अगर लाखों कारखानों के लिए कच्चा माल न पैदा हो तो मुल्क का काम कैसे चलेगा ? यह भी याद रहे कि गत 70-80 साल के भीतर जनसंख्या 20 करोड़ से 40 करोड़ हो गई। इतने ही साल में 80 करोड़ और डेढ़ सौ वर्ष बाद 160 करोड़ हो जाएगी। तब उतने लोगों को अन्न-वस्त्र कहाँ से आएगा , जबकि आज ही नहीं आता ? यह सबसे बड़ा प्रश्न है और सारे देश इसी के हल करने में लगे हैं। हमें भी यही करना है। जमीन के ऊपर से व्यक्ति विशेष की मिल्कियत हटा कर उसे खेती करनेवालों के हवाले कर देना और उन्हें विश्वास दिला देना है कि खूब अन्नादि उपजाओ , स्वयं डटकर खाओ , पीओ , भोगो और जो बचे उसमें से सरकार को दो-समाज को दो। जमीन की उपज आज से कई गुनी किए बिना काम न चलेगा और यह बात असंभव है जब तक मोटर के हलों से खूब गहरी जुताई , काफी सिंचाई , भरपूर खाद और अच्छे बीजों का प्रबंध सरकार खुद नहीं करती। इसीलिए हमें एक ओर फौरन ऐसी सरकार बनानी है जो किसान-मजदूरों की अपनी हो , जिसका इनके साथ दिली अपनापन हो , जिसे ये समझें कि वास्तव में हमारी है।

दूसरी ओर सभी मिल्कियतों को जमीन के ऊपर से फौरन मिटा देना है , ताकि किसान जमीन को भी सरकार की ही तरह अपनी समझने लगें , यह उनकी अपनी हो जाए। जमीन पर जमींदारों या गैरों का कुछ भी हक रहने पर ऐसा न होगा और जब तक जमीन के साथ किसान का अपनापन न होगा वह उसकी उपज बढ़ाने में अपने खून को पानी न करेगा।

इसी के साथ खेतों की बीचवाली सीमाओं और मेंड़ों को भी मिटा देना है।तभी ट्रैक्टरों से खेती होगी। नन्हे-नन्हे खेतों में ट्रैक्टर चल नहीं सकते। हर गाँव में इन मेंड़ों के मिटाने से पचासों बीघे जमीन और भी निकल आएगी। अगर खाद , सिंचाई , जुताई आदि की पूरी सुविधा होगी तो किसान पैदावार काफी बढ़ाएगा , खासकर जब उसे यह विश्वास हो कि उपज में सर्वप्रथम उसे सपरिवार के सुख के लिए खर्च करनाहै।

किसान और खेत मजदूर

इसीलिए यह सवाल होता ही नहीं कि किसान यदि जमींदारी को मिटाते हैं तो खेत-मजदूर किसानों को भी मिटाएँगे उनकी जमीनें छीनकर। छीनने का प्रश्न होता ही नहीं। जमींदारी तो सिर्फ इसीलिए हटाई जा रही है कि खेती में बाधक है , रोड़ा है , उसके चलते जमीन के साथ किसान का अपनापन हो नहीं पाता। मगर किसान क्यों मिटेगा ? हम तो जमींदार को भी नहीं मिटाते , किंतु उसे भी सुखी बनाना चाहते हैं , पूरे आराम से रखना चाहते हैं। हम सिर्फ जमींदारी मिटाते हैं। तो क्या किसानी मिटाई जाएगी। किसानी तो खेती में साधक है न ? जमींदारी की तरह बाधक नहीं , कि मिटाई जाए। साथ ही किसान तो खुद मजदूर है , खेतों की उपज के लिए दिन-रात काम करता है , फिक्र करता है , चिंता करता है। खेती में कोई हल चलाता , कोई कुदाल ; कोई बैलों को खिलाता ; कोई खेत-खलिहान की रक्षा करता ; कोई खाद-गोबर डालता , कोई दौनी-ओसौनी करता है। इसी तरह सैकड़ों काम हैं। फिर किसान क्यों मिटेगा ? केवल हल चलाने से या किसी एकाध काम से ही तो खेती होती नहीं। और किसान की जमीन छिनेगी कैसे ? वह जाएगी कहाँ ? जो छीनेगा उसका पेट भी बिना उपज बढ़ाए कैसे भरेगा ? जनसंख्या दिनोंदिन बढ़ती जो जा रही है। फलत: सबों को मिलकर सरकार की पूरी मदद से उपज बनाना जरूरी है। इसीलिए किसान और खेत-मजदूर का झगड़ा भी बेकार है। उसकी गुंजाइश है ही कहाँ ? हम तो उन सबों को खेत के मजदूर ही मानते हैं जो खेती से जीते हैं ─ जिनकी जीविका का प्रधान साधन खेती है। वह तो पक्का किसान है जिसके पास किसी प्रकार कामचलाऊ या नाममात्र को ही जमीन है या न भी है , मगर खेती ही जिसकी जीविका का साधन है। हम ऐसों ही को सारी जमीन सौंपना और उन्हीं को समस्त सुविधाएँ देना चाहते हैं। नहीं तो वर्तमान जनसंख्या के होते ही जब फी आदमी कमबेश एक ही एकड़ जमीन खेती लायक है या हो सकती है तो आगे चलकर दिनोंदिन कम ही होती जाएगी। फिर भोजन कैसे मिलेगा ?

सीधा संघर्ष ─ तुम या हम

हम तो पूर्ण स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते रहे हैं जिसमें अंग्रेजों के विरुध्द हमारा नारा रहा है कि तुम रहो या हम-दोनों रह नहीं सकते। वह युध्द अभी जारी ही है। उसका एक पर्व पूरा हुआ है , दूसरा शेष ही है। पूर्ण स्वतंत्रता अभी तक फाँसी पर लटकी ही है। कांग्रेसी नेताओं ने समझौता करके डोमिनिया राज्य से ही संतोष कर लिया , चाहे शब्दाडंबर कुछ भी रखें। फलत: हमें पूर्ण स्वराज्य लेना है और वही किसान-मजदूर राज्य भी होगा। इसीलिए हमें तो इन नेताओं के विरुध्द वही नारा जारी रखना है कि तुम रहो या हम रहें , दोनों रह नहीं सकते। मुखर्जी , चेट्टी , मथाई , सिंह , भाभा , अंबेडकर जैसे लोग , जो सदा कांग्रेस के विरोधी रहे हैं , जब कांग्रेसी मंत्रिमंडल में लिए जाते हैं , सो भी अर्थमंत्री , व्यापार मंत्री , कानून मंत्री , युध्द मंत्री , के पदों पर , तब साफ हो जाता है कि नेहरू कितने गहरे पानी में हैं और उनका किसान-मजदूर राज्य किस धोखे की टट्टी है। भारत को टूक-टूक किया। अब काश्मीर के भी दो टूक करने की तैयारी है। बजट में जो कुछ किया जाता है वह थैलीशाहों के ही लिए। भाषणों में उन्हीं से आरजू-मिन्नत की जाती है , उद्योग-धंधों का राष्ट्रीयकरण न करने के वादे किए जाते हैं। फिर भी किसान-मजदूर राज्य वही लोग लाएँगे ? कभी नहीं। उन्हें तो हटाना होगा। सो भी जल्द। तभी खैरियत होगी।

फिर वही दो दल

15 अगस्त , 1947 के पूर्व दो दल थे-एक शासकों का , दूसरा आजादी के दीवानों का। आज भी वही दो दल हैं , वही दो दल होने चाहिए और दोनों का प्राणपन से वैसा ही संघर्ष चाहिए। हमारा-वामपंथियों का कांग्रेस के साथ हजार मतभेद होते हुए भी उसके साथ हम सभी एक होकर शासकों से लड़ते थे। आज भी हम सभी वामपंथियों को , आपसी भेद के बावजूद भी , मिलकर बेखटके शासकों से लड़ना है , लीडरों से निपटना है। हम सभी चौराहे पर खड़े हैं जहाँ राहें पृथक होती हैं। हमें मिलकर अपनी राह चुन लेनी है। जो इसमें चूकेगा वही किसान-मजदूर राज्य का शत्रु है। शासक हमें आपस में लड़ाकर एके बाद दीगरे सबों को कुचल देंगे , याद रहे। इसलिए उनसे सजग रहें और आपस में हर्गिज न फूटें। हममें हरेक को यही निश्चय करना है। मैंने तो कर भी लिया है। बाकियों से भी क्या यही आशा करूँ ?

जय किसान , जय मजूर

हमने भारत माता की जय , जय हिंद आदि नारे बहुत लगाए। अब समय पलटा है। नारे भी बदले जाएँ। ' जय किसान ', ' जय मजूर ' अब हमारे यही नारे होंगे। ' जो अन्न वस्त्र उपजाएगा , अब सो कानून बनाएगा। भारतवर्ष उसी का है , अब शासन वही चलाएगा ' यही हमारा मूलमंत्र हो। उसी के जाप से हमारी साधना पूरेगी और हमारा लक्ष्य-किसान-मजूर राज्य-प्राप्त होगा। एतदर्थ हमें हर किसान-मजूर स्त्री-पुरुष बालिग को किसान सभा में दाखिल करना होगा , सर्वत्र किसान सभा का जाल बिछाना होगा , गाँव में जो सबसे दबे-दुखिया हैं , मजूरी करते हैं उन्हें अपनाना होगा , उठाना होगा , तैयार करना होगा। अब उन्हीं का युग है। वही साथी बनेंगे , तभी विजय होगी , याद रहे। किसान सभा जिंदाबाद! मजूर सभा जिंदाबाद! किसान-मजूर राज्य जिंदाबाद! जय किसान , जय मजूर!

गया जिले में सवा दो मास

गत मार्च के अंत में ─ 27-28 मार्च , 1949 को ─ नियामतपुर गया में बिहार प्रांत के प्रमुख किसान कार्यकर्ताओं की महत्त्वपूर्ण मीटिंग हुई थी। प्रायः सभी किसान-सेवक उपस्थित थे। उसमें सर्वसम्मत निश्चय हुआ था कि ( 1) जिन्हें किसान-सभा में रहना है वे 30 अप्रैल , 1949 तक कांग्रेस से अलग हो जाएँ ( 2) किसान-सभा राजनीतिक दल के ढंग पर चलाई जाए , जिससे इसमें अनुशासन की पाबंदी सख्ती से की जाए और ( 3) गया जिले के हर एक थाने एवं सबडिविजन के हेड क्वार्टर्स में किसान-सभाएँ तथा किसान रैलियाँ की जाएँ। अनुशासन वगैरा के बारे में नियम बनाने के लिए स्वामी सहजानंद सरस्वती , पं. यदुनंदन शर्मा और पं. रामचंद्र शर्मा की एक उपसमिति भी बनाई गई थी।

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उसी निश्चय के अनुसार 15 अप्रैल , 1949 को पहली मीटिंग औरंगाबाद के दाउदनगर थाने में की गई। वह सिलसिला तभी से चालू था और 20 जून , 1949 को सदर सबडिविजन के फतेहपुर थाने में अंतिम किसान मीटिंग के साथ पूरा हुआ। हमने जिले के कुल 36 थानों में एक को भी नहीं छोड़ा-सर्वत्र मीटिंग कीं ─ कहीं छोटी , कहीं मँझोली और कहीं महती मीटिंग। औरंगाबाद , जहानाबाद , नावादा में विराट किसान रैलियाँ भी हुई , जिनमें 8-10 हजार से लेकर 20-25 हजार तक किसान सम्मिलित हुए। दर्जनों थाना सभाओं में भी 8-10 हजार और इनसे भी अधिक किसान शरीक हुए। गया शहरवाली किसान रैली पीछे की जाएगी।

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गया जिला किसान-आंदोलन का सदा से केंद्र रहा है। फिर भी सामूहिक रूप से समस्त जिले के कोने-कोने में सभाएँ करने का यह पहला प्रयास था। तय था कि इस बार कोई भी कोना छोड़ा न जाए। फलतः कुछ थानों में दो-दोन , तीन-तीन सभाएँ भी की गईं। जिले भर में 50 हजार से कम विज्ञप्तियाँ न बँटीं ─ ऐसी विज्ञप्तियाँ , जिनमें किसानों के वर्तमान नारे और दावे स्पष्ट रूप से लिखे थे , जो बातें हम सभाओं में बोलते थे , वही संक्षिप्त रूप में इन विज्ञप्तियों में अंकित थीं। हजारों पोस्टर भी यही बातें अति संक्षेप में ─ सूत्र रूप से लिखकर छपे और बँटे थे चिपके थे। पाँच-पाँच , सात-सात , दस-दस और कीभी इनसे भी अधिक किसान सेवकों के दल झंडों , गानों और नारों के साथ गाँवों में चक्कर लगाकर इसकी बात का प्रचार करते रहे। औरंगाबाद में तो ' पर्दाफाश ' नाटक भी खेला गया , जिसमें 8-10 हजार दर्शक शरीक हुए।

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इसी प्रकार गया जिले के कम-बेश 10-12 लाख किसानों एवं आम जनता को किसान-सभा का नया संदेश इन सवा दो महीनों के भीतर सुनाया गया। सो भी जमकर संगठित रूप से। खूबी यह कि कहीं भी जनता ने विरोध की एक भी आवाज न उठाई। यहाँ तक कि कांग्रेस के नए मुखिया लोग भी ' सटकसीताराम ' रहे। उन्हें भी हिम्मत न थी कि जुबाँ खोलें ─ चूँ करें। हालांकि समूचे प्रचार और सभी सभाओं में कांग्रेस एवं उसके कर्णधारों की कड़ी-से-कड़ी आलोचना खुल के की गई। हमने खासकर दो बातों पर सर्वत्र जोर दिया ─ कांग्रेस को तोड़ दो और गद्दीधारी नेता गद्दी छोड़ दें। बेशक इन दो प्रमुख नारों की पूरी पृष्ठभूमि भी हमारे प्रचारों और भाषणों में निरंतर की गई , जिससे वे सबों की समझ में आसानी से आ सकें और सबने इनकी महत्ता , इनकी आवश्यकता एवं सामयिकता इनका औचित्य हृदयंगम कर लिया।

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हमारी सभी सभाओं की विशेषता यह थी कि इनमें अधिकांश खेत-मजदूर और टुटपुँजिए किसान शरीक हुए। फटे-टूटे चिथड़े , मैले-कुचैले कपड़े और लँगोटी पहननेवाले काले-कलूटे अन्नदाताओं ने इस बार विशेष रूप से भाग लिया। वे हमारे भाषणों और गानों को गोया चुपचाप पीते रहे हैं। बड़े चाव एवं प्रेम से हमारी बात वे सुनते रहे हैं। हमारे शब्द ठेठऋ उनके दिल-दिमाग में घुस जाते हैं , ऐसा मालूम पड़ता रहा है। हमने देखा कि बातें सुनते-सुनते उनके चेहरे खिलते थे। गोया , सभी बातें उनके दिल की ही कही जाती थीं। हमने यह भी अनुभव किया कि वास्तविक किसान , असली शोषित-पीड़ित जनता जग चुकी और जग रही है करवटें बदल रही है और आँखें खोल चुकी है ─ वही जनता जो महारूद्र का महातांडव करती है। भूकंप और प्रलय मचाती है , इनकिलाब और क्रांति करती है। ऐसा लगा कि उसका दिल कह रहा है कि कुछ निराली बात करनी है। जिसका संदेश सुनानेवाले आ रहे हैं , चलो और संदेश सुनो।

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जब हमने आज से सवा दो मास पूर्व यह महान एवं पवित्र कार्य शुरू किया , तो खूब समझ-बूझकर कि देहातों में सभाएँ करनी हैं लगन और विवाह का दिन है। खासकर तपिश और लू का सामना करना है , खासकर गया की लू का , बरसात भी सर पर थी , खेती-गिरस्ती के दिन आ चुके थे और किसानों को बारिश के पूर्व अपने झोंपड़ों तथा घरों की मरम्मत भी करनी थी। फिर भी हम आगे बढ़े और आत्मविश्वास एवं हिम्मत के साथ आगे बढ़े। इहसान नाखुदा का उठाएँ मेरी बला। कश्ती खुदा पे छोड़ दूँ , लंगर को तोड़ दूँ। को हमने सामने रखा। कुछ धुनी साथियों को लेकर हम और श्री यदुनंदन शर्मा ने तूफानी समुंदर में अपनी कश्ती डाल दी , मस्ती के साथ बिना पतवार और मल्लाह के ही नाव को झकोरों और लहरों के बीच खेलने दिया और अंत में लहराते झंडों के साथ पार उतरे और किनारे लगे।

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जिन्हें थानों की मीटिंगों के लिए प्रचार का भार सौंपा ऐसे कुछ साथी अपनी ड्यूटी में बुरी तरह चूके सो भी अपनी लापरवाही एवं गैर-जवाबदेही के चलते। वे थाने में गए तक नहीं। कुछ ऐसे थे , जो गए जरूर और कुछ काम भी प्रचार का कर सके , मगर पीछे किसी मजबूरी से बैठे रहे। मजबूरी वालों में कुछ बीमार पड़े और कुछ गर्मी तथा लू के चलते अलसा गए फिर भी हमारा काम चलता रहा। हमारा कारवाँ आगे बढ़ता ही गया। हमने एक भी थाना न छोड़ा। हमें , श्री यदुनंदन शर्मा , त्रिवेणी सुधाकर और हलधर को तो न बीमारी पूछती थी , न लू , न थकावट और न घबराहट और न निराशा ही। हम मस्ती से यकीन के साथ आगे बढ़ते ही गए। हालत यह थी कि जिस थाने में कोई समाचार पहले से न हो सका था , वहाँ भी बात-ही-बात में हमने हजारों की हाँ , हजारों की सुंदर मीटिंग कर ली। दृष्टांत के लिए बोध गया और अतरी को ले सकते हैं। यहाँ 12 और 24 घंटों में सुंदर सभाएँ हो गईं , हालाँकि पहले खबर भी न पहुँच सकी थी कि हम आ रहे हैं। अगर गुरू गोविंद सिंह को दो-तीन साथियों के बल पर काया पलट की , तो श्री यदुनंदन शर्मा को भी ऐसे ही दो-चार साथी मिले हैं।

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नेताओं से जनता को बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं , लीडरों ने बड़ी-बड़ी बातें जो की थीं। और जनता तो नेताओं का विवेचन-विश्लेषण मार्क्सवादी ढंग से कर पाती नहीं। फलतः उसने लीडरों की बातें अक्षरशः , सही मानी थी। मगर जब आज देखती है कि हजार में एक बात भी पूरी न हो रही है , तो उसे सहसा खयाल होता है कि सब किया-कराया बेकार गया। इसी को अंग्रेजी में ' सेंस ऑफ फस्टेशन ' कहते हैं। जनता की यह दशा है इसी से उसे गुस्सा भी है। वह सारी शैतानियत और वादाखिलाफी उखाड़ फेंकने की ओर आप-से-आप झुक रही है। कोई शक्ति उसे इस ओर बलात घसीटती-सी है। हमें यह अनुभव हुआ। अतः हमने समझा कि यही तो सुनहला मौका है कि जनता को आज क्या करना है। यह सिखाया जाए। यदि क्रांतिकारी ताकतें इस मौके पर चूकेंगी , तो बुरा होगा। उनको आज ही जरूरत है कि किसान-मजूरों के बीच धूनी रमाएँ नहीं तो जनता उन्हें भी न छोड़ेगी। याद रहे जनजागरण का जो स्त्रोत अपने-आप फूट रहा है। चालू हो रहा है उसे जल्द-से-जल्द तेज और विकराल बना देने में हम सबों को अविलंब लग जाना है , ताकि वह मार्ग की चट्टानों और शिलाओं को चीरता-फाड़ता-रौंदता हुआ अबाध द्रुतगति से आगे बढ़े तथा लक्ष्य तक पहुँच के ही दम लें।

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हमें इस तूफानी दौर में बहुतों को देखना था कि कौन कहाँ तक साथ देगा। सबसे पहले किसान-मजूरों एवं जनसाधारण की नब्ज देखनी थी। वह तो चुस्त मिली। तो साथ ले चलनेवालों की प्रतीक्षा में है।

अपने पुराने साथियों को भी देखना था कि वे किस घाट पर लगेंगे। हमें खुशी है कुछेक को छोड़कर सभी उत्साह से हमारा साथ आए। जिनकी हमें आशा न थी , वे ही आए। यह ठीक है कि लंबी दौड़ में वे अंत तक डट न सके-उन्हें थकान आ गई। यह स्वाभाविक भी है। हमार विश्वास है , ऐसी ही धूल , धूप और सरपट में एक-दो बार और भी गोते जाने पर वे सब नहीं , अधिकांश इस्पात हो के निकलेंगे। उन्हें इस फौजी अनुशासन में नौ हफ्तों तक अविराम चलने का पहला ही मौका था। फिसलन काफी थी। फलतः पाँव खिसक जाना स्वभाविक था। मगर वे न भूलें कि जनता बेमुरव्वती से अपने सेवकों से हिसाब माँगती है और जरा सी भूल पाकर लटका देती है ─ खासकर किसान-मजूर जनता। ' सेवक धर्म कठोरा ' यह एक सत्य भी है। सेवक भी बने और मजा भी लें , यह होने को नहीं।

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आखिर में हमें औरंगाबाद के अपने राजपूत साथी को भी देखना था कि उसमें थकान तो नहीं है। हमें खुशी है कि वह तो राजपूती ढंग से आगे बढ़ना ही जानता है। प्रलोभन और विघ्नबाधाएँ उसे और भी सजग , कर्त्तव्यपरायण एवं मौत से खेलनेवाला बना रही है। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है , त्यों-त्यों उसकी यह अनोखी राजपूती अपना कमाल दिखाती नजर आती है। ढलती उम्र में भी वह कुमार ही है। सारी शक्ति लगाकर किसान-मजूरों की सेवा में अपने को उत्सर्ग कर देने की उसकी तमन्ना ने हमें बाग-बाग कर दिया।

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इस अपनी सरकार में मीटिंग जैसे नागरिक अधिकार पर चौबीस घंटे , तीस दिन और बारह महीने कितनी जंजीरें सख्ती से लगी हैं यह भी हमने सवा दो महीने में दर्द के साथ अनुभव किया। न तो कोई असाधारण स्थिति है , न दंगे या युळ का समय है। फिर भी , हम मीटिंगें कर नहीं सकते। जब तक दारोगा , इंस्पेक्टर , एस. पी. और कलक्टर के पास क्रमशः दरबार करके आज्ञा न लें। आज्ञा तो हमें बेशक मिली। जिले के अधिकारियों ने कोई बाधा न डाली। उनने कभी-कभी निहायत जरूरी में ही हमें आज्ञा दे दी। मगर नीचे से ऊपर तक यह शिष्टाचार और यह विधि-विधान हमें बुरी तरह खटका। इसने रह-रह के याद दिलाया कि यह आजादी कैसी खोखली है और असली आजादी से हम कितने दूर हैं। यह ' अपनी सरकार ' भी कैसी गजब की है। हमने इसी दरम्यान देखा। शासन का कर्ज इसे ही कहते हैं , जो कांग्रेसी शासकों पर सवार है। देखें , उसकी दवा कब , कैसे , कौन करता है ?

उद्धरण

हमारा बादशाह किसान-मजदूर ─ हम किसी को बादशाह नहीं मानना चाहते। हमारा बादशाह किसान-मजदूर है। जिसकी कमाई से बासमती, गेहूँ, दूध-घी, चीनी-शक्कर, कपड़े और हमारे आराम की तमाम चीजें तैयार हों, वही तो हमारा बादशाह है। हमारा बादशाह दूसरा कौन? जिस बादशाह की कमाई हम खाते हैं, उसी की सरकार हम अपने मुल्क में चाहते हैं।

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हम व्यक्तिगत राज नहीं चाहते ─ हम क्रांति चाहते हैं, पर किसी का व्यक्तिगत राज होना हम नहीं चाहते। हम किसान-मजदूर राज चाहते हैं। इनकिलाब के मानी अराजकता नहीं, लूट नहीं। इसमें हम कम-से-कम जान माल का नुकसान कर किसान-मजदूर-राज स्थापित करना चाहते हैं।

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अपने कब्जे की बकाश्त मत छोड़ो ─ जो बकाश्त जमींदार अपने हल-बैल से करता है, उस पर मत जाओ। प्रांत भर में कुल 20 लाख एकड़ बकाश्त है। उनमें 19 लाख एकड़ किसान जोतते हैं और 1 लाख एकड़ जमींदार। इस 1 लाख के संबंध में कुछ नहीं सोचो─19 लाख एकड़ पर अपना कब्जा न छोड़ो। उस पर मर जाओ; पर उससे बेदखल न होओ। हम जमींदारों से कह देना चाहते हैं कि यदि वे गड़बड़ी करेंगे, तो उनकी 1 लाख एकड़ भी चली जाएगी।

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किसान-मजदूरों को क्या मिला ? ─ कहा जाता है, अपनी सरकार बन गई, अंग्रेज चले गए लेकिन किसान और मजदूरों को क्या मिला? आज सरकार की सारी ताकत जमींदारों के लिए, पूँजीपतियों के लिए सारी सहूलियतें मुहैया करने में लगी है, उनके लिए सरकार की पूरी तैयारी है पर उन किसान-मजदूरों को क्या मिला, उनके लिए कौन-सी सरकारी तैयारी हो रही है, जिनके बल पर सरकार बनी और कायम है?

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जमींदारों के एक पैसा भी नही ─ अगर हमारी चले, तो हम पलक में किसानों को जमीन का मालिक बना दें। जमींदार को जमींदारी के बदले में एक पैसा भी नहीं मिलना चाहिए। अगर जमींदारों को पैसा देंगे, तो दो सौ वर्षो से अंग्रेज इस मुल्क में रहे, इसके लिए भी हमें उन्हें पैसा देना चाहिए। जमींदारों ने बहुत मौज कीं, किसानों को लूट कर अपने को मालोमाल किया। अब मुआविजा कैसा? हमारे नेता कहते हैं, हमने चुनाव-घोषणा में वादा किया है कि जमींदारी को हासिल करेंगे, इसलिए मुआविजा देना वाजिब है। चुनाव-घोषणा में किसानों और मजदूरों के साथ भी बहुत वादे किए गए थे, परंतु आज उनमें एक को भी पूरा नहीं किया जा रहा है। आज किसानों के स्वार्थों के साथ, उनके सवालों के साथ, उनकी माँगों के साथ मखौल किया जा रहा है। आज भावली से नकदी करने में क्या हो रहा है, जमींदारी उठाने में क्या हो रहा है? आबपाशी के लिए क्या किया जा रहा है?

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यह सरकार मालदारों की है ─ 5 अगस्त के बाद राज कायम हुआ है, उसमें बिड़ला, डालमियाँ, टाटा, सिंघानियाँ को कारखाना खोलने में सहूलियत मिलेगी किसानों और मजदूरों को कोई सुख-सुविधा नहीं मिल सकती। यह सरकार मालदारों की है, जमींदारों की है। आज उन्हीं की मनमानी-घरजानी है, उन्हीं का बोलबाला है। मजिस्ट्रेट और पुलिस उन्हीं के इशारे पर नाच रहे हैं और किसानों और मजदूरों पर जुल्म और सितम ढा रहे हैं।

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जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा , अब सो कानून बनाएगा ─ कांग्रेस के लोग तो किसानों के चिंतकों से भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं। आपने देखा, उन्होंने असेंबली में किन लोगों को भेजा?─सिर्फ जमींदारों या उनके पिट्ठुओं को। किसानों की बात बोलनेवाला कहाँ कौन है? जहाँ ऐसी असेंबली है, वहाँ किसानों का खुदाहाफिज। अब असेंबली में भेजनेवालों में छँटैया करने के बाद कहीं किसानों और मजदूरों की असेंबली बनेगी। अब ऐसे आदमियों को वोट दो, जिनके कंधे पर हल और हाथ में कुदाल है। अब सिद्धांत बना लो कि जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा? अगर ऐसा आदमी कानून बनाएगा और गड़बड़ करेगा, तो उसे कान पकड़ कर दो तमाचे भी लगा सकोगे, परंतु आजकल के एम. एल. ए. लोगों की तो शक्ल भी देखने में नहीं आती।

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समझौते की नीति से सब चौपट ─ हमारे नेताओं की समझौते की मनोवृत्ति ने सारा गुड़ गोबर कर दिया। हमारे जैसे लोग बराबर विदेशी हुकूमत से लड़ कर स्वराज हासिल करने पर जोर देते थे, पर सुनता कौन है? हमने हिंदुस्थान को दो हिस्सों में विभाजित करने का सदा विरोध किया, पर हमारे नेताओं ने हमारी एक भी न सुनी। उनका कहना था कि दंगे और खून-खराबी रोकने के लिए हिंदुस्तान का बँटवारा होना जरूरी है। मैं पूछता हूँ कि आज जो सांप्रदायिक दंगे, खून-खराबी और औरतों की बेइज्जती हो रही है, उससे ज्यादा पहले कभी हुई?

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स्वराज या पुलिसराज ? ─ लोग कहते हैं कि स्वराज आ गया; परंतु स्वराज नहीं यह तो पुलिसराज है। एम.एल.ए. का राज है। पुलिस जो चहती है, कर रही है। पुलिस का रवैया तो पहले से खराब है, उसकी धाँधली तो दिन-प्रतिदिन बढ़ ही रही है। एम.एल.ए. जो चाहते हैं, कर रहे हैं। उन्हें लोकमत की कोई परवाह नहीं है। लोग कहते हैं कि मैंने किसानों से कहा था कि कांग्रेस के उम्मीदवारों को वोट दो, ठीक है, मैंने ऐसा कहा था, परंतु कब? जब अंग्रेजी हुकूमत यहाँ थी और उसको हमें मार भगाना था। उस समय यदि कांग्रेस की हार होती, तो अंग्रेजों के खिलाफ जो हमारा मोर्चा था, वह कमजोर होता और अंग्रेजों की जड़ इस मुलक में मजबूत होती। परंतु अब तो 15 अगस्त के बाद यह बात नहीं रही। अब तो कांग्रेस ने अपना काम कर लिया। अब तो उसे मुक्ति मिलनी चाहिए।

संयुक्त वामपक्षी मोर्चे की स्थापना पर वक्तव्य

भारतीय जनता को विश्वास दिलाया गया था कि 15 अगस्त, 1947 से वह आजाद हो रही है। मगर अब उसका यह विश्वास टूटने लगा है। इस तथाकथित आजादी से उसे मिला है चीजों का बढ़ता हुआ अकाल, बढ़ती हुई महँगाई, मजदूरी और तनख्वाह की कमी, बढ़ती हुई बेरोजगारी, चारों ओर फैला हुआ चोर बाजारी का जाल, हर जगह खूनी सांप्रदायिक दंगे, और हर तरह का कष्ट, अभाव और बरबादी। राजनीतिक क्षेत्र में, जनता को नागरिक अधिकारों पर गहरा हमला किया गया है; हर प्रांत में राजनीतिक कार्यकर्ता बिना मुकदमा चलाए जेलों में बंदकिए जा रहे हैं, शांत जुलूसों और प्रदर्शनों पर गोलियों का चलाना रोजमर्रा की बात हो गई है। लोग जनता के हकों के लिए लड़ने के कारण जेलों में डाल दिएगए हैं और जनता के संगठनों को घोर दमन का शिकार बनाया गया है।

भारतीय संघ और पाकिस्तान की तथा विभिन्न प्रांतों की सरकारों ने, जिनकी बागडोर कांग्रेस और लोगों की नेताशाही के हाथ में है, वादा किया कि वे मजदूरों और कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी दिलाएँगे, किसानों को भूमि देंगे, चोर-बाजारी के खिलाफ जेहाद बोलेंगे, शासन की मशीन तथा पुलिस-फौज का आजादी के आधार पर पुनर्गठन करेंगे और तीव्र गति से देश की सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए अनुकूल हालत पैदा करेंगे। मगर जनता के प्रति अपने इन वादों को नेताओं ने त्याग दिया है। इन वादों को पूरा करने के बदले वे पूँजीपतियों, चोरबाजारियों और सामंती मुफ्तखोरों का हित साधन कर रहे हैं। वे मजदूरों का पेट काटने, चोर-बाजार की कानूनी स्थिति देने, मुख्य उद्योगों का राष्ट्रीकरण करने से इन्कार करने आदि की नीति पर चल रहे हैं। वे देशी नरेशों को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं और इस प्रकार रियासती जनता के संघर्ष को धक्का लगा रहे हैं। जोतनेवालों को जमीन देने से इन्कार कर वे जमींदारों और दूसरे सामंती वर्गों को खुश करने की नीति पर चल रहे हैं। उन्होंने शासन की पुरानी मशीन को बरकरार रखा है और देश में वही पुलिस-पलटन और नौकरशाही कायम है। वे विधान-परिषद में एक ऐसा विधान तैयार कर रहे हैं। जिसका तत्व जनविरोधी है और जिसमें विदेशी और देशी पूँजीपतियों को पूर्ण मुआवजे का अधिकार प्रदान किया गया है, शासन विभाग को असाधारण अधिकार दिएगए हैं, प्रांतीय स्वराज्य में बहुत बड़ी कमी की गई है और जनता को केवल लंबी मुद्दतों के बाद वोट देने का हक दिया गया है।

नेताओं ने साम्राज्यशाही से लड़कर आजादी छीन लेने से इन्कार किया और ब्रिटिश साम्राज्यशाही से समझौता कर लिया है। इसी का नतीजा है कि देश में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमें लाखों जनता को भय, मुसीबत और बरबादी का सामना करना पड़ा मगर लीग के नेता जो संप्रदायवाद के समर्थक हैं, और कांग्रेस के नेता जो राष्ट्रीयता की दुहाई देते हैं, दोनों ही ने संप्रदायवाद से लड़ने के बदले संप्रदायवादी प्रतिगामियों को खुश करने की नीति अपनायी है। नेताशाही के अधिक जोरदार अंग ने स्वयं संप्रदायवादी और हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच युध्द का प्रचार कर दंगों को बढ़ावा दिया है।

विदेशी शासन से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने की कोशिश करने के बदले भारतीय संघ और पाकिस्तान की सरकारें कांग्रेस और लीगी नेताशाही के नेतृत्व में विश्व साम्राज्यवाद की पिछलग्गू बन गई है। उन्होंने विदेशी पूँजी की आर्थिक सत्ता बरकरार रखी है, विदेशियों से राष्ट्र के लिए अपमानजनक व्यापारिक संधियाँ की हैं और साम्राज्यवादी सरकारों के साथ सैनिक गठबंधन करने के लिए दाँव-पेंच खेले हैं और इस प्रकार अमरीकी-ब्रिटिश साम्राज्यशाही की पिछलगुआगीरी की है। हाल की घटनाओं से यह भी पता चलता है कि युध्द छिड़ने की हालत में वे अमरीकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादी गुट में शामिल होने की ओर कदम बढ़ा रही हैं, जिसका नतीजा देश की जनता की भयानक बरबादी होगा।

आज के भारत की यही तस्वीर है। कांग्रेस और लीग की नेताशाही के नेतृत्व में वह स्थिर स्वार्थ वर्ग के हाथों की कठपुतली है और अमरीकी-ब्रिटिश साम्राज्यशाही के दामन में बँध गया है। इस स्थिति में दुनिया में पूँजीवाद के तीव्रतर होते हुए संकट के असर से जनता की हालत और भी खराब होने का सामान मुहैया है। भारतीय संघ और पाकिस्तान की पूँजीवादी नेताशाही उसे अकाल, बढ़ती हुई महँगी, चीजों का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ अकाल, मजदूरों और कर्मचारियों की आम छँटनी, दमन का राज और सांप्रदायिक दंगों के नए दौर की खंदक की ओर घसीट रही है। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा नेताशाही या सरकार न तो जनता को इस खंदक की ओर जाने से बचा सकती है न बचाना चाहती है। मुल्क को इस बरबादी और सत्यनाश से बचाने और साम्राज्यशाही की मातहती से छुड़ाने के लिए मौजूदा सरकार को हटाना ही पड़ेगा और उसकी जगह ऐसी सरकार बनानी पड़ेगी जो कि शोषित जनता के अधिकारों की रक्षा करेगी। सरकार के निर्मम हमलों और दमन के बावजूद जनता का असंतोष और बेकारी बढ़ रही है और विभिन्न अंगों का संघर्ष और आंदोलन जोर पकड़ रहा है। मजदूरों की हड़तालें, व्यापक किसान आंदोलन, रियासती जनता के तूफानी आंदोलन, दमनकारी कानूनों के खिलाफ जनता के विशाल प्रदर्शन, मध्यमवर्गी कर्मचारियों और विद्यार्थियों की लड़ाइयाँ और कांग्रेसी तथा लीगी जनता में उठती हुई उथल-पुथल-ये सभी इस बात के स्पष्ट चिद्द हैं कि क्रांतिकारी शक्तियाँ मजबूत हो रही हैं और उनको मिल-जुलकर और एक स्वर तथा एक ताल पर चलकर आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

संयुक्त वामपक्षी मोर्चा

इस सम्मेलन में मौजूद उग्रदली पार्टियों के प्रतिनिधि इस आवश्यकता को महसूस करते हैं और आज इस जगह इस ऐलान के जरिए''संयुक्त उग्रदली मोर्चा'' बनाने का निश्चय करते हैं। यह मोर्चा ऊपर बतलाए संघर्षों को पूर्ण स्वतंत्रता और समाजवाद की प्राप्ति के लिए एक आम और व्यापक संघर्ष का हिस्सा समझ कर और भी आगे बढ़ाएगा और तेज करेगा।

सांप्रदायिक दंगों, भारत-पाकिस्तान के बीच युध्द के प्रचार, छंटनी और तनख्वाह की कटौती, सरकार के दमनकारी कानूनों, राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस और उस जैसी अन्य संस्थाओं के जरिए पूँजीवादी वर्ग की जन-संगठनों में फूट डालने और उन्हें कमजोर करने की कोशिशों तथा मजदूरों और किसानों की माँगें और आवश्यकताएँ पूरी किए बगैर औद्योगिक और कृषि मोर्चों पर शांति रखने के नारे के खिलाफ तत्काल और संयुक्त आंदोलन छेड़ कर के ही यह उग्रदली मोर्चा बनाया और बढ़ाया जाएगा। यह मोर्चा देशी रियासतों में सच्चे जनवादी सुधारों और मजदूरों, किसानों और दूसरे मेहनतकश लोगों के हक के लिए आंदोलन करेगा। इस मोर्चे को तैयार करने के लिए भारतीय संघ और पाकिस्तान में प्रतिक्रियावादी नेताशाही की नीति का लगातार पर्दाफाश करना होगा।

यह मोर्चा भारतीय संघ और पाकिस्तान के अंदर काम करनेवाले साम्राज्य-विरोधी कांग्रेसजनों और लीगियों के संघर्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण समझता है। यह मोर्चा सबके समान हितों के सवालों पर होनेवाले संयुक्त प्रदर्शनों में इन साम्राज्य विरोधी लोगों को लाने की कोशिश करेगा और प्रतिक्रियावादी नेताओं के असर से अपने को छुड़ाने में उनकी मदद करेगा।

इस मोर्चे का उद्देश्य मौजूदा सरकारों के बदले शोषित जनता की हित-रक्षा करनेवाली सरकारें कायम करना होगा। यह मोर्चा नीचे से, मेहनतकश जनता की एकता और संगठन, और उनके पीछे सभी उग्रदली पार्टियों और प्रगतिशील अंगों के संयुक्त प्रयत्नों के जोर से बनी जन-संगठनों की एकता के जरिए तैयार होगा, फैलेगा और मजबूत होगा।

कार्यक्रम

यह "संयुक्त उग्रदली मोर्चा'' नीचे लिखे कार्यक्रम के आधार पर तैयार किया जाएगा-

1. पूर्ण स्वतंत्रता-ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध-विच्छेद और सभी ब्रिटिश फौजों और अफसरों को यहाँ से विदाई।

2. सभी ब्रिटिश और विलायती आर्थिक हितों की जब्ती, जिनमें बैंक, बीमा कंपनियाँ, मिल-कारखाने, बागान, खान आदि सम्मिलित हैं। अमरीकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादी राष्ट्र-समूह से कोई समझौता नहीं किया जाए।

3. शासन की मशीन और सेना को पूरी तरह जनवादी बनाया जाए। नौकरशाही का खातमा किया जाए।

4. जनता को हथियार दिया जाए और एक जनता की स्वयंसेवक सेना संगठित की जाए।

5. जनवादी विधान बनाया जाए जिसका आधार भाषा और संस्कृति की बुनियाद पर बनी इकाइयों का─यदि ऐसी इकाइयाँ हों─आत्मनिर्णय का अधिकार होगा जिन्हें अलग होने का भी अधिकार रहेगा। सबकी इच्छा के आधार पर एक भारतीय संघ की स्थापना हो तथा सभी बालिगों को वोट का अधिकार और सानुपातिक प्रतिनिधित्व रहे।

6. सभी दमनकारी कानून रद्द किए जाएँ। सभी राजबंदी, जिनमें किसानों, मजदूरों और जनता के अन्य वर्गों की लड़ाइयों के सिलसिले में सजा पाए या नजरबंद लोग भी हैं, रिहा किए जाएँ। देश में पूर्ण शहरी आजादी, जिसमें भाषण, सभा और प्रेस की स्वतंत्रता शामिल है, कायम हो।

7. देशी रियासतों में रजवाड़ों का खातमा किया जाए और एकतंत्र के खिलाफ रियासती जनता की लड़ाइयों की मदद की जाए।

8. अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की जाए, उनकी संस्कृति, भाषा और रोजी-रोटी के हकों की हिफाजत के लिए कदम उठाए जाएँ, तथा सांप्रदायिक भेदभाव और दंगों के खिलाफ जेहाद बोल दिया जाए। भारतीय संघ और पाकिस्तान के बीच दोस्ताना संबंध कायम किया जाए। सरकारें सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए जो भी सही कदम उठाएँ उनका समर्थन किया जाए; साथ ही─साथ सांप्रदायिक प्रतिक्रियावादियों को खुश करने की नीति का डटकर पर्दाफाश किया जाए।

9. जमींदारों के हर रूप का और इसी के समान दूसरी व्यवस्थाओं का बिना मुआवजे के खात्मा किया जाए। जोतनेवालों को जमीन दी जाए। किसानों के सभी कर्ज रद्द किए जाएँ। खेती के लिए सरकार की ओर से बैंक खोले जाएँ और किसानों को सस्ती दर पर कर्ज दिया जाए।

10. बिना मुआवजा दिए सभी मुख्य और बुनियादी उद्योगों और प्रधान राष्ट्रीय साधनों का राष्ट्रीकरण किया जाए।

11. चोर-बाजारी और मुनाफाखोरी को खत्म करने के लिए जोरदार आंदोलन छेड़ा जाए। पूरी और उचित खुराकबंदी और मूल्य-नियंत्रण की व्यवस्था जारी की जाए।

12. काम के घंटे हफ्ते में 40 हों, जीवन-निर्वाह योग्य तनख्वाह की एक कम-से-कम दर तय कर दी जाए, सबको रोजगार पाने का हक हो, और सबकी नौकरी पक्की हो। हड़ताल, पिकेटिंग और यूनियन बनाने का हक मिले।

13. हर नागरिक को मुफ्त शिक्षा दी जाये और सबके लिए मुफ्त इलाज और स्वास्थ्य-रक्षा के आम साधनों का प्रबंध हो।

पहला काम

इस सम्मेलन का दृढ़ विश्वास है कि संयुक्त उग्रदली मोर्चे को मजबूत बनाने के लिए पहला काम जो सबसे जरूरी है, वह यह है कि मेहनतकशों और जनता के जनसंगठनों को एक किया जाये और उन्हें मजबूत बनाया जाए। इसलिए यह निश्चय किया जाता है कि─

1. अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस को ट्रेड यूनियन का एकमात्र केंद्र बनाया जाए और सभी पार्टियाँ उसको ''राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस'' तथा ''सोशलिस्ट ट्रेड यूनियन सेंटर'' के फूटवादी हमलों से बचाएँ और मजबूत करें। इस सम्मेलन में भाग लेनेवाली पार्टियाँ ट्रेड यूनियन कांग्रेस में पूर्ण ऐक्य बरतें और अपने मतभेदों को आपसी समझौते से सुलझावें।

2. एक ही किसान सभा हो जिसमें सम्मेलन में शामिल सभी पार्टियाँ मिलकर मित्रतापूर्वक काम करें। शामिल पार्टियों के किसान प्रतिनिधि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए रास्ता निकालने के लिए जितनी जल्दी हो मिलें।

3. एक ही संयुक्त विद्यार्थी संगठन हो। पिछले साल कायम ''विद्यार्थी एकता-बोर्ड'' से इसके लिए अनुरोध किया जाता है कि एक एकता सम्मेलन बुलायें और विभिन्न विद्यार्थी संगठनों को मिलाकर एक करने के लिए जरूरी कदम उठावें।

सम्मेलन में शरीक सभी पार्टियाँ इकरार करती हैं कि एकता की रक्षा के लिए वे किसी भी संयुक्त सभा या प्रदर्शन में एक दूसरे की आलोचना या एक-दूसरे पर छींटाकशी न करें और उनका प्रचार ''संयुक्त उग्रदली मोर्चे'' के फैसले और कार्यक्रम के दायरे में सीमित रहेगा।

अलग-अलग हर पार्टी को जनता के सामने अपना पूरा कार्यक्रम पेश करने की आजादी रहेगी लेकिन इस आजादी में संयुक्त मोर्चे के कार्यक्रम की आलोचना नहीं शामिल है। एक-दूसरे की आलोचना केवल राजनीतिक सतह पर ही की जा सकेगी-व्यक्तिगत दोषारोपण, द्वेषपूर्ण आरोप, किसी की नीयत के बारे में कीचड़ उछालनी और तथ्य को तोड़ना-मरोड़ना आदि बातें बिलकुल नहीं होनी चाहिए।

प्रांतीय एकीकरण कमेटियाँ

संयुक्त उग्रदली मोर्चे की तात्कालिक जरूरत चूँकि विभिन्न प्रांतों और रियासतों में संयुक्त प्रचार और आंदोलन की नींव डालना है इसलिए मोर्चे के कार्यक्रम को फौरन अमल में लाने के लिए, आपसी मतभेदों को तय करने के लिए, और जन-संगठनों के कामों को एक करने के लिए प्रांतों में ''उग्रदली मोर्चा एकीकरण कमेटियों'' का निर्माण किया जाएगा। इन कमेटियों में यहाँ उपस्थित पार्टियों के प्रतिनिधि (और दूसरी पार्टियों और जन-संगठनों के, जब वे मोर्चे में प्रवेश करेंगे) होंगे।

एकीकरण कमेटियों में जो फैसले किए जाएँगे सबकी राय से। फैसले ऐसे नहीं होंगे जो जन-संगठनों द्वारा उनके विधान के अनुसार अमल में न लाए जा सकें।

केंद्र में इस वक्त केवल एक संयोजक रहेगा जो कि जरूरी समझने पर या शरीक पार्टियों में एक चौथाई की माँग पर सभी शरीक और आगे शरीक होनेवाली पार्टियों और संगठनों की बैठक बुलाएगा।

हमें इस बात का दुख है कि इस सम्मेलन में दो-एक उग्रदली पार्टियाँ मौजूद नहीं हैं। उग्रदली मोर्चे का काम किसी पार्टी या संगठन के लिए रुका नहीं रह सकता। मगर उसका दरवाजा हमारे कार्यक्रम को माननेवाली हर पार्टी और संगठन के लिए सदा खुला रहेगा और हम उनका हृदय से स्वागत करेंगे। हमें यह ऐलान कबूल है।

(1) स्वामी सहजानंद सरस्वती, (2) सोमनाथ लाहिड़ी (हिंदुस्तानी कम्युनिस्ट पार्टी), (3) राजदेव सिंह, प्रधानमंत्री, सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, (4) यमुना कार्यी, प्रधानमंत्री, बिहार प्रांतीय किसान सभा, (5) शीलभद्र यात्री, प्रधानमंत्री अखिल भारतीय फारवर्ड ब्लाक; (6) ओंकार नाथ शास्त्री, प्रधानमंत्री, रिवाल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया (त्रात्स्कीवादी, चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय), (7) रामचंद्र राय, बोलशेविक पार्टी, ऑफ इंडिया 22 डी.एन. सेन लेन, काशी, पो.ठ कुरिया, कलकत्ता; (8) अजित राय, बोलशेविक लेनिनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया पो. 913, संचार एवेन्यु, कलकत्ता 13; (9) मुघींद्र नाथ कुमार, रिवाल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, 5-1 राममय रोड, कलकत्ता; (10) सुशील भट्टाचार्य, रिवाल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी; (11) साधन गुप्ता, हिंदुस्तान खान मजदूर संघ (12) जीवन लाल चटर्जी, डिमोक्रेटिक वैनगार्ड, (13) पंकज कुमार दास; कम्युनिस्ट वर्कर्स लीग ऑफ इंडिया, (14) परमानंद प्रसाद, किसान सभा; (15) टी. परमानंद, मजदूर सभा; (16) सोशलिस्ट सेंटर; (17) कम्युनिस्ट वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया; (18) श्रीमती रामदुलारी सिंह प्रांतीय सुगर फेडरेशन।

प्रस्ताव

(1) संयुक्त उग्रदली मोर्चे की स्थापना पर बयान का यह मसविदा तसदीक होने तक मंजूर किया जाता है।

(2) केंद्र में का. शीलभद्र यात्री मोर्चे की सभाओं के संयोजक नियुक्त किए जाते हैं।

(3) संयुक्त किसान सभा बनाने के लिए बैठक बुलाने के लिए का. स्वामी सहजानंद सरस्वती संयोजक नियुक्त किए जाते हैं।

15-16 अप्रैल, 1948, पटना, नया बिहार प्रेस लि. पटना

 

भारतीय समाजवादी सभा लक्ष्य तथा कार्यक्रम

भारत के विभिन्न वामपक्षी, समाजवादी एवं प्रगतिवादी दलों तथा संगठनों ने, जिनकी संख्या 20 से अधिक थी, मिलकर सर्व-सम्मति से 'भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा' की स्थापना अभी हाल ही में नेताजी-भवन, कलकत्ता में की। इसमें बहुसंख्य ऐसे व्यक्तियों और विद्वानों ने भी योग दिया, जो समाजवाद एवं साम्यवाद में विश्वास रखते हुए भी किसी वामपक्षी या समाजवादी दल के सदस्य नहीं हैं। विभिन्न दलों और संगठनों के प्रतिनिधि भारत के सभी प्रांतों से आए थे। शायद ही कोई प्रांत बचा हो। जिससे युक्त समाजवादी सम्मेलन में यह महान कार्य संपन्न हुआ, उसमें उपस्थित प्रतिनिधियों की संख्या प्राय: तीन सौ थी। श्री शरदचंद्र बोस ने इस सम्मेलन का आयोजन किया था। उद्धाटन भी उन्हीं ने किया। 28, 29, 30 अक्टूबर, 1949 को यह सम्मेलन क्रमश: स्वामी सहजानंद सरस्वती, श्री शंकरराव मोरे और जनरल मोहन सिंह की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा के अध्यक्ष श्री शरदचंद्र बोस चुने गए। सम्मेलन में शरीक सभी दलों के दो-दो प्रतिनिधियों को मिलाकर अस्थायी जनरल कौंसिल बनाईगई, जिसके लिए देश भर से 10 प्रतिनिधियों को सभापति उन व्यक्तियों में से नामजद करेंगे, जो किसी दल से संबध्द न होते हुए भी जन-प्रतिनिधित्व की हस्ती रखते तथा सम्मेलन के मंतव्यों को मानते हैं। इस प्रकार कम-बेश 50 सदस्यों की वह कौंसिल होगी, जिसकी पहली बैठक कलकत्ता में 4 दिसंबर, 1949 को होगी। उसी में मंत्रिायों आदि का चुनाव होगा। वही कौंसिल भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा का विधान भी तैयार करेगी, जो उस सभा के अगले खुले अधिवेशन में स्वीकार होने के लिए पेश होगा। यह अधिवेशन अगले मार्च-अप्रैल तक होगा। सम्मेलन में श्री मावसेतुंग के नेतृत्व में चीनी जनता की विजय, वहाँ जनता की प्रजासत्ताक सरकार की स्थापना एवं च्यांग कैशेक के शासन के ध्वंस पर खुशी जाहिर की गई और चीनी जनता तथा उसकी नवीन सरकार को बधाई दी गई। भारत सरकार उसे फौरन मान ले, यह माँग भी की गई। कांग्रेसी सरकारों के द्वारा जो दमन की चक्की चालू है, उसकी निंदा भी इस सम्मेलन ने की। भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा के लक्ष्य, नाम तथा कार्यक्रम के संबंध में नीचे लिखी घोषणा तैयार की गई ─

"द्वितीय विश्वयुध्द के खत्म होते-न-होते पूर्वी एशिया तथा यूरोप की जनता में भीषण क्रांतिकारी उफान नजर आया। क्रांति और नई सामाजिक व्यवस्था संभव हो गई। पश्चिमी यूरोप में साम्राज्यवादियों के सीधो हस्तक्षेप एवं चंद वामपक्षी राजनीतिक दलों के आगा-पीछा तथा वर्ग-सामंजस्यवाली चालों के फलस्वरूप किसी हद तक क्रांति का काम रुका सही; फिर भी दूसरे देशों में साम्राज्यवादी पूँजीवादी प्रणाली को निश्चित रूप से धक्का लगा। फलत: जनता के प्रयत्नों से राजनीतिक एवं सामाजिक बातों में मौलिक परिवर्तनों का श्रीगणेश संभव हो गया। यह भी बात है कि दक्षिण-पूर्व एशियावालों के विप्लवों पर हाल की चीन के स्वातंत्रय-आंदोलन की विजय ने पाश्चात्य साम्राज्यवादी प्रभुत्व को खोखला कर दिया है। समाजवाद तथा जनतंत्र का पलड़ा बेशक भारी हो गया है।

"वर्षों के युध्द के करते जीर्ण-शीर्ण तथा आर्थिक दृष्टि से छिन्न-भिन्न ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके स्थिर स्वार्थ जो भारत एवं एशियाई देशों में फैले हैं, अपनी हस्ती की सबसे बड़ी उथल-पुथल का सामना कर रहे हैं। यूरोप तथा एशिया में सोवियत रूस का बढ़ता हुआ प्रभाव और संसार के बाजार पर अमरीका का प्रभुत्व ये दोनों ही इसे दोनों ओर से कतरने लगे। ऐसी दशा में ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने ठीक ही महसूस किया कि अपने लूट-खसोटवाले व्यापार के विशेष क्षेत्र के रूप में भारतीय बाजार को किसी भी मूल्य पर बचाना होगा; फलत: अमेरिका के संसारव्यापी प्रभुत्व तथा सोवियत रूस के पूर्व-पश्चिम (दोनों ओर) फैलनेवाले प्रभाव के विरुध्द भारतीय पूँजीपतियों के साथ साठ-गाँठ अनिवार्य रूप से आवश्यक है। भारतीय जनता के क्रांतिकारी विचारों में वृध्दि देखकर भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अच्छी तरह मान लिया कि उसकी अपनी हस्ती के लिए भी भारतीय पूँजीवादियों से सट्टा-गुट्टा एक ऐतिहासिक आवश्यकता है और इसके लिए, जितना शीघ्र हो, अनिवार्य कदम बढ़ाना ही होगा।

"कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं एवं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बीच सौदे के फलस्वरूप 1947 के अगस्त में शासन-सत्ता हस्तांतरित करने की रस्म अदाई हुई। इस प्रकार एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और दूसरी ओर भारतीय पूँजीवादियों को मिलाकर एक मोर्चा भारतीय जन-क्रांति के विरुध्द तैयार हुआ। नेहरू सरकार, जो भारतीय स्थिर स्वार्थों की सरकार है, अपने वर्ग-स्वभाव के करते ही उन समस्याओं को सुलझा नहीं सकती, जो भारतीय जनता के सामने खड़ी हैं। भारत में विद्यमान पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्था के रहते भारतीय जनता को गरीबी और भूख के पंजों से त्राण नहीं मिल सकता। नेहरू और पटेल की सरकार तो स्थिर स्वार्थों की है। अमीरों के हाथों गरीबों की लूट को यह सरकार क्षमा प्रदान करती है। उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण को इसने पाँव तले रौंद दिया है। जमींदारों के द्वारा चुराईगई चीज (जमीन) को उनसे उगलवाने-जमींदारी को मिटाने के लिए मुआविजा देने के ख्याल से यह सरकार किसानों से रुपए के रूप में उनका खून निचोड़ रही है। अमीरों पर जो अतिरिक्त आय-कर लगा था, उसके भार को यह कम कर रही है। लेकिन, श्रमजीवी वर्ग के द्वारा गुजारे लायक मजदूरी की माँग को इसने बेरहमी से दबा दिया है। शरणार्थियों एवं विपन्न मध्यमवर्गियों के सभी प्रतिवाद आंदोलनों के उभड़ने को इसने बर्बरतापूर्ण बहशियाना कामों के द्वारा दबा दिया है। जनता के स्वतंत्र भाषण तथा आजाद संगठन के अपरिहरणीय अधिकारों को इसने लूट लिया है और विशेष आईन-कानूनों के द्वारा शासन जारी कर दिया है।

"यह सरकार पूँजीपतियों, चोरबाजारियों तथा भ्रष्ट पुलिस अफसरों के, जो खुफिया विभाग के बैरकों में राजबंदियों के साथ अमानुषिक बर्ताव संबंधी साम्राज्यवादी परंपरा को जारी रखना चाहते हैं, उभाड़ने पर लोगों को गिरफ्तार करती है। इसमें आजाद हिंद फौज एवं दूसरे फौजियों के साथ, जिनने बहादुरी से भारतीय स्वतंत्रता के लिए युध्द किया, अपमानजनक व्यवहार किया है। जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद आज राष्ट्रसंघ के बुर्के के नीचे मौजूद है, उसके सामने इसने आत्मसमर्पण किया है। नेहरू सरकार ने जो मुद्रा के मूल्य को घटाया है, वह ग्रेट ब्रिटेन के पूर्ण पिछलग्गू बनने का सबसे ताजा और जबर्दस्त नमूना है। यह चीज हमारी सारी राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के लिए घातक है। नेहरू-सरकार ब्रिटिश-अमरीका गुट का अर्दली बन गई है।''

पूँजीवादियों, चोरबाजारियों, कंपनियों के हिस्सेदारों और जमींदारों की इस स्थिर स्वार्थवाली सरकार को खत्म करना होगा तथा इसकी जगह किसानों, मजदूरों एवं विपन्न मध्यवर्गीयों की सरकार स्थापित करनी होगी। जनतांत्रिक जनता की यह सरकार ही भारतीय राष्ट्रीय स्वार्थों की प्रगति कर सकती है। सिर्फ वही एक-एक कर के सबों को खाना, कपड़ा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य निश्चित रूप से दे सकती है। केवल वही हमारे देश के जन-समूह का सर्वांगीण उध्दार कर सकती है।

(इसी दृष्टि से) भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा नीचे लिखे लक्ष्य तथा कार्यक्रम के संबंध में अपने-आपको संकल्पबध्द करती है। यह लक्ष्य एवं कार्यक्रम भारतीय जनता के आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं को अपनाता है─

नाम-इस संस्था (संगठन) का नाम होगा, ''भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा'' (युनाइटेड सोशलिस्ट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया)।

लक्ष्य-(अ) ''भारत में समाजवादी प्रजासत्ताक राज्यों के संघ की स्थापना इसलिए करना कि यहाँ वर्गविहीन समाज की स्थापना हो जाए, जिसमें मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण लापता होगा और यह सिध्दांत मान्य होगा कि हरेक से उसकी योग्यता के अनुसार काम लिया जाए और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए, यही इस सभा का लक्ष्य होगा।

(ब) समाजवादी प्रजासत्ताक राज्यों के इस संघ की बुनियादी रूपरेखा यही होगी कि उत्पादन, वितरण तथा विनिमय के साधनों पर समाज का अधिकार होगा और अन्यान्य बातों के सिवाय यह संघ फौरन ही आदेश जारी करेगा कि─

(1) बिना मुआविजा जमींदारी (भूमि का आधिपत्य) खत्म हो।

(2) पूँजीवादी ढंग का शोषण खत्म हो तथा बुनियादी, विस्तृत एवं मूलभूत उद्योग-धंधे समाज की संपत्ति हों।

(3) जनता के उपयोग के सभी विभाग समाज के हाथ में हों।

(4) जमीन जोतने-कोड़नेवालों (किसानों) की ही हो। इस संबंध में वही और उतने ही बंधन हों, जो राष्ट्र तथा जोतने-कोड़नेवालों के हित-साधक हों।

(5) खेती संबंधी सभी ऋण माफ हों।

(6) बैंक तथा ऋण देनेवाली अन्य संस्थाएँ समाज की हों।

(7) विदेशी कारोबार पर राष्ट्र का एकाधिपत्य हो।

(8) देश के भीतर कारोबार और रोजगार के लिए नियम-कायदे राष्ट्र सरकार बनाए।

(9) मौजूदा विदेशी स्थिर स्वार्थ मिटा दिए जाएँ।

(10) जनता के निवास-स्थान की व्यवस्था सरकार करेगी।

(11) खानें, खनिज पदार्थ, जंगल, नदियाँ और समुद्री किनारे के जल जैसे प्राकृतिक पदार्थों पर राष्ट्र (सरकार) का अधिकार होगा।

(12) शक्ति के मूलभूत साधन विद्युत शक्ति कोयले, तेल एवं शक्तिदायक आसव (शराब) तथा इस शक्ति के उत्पादक कल-कारखाने राष्ट्र (सरकार) के हाथों में होंगे और वही उन्हें चलाए तथा नियंत्रण में रखेगा।

(13) जन-स्वास्थ्य संबंधी सभी विभाग समाज के हाथ में होंगे और सबों के लिए दवा-दारू का पूरा प्रबंध होगा।

(14) सबों को पूरा काम मिलेगा, भिखमंगी न रहेगी और ऐसी व्यवस्था होगी कि यदि दैवात बेकारी हो जाए, तो भी आराम का जीवन गुजरे। बुढ़ापे, बीमारी, शारीरिक अयोग्यता, संतानोत्पत्ति की दशा तथा अनाथ बच्चों के लिए भी वही व्यवस्था हो।

(15) सभी शिक्षा-संस्थाएँ समाज के हाथ में हों, जिनमें धार्मिक शिक्षा न दी जाए। सबों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था हो।

(16) सबों को सोचने-विचारने एवं पूजा-पाठ की पूर्ण स्वतंत्रता हो।

(17) समाजवादी राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुकूल सबों को सांस्कृतिक बातों में पूर्ण स्वतंत्रता हो।

(18) अस्पृश्यता एवं इसी तरह के जाति-भेद और ऊँच-नीच आदि के खयालों के नामोनिशान को बखूबी मिटा दिए जाने की व्यवस्था हो और सबों को समान अधिकार हों।

(19) स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण समानता हो।

(20) सभी नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता अक्षुण्ण हो।

काम-भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा का काम होगा साम्राज्यवाद तक सामंतवाद के सभी अवशेषों और पूँजीवाद के विरुध्द क्रांतिकारी संघर्ष चलाना, ताकि अप्रजातांत्रिक, अधिकनायकवादी एवं प्रतिगामी भारतीय स्थिर स्वार्थों की सरकार की जगह मजदूरों और किसानों की सरकार स्थापित हो।

कार्यक्रम-भारतीय संयुक्त समाजवादी सभा के संघर्ष का कार्यक्रम यों होगा कि वह─

(1) प्रतिनिधित्व-शून्य एवं अजनतांत्रिक मौजूदा विधान-परिषद के द्वारा निर्मित तथाकथित भारतीय विधान का अमान्य ठहराने के लिए जनता को ललकारेगी और कहेगी कि जनता की विधान-परिषद बुलाई जाए, जो सार्वजनिक बालिग मताधिकार के आधार पर चुनी जाए और भारत में समाजवादी प्रजासत्ताक राज्यों के संघ के लिए विधान बनाए, ताकि (अ) सरकार के संचालन में मजदूरों एवं किसानों को वाजिब स्थान मिले; (ब) संघ में सम्मिलित सभी भागों को पूर्ण स्वतंत्रता हो और (स) भाषा के आधार पर सभी प्रांतों के भू-भागों का फिर से बँटवारा हो।

सभा माँग करेगी कि─

(2) भारत ब्रिटिश राष्ट्रसंघ से पूर्ण संबंध-विच्छेद कर ले।

(3) ब्रिटिश अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ कोई सट्टा-गट्टा न होगा।

(4) अंग्रेजों के हाथों निर्मित साम्राज्यवादी नौकरशाही तथा फौजी यंत्र के रूप में मुल्की, फौजी और पुलिस विभाग की जो नौकरियाँ हैं, उन्हें खत्म कर के नए ढंग से शासन-व्यवस्था के यंत्र का निर्माण हो तथा भारतीय परिस्थिति एवं जनता की भावना के अनुसार जनता का फौजी दल तैयार किया जाए।

(5) अनिवार्य फौजी शिक्षा दी जाए और हथियार-कानून खत्म हो।

(6) आजाद हिंद फौज के सभी सिपाहियों को फिर से भर्ती किया जाए और उन्हें बसाया न जाए।

(7) कल-कारखानेदारों ने जो युध्द में नफा कमाया है, वह और चोरबाजारियों तथा सट्टेबाजों की संपत्ति जब्त हो।

(8) फौरन ही वे दमनकारी कानून और ऑर्डिनेन्स (फरमान) रद्द किए जायें, जो बिना वारंट गिरफ्तारी, बिना मुकदमा चलाए नजरबंदी, नागरिक स्वतंत्रता में बंधन तथा हड़ताल के हक पर रोक की आज्ञा देते हैं।

(9) राजबंदियों और नजरबंदों की फौरन ही बिना शर्त रिहाई हो।

(10) सभी राजनीतिक दलों एवं मजदूर-किसान संगठनों पर लगे बंधन हटाए जाएँ।

(11) सभी मीटिंगों और जलूसों की रोक हटाई जाए, ताकि बोलने एवं संगठन की पूरी आजादी हो।

(12) सभी प्रकार की जमींदारियों तथा किसान एवं सरकार के मध्यवर्ती सभी प्रकार के स्वार्थों का खात्मा बिना मुआविजा किया जाए।

(13) खेती संबंधी ऋण माफ किए जाएँ, खेती की उन्नति के लिए सस्ते कर्ज तथा अन्य प्रकार की सरकारी सहायता की व्यवस्था हो और अलाभकर जमीनों से लगान लिया जाए।

(14) किसानों की उपज का लाभदायक मूल्य निश्चित हो, जिसमें खेती के खर्च के अलावे-(अ) उचित मुनाफा भी शामिल हो, (ब) खेत-मजदूरों की गुजारे लायक कम-से-कम मजदूरी निश्चित की जाए, और (स) किसानों के जीवन एवं खेती के लिए आवश्यक चीजों का मूल्य घटाया जाए।

(15) कल-कारखाने के मजदूरों को गुजारे लायक वेतन मिले।

(16) कानून के जरिए40 घंटे का हफ्ता और 7 घंटे रोज काम करना तय हो।

(17) लोगों को काम पाने का हक हो, नहीं तो, बेकारी का भत्ता मिले।

(18) हड़ताल करने का हक हो।

(19) सामाजिक सुरक्षा का हक सबको हासिल हो, जिसमें कोई भूखा-नंगा न रहे।

(20) ठेकेदारी पर काम करना उठा दिया जाए।

(21) सबों को भोजन, वस्त्र, निवास और दवा-दारू मिलने की गारंटी हो।

(22) मैट्रिक्युलेशन तक की शिक्षा मुफ्त एवं अनिवार्य हो।

(23) चोरबाजारी, जीवन की जरूरी चीजें जमा कर के छिपा रखने और शासन के भ्रष्टाचार के विरुध्द सख्त-से-सख्त दंड आदि की व्यवस्था हो।

(24) शरणार्थियों तथा अपने स्थानों से हटे-हटाए अन्य लोगों के लिए जमीन, मकान और काम देकर सहायता पहुँचाने तथा बसाने का प्रबंध हो।

(28,29,30 अक्टूबर, 1949 कलकत्ता)
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कम्यूनिस्ट पार्टी में इस समय तक रशादिवे गुट की विजय हो गई। वे संयुक्त मोर्चे के खिलाफ थे। इस सभा में कम्यूनिस्ट पार्टी, कांग्रेस समाजवादी पार्टी, रेडिकल पार्टी (एम.एन. राय) शरीक नहीं हुए। - संपादक

आओ साधने! आओ

साधने!आओ। मैं तुम्हारे लिए टकटकी लगाए और आँखों की पलकें बिछाए बेचैन, बेकरार हूँ। तुम आओ, मुझे सांत्वना दो, मैं जानता हूँ, तुम साधक के ही पास जाती हो,उसकी साथिनी बनना चाहती हो। और मैं? मैं तो साधक ही हूँ! मैंने निश्चय कर लिया है, प्रण कर लिया है, संकल्प कर लिया है कि साध्य को प्राप्त करके ही दम लूँगा। मुझे यह भी पता है कि साधने, बिना तुम्हारा आश्रय लिए, बिना तुम्हें अपनाए, साध्य की सिद्धि, उसकी प्राप्ति असंभव है। इसीलिए मैंने तुम्हारे लिए ही सर्वप्रथम अलख लगाना शुरू कर दिया है। तो क्या अब भी न आओगी ?

मुझे मालूम है, तुम अनन्य भाव, अनन्य भक्ति, अनन्य भावना चाहती हो। उसी की भूखी हो। तुम ऐसों की ओर घृणा की दृष्टि से देखती हो, तिरस्कार पूर्ण पलकें उठाती हो, जो दुभाषिए हैं, जिनका मन कभी तुम्हारी ओर जाता है तो कभी दूसरी ओर, जो कभी राम-राम कहते हैं तो कभी खुदा-खुदा। जिनके लिए तुम स्वाती की बूँद हो और जो पपीहे की तरह दिन-रात तुम्हारे लिए पी-पी की रट लगाते रहते हैं, जो मूसलधार और दूसरी रिमझिम बूँदों की ओर ताकते तक नहीं, मैं तो वही अनन्य भक्त हूँ। विश्वास करना। इसका पता परीक्षा के समय लगेगा कि मैं कौन हूँ─

''हकीकत साफ खुल जाएगी वक्ते इम्तहाँ मेरी।''

मुझे पता है, तुम 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी' की तलाश में रहती हो, जो मस्ताना है, तुम्हारे पीछे पागल है, जो'मैं रात में जग कर रोता हूँ जब सारा आलम सोता है'वाला है और तुम्हारे पीछे बेहाल फिरता है, आँसुओं की धारा बहाता है, जो सब कुछ भूल जाता है, तुम उसी को याद करती हो, उसी के पास पहुँचती हो। जिसे थकान का पता ही नहीं, जो पस्ती को पछाड़े बैठा है और दम मारने को रवादार नहीं, निराशा जिसके पास फटकने की हिम्मत नहीं रखती और जिसे अपने आप में, अपने साध्य में अधिक विश्वास है, तुम उसी के चरण चूमती हो। और मैं! मैं वह हूँ! और, इसका पता तुमको लगेगा। मेरी और तुम्हारी होड़ है, कहे देता हूँ। याद रखना, तुम्हें पछाड़ना है और जरूर पछाड़ना है। मैंने खम ठोंकी है और तुम्हें साथिनी बनाने के अलावा कोई चारा नहीं है। इसी से कहता हूँ कि आओ साधने! आओ।

यों लिखा गया ' गीता हृदय '

गीता हृदय तो जेल से निकलने के ठीक पूर्व जैसे लिखा जा सका। जानें मेरे दिल में रिहाई के दो मास पूर्व क्यों यह बात जम गई कि गीता हृदय पूरा करो नहीं तो रिहाई होने ही वाली है और फिर वह पड़ा ही रह जाएगा। बस, मैंने उसमें हाथ लगा दिया। सचमुच मेल की गति की बात ही क्या, मैं स्पेशल ट्रेन की चाल से चलता रहा तब कहीं यह लंबी पुस्तक पूरी हो सकी। लिखित कॉपी (हस्तलिपि) पर रोज-रोज की तारीखें नोट हैं कि किस दिन कितना लिखा। फिर भी इसका आशय यह नहीं है कि ऊलजलूल बातें लिख मारीं। ऐसा नहीं हुआ। जो कुछ लिखा गया वह खूब समझ-बूझ के, इतने पर भी दोई भाग पूरे हुए। तीसरा लिखा न जा सका। उसके लिए कुछ खास छानबीन और अन्वेषण जरूरी था और वैसी पुस्तकें जेल में मिल न सकती थीं। मेरा अपना विचार है कि गीता हृदय में लिखी बातें अपने ढंग की निराली हैं। उनमें अधिकांश विचार के परिपाक के परिणाम हैं। कुछ तो लिखते-लिखते अकस्मात सूझीं और मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्हें लिपिबद्धकरने में मुझे अपार आनंद हुआ।

 

मेरा भगवान

कहते हैं कि वह (ईश्वर) सब काम पलक मारते कर देता है और जिस बात को नहीं चाहता उसे कदापि नहीं होने देता। लेकिन दूसरों का काम सँभालने और भक्तों का हुक्म बजाने से पहले वह अपना काम तो सँभाले। तभी हम मानेंगे कि वह बड़ा शक्तिमान या सब कुछ कर सकनेवाला है─ सब कुछ करता है। एक दिन किसान के घी से भगवान के मंदिर में दीप मत जलाइए और भगवान से कह दीजिए कि आपकी सामर्थ्य की परीक्षा आज ही है। देखें, आपके घर में─ मंदिर में─ मस्जिद में─ अँधेरा ही रहता है या उजाला भी होता है। रात भर देखते रहिए। मंदिर का फाटक बंद करके छोटे से सूराख से रह-रहकर देखिए कि कब चिराग जलता है ! आप देखेंगे कि जलेगा ही नहीं, रात भर अँधेरा ही रहेगा!

इसी प्रकार एक दिन न घंटी बजे, न आरती हो और न भोग लगे ! किसान के गेहूँ,दूध और उसके पैसे से खरीदी घंटी, आचमनी आदि हटा लीजिए। फिर देखिए कि दिन-रात ठाकुरजी भूखे रहते और प्यासे मरते हैं या उन्हें भोजन उनकी लक्ष्मीजी पहुँचाती हैं, दिन-रात मंदिर सुनसान ही और मातमी शक्‍लबनाए रह जाता है या कभी घंटी वगैरा भी बजती है! पता लगेगा कि सब मामला सूना ही रहा और ठाकुरजी या महादेव बाबा को 'सोलहोंदंडएकादशी' करनी पड़ी ! एक बूँद जल तक नदारद-आरती, चंदन, फूल आदि का तो कहना ही क्या! सभी गायब! वे बेचारे जाने किस बला में पड़ गए कि यह फाकामस्ती करनी पड़ी।

और ये मंदिर बनते भी हैं किसके पैसे और किसके परिश्रम से?जब मंदिर का कोना टूट जाए, तो ललकार दीजिए ठेठ भगवान को ही जरा खुद-ब-खुद मरम्मत तो करवा लें। नएमंदिर बनाने की तो बात ही दूर रही! वह कोना तब तक टूटा का टूटा ही रहेगा जब तक किसान का पैसा और मजदूर का हाथ उसमें न लगे! यदि कोई मंदिर भूकंप से या यों ही अकस्मात गिर गया हो और भगवान उसी के नीचे दब गए हों तो उनसे कह दीजिए कि बाहर निकल आएँ अगर शक्तिमान हैं! पता लगेगा कि जब तक गरीब लोग हाथ न लगाएँ, तब तक भगवान उसी के नीचे दबे कराहते रहेंगे। चाहे मरम्मत हो या नए-नएमंदिर बनें─ सभी केवल मेहनत करनेवालों के ही पैसे या परिश्रम से तैयार होते हैं।

आगे बढ़िए! गंगा को तीर्थ, मंदिर को मंदिर, जगन्नाथ धाम को धाम किसने बनाया है?किसके चरणों की धूल की यह महिमा है कि तीर्थों, मंदिरों और धामों का महत्त्व हो गया? किसने गोबर को गणेश और पत्थर को विष्णु या शिव बना डाला? क्या अमीरों और पूँजीपतियों ने? सत्ताधारियों ने? यदि नंगे पाँव और धूल लिपटे किसान-मजदूर गंगा में स्नान न करें, उन्हें गंगा माई न मानें, मंदिरों में न जाएँ, जगन्नाथ और रामेश्वर धाम न जाएँ तो क्या सिर्फ मालदारों के नहाने, दर्शन करने या तीर्थ-यात्रा से गंगा आदि तीर्थों, मंदिरों और धामों का महत्त्व रह सकता है?उनका काम चल सकता है?गरीबों ने यदि बहिष्कार कर दिया तो यह ध्रुव सत्य है कि राजों-महाराजों और सत्ताधारियों की लाख कोशिश करने पर भी गंगा और तलैया में कोईअंतर न रह जाएगा, मंदिर और दूसरे मकान में फर्क न होगा और धामों या तीर्थों की महत्ता खत्म हो जाएगी। उन लोगों के दान-पुण्य से ही मंदिरों और धामों का काम और खर्च भी नहीं चल सकता यदि गरीबों के पैसे-धेले न मिलें। जल्द ही दिवाला बोल जाएगा और पंडे-पुजारी मंदिरों,तीर्थों और धामों को छोड़कर भाग जाएँगे !

यह तो करोड़ों गरीबों के नंगे पाँवों में लगी धूल-चरण रज-की ही महिमा है, यह उसी का प्रताप है कि वह जब गंगा में पहुँचकर धुल जाती है तो वह गंगा माई कहाती है; जब मंदिरों में वही धूल पहुँच जाती है तो वहाँ भगवान का वास हो जाता है, पत्थर को भगवान व गोबर को गणेश कहने लगते हैं; जब वही धूल जगन्नाथ और रामेश्वर के मंदिरों में जा पहुँचती है तो उनकी सत्ता कायम रहती है और उनकी महिमा अपरंपार हो जाती है। गरीबों के तो जूते भी नहीं होते। इसीलिए तो उनके पाँवों की धूल ही वहाँ पहुँच कर सबों को महान बनाती है।

कहते हैं कि महादेव बाबा खुद तो दरिद्र और नंगे-धड़ंगे श्मशान में पड़े रहते हैं, मगर भक्तों को सब संपदाएँ देते हैं─ उन्हें बड़ा बनाते हैं! पता नहीं,बात क्या है?किसी ने आँखों से देखा नहीं। मगर ये किसान और कमानेवाले तो साफ ही ऐसे'महादेवबाबा'हैं कि स्वयं दिवालिए होते हुए भी,ईश्वर तक को ईश्वर बनाते और खिलाते-पिलाते हैं!

ईश्वर सबको खिलाता-पिलाता है,ऐसा माना जाता है─ सही। मगर किसने उसे हल चलाते,गेहूँ, बासमती उपजाते, गाय-भैंस पाल कर दूध-घी पैदा करते, हलुवा-मलाई बनाते तथा किसी को भी खिलाते देखा है? लेकिन किसान तो बराबर यही काम करता है। वह तो हमेशा ही दुनिया को खिलाता-पिलाता है!

इतना ही नहीं। कहते हैं कि ईश्वर तो केवल भक्तों को खिलाता और पापियों को भूखों मारता है। वह अपनों को ही खिलाता है। इसिलए वह एक प्रकार की तरफदारी करता है। मगर किसान की तो उल्टी बात है! वह तो जालिमों और सतानेवाले जमींदारों, साहूकारों और सत्ताधारियों को ही हलुवा-मलाई खिलाता है और खुद बाल-बच्चों के साथ या तो भूखा रहता है या आधा पेट सत्तू अथवा सूखी रोटी खा कर गुजर करता है!ऐसी दशा में असली भगवान तो यह किसान ही हैं!

दुनिया माने या न माने। मगर मेरा तो भगवान वही है और मैं उसका पुजारी हूँ। खेद है, मैं अपने भगवान को अभी तक हलुवा और मलाई का भोग न लगा सका, रेशम और मखमल न पहना सका, सुंदर सजे-सजाएमंदिर में पधरा न सका, मोटर पर चढ़ा न सका, सुंदर गाने-बजाने के द्वारा रिझा न सका और पालने पर झुला न सका। मगर उसी कोशिश में दिन-रात लगा हूँ─ इसी विश्वास और अटल धारणा के साथ कि एक-न-एन दिन यह करके ही दम लूँगा; सो भी जल्द!

 

नग्न चित्र

साथियो,

आज मैं भारत के उन करोड़ों नर-नारियों-किसानों के प्रति श्रद्धा-भक्ति प्रकट करने के लिए यहाँ खड़ा हूँ जिन्होंने अपने निःस्वार्थ त्याग से─ उन्हीं के लिए त्याग जिन्होंने उनका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तरीके पर शोषण किया है और कर रहे हैं, और उनका सारा खून चूस चुके हैं─ मुझे और मेरे जैसे हजारों को अपना पुजारी बना लिया है। किसान न सिर्फ मानव व्यवहार की उन्हीं आवश्यक वस्तुओं के उपजानेवाले हैं जिनके अभाव में जीवन नष्ट हो जाता है, दिमाग काम नहीं करता और कोई भी अंग हिल नहीं सकता, बल्कि आधारभूत कच्चे माल के भी जो तैयार माल के रूप में बदल कर जीवनयापन को आसान और सुखद बना देते हैं, जिनके चलते हमारे विचार विस्तृत और परिष्कृत होते हैं, प्रगतिशील बनते हैं, और जिनने दुनिया को भूत और वर्तमान रूप दिया है। अपने पुत्र-पुत्रियों के द्वारा वे फैक्टरियों और खानों को चालू रखते, ऑफिस चलाते, और वर्तमान शासन-व्यवस्था की रक्षा के लिए─ इसके दुश्मनों को डराकर और जरूरत पड़ने पर हराकर भी─ उन्हीं पुत्र-पुत्रियों को फौजी गोली का शिकार बनाते हैं। ये वही हैं जो अपने खून को पसीना बना कर शासन-व्यवस्था के कामों और उन्हीं के आराम के लिए जो उन्हें अत्यंत निर्दयतापूर्वक पैरों तले रौंदते हैं। राजमहल, किले और गृह-निर्माण करते हैं। अपार धनराशि और साधनों के होते हुए भी यदि आज किसान उन बाबुओं से असहयोग कर लें, उन्हें चावल, गेहूँ, चना, तरकारी, दूध और उससे बने सामान देना बंद कर दें, तो वे एक भी प्रथम क्यों द्वितीय श्रेणी के भी, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री अथवा शासक, जिनका उन्हें गर्व है, पैदा कर नहीं सकते।

उपर्युक्त बातों से मोटी अक्‍लवालों के लिए भी यह साफ है कि सिर्फ एक ही श्रेणी के लोग─ किसान ही हैं जिनके अनंत स्वार्थ-त्याग से ही यह दुनियाँ टिकी हुई है। सचमुच यह बड़े दुःख की बात है कि जबकि वे किसान अपने वार्षिक घरेलू बजट में दूसरे सबों के लिए पूरी ताकीद और गुंजाइश रखते हैं─ देवी और देवता, साधु और फकीर, भिखमंगे और नेता, पुलिस और मजिस्ट्रेट, शासक और शोषक, उपदेशक और गुरू और यहाँ तक कि मृतात्माओं के लिए भी, कोई किंचित मात्र भी उनके लिए परवाह नहीं करता और न उनके संबंध में कुछ क्षण सोचने-विचारने का कष्ट ही उठाता है। नहीं तो, यह पूरा-का-पूरा किसान वर्ग क्यों अधापेट खाकर अधनंगा रहता है? वे दूसरों को खाना, पहनना देते हैं तो क्या यह दूसरों के लिए न्याय और उचित है कि उनके लिए कुछ न करें? क्या किसानों का जो {ण उन पर लदा है, उसे वे नहीं चुका सकते अथवा उन्हें नहीं चुकाना चाहिए? इस विषय में क्या वे सचमुच ही असमर्थ हैं? जबकि जमींदार और पैसेवालों के कुत्ते, बिल्ली, चूहे, शेर आदि किसानों की गाढ़ी कमाई पर गुलछर्रे उड़ाते हैं, क्या किसान इन जानवरों के व्यवहार में आने वाले अच्छे खान-पान और वस्त्र का एक भाग भी पाने के हकदार नहीं? क्या वे जमींदारों, राजाओं, महाराजाओं और अफसरों द्वारा प्यारभरी बातें सुनने के भी अधिकारी नहीं? क्या किसान जानवरों से भी कम उपयोगी और गए-गुजरे हैं?धनिकों के कुत्ते पहले दर्जे में सफर करते हैं और सोने के प्याले में दूध पीते हैं किंतु किसानों, उनके बच्चे-बच्चियों को तीसरे दर्जे में भी सफर करने का साधन नहीं ! उन्हें रोटी के टुकड़े के भी लाले पड़े हैं जबकि जमींदारों के कुत्ते अच्छी-से-अच्छी मोटरगाड़ी में उनकी गोद में बैठते हैं, किसान उन तक फटक भी नहीं पाते, उन्हें बैलगाड़ी तक नसीब नहीं यह बात किसी की बुद्धि में नहीं अँटती और इससे दिल के टुकड़े हो जाते हैं। इसे लोग दुर्भाग्य कहते हैं किंतु यह एकमात्र सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अंधेरखाता है।

चाहे जैसे हो, इसे तो बंद करना ही होगा और यह जितना शीघ्र बंद हो जाए, उतना ही अच्छा। और जब तक हम लोग, जो जन-सेवा के ठेकेदार होने का दम भरते हैं, बिना किसी हिचकिचाहट के इसकी पूरी कीमत चुकाने को तैयार न होंगे, इस अव्यवस्था, अंधेरखाता तथा समूचे गोलमाल का अंत होने की कोई आशा नहीं। इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए हमें ऐसे स्वार्थहीन किसान सेवकों की जरूरत है जो अपने जीवन को किसानों की सेवा में उत्सर्ग किए हों, गाँवों में धूनी रमाने के लिए व्याकुल हों और बिना किसी पारितोषिक के, लोभ के अपनी सारी शक्ति, चातुरी और अक्ल इस महान कार्य में लगा देनेवाले हों। सारांश हम हजारों किसान पुजारी चाहते हैं।


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