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रचनावली

स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली
खंड 2

सहजानन्द सरस्वती
संपादन - राघव शरण शर्मा

अनुक्रम पूर्वभाग ─ पूर्व खंड पीछे     आगे

(1)

जन्म और बाल्यावस्था

मुझे ठीक याद नहीं कि माँ के गर्भ से बाहर मैं कब आया। जब यह जान सकता था तब तो इसकी कोशिश ही न की─न कर सका और अब अर्धशताब्दी से ज्यादा समय गुजर जाने पर पता लगना एक प्रकार से असंभव है। इसीलिए इस बात की फिक्र ही छोड़ दी। फिर भी पढ़ने के समय स्कूल में जो अवस्था मोटा-मोटी लिखी-लिखाई जाती है, उसी के आधार पर मैंने यह अनुमान किया कि सन 1889 के आरंभ के ही महीनों में किसी में मैंने पहले-पहल इस जीवन में यह दुनिया मूक रूप से दखी थी। जहाँ तक फिर भी पता लग सका है, फरवरी महीने में फागुन की महाशिवरात्रि का दिन था, हालाँकि पक्की जानकारी न हो सकी है।

अपनी माँ का मैं अंतिम बालक था और कुछ सयाना होने पर मैं जान पाया कि मेरी तीन या चार वर्ष की उम्र में ही माता का देहांत हो गया था । फलत: मातृसुख का अनुभव मैं यथावत कर न सका। माता की सेवा का तो प्रश्न ही नहीं। उसका अवसर ऐसी हालत में मिलता ही कैसे?

मेरे पिता श्री बेनीराय, दो भाई थे और माता भी दो बहनें थीं। फलत: माता के मरने पर उसकी बड़ी बहन, मेरी मौसी और चाची ने, क्योंकि दोनों बहनों की शादी पिता और उनके बड़े भाई से ही हुई थी, मेरा पालन-पोषण किया। असल में मौसी को ही मैंने हमेशा माँ की तरह समझा और माना और उसका भी भाव मेरे प्रति सोलहों आने पुत्रवत ही रहा। परिणाम यह हुआ कि जब मैंने प्राय: अट्ठारह वर्ष की ही आयु में संन्यास ले लिया तो उसे मर्मांतिक वेदना हुई और अधिक दिनों तक वह जीवित न रह सकी। पिता जी को भी अपार क्लेश हुआ और वह भी मेरे गृहत्याग के पश्चात शीघ्र ही कुछ वर्षों के भीतर ही चल बसे। परंतु ठीक-ठीक कह नहीं सकता कि दोनों का देहावसान कब और किस समय हुआ। केवल इतनी ही खबर किसी प्रकार लग सकी कि वे दोनों ही स्वर्गीय हो गए।

चचा श्री विश्वेश्वर राय के तो एक ही पुत्र थे श्री सुंदर राय।लेकिन हम पाँच भाई थे। बहन कोई न थी, सिर्फ एक चचेरी बहन थी। पाँच भाईयों में एक का देहांत तो मेरी जानकारी से पहले ही हो गया था। इसलिए इस समय उसका नाम भी मुझे याद नहीं। शेष चार में श्री रामदिलास राय की भी मौत मेरे सामने हो गई। रह गए तीन। सबसे बड़े थे श्री जंगबहादुर राय और उसके बाद श्री रामध्यान राय। हाँ, अपने माँ-बाप का दिया अपना नाम कहना तो मैं भूल ही गया। मुझे लोग नवरंग राय कहते थे। चचेरे भाई का तो कोई वंश रह नहीं गया है और न मृत भाईयों का। लेकिन जो शेष दो भाई बचे थे, और जिनमें बड़े का भी पीछे देहांत हो गया उनका वंश है।

बाल्यावस्था की कोई विशेष बात न तो मुझे याद है और न मालूम। सिर्फ एक ही बात जानता हूँ, जो घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों से सुनी थी। वे कभी-कभी हँसी में मेरे बारे में कहा करती थीं कि ''यह तो बड़ा ही पत्थर के कलेजे का हैं, जब इसकी माँ मरी थी और सभी लोग रोते थे तो यह कहता था कि─माँ तो मर ही गई, क्या रोते-रोते आप बाकी लोग भी मर मिटेंगे'' लेकिन मुझे अनुभव नहीं कि आया, ऐसा कहता था या नहीं, कारण 3-4 वर्ष की अवस्था की बात ही तो ठहरी। हाँ, एक बात और है। न जाने मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा रहा है कि बचपन में लड़के मिल-मिला कर जो खेल खेला करते और शैतानियाँ करते रहते है, उनसे मैं बराबर दूर रहा हूँ।

फलत: न तो वे खेल ही जानता और न वैसी शरारतें ही। यहाँ तक कि दरवाजे के सामने अपार जल का लंबा तालाब, जिसे बस बावड़ी (बौली) कहा करते थे, रहने पर भी मैंने तैरना जाना ही नहीं, जब कि मेरे उम्र के सभी लड़के इस विद्या में पारंगत थे। तालाब तो हमारे गाँव में बहुत थे। मगर स्वभावत: ही मैंने तैरना न सीखा। आखिर, इस काम में भी तो नटखटपन की जरूरत होती है और मुझमें वह चीज थी ही नहीं। परिणाम यह है कि मैंने अच्छी तरह तैरना आज तक जाना ही नहीं। सिर्फ़ सन 1916 ई. की ऐतिहासिक बाढ़ आनेपर विश्वंभरपुर (गाजीपुर) के ताल में, संन्यासी होने के बहुत बाद, किसी प्रकार थोड़ा-सा सीख पाया था। सो भी इसलिए कि एक बार सारन जिले में नहाने के समय एक तालाब में डूबते-डूबते बचा था। पता नहीं कि उतना भी तैरना अब भूल गया या आता है। क्योंकि फिर कभी इसकी परीक्षा की नहीं।

(2)

स्थान और वंश

मेरा जन्म देवा नामक ग्राम में हुआ। यह स्थान युक्त प्रांत के सबसे पूर्वीय और बिहार से मिले हुए गाजीपुर जिले की सैदपुर तहसील, शादियाबाद परगने और बिरनों थाने के भीतर गाजीपुर शहर से उत्तर-पश्चिम प्राय: बीस मील के अंतर पर बंगाल नार्थ वेस्टर्न (ओ.टी.) रेल्वे के दुलहपुर स्टेशन के पास है। यहाँ गाजीपुर से दो-एक कच्ची और दूसरी पक्की, सड़कें आती है। कच्ची तो गाँव से हो कर ही किनारे-किनारे निकल जाती है। मगर पक्की बिरनों थाने से हो कर आती है और गाँव के उत्तर हो कर निकट से ही सीधी आजमगढ़ चली जाती है। कच्ची सड़क गाँव से कुछ दूर उत्तर-पश्चिम में इसी से मिल कर खत्म हो जाती है। देवा गाजीपुर जिले के वायव्य कोन का आखिरी गाँव है और इसके बाद आजमगढ़ जिला शुरू हो जाता है।

गाँव के चारों ओर पुरानी खाई है, जो अधिकांश में समय गुजर जाने के कारण भर-सी गई है। फिर भी वर्ष में तो पानी से लबालब होई जाती है और दो-चार निर्दिष्ट मार्गों के अलावे गाँव से बाहर जाने के और रास्ते रही नहीं जाते। इसके बहुत अंशों में और खास कर समूचे उत्तरी भाग में, जो ज्यादा चौड़ा भी है, गर्मियों में भी जल भरा रहता था। खाई के सिवाय उसके भीतर ही, पर उसी के किनारे गाँव के चारों कोनों में मिट्टी के चार बहुत ही ऊँचे धूस हैं, जिन्हें अब तक बराबर मोर्चे के नाम से लोग पुकारते है। इतना ही नहीं, गाँव के उत्तरी भाग में, खास कर जहाँ हमारे वंशवालों का घर है, एक पुराने गढ़ के चिद्द अभी तक पाए जाते हैं जिससे लंबी-लंबी ईंटें निकलती हैं और जिसे कोट के नाम से पुकारा जाता है। वहीं एक पुरानी देवी भी है, जिन्हें कोर्ट की देई या देवी कहते चले आते है। गढ़ पर ही, जो अब प्राय: समतल सा हो गया है, हम लोगों के घर के बगल में ही एक पुरानी कब्र पड़ी है, जिसकी मरम्मत उस समय हमारे घरवाले ही कभी-कभी कर दिया करते थे और जिसे 'शहीद मर्द' कह कर पुकारते थे। मैंने यह भी देखा है कि घरवाले कभी-कभी 'शहीद मर्द' पर दीया जलाया करते थे। मालूम होता है, पुराने समय, जब गढ़ मौजूद था, किसी लड़ाई में कोई बहादुर मुसलमान किसी कारण से लड़ते-लड़ते हक के लिए मरा था जिससे उसकी बहादुरी में उसकी कब्र को 'शहीद मर्द' कहने लगे। गाँव में मुलसमान तो केवल दो-चार घर ही जुलाहे और चुड़िहार, मिला कर हैं, दो घर भाट भी हैं, जिनमें एक श्री रामखेलावन मियाँ बड़ा ही गवैया और सारंगी का बजवैया कारीगर था। इससे उसकी ख्याति आस-पास में और दूर तक भी थी। सारंगी बजाने में तो कमाल करता था। उसके व्यवहार-आचार से उसे कोई सहसा कह नहीं सकता था कि मुसलमान था। कहते हैं कि वह स्वयमेव एक बार हिंदू बनने को तैयार था। मगर गाँव के बड़े-बूढ़े हिंदूओं ही ने न होने दिया। उसका लड़का श्री प्रदीप तो गाने-बजाने में उससे भी बाजी मार ले गया है और बहुत दूर तक श्रीमंतों में उसकी पूछ है।

देवा नाम, कोट की पुरानी देवी और गढ़ का विचार करने से अंदाज होता है, पहले वह हिंदुओं का था, पीछे किसी मुसलमान नवाब या सामंत ने उस पर अधिकार किया। उसे ध्वस्त कर के ही फिर हमारे पूर्वजों ने उस पर कब्जा किया और उसी लड़ाई में किसी तरह की आकर्षक मृत्यु के कारण वह मुसलमान शहीदमर्द बना।

बूढ़े लोग कहते थे कि चारों मोर्चे पर तोपें रहा करती थीं, ऐसा उन्होंने सुना था। यह भी वे लोग सुनाया करते थे कि पहले उत्तरवाली पक्की सड़क से पलटनें जाया करती थीं, जिन्हें, तिलंगा के नाम से पुकारते थे यह बहुत पुरानी बात न थी। मालूम होता है, तैलंग लोगों को फौज में भर्ती कर के सन 1857 ई. के बाद उधर गोरी पलटनों के साथ ही गश्त कराया जाता था। इसीलिए सभी पलटनों के सिपाहियों को तिलंगा कहने की आदत सी पड़ गई थी।

मेरा वंश जुझौतिया ब्राह्मणों का है। जो पश्चिम से आ कर उस गाँव में बहुत पहले ही बस गए थे। हाँ, यह बूढ़े यह भी कहते थे कि उनके पूर्वज गाँव से उत्तर के डीह में बसे थे जो अब खेत हो गया है, मगर गौर करने से वहाँ प्रथम बस्ती होने का अंदाज लगता है। जब डाकुओं ने बहुत दिक्कत किया तो गढ़ के भीतर आ बसे। खैर, बात जो हो, जुझौतिया ब्राह्मणों का एक दल कुछ कायस्थों के साथ बुंदेलखंड की ओर से किसी प्रकार वहाँ आ गया। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की ही एक शाखा जुझौतिया कहाती है, जैसे सरवरिया या सर्यूपारी। जुझौती या जजाक्मुक्ति पुराना नाम है। वहीं रहने से ये ब्राह्मण जुझौतिया कहे गए। वहाँ के लोग खूब लड़ाके वीर होते थे, यह सभी जानते हैं और इतिहास इसका साक्षी है। इसीलिए बुंदेलखंड को जुझौती भी कहते थे। जुझौतिया ब्राह्मण अधिकांश उसी भाग में और हमीरपुर, ललितपुर, झाँसी में पाए जाते हैं। चित्रकूट के पास में कोई एक छोटा-मोटा राजा या जमींदार भी उनमें पहले था। उनकी सभा भी एक है और वंशावली वगैरा : भी छपी है।

ये थोड़े से जिझौतिया ब्राह्मण सुदूर पश्चिम से कब और कैसे आए पता नहीं। उस इलाके में या ईधर-उधर नजदीक में कहीं और उनका सुराग नहीं मिलता, सिर्फ एक ही गाँव वही है, वहाँ भी उनकी संख्या ज्यादा नहीं। पंद्रह-बीस घर होंगे जो असल में गिने-गुथे पूर्वजों से ही इतने बढ़े हैं, ऐसा अंदाज है। आसपास के गाँवों में या तो सर्यूपारीब्राह्मण पाए जाते हैं या भूमिहारब्राह्मण, सो भी बहुत कम। मालूम होता हैं, खेतीबारी करने और समय-समय पर युद्ध-कौशल दिखानेवाले ये जुझौतिया लोग बुंदेलखंडवाले अपने ऐसे ही भाईयों से रेल, तार वगैरह का जमाना न होने के कारण धीरे-धीरे कतई अलग हो गए और अपने ही सरीखे भूमिहारब्राह्मणों से उन्होंने खान, पान और विवाहादि का नाता क्रमश: जोड़ लिया। मुझे खूब याद है कि अकेले होने के कारण इनकी वैसी प्रतिष्ठा भूमिहारब्राह्मण भी नहीं कर सकते थे। वे समझ ही न सकते थे कि ये जुझौतिया आखिर कौन जीव है। कान्यकुब्ज, सर्यूपारी आदि को तो समझ पाते थे। इसीलिए मेरे समय में हमारे गाँव के लोग जुझौतिया कहने में भी संकोच करते थे और इस नाम को भी ना समझी से बिगाड़ कर जुजहुतिया, या जिजहुतिया आदि कर दिया था। ईधर पता लगा कि दुमका (संथाल परगने में) कोई जुझौतिया अध्यापक मैथिलों के द्वारा इसीलिए अपमानित किए जाते थे कि उस श्रेणी का वहाँ और कोई है नहीं। ऐसा होता ही है। हजारों के बीच जो अकेला होता है वही नक्कू बनता हैं। देवा के जुझौतिया ब्राह्मणों का कश्यप या काश्यप गोत्र है।

(3)

आर्थिक अवस्था

हमारे वंश की आर्थिक दशा अच्छी न थी । मालूम होता है, हमारे दादा श्री ठाकुर प्रसाद राय के समय में लोग सुखी-संपन्न थे और पीछे हालत खराब हो गई। दादा को या उनके समय को तो मैंने देखा नहीं लेकिन उनके बारे में एक बात बार-बार सुनता था। वे बराबर एक अच्छी घोड़ी रखते थे और उसी पर चला करते थे। कहा जाता है कि एक बार कोई सज्जन किसी बारात के लिए उनसे वह घोड़ी माँगने आए तो उन्होंने उसे देना न चाहा। असल में उसे वे बहुत मानते और उसकी बहुत हिफाजत करते थे। इसी से देने को राजी न थे। मगर बहुत हठ करने पर ताकीद के साथ दे दी। हालाँकि डरते थे कि उनकी अनुपस्थिति में उसकी ठीक सेवा न हो सकेगी। हुआ भी ऐसा ही। वे हजरत बारात में गए और न जाने उसके साईस को क्यों न ले गए। बारात में नियमानुसार घुड़दौड़ आदि भी हुई मगर उसके बाद उन्होंने मामूली टट्टघओं की तरह उसे लापरवाही से दोनों पाँव बाँध कर यों ही चरने को छोड़ दिया, जिसकी कभी उसे आदत न थी। फलत: रात में ही उसके पाँव आपस में फँस गए वह गिर पड़ी और मर गई। जब दादा को खबर मिली तो चिंता और गम के मारे उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया और आखिर मर ही गए।

हमारे वंश के थोड़ी-सी जमींदारी थी और बाकी कास्तकारी। जब दादा के जमाने में वंश छोटा था तो काम ठीक चलता था और कोई दिक्कत न थी। मगर पीछे उसका बँटवारा छ: या सात हिस्सों में हो जाने से हालत स्वभावत: खराब हो गई। हालाँकि ईधर सुना है, फिर सभी हिस्सेदारों के मर-मिटने के कारण सब जायेदाद एकत्र हो गई है। जमींदारी में तो कुछ था नहीं, खास कर बँटवारे के बाद। केवल खेती से ही काम चलता था। मुझे संवत 1956 विक्रमी के उस घोर अकाल की ताजी याद बनी है, जिसमें लोग चारों ओर भूखों मर रहे थे। न जाने किधर से मक्का (मकई) की चलन गई थी। उसे ही दल कर लोग भात की तरह पकाते और खाते थे। मुझे यह भी भूला नहीं कि उस प्रसिद्ध छप्पनवाले अकाल में, क्योंकि पीछे तो उसका नाम ही छप्पनवाला पड़ गया, संभवत: सन 1900 ई. में हुआ था, एक अनहोनी बात हो गई थी। अरहर की खेती उस साल अच्छी थी और संयोग से वह महीनों पहले ही पक गई। फलत: लोग उसे ही पका कर खाया करते थे।

गाँव के दूसरे लोग भी साधारण स्थिति के थे और खेती-गिरस्ती से ही काम चलाते थे। हाँ, एक उल्लेखनीय बात यह थी कि वहाँ खांडसारीवाली पुराने कारखाने की चीनी बहुत बनती थी। तीन-चार कारखाने अच्छे थे। उस हाथ से बनी चमाचम चीनी की स्मृति आज भी ताजी है। रुपए की दो-ढाई सेर बिकती थी। इसीलिए सभी किसान ऊख की खेती करते थे। चीनी के कारखानेदार सुखी-संपन्न समझे जाते थे और एकाध दूसरे लोग भी, गाँव में कोई दूसरा रोजगार-व्यापार न था और न नौकरी-चाकरी ही। पढ़ना-लिखना भी ऐसा ही तैसा था। केवल कायस्थों में कुछ लोग पढ़े-लिखे थे और बाहर नौकरी करते थे। कायस्थ लोग जहाँ तक याद है, खरे कहाते थे और उनके चार ही पाँच घर थे।

(4)

पढ़ाई का श्रीगणेश

यद्यपि घर में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं और गाँव में भी शायद ही दो-चार कैथी पढ़-लिखे लोग थे, तथापि घरवालों की राय हुई कि लड़के की बुद्धि तेज है, इसलिए इसे स्कूल भेजा जाए। गाँव के कुछ और लड़के भी पढ़ते थे। इसलिए सन 1899 ई. की जनवरी के शुरू में ही मैं जलालाबाद के अपरप्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में दाखिल किया गया। जलालाबाद देवा से उत्तर प्राय: दो मील के फासले पर है। वहाँ बाजार लगता है और डाकघर भी है। बनियों और राजपूतों की बस्ती है। जुलाहे और दूसरे मुसलमान भी बसते है। मुझे याद है, हमारे गाँव और दूसरे गाँव की बहुत सी औरतें चरखे से सूत कात कर वहाँ ले जाती थीं और रूई के बदले सूत जुलाहों को दे आती थीं। यह याद नहीं कि सूत के बदले रूई कितना गुना मिलती थी। यह भी मैंने देखा कि चार ही छ: वर्षों में सारे चरखे खत्म भी हो गए।

जलालाबाद में पश्चिम ओर एक पुराना और बहुत बड़ा गढ़ का धवंसावशेष है। पुराने लाखौरी ईंटों की गिरी-गिराई दीवारें अब भी खड़ी हैं। बीच में एक पक्का चबूतरा है, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके नीचे खजाना गड़ा है और जो खोदना चाहे उसे साँप बन के उसके रक्षक, जो भीतर है और दैवी शक्ति रखते हैं, डँस देते हैं। ऐसी कहावतें अकसर पाई जाती हैं।

अपरप्राइमरी स्कूलों में छ: कक्षाएँ अक्षरारंभ से ले कर अंत तक थीं और हर साल दो-दो श्रेणियों को पूरा कर के मैंने तीन ही वर्ष में अपरप्राइमरी की पढ़ाई पूरी कर ली। सन 1902 ई. की जनवरी या फरवरी में जलालाबाद से बहुत दूर और गाजीपुर शहर से पश्चिम करंडा परगने के गोशंदेपुर गाँव में हमारे अध्यापक हमें अपरप्राइमरी की आखिरी कक्षा की परीक्षा दिलाने को ले गए। स्कूलों के डिप्टी साहेब ने परीक्षा ली। मुझे कुल बीस नंबर में पूरे उन्नीस मिले यह याद है और इसे देख कर परीक्षक हैंरत में थे। मुझे यह भी खूब याद है कि जो एक नंबर कम किया गया वह सिर्फ इसलिए कि हिंदी व्याकरण में जो एक प्रश्न उन्होंने किया वह व्याकरण की निर्दिष्ट पुस्तक से बाहर का था। नहीं तो बीस के बीस ही नंबर मुझे अवश्य मिलते। डिप्टी साहेब ने यह देख कर यह भी कहा कि ''भूल हुई यह लड़का यदि स्कॉलरशिप की परीक्षा में गया होता तोस्कॉलरशिप जरूर पाता।'' मगर, जब मामूली परीक्षा 20-25 मील की दूरी पर हुई तो न जाने वह कहाँ आसमान पर होती। फिर मास्टर साहेब को भी शायद मालूम न था। नहीं तो वहीं ले जाते। या क्या बात थी, मालूम नहीं। लेकिन यह सही है कि मास्टर या शिक्षा विभाग की भूल और कुप्रबंध के करते ही मैं स्कॉलरशिप से वंचित रहा। खैर, परीक्षा के बाद गोशंदेपुर से लौट आया।

आगे बढ़ने के पूर्व दो-एक मजेदार बातें और कहनी है। मैं नियमपूर्वक पढ़ता तो था हिंदी, लेकिन मास्टर लोग दोनों ही, क्योंकि वहाँ दो ही अध्यापक थे उर्दू भी जानते थे, उर्दू पढ़े-लिखे थे। फलत: कक्षा के उर्दू पढ़नेवाली लड़कों की पढ़ाई सुन कर ही मैंने बिना किताब के ही उर्दू भी साथ ही पढ़ डाली और उसका कवायद (व्याकरण) सुन-सुन कर ही याद कर लिया। फलत: हिंदी की अपरप्राइमरी की आखिरी परीक्षा देने के समय में उर्दू में भी पास होने की पूरी योग्यता रखता था, हालाँकि परीक्षा दे न सका। देता भी कैसे?दोनों की साथ ही थी। फिर हिंदी की देता या उर्दू की?एक बात और भी थी उर्दू का शिकस्त, (घसीट कर) लिखा हुआ पढ़ने का मौका भी मिलता था। क्योंकि शिक्षा विभाग की ओर से युक्त प्रांत में उन दिनों जो भी लिखा-पढ़ी होती थी, वह शिकस्त में ही होती थी। फलत: ऐसे पत्र जब आते थे और हेडमास्टर उनके उत्तर लिखते थे तो उन्हें पढ़ने का मौका मिलता था, कारण, हम उनसे हिलेमिले रहते और प्रेम करते थे, वे भी हमसे। पीछे से एक हेडमास्टर साहब ऐसे भी आए जो फारसी जानते थे और उन्होंने मुझे फारसी पढ़ाने का विचार भी किया। कुछ शुरू भी किया। लेकिन एकाएक वे दूसरी जगह चले गए और यह विचार मन का मन में ही रह गया। पीछे बहुत देर बाद सन 1922 ई. में लखनऊ जेल में मैंने कुछ किताबें मँगा कर फारसी पढ़ना शुरू किया। लेकिन दुर्भाग्य से वहाँ भी काम न हो सका और शुरू कर के ही पुनरपि रह जाना पड़ा।

उन दिनों दूर-दूर से─कई मील से पढ़ने के लिए उस स्कूल में लड़के आते थे। क्योंकि─स्कूलों की कमी थी। सभी के सभी, फिर चाहे कैसे ही घर के क्यों न हों, सुबह कुछ खा-पी कर घर से चलते थे और दोपहर के भोजनार्थ गुड़, चबेनी वगैरह लाते थे और आपस में जिनका हेलमेल था वे परस्पर थोड़ी बहुत अदली-बदली कर के खाते थे। लड़कों के लिए दोपहर में भोजन पकाने-खाने का न तो वहाँ कोई प्रबंध था, न परिपाटी थी और न इसकी जरूरत ही मानी जाती थी। हाँ, अध्यापकों का भोजन जरूर बनता था और हम लोग इस काम में उनकी सहायता किया करते थे। उन दिनों अध्यापकों की सभी प्रकार की सेवा करने की आम चलन थी और मैंने यह काम दिल लगा कर किया। अच्छी से अच्छी और पतली-से-पतली रोटियाँ बनाना मैंने उन्हीं दिनों सीखा।

पहले-पहल हमें जिन दो अध्यापकों से संसर्ग हुआ, उनमें प्रधानाध्यापक थे श्री शिवधनी सिंह और सहायक थे श्री रामदास सिंह। दोनों ही क्षत्रिय थे और कट्टर सनातनी एवं शिवबाबा के भक्त। बड़े अध्यापक के पास तो शिवपूजन की बड़ी सामग्री थी ─ सर्पाकार पीतल के सिर पर दीपक, घंटी, आचमनी, कटोरी, थाल वगैरह। मैं ही प्राय: उन्हें प्रतिदिन मलमल कर ठीक करता था। छोटे अध्यापक के पास यह सब डंड-कमंडल तो नहीं था। लेकिन वे पूजा में विल्वपत्र चढ़ाते और पुष्पदंताचार्य के महिम्नस्तोत्र का पाठ नित्य किया करते थे। उस समय तो, महिम्नस्तोत्र कौन-सी चिड़िया हैं, वह मैं समझ सका नहीं। लेकिन पीछे संस्कृत पढ़ने पर जान पाया। उन पूजाओं और पुजारी अध्यापकों के संसर्ग से कहिए या घर और गाँववालों की प्रवृत्ति से कहिए, मैं बराबर सनातनी रहा हूँ। इसकी गहरी छाप जो मेरे दिल पर उस समय पड़ी वह मिट न सकी, हालाँकि पहली कट्टरता अब नहीं रही और पीछे आ कर मैंने उस धर्म की उन्हीं बातों को बराबर माना हैं, जिन्हें बुद्धिपूर्वक मान सका हूँ। आज तक भी उनका कुछ-न-कुछ असर है, यह सही हैं। पीछे सुना कि सहायक अध्यापक आर्यसमाजी बन गए और जो पहले कट्टर मूर्तिपूजक थे वही उसके सख्त दुश्मन बन गए। अगर भूल नहीं करता तो एक बार उन्होंने इस बारे में अचानक भेंट होने पर, मुझसे दलीलें भी की थीं। उन दिनों जलालाबाद में एक क्षत्रिय वैद्य थे। भले आदमी थे और स्कूल में प्राय: आते रहते। एक दिन यों ही लड़कों ने अपनी-अपनी नब्ज उन्हें दिखाना शुरू किया कि कोई बीमारी है या नहीं। लड़के क्या समझने गए बीमारी के महत्त्व को?वह तो देखा-देखी लड़कपन था। पास मैं भी था और हाथ बढ़ा दिया था। उनने नाड़ी देख कर कहा कि कलेजे पर पित्त जमा हो रही है। उपाय न करने से आगे हानि होगी। मैंने पित्त-बित्त कुछ न समझा। फिर परवाह क्या करता?लेकिन वे कितने अनुभवी थे यह बात मैंने पीछे जानी। क्योंकि सचमुच उस पित्त के प्रकोप ने, पीछे तहसीली स्कूल में कुनाइन खाने के बाद, मुझे बहुत परेशान किया और उसकी गर्मी से बराबर परेशान रहा हूँ। ईधर बीसों बरस से नमक-मसाला छोड़ने और सख्त संयम करने से ही उसका कुछ शमन हो सका है और मुझे थोड़ा आराम मिला है।

पढ़ाई के सिलसिले में दो और बातों का यहाँ उल्लेख कर देना जरूरी है। पहली बात तो यह है कि मैं बहुत ज्यादा, सोलहो आने दिल लगा कर पढ़ता था। और दूसरे काम की ओर कभी दृष्टि भी नहीं करता था। स्कूल से कभी अनुपस्थित नहीं हुआ। शायद, बीमारी की दशा में कभी ऐसा हुआ हो। जिसकी मुझे स्मृति नहीं। कारण, उस अवस्था में बीमार होने का ख्याल ही नहीं है। सोलह वर्ष के पहले शायद ही मैं बीमार पड़ा। पढ़ने में मेरा दिल इतना लगा था कि सभी हैरत में थे। लेकिन दो-एक दिन न जाने क्या हो गया कि जब घर रहूँ तो स्कूल जाने का दिल हो और जब वहाँ जाऊँ तो घर चले आने की जबर्दस्त इच्छा हो जाए। यहाँ तक कि एक दिन चुपचाप स्कूल से बीच में ही चला भी आया। मगर दो ही एक दिन के बाद यह दशा मिट गई और मेरे सिवाय इसका पता किसी को भी न लगा। मैं आज तक भी यह समझ न सका कि यह बात क्यों हुई। लेकिन यह इतनी निराली है कि अभी तक भूली नहीं।

मेरे दिल लगा कर पढ़ने और तीक्ष्ण बुद्धि होने का ही यह परिणाम था कि विद्यार्थी जीवन में न तो कभी किसी अध्यापक आदि ने डाँट-फटकार सुनाई और न मार-पीट की। इसका तो मुझे अनुभव ही न हुआ। प्राय: सुना करता था कि बहुत तेज लड़के फेल हो जाया करते है। मगर अपने बारे में यह बात देखने की तमन्ना बनी ही रह गई।

मनोयोगपूर्वक पढ़ने के बारे में एक घटना है। जलालाबाद पढ़ने जाने के ही दिनों में ऐसा हुआ कि खेत से कट कर बाग के खलिहान में धान जमा था और वहीं शायद उसे पाँव से रौंदने (दौनी करने) के लिए कई बैल भी थे। उसी समय घर के सभी लोगों को संभवत: खेती का कोई ऐसा काम आ पड़ा कि मेरे सिवाय बैलों की रखवाली करने वाला कोई रही न गया। लाचार हो कर मुझे, जब कि किताबें ले कर पढ़ने जा रहा था, घरवालों ने बीच में ही रोक कर बैलों की रखवाली में लगा दिया और काम पर चले गए। मुझे एक दिन के लिए भी स्कूल से अनुपस्थिति असह्य थी। फलत: सभी लोगों के चले जाने पर धान की उसी ढेर में बैलों को छोड़ कर मैं चलता बना। बैलों ने खूब ही धान खाया। ख्याल नहीं कि उन्हें खूँटे में बाँध क्यों न गया। शायद वहाँ बाँधने का कोई सामान न था। लेकिन जब घरवालों ने आ कर पीछे यह दशा देखी तो उन्हें बहुत ही क्रोध आया। मैं भी डरता-डरता शाम को घर आया। लेकिन गुस्से में भी लोग केवल पूछ-पाछ कर के ही रह गए। मुझे पीछे पता चला कि लोगों ने पढ़ने में मेरा इतना प्रेम देख कर ही बर्दाश्त कर लिया और मेरी मरम्मत न की।

उस समय की एक और बात याद है। असल में मैंने आज तक घोड़े पर चढ़ना जाना नहीं। इसीलिए इससे डरता बहुत हूँ। ईधर दो बार विवश हो कर घोड़े की सवारी करनी पड़ी है। मगर घोड़ा के निहायत सीधा होने पर भी मैं परेशान हो गया। एक बार तो तीन साल पूर्व जालंधर (पंजाब) जिले के किसान-सम्मेलन में सभापतित्व करने गया और स्टेशन से तीन मील तक लोग घोड़े पर ही ले गए। वहाँ के लोगों ने कहा कि यहाँ का यही तरीका है और आप को चढ़ना ही होगा। मजबूर था आखिर ठोंक-पीट कर वैद्यराज बनने के सिवाय चारा ही क्या था?यह पहला ही मौका था। तीन मील तक धीरे-धीरे जुलूस में बाजे-गाजे के साथ सभास्थल, बड़ापिंड गाँव तक जाना पड़ा। दूसरी बार गत बरसात में किसानों के बकास्त सत्याग्रह के संबंध में मझियावाँ (गया) जाना पड़ा था। वहाँ से रात में टिकारी लौट कर मोटर से गया आना और रेल से पटना, पहुँचना अनिवार्य था। मझियावाँ में ही रात हो गई। मजबूरन एक घोड़ी पर आना पड़ा। रास्ता बहुत ही बुरा था, चौदह मील की दूरी थी और दूसरा चारा न था।

हाँ, मैं तो भूल ही गया। असल में एक बार और घोड़ी पर चढ़ा था, जब जलालाबाद पढ़ने जाता था। यह बात भूलती ही नहीं। बात यों है कि गाँव के लड़के पढ़ने जाते थे तो किसी-किसी के घर के छोटे-मोटे टट्टुओं को ले जा कर रास्ते में जलालाबाद से दक्षिण के ताल में घास चरने को छोड़ देते थे और फिर लौटने के समय वापस लाया करते थे। जाने में चढ़ कर दौड़ाते भी थे। मैं तो अलग रहता था। मगर एक दिन न जाने कैसे एक घोड़ी पर साथियों ने चढ़ा दिया। उसके बाद एकाएक वह घोड़ी एक गहरे पर सूखे तालाब के हिस्से में जिसका करारा बहुत ऊँचा था, सीधी उतर पड़ी। अब तो चीरो तो मुझमें खून नहीं और समझ लिया कि मैं उलटा, मेरे ऊपर से घोड़ी पार होगी और बस मेरा काम खत्म! लेकिन जान पर खेल कर उसकी पीठ पर चिपक गया और न जाने किस प्रकार बच गया। तभी से मैं और भी डर गया और यह तय कर लिया कि भूल कर भी घोड़े पर न चढ़ना।

उन दिनों देहातों में यह चलन थी कि स्कूलों में पढ़नेवाले लड़कों से रात में तुलसीकृत रामायण जोर से मीठे स्वर में पढ़वाई जाती थी और गाँव के बहुतेरे लोग जमा हो कर चाव से सुनते थे। कम-से-कम हमारे गाँव में यह प्रथा थी। बीच-बीच में रुक-रुक कर कोई समझदार लोग साधारण लोगों को उसके अर्थ भी समझाया करते थे। मैं और मेरे साथ एक और लड़का, जो सहपाठी था-दोनों ही प्राय: रोज इस प्रकार रामायण पढ़ा करते थे। ऐसा भी होता था कि झाल और ढोल की सहायता से गाँव के लोग दो पंक्तियों में बैठ कर रामायण की चौपाइयाँ तरह-तरह से गाया करते थे और बीच में जब वे रुकते थे तो हमसे पढ़वा कर उनका अर्थ लोगों को समझाया जाता था। एक प्रकार यह नित्य नियम था और शाम के भोजन के बाद यह बात होती थी। उन दिनों बंबई की छपी रामायण मिलती थी। कैथी अक्षरों में लिखी रामायण भी पाई जाती थी। इस प्रकार कई वर्षों तक निरंतर पाठ करने से मुझे रामायण प्राय: समस्त ही कंठस्थ थी, जो इतने दिनों के बाद भी अभी काफी याद है। आजकल की छपी रामायणों में, उसके फलस्वरूप, एक विचित्र बात पाता हूँ। पाठ में बहुत ज्यादा परिवर्तन हो गया है, इतना ज्यादा कि कहा नहीं जा सकता। जब रोज पाठ में आनेवाली अत्यंत सर्वजनप्रिय पुस्तक की यह हालत हैं, तो दूसरे पोथी-पुरानों में परिवर्तन हो जाना और मनगढ़ंत बातें घुसेड़ देना बहुत आसान हैं। क्योंकि उनका प्रचार कम होने से कोई पकड़ नहीं सकता। जब छापेखाने न थे, तब तो यह बात और भी आसान थी।

हमारे गाँव और देहात में उन दिनों ऊख (गन्ना) पेरने का कोल्हू बहुत बड़ा मोटा पत्थर का होता था, जो सदा एक ही जगह जमीन में गड़ा रहता था। उसे पथरिया कोल्हू कहते थे। उसे एक स्थान से दूसरी जगह हटा नहीं सकते थे। तब प्लेग का खतरा न था। पीछे जब मेरे देखते-देखते पहले पहल गाँव में चूहे मर कर गिरे और प्लेग देवता पधारे तो घबराहट हुई। क्योंकि नियमानुसार गाँव छोड़ कर फूस के झोंपड़ों में लोगों का चला जाना जरूरी हो गया। लेकिन पथरिया कोल्हू महाराज तो जा सकते न थे। वे तो गाँव में चहारदीवारी के भीतर आँगन में विराजमान थे और वहाँ रहने की मनाही लोगों के लिए थी। इसीलिए लोहे के नए कोल्हू या कलावती (कल) जी का आविर्भाव तथा प्रचार हुआ, जिन्हें कहीं भी आसानी से ले जा कर खड़ा कर सकते थे। आज तो पथरिया कोल्हू बेकार खड़े-खड़े पूर्व समय की स्मृतिमात्र दिलाते है। इन कोल्हुओं का रस बहुत ही सुंदर होता था। पेरने के समय खोइयों में जरा भी रस रह जाता न था। कोल्हू के बीच में उसके सिर पर एक गढ़ा सा रहता था और इसके चारों ओर ऊख की छोटी-छोटी गड़ेरियाँ भरने की जगह रहती थी। उसी गढ़े में एक मजबूत और लंबा काठ खड़ा कर देते थे जिसे जाठ कहते थे। जाठ का ऊपरी सिर नोकीला होता था जिस पर एक लकड़ी पिन्हा कर नीचे लटका दी जाती थी और उसका संबंध एक लंबे और चिपटे काठ से रहता था जिसे कातर या कतरी कहते थे और जिसका एक भाग कोल्हू की कमर में चारों ओर बनी नाली में लगा हुआ घूमा करता था। तेली के कोल्हू जैसे ही सारी बातें समझिए। यह कोल्हू प्रतिदिन का पेरना शुरू होने के पहले खूब धोया जाता था जाठ को बाहर निकाल कर, ताकि उसमें खटाई का अंश रहने न पाए। इसमें एक बात यह भी थी कि यह कई किसान परिवारों के सहयोग से ही आमतौर से चलता था और शायद ही बहुत बड़े किसान अकेले चलाते रहे हों। सभी के आदमी और बैल मिल कर रोज इसे चलाते थे और हर एक किसान की ऊख बारी-बारी से कटती तथा पेरी जाती थी। रोज दोपहर से पूर्व थोड़ी सी ऊख पेर कर उसका रस उन सभी परिवारों के घर जाता था जो उसमें शामिल रहते थे। इस कोल्हू को कुत्तो वगैरह चाटें या स्पर्श करें, जैसा कि लोहे की कल को करते ही रहते हैं, ऐसी संभावना थी ही नहीं। एक तो बंद हाते में रहता था, दूसरे काफी ऊँचा था और फिर रोजाना धोया भी जाता था। गुड़ बनाने का कड़ाह भी बंद घर में रहता था। मैंने तो लोहे की कल की गंदगी देख कर उसका रस पीना ही बंद कर दिया। हिम्मत ही नहीं पड़ती कि पी सकूँ।

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उपनयन संस्कार और गुरुमंत्र

जहाँ तक याद हैं, बारह वर्ष की अवस्था में मेरा उपनयन संस्कार हो गया और मैंने नियमित रूप में संधयोपासन करना शुरू कर दिया। यह काम दोनों समय 'सायं-प्रात:' घंटों चला करता था। उसके सिवाय मंदिर में शिव पूजन भी विधिवत किया करता था। अधिमास के समय महीने भर लगातार सह्त्रो बिल्वपत्र और फूल प्रतिदिन शिव जी पर चढ़ाता था। कभी-कभी उसके पत्रों पर चंदन से राम-राम लिख कर भी चढ़ाता था। यह पूजा धीरे-धीरे बढ़ती ही गई।

हम लोगों के वंश परंपरागत गुरु एक नानकशाही सज्जन थे। पहले इनके पूर्वज साधु रहे होंगे। मगर अब ये बाल-बच्चेवाले हो गए थे। देहातों में, और शहरों में भी, यह परिपाटी है कि सभी स्त्री-पुरुष गुरुमुख होना जरूरी समझते है। गुरुमुख का अर्थ है कुछ साधारण विधि व्यवहार के बाद एकांत में भावी गुरु जी का अपने तथा भावी शिष्य के सिर पर एक ही कपड़ा डाल कर उसी की ओट में उसके कान में मंत्र के नाम से कोई वाक्य कह देना। इसे ही कान फुँकवाना, कनफुँकिया या मंत्र लेना भी कहते हैं। प्राय: उपनयन या विवाह के समय ही यह बात की जाती है। नहीं तो तीर्थयात्रा के समय तो अवश्य ही। लोगों का ख्याल है कि बिना इसके धर्म का काम सफल नहीं होता, व्यर्थ जाता है। इसीलिए कहा करते हैं कि निगुरा (जो गुरुमुख न हो) का छुआ पानी नहीं पीना चाहिए। बिना गुरुमुख हुए कोई भवसागर से पार होई नहीं सकता, यह जबर्दस्त धारणा है और 'विनु गुरु भवनिधि तरै न कोई, जो विरंचि शंकर सम होई' जैसा महाप्रमाण इसमें पेश किया जाता है। यह भी कहते हैं कि निगुरा जिस भूमि पर बैठे, वह नापाक हो जाती है। इसीलिए अंततोगत्वा मरने के पहले गुरुमुख हो जाना अनिवार्य है। गुरु लोगों की दशा यह है कि संस्कृत के सही या गलत श्लोक, वाक्य या पद समूह से ले कर हिंदी, कैथी, गुरुमुखी या रद्दी से रद्दी और निरर्थक शब्दावली तक गुरुमंत्र के नाम पर चेले के कान में कह देते हैं। और उसे वह वेदवाक्य से बड़ा मानता है। रीति यह है कि वह गुरुमंत्र किसी को बताया नहीं जाता। इसकी सख्त मनाही है। शायद भंडाफोड़ हो जाने के डर से ही यह बंदिश की गई है। चेलों का धर्म होता है कि उस गुरुमंत्र को रोज जपें। हालाँकि विरले ही ऐसा करते हैं।

यह गुरुमुख होने की प्रथा कुछ ऐसी रूढ़ है कि इसे छोड़ने की हिम्मत लोगों को नहीं होती। ये गुरु लोग खानदानी होते हैं। बाप के मरने पर उसका उत्तराधिकारी पुत्र और साधु के मरने पर उसका चेला या उत्तराधिकारी ही गुरु हो सकता है और उसी से (मंत्र) लेना जरूरी माना जाता है। एक ग्रेजुएट ब्राह्मण ने जो पीछे डिप्टीमजिस्ट्रेट हो गए, मुझे लिखा कि क्या गुरुमुख होना जरूरी है, सो भी खानदानी गुरु से ही?मैंने उत्तर दिया कि यूनिवर्सिटी का डिप्लोमा पढ़ कर लिया था या चोरी से?पढ़ने से तो अक्ल होती है और नादानी की ये बातें छूट जाती हैं। मेरा यह मतलब है कि रूढ़ि इतनी प्रबल है कि तीक्ष्णबुद्धि अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग भी इससे बाहर जाने की हिम्मत नहीं करते और इस बेवकूफी के शिकार बन जाते हैं। इस वंश-परंपरागत गुरुवाई ने इन गुरुओं को निरक्षर और दुराचारी बना डाला है। क्योंकि उनकी पूजा, प्रतिष्ठा और आमदनी तो रुकनेवाली नहीं, फिर वे पढ़ने या सच्चरित्रता की परवाह क्यों करने लगे?नादान चेलों को इतनी भी सूझ नहीं कि जो गुरुनामधारी स्वयं निरक्षर और पापी हैं, फलत: नरक जाने से बच नहीं सकता, जो भवसागर में डूबेगा ही वही उन्हें क्यों कर नरक से बचा सकता या भवसागर में तार सकता है।

मैंने यह देखा है कि मर्द तो मर्द, औरतें भी इन्हीं गुरुओं से मंतर लेती हैं। मर्द शायद चूक भी जाए, मगर ये नहीं चूकती हैं। कितना पतन है! हिंदुओं के पोथी-पुरान में तो स्त्री के लिए पति ही गुरु है और वही तुलसीदास कहते है कि ''सपनेहु आनपुरुष जग नाहीं।'' लेकिन कौन मानता हैं?असल में स्त्रियाँ खूब कपड़ा-लत्ता, गुरुवानी के लिए साड़ी वगैरह तथा (पूजा) रुपया देती हैं। इसीलिए उन्हें जानबूझ कर फँसाया गया है। मैंने बचपन में आँखों देखा कि जब गुरु जी या उनके पुत्र आते थे तो उन्हें खाट पर बैठा कर गाँव-घर की बड़ी बूढ़ी-औरतें एक थाल में जल लाती थीं। उसी जल से गुरु महाराज के दोनों पाँव पखारे जाते थे। उसी थाल में ही और वह जल घर, आँगन में चारों ओर छिड़का जाता था सभी चीजों को पवित्र करने के लिए। गुरु जी चाहे जूते पहन कर आए, या नंगे पाँव गंदी चीजें तलवे में लगाए हुए, मगर यह विधान हर हालत में जरूरी था। उसके बाद फिर दूसरा पानी उसी थाल में लाया जा कर पुनरपि वह चरण उसमें धुलता था और वह जल सभी स्त्री-पुरुष, चेले-चेलियाँ, चुल्लू में ले कर पान कर जातीं और सिर पर छिड़क लेती थीं। कितनी गंदी और नादानी की बात है। उसके बाद गुरु जी के भोजन के अनंतर उनके जूठन की भी लूट होती थी। उसे प्रसाद कहते थे और अब भी कहते हैं। गुरु जी की और सेवाएँ तो मामूली बात हैं। जब वे चलने लगते तो सभी लोग (हर व्यक्ति) कुछ-न-कुछ द्रव्य उनके चरणों पर रखते थे, जिसे पहले भी और आज भी (पूजा) कहते हैं। यह अजीब बात है कि रुपए-पैसे को पूजा नाम दे डाला। गुरु जी लोग प्राय: हर साल चक्कर लगाया करते हैं, जिसे रामत भी कहा जाता है। हाँ, जब चेलों की संख्या बहुत हो जाती हैं तो सालाना (रामत) नहीं हो सकती। हर रामत में चेलों का धर्म है पूजा चढ़ाना और कपड़े-लत्ते देना। यदि बीच में विवाह हुआ तब तो और भी ज्यादा पूजा के हकदार गुरु जी हो जाते हैं। इस प्रकार उन्हें अपार आमदनी होती है। यह सबसे आसान और साथ-ही सबसे ज्यादा आमदनी का जरिया है। पूजा-सत्कार भी खूब ही होता है। इसलिए दुनिया में यह गुरुवाई ही सबसे अच्छा पेशा है। यही कारण है कि बड़े-बड़े विवेकी और पंडित भी, जो विचार-दृष्टि से इसका 'समर्थन' कभी नहीं कर सकते, इसमें लोभवश फँस जाते और हजारों चेले बना छोड़ते हैं।

मेरे ये विचार तो बेशक पीछे हुए बहुत पीछे, सभी बातों का अनुभव होने पर, जब कि मैं इस 'गुरुडम' के नग्नरूप को देख सका हूँ। लेकिन न जाने, क्यों अत्यंत अल्पावस्था से ही, या यों कहिए कि शुरू से ही मेरी अनास्था और अप्रवृत्ति इस ओर स्वभावत: रही है। मैंने इस बात को कभी पसंद नहीं किया। उपनयन के समय भी संयोगवश इस पाखंडी 'गुरु मंतर' का मौका न मिला, मैं इससे बच गया और सिर्फ गायत्री मंत्र का ही मुझे उपदेश हमारे पुरोहित जी ने दिया, जैसा कि उचित ही था। यद्यपि शास्त्रानुसार पिता या बड़े भाई को ही यह गायत्री मंत्रोपदेश देना चाहिए था न कि पुरोहित को, जैसा कि सभी ब्राह्मण दलों और इसीलिए भूमिहार ब्राह्मणों में भी तिर्हुत आदि में आज भी पाया जाता है। जुझौतिया ब्राह्मण तो उधर और गाँवों में हुई नहीं।तथापि युक्तप्रांत में यह प्रणाली थी नहीं और आज भी नहीं है। वहाँ पुरोहित या और ही कोई आचार्य बनता और गायत्री उपदेश करता है। यह बात सभी ब्राह्मण दलों की है। हमारे पिता आदि गायत्री जानते भी न थे। वे तो कोरे किसान थे।

बचपन से ही अनजान में ही, स्वभावत: मेरे भीतर ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मणत्व में पूरी आस्था थी और इसका मुझे गर्व था। इसीलिए ब्राह्मणोचित संधयोपासन आदि में मेरी स्वाभाविक प्रवृत्ति हुई। इसे देख कर एक-दूसरे सर्यूपारी ब्राह्मण श्री हरिनारायण पांडेय ने, जो मेरे पुरोहित न थे, परंतु समयानुसार संस्कृत के अच्छे पढ़े-लिखे धर्म-कर्म के जानकार और संध्योपासन आदि के पक्के अनुष्ठान करनेवाले थे, मुझे अपनी ओर खींचा और विस्तृत संध्योपासन, स्नान, शौचादि की विधि बताई। मैंने शीघ्र ही सभी बातें याद कर लीं और दोनों समय तीन-तीन, चार-चार घंटे तक इस काम में गुजरने लगे लेकिन खूबी यह थी कि पढ़ने-लिखने के काम में कोई त्रुटि नहीं होती थी। इससे घरवाले यों तो रंज न हुए, फिर भी धर्म-कर्म में ज्यादा लगने से घरबार त्याग कर विरागी होने का भय उन्हें लगने लगा। यह बात ईधर-उधर कही भी जाने लगी। इस मामले में पं. हरिनारायण पांडेय काफी बदनाम भी थे कि वे लोगों को विरागी बना दिया करते हैं। एकाध बार उन्होंने स्वयं भी इस धुन में घरबार छोड़ा था। मगर पीछे लौट आए। कुछ औरों को भी ऐसा कराने का महान अपराध उन पर था। इसी से लोग डरते थे।

गाँव में एक बूढ़े थे, जिनकी दशा नारद की सी थी और जो प्राय: ईधर-उधर घूम कर बातें बहुत करते रहते थे। उन्होंने संध्योपासन के प्राणायाम की खिल्ली उड़ाते हुए एक दिन कह डाला कि जो आदमी अपनी नाक दबा लेता है, उसे औरों की दबाने में क्या हिचक होगी?लेकिन बावजूद इस काना-फूसी और सनसनी के मेरा काम अबाधा चलता रहा। हाँ, श्री हरिनारायण जी ने योग की बहुत-सी पुस्तकें जमा कर रखी थीं और प्राणायाम तथा मुद्रा आदि का शौक उन्हें बहुत था। थोड़ा-बहुत ईधर-उधर से उन्होंने सीखा भी था। बस, मुझे भी प्राणायाम और योगाभ्यास की चसक लगी। उसका अभ्यास भी करने लगा। पीछे चल कर इसी चसक ने तथा एतंमूलक महान वैराग्य ने मुझे एकाएक घरबार छोड़ योगी और ईश्वरप्राप्ति के लिए संन्यासी होने को विवश किया। इस प्रकार घरवालों का भय सही साबित हुआ। इसका उल्लेख प्रसंगानुसार आगे मिलेगा।

मेरा संबंध पं. हरिनारायण पांडेय के साथ दिनों-दिन घनिष्ठ होता गया और ज्यों-ज्यों इसे रोकने की चेष्टा होती, त्यों-त्यों मैं और भी हठपूर्वक इस संबंध को दृढ़ करता गया। असल में मेरा यह स्वभाव है कि जिस बात में पड़ता हूँ, उसमें विघ्न-बाधाएँ आने पर मुझे उससे विमुख करने के बजाये और भी उसमें संलग्न कर देती है। हाँ, यदि समझा-बुझा कर कोई मनाना चाहे तो बात दूसरी है। मगर दबाव के सामने झुकना तो मैंने जाना ही नहीं। यही बात आज भी पाई जाती है। इसीलिए बहुत से लोग मुझे जिद्दी और तानाशाह तक कह डालते है। परंतु मैं इसे अपनी एक अपूर्व शक्ति समझ इसमें गर्व अनुभव करता हूँ।

इसका रहस्य समझ न सकने की लोगों की नादानी पर कभी-कभी मन-ही-मन हँसता भी हूँ। हाँ, तो मैंने पंडित जी के साथ कोई पूर्वोक्त गुरु-मंत्र का नाता तो नहीं जोड़ा, क्योंकि उसकी गुंजाईश थी ही नहीं। फिर भी उन्हें हृदय से गुरुवत मानता था। वह भी मुझमें असीम प्रेम करते थे। उन्होंने कुछ संस्कृत पढ़ने का भी श्रीगणेश कराया, जो धीरे-धीरे बढ़ता-बढ़ता पीछे संस्कृत साहित्य में मुझे भरपूर प्रवेश करने में अंततोगत्वा समर्थ हुआ। यह बात जरूर है कि मैंने यह गुरुडमवाला नाता कभी पसंद नहीं किया, इसका मैं सदा सख्त विरोधी रहा और आज भी हूँ। सह्त्रो को इस अंधपरंपरा से छुड़ाया और कभी एक भी शिष्य न बनाया। यहाँ तक कि किसी को संन्यास दे कर भी शिष्य न बनाया। हालाँकि स्वयं तो संन्यास की दीक्षा ली थी ही। परंतु यह अनिवार्य थी। मेरा एक प्रकार का यह निश्चय या संकल्प-सा है कि किसी प्रकार का शिष्य या चेला न बनाना और संन्यासी तो कभी किसी को बनाना ही नहीं। मुझे, बेशक, ऐसे मौके संन्यासी होने के बाद अनेक बार मिले, जिससे चेला बनाने में फँस ही जाता मगर किसी प्रकार चुपके से उठा, फंदे से निकल भागा।


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