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रचनावली

स्वामी सहजानन्द सरस्वती रचनावली
खंड 2

सहजानन्द सरस्वती
संपादन - राघव शरण शर्मा

अनुक्रम उत्तर भाग ─ उत्तर खंड पीछे     आगे

(1)

जमींदारी खत्म हो

जिस ईमानदारी और नेकनीयती के साथ विश्वासपूर्वक मैंने जमींदारी और जमींदारों के सुधारने और किसानों एवं उनके बीच सद्भाव लाने की कोशिश की थी,उसका परिणाम सिवाय परेशानी और भयंकर निराशा के दूसरा कुछ न हुआ। उलटे जमींदारों का कुचक्र दिन-रात बढ़ता ही गया। भूकंप के बाद जिस हृदय-हीनता का परिचय उन्होंने दिया, वह मेरी आँखों के भी सामने आज नाचता है। बिहार में सरकार के ही कथनानुसार गल्ले का दाम साठ फीसदी गिर गया। फलत:, किसानों को ढाई रुपए की जगह सिर्फ एक रुपया दाम मिलने लगा। भूकंप ने अच्छी जमीनें बालूमय कर दी थीं, जिससे पैदावार भी मारी गई। उसके बाद ही ऐसी बाढ़ आई कि किसान तबाह हो गए। भूकंप के करते जमीन की सतह ऐसी खराब हो गई कि बरसात और बाढ़ का पानी बह जाने के बजाए स्थान-स्थान पर जमा होकर खेतों को चौपट करने लगा। इसी के साथ हमने आंदोलन करने में कोई भी कसर नहीं उठा रखी। मगर सरकार और जमींदार दोनों ही वज्र बहरे हो गए। दूसरे प्रांतों ने किसानों को आराम देने के लिए कुछ-न-कुछ किया। बहुतों ने तो ज्यादा किया। मगर बिहार की सरकार ने,यहाँ के जमींदारों ने और कौंसिल ने भी गोया कसम खा ली कि वह टस से मस न होंगे। सचमुच उनके कान पर जूँ तक न रेंगी।

फलस्वरूप,मैंइस नतीजे पर पहुँचा कि जमींदार नाम की चीज ही बुरी है। वह रहने लायक नहीं। उसे खत्म करना चाहिए। मनुष्य के नाम से या और नामों से कोई , रहे भले ही। मगर इस नाम से नहीं। मेरी धारणा हो गई कि यदि मिट्टी का भी जमींदार हो तो वह भी उतना ही खतरनाक होगा। इसलिए तय कर लिया कि जमींदारी का खात्मा करना ही होगा और समय आ गया है कि किसान-सभा इस मामले में अपनी आवाज बुलंद करे। सन 1935 ई. के बीतने के पहले ही मैं इस नतीजे पर पहुँचा। आखिर , दुनिया में और खास कर बंबई आदि प्रांतों में बिना जमींदारी के ही लोग खाते-पीते रहें। तो फिर , यहाँ जमींदार बन के क्यों किसानों की छाती पर कोदो दलते रहें ? रोजगार , व्यापार करके क्यों न खाएँ-पिएँ ? शैतान से आदमी क्यों ने बन जाएँ ?

उस साल मुजफ्फरपुर जिले के हाजीपुर में तृतीय बिहार प्रांतीय किसान सम्मेलन होनेवाला था। नवंबर का महीना निश्चित था। मैं ही सभापति चुना गया था। इसलिए मौका अच्छा मिला। मैंने साथियों से कहा कि अब जमींदारी मिटाने की बात साफ-साफ बोलिए। मैंने अपने भाषण में, जो छपा था, यद्यपि इस बात को साफ-साफ नहीं कहा। तथापि इशारा जरूर किया। मेरा खयाल था और आज भी है कि महत्त्व पूर्ण सैध्दांतिक बातों के बारे में कोई व्यक्ति न बोलें। इस बारे में किसान-सभा या ऐसी संस्थाएँ ही पहले पहल निर्णय करें तो ठीक हो। खास कर सभापति के बोल देने पर और लोगों पर एक भार हो जाता है और उन्हें स्वतंत्र निर्णय करने में दिक्कत होती है। यों तो प्रचार के लिए सभी लोग बोल सकते हैं। यही कारण था कि भाषण में मैंने स्पष्ट बात नहीं कही।

यों तो हाजीपुर का इलाका छोटे-मोटे जमींदारों का है। अतएव किसानमय नहीं कहा जा सकता,जैसा कि दरभंगा, गया आदि के अनेक इलाकों को कह सकते हैं। मुजफ्फरपुर में भी ऐसे अनेक भाग हैं। फिर भी सम्मेलन अच्छा जमा और उसने एक क्रांतिकारी कदम आगे बढ़ाया जो किसान-सभा के इतिहास में अमर रहेगा। यह तो कही चुका हूँ कि मेरा भाषण छपा था। हमारे सम्मेलन को यह पहला ही अवसर ऐसा मिला था। जब मैंने वह भाषण लिख लिया तो छपने के पहले साथियों को उसे दिखला दिया। केवल यह जानने के लिए कि वह उसे पसंद करते हैं या नहीं। तभी से एक रूढ़ि सी हमारी किसान-सभा में हो गई है कि सम्मेलनों के सभापतियों के भाषण हम पहले ही देख लेते हैं। शायद कभी-कभी कुछ संशोधन भी उनमें करते हैं। इससे नीति में सामंजस्य बना रहता है और कोई गैर-जवाबदेही की बात सभापति जैसेउत्तरदायी व्यक्ति के मुँह से नहीं निकल पाती।

हाँ, तो मेरा भाषण साथियों ने पसंद किया, केवल समाजवाद के बारे में एक अंश उन्हें कुछ जरूरी न जँचा और मुझे कहा गया कि उसे निकाल दूँ तो अच्छा हो। मगर मैंने ऐसा नहीं किया। असल में मैंने अपने व्यक्तिगत विचारों के सिलसिले में लिखा कि मेरे जानते समाजवाद में धर्म का स्थान नहीं हो सकता। चाहे,उसका विरोध वह भले ही न करें। धर्म का सम्मिश्रण होते ही उसमें गड़बड़ियाँ आएँगी और अपने लक्ष्य से वह च्युत हो जाएगा। मैंने यह भी लिखा कि भौतिक दर्शन जितने हैं,उनमें यही सबसे सही है। मगर धर्म को उसमें स्थान न होने से मेरे जैसों के लिए उसमें जगह नहीं है। इस अंश को हटाने को मैं तैयार न था। यदि समाजवाद या मार्क्सवाद पर कोई आक्षेप रहता तो जरूर हटा लेता। मगर यह तो उसके एक पहलू पर मेरे निजी विचार थे जो किसी को खटक नहीं सकते थे। धर्म के मामले में आज भी मेरे विचार बहुत कुछ वैसे ही हैं। फिर भी उस कारण से उसमें शरीक होने में मुझे तो अब कोई बाधा नजर नहीं आती,हालाँकि,अब तक शरीक हूँ नहीं और इसके दूसरे ही कारण हैं।

 

 

(2)

धर्म की बात

यहधर्मका प्रश्न इतना पेचीदा और खतरनाक है कि लोगों को इससे भ्रम हो सकता है। उस भाषण से कई लोग भ्रम में पड़े भी हैं,यह मैं जानता हूँ। इसलिए प्रसंगवश यहीं उसके बारे में दो-चार शब्द कह देना चाहता हूँ। कहते हैं कि आत्मा की भूख की शांति के लिएधर्मका आविष्कार हुआ। फिर उसके दो आकार हुए─ एक वैज्ञानिक और दूसरा व्यावहारिक। पहले में दर्शन और दार्शनिक विचार आ जाते हैं। उन्हीं विचारों को अमली जामा पहनाने के सिलसिले में बाहरी तथा व्यावहारिक पूजा-पाठ आदि आते हैं।

चाहे,शुरू में इसका कुछ भी रूप क्यों न रहा हो,इसका उद्देश्य भी कितना ही पवित्र और ऊँचा क्यों न रखा गया हो और कुछ लोगों ने ठीक वैसा ही अमल भी क्यों न किया हो,लेकिन इन सब बातों का हमें आज कतई पता नहीं है। उन्हें न हमने पहले देखा था और न आज ही देखते हैं। प्रत्यक्ष तो यही देखते हैं कि धर्म में तर्क, दलील और विचार को स्थान नहीं है। यही उसका व्यावहारिक रूप है। पंडित, मौलवी और धार्माचार्य जो कहें,उसे आँख मूँद कर मानो। नहीं तो तुम्हारे विरुध्द फतवा निकल जाएगा। चीं-चपड़ मत करो। ''ऊँट बिलाई ले गई तो हाँजी हाँजी कहना!'' ये धर्माचार्य,गुरु,पंडित वगैरह भी कैसे,कि अक्ल से उन्हें ताल्लुक ही नहीं। और ये चीजें पुश्तैनी हो जाने से उनके लिए पढ़ना-लिखना भी जरूरी नहीं। फलत:, वे लोग प्राय: निरक्षर भट्टाचार्य ही होते हैं। मगर मंतर और दीक्षा देकर बैकुंठ भेजने का, बहिश्त पहुँचाने का दावा जरूर रखते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिकार संरक्षित! फलत:, धर्म के नाम पर सबसे ज्यादा अँधेरा खाता देखते हैं। वह व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो गया है। भेड़ों की ही तरह हिंदू,मुसलिम,क्रिस्तान आदि के समूह होते हैं। इस प्रकार धर्म दिल की चीज न होकर बाहरी और दिखावटी वस्तु हो गई है। हम शिखा और दाढ़ी से ही प्राय: हिंदू और मुसलमान का परिचय करते हैं।

मगर मैं इस धर्म को कतई नहीं मानता। बल्कि कह सकते हैं कि मैं ऐसे धर्म को समाज, देश और मानवता का शत्रु मानता हूँ। यह हमारी आजादी का भी बंधक है। जहाँ विवेक को स्थान नहीं और फतवा या आदेश चले,मैं उस चीज को नहीं मानता। यदि बुध्दि ही कुंठित कर दी गई और विवेक को ही स्थान न रहा, तो फिर सब खत्म ही हो गया! मैं विवेक के ऊपर लगाम और जाब चढ़ाना बर्दाश्त नहीं कर सकता और जो बात बुध्दि में न समाए, विवेक में न आए, उसे धर्म के नाम पर मानने,मनवाने का मैं सख्त दुश्मन हूँ। इसीलिए बच्चों को धार्मिक शिक्षा─जिस मानी में आज धर्मकहा जाता है, उसकी शिक्षा─देने काविरोधी हूँ। धर्म तो मेरे विचार से सोलहों आने व्यक्तिगत वस्तु है, जैसे अक्ल, दिल, आँख, नाक आदि। दो आदमियों की एक ही बुध्दि या आँख नहीं हो सकती। तो फिरधर्मकैसे दो आदमियों का एक होगा? और जैसे रोगग्रस्त शरीर में अन्न की भूख नहीं होती उसी तरह पराधीन तथा विवेकहीन आत्मा मेंधर्मया अध्ययात्म की भूख कहाँ, कि उसकी शांति का यत्न हो?इसीलिए मेराधर्मविचित्र है। उसकेसंबंधमें लोगों को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।

साथ ही साथ,मैं यह भी मानता हूँ कि जिस धर्म को आज हम देखते हैं। उसका भी सीधे विरोध करना बड़ी भारी भूल है। उसके विकृत पहलुओं का एक- एक कर के विरोध किया जा सकता है, न कि सामान्य रूप से धर्म का ही। इसमें बड़ी हानि हो सकती है। पहलुओं का विरोध भी तर्क और दलील के बल पर होना चाहिए और जिन्हें धर्म के मामले में कहने और बोलने का अधिकार है, जिनके बारे में लोग ऐसा मानते हों, वही यदि यह विरोध और खंडनमंडन करें तो अच्छा हो। दूसरों को प्राय: इसमें नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें इससे बचना चाहिए। हाँ, अमल तो सभी कर सकते हैं,ठीक उसी प्रकार का जैसी कि उनकी धारणा है। उसमें कोई खतरा या बाधा नहीं। परंतु समूह के ऊपर सहसा भयंकर प्रतिघात जिससे हो, वह काम बचाया जाए,खासकर समूह की जानकारी में। जहाँ ऐसा खतरा न हो वहाँ वह भी किया जा सकता है, अगर उसे ठीक मानते हों। जो लोग जनता में काम करते हैं, उन्हीं के लिए मेरा यह विचार है। बाकी लोग जो भी चाहें,कहें या करें। मुझे उनकी फिक्र नहीं।

हाँ,तो जमींदारी मिटाने के प्रस्ताव के साथ ही अनेक महत्त्व पूर्ण निश्चय कर के वह हाजीपुरवाला सम्मेलन संपन्न हुआ। यह समझ लेना चाहिए बकि उसके पहले कई बार ऐसा मौका आया जब कि साधारण किसान-सभाओं और जिला किसान सम्मेलनों में जमींदारी के विरुध्द प्रस्ताव आए थे और पास भी हुए थे। इस प्रकार वायुमंडल तैयार किया गया था। विशेष रूप से मुजफ्फरपुर के मनियारी मौजे में जो सम्मेलन जिले के किसानों का हुआ था , उसमें तो इस बारे में खूब चहल-पहल रही। वहाँ पहले-पहल यह सवाल उठाया गया था। कांग्रेस के कुछ ख्यातनामा लीडरों ने, जो जमींदारों के दोस्त और खुद नाममात्र के जमींदार हैं, इस प्रस्ताव के विरुध्द सारी शक्ति भी लगाई थी। मगर फिर वे बुरी तरह असफल रहे जिसका उन्हें सपने में भी खयाल न था। मैं भी वहाँ था और मेरे विचार से वे लोग फायदा उठाना चाहते थे। मगर वह भूलते थे कि मेरे विचारों के क्या मानी हैं।

 

 

 

(3)

आल इंडिया किसान-सभा और किसान बुलेटिन

सन 1935 ई. के बीतते-न-बीतते एक औरमहत्त्वपूर्ण घटना किसान-सभा के इतिहास में हुई। वामपक्ष के अनेक प्रमुख नेता मेरठ में एकत्र हुए और अन्य बातों के सिवाय उन्होंने यह भी तय किया कि अखिल भारतीय किसान-सभा का संगठन होना चाहिए। उनमें बिहार के भी कुछ मेरे साथी थे, जो आखिरकार इस बात में सहमत हो गए।वहाँ इस काम के लिए जो संगठन-समिति बनी,उसकेमंत्री,उन्होंने,मुझे,श्री एन. जी. रंगा को और श्री मोहनलाल गौतम को नियुक्त कर दिया। जिस परिस्थिति ने हमें जमींदारी के मामले में खामख्वाह आगे बढ़ाया उसी परिस्थिति ने और भी आगे जाने को विवश किया। मैं तो इसका विरोधी था। लेकिन किसान-सभा में अब तक मेरी बराबर नीति यही रही है कि साथियों की राय के बिना कुछ न करना और जिसमें वे सहमत होजाए , उसमें ज्यादा आगा-पीछा न करना , र्बशत्तो कि कुछ पेचीदा पहेली जैसी बात न हो , जिसका बुरा असर हमारी सभा पर पड़ने का खतरा हो। इसलिए मैंने मान लिया कि आल इंडिया सभा भी बने। देखा जाएगा।

इसके बाद अप्रैल के महीने में सन 1936 ई. में लखनऊ में कांग्रेस के अधिवेशन के समय ही पहला आल इंडिया किसान सम्मेलन करने का भी फैसला उन लोगों ने कर लिया। शायद यह बात मेरठ में ही तय पाई हो। सिर्फ आखिरी निश्चय पीछे कर लिया गया हो। लेकिन यह बात हुई और अखबारों में खबरें भी निकल गईं। कुछ खास प्रबन्ध तो करना न था। कांग्रेस की तैयारी थी ही। विषय-समिति के पंडाल में ही सम्मेलन करना तय करके स्वागत समिति से इस कार्य के लिए आज्ञा ले ली गई थी। यह भी उन्हीं लोगों ने तय कर लिया था कि उसका सभापति मैं ही बनाया जाऊँ। इसकी सूचना भी तार द्वारा मुझे दी गई। मगर तार मिलने के पहले ही मैं लखनऊ जा पहुँचा था। क्योंकि कांग्रेस की विषय-समिति आदि में सम्मिलित होना था। और लोग भी पहुँचे ही थे। वहाँ जाने पर ही मुझे सब बातें मालूम हो गईं। हरेक प्रांत के वामपक्षी लोगों से खास तौर से वहाँ परिचय प्राप्त किया।

तब से लेकर आज तक के मेरे पक्के साथी प्रो. रंगा और श्री इंदुलाल याज्ञिक से पहले मुलाकात वहीं हुई। यों तो एक बार रंगा जी दो मास पूर्व बिहार आने को थे। पर न आ सके। श्री इंदुलाल जी से तो लिखा-पढ़ी पहले ही से चलती थी। असल में वह बंबई में एक प्रचार संस्था बना के किसानों के संबंध की एक विज्ञप्ति कभी-कभी उसी संस्था के द्वारा प्रकाशित करते थे। मुझे भी उसे कुछ दिन से भेजने लगे थे। उन्होंने वहाँ मिलने पर उसके भेजने का कारण यह बताया कि कभी किसी अंग्रेजी अखबार में मेरे किसी भाषण का वह अंश उन्हें पढ़ने को मिला, जिसमें मैंने और बातों के साथ यह कहा था कि रोटी भगवान से बड़ी है। इसी से आकृष्ट हो के उनने मुझे पत्र लिखा और पीछे वह अंग्रेजी विज्ञाप्ति भेजने लगे।

मैं तो सशंक था कि यह कैसा आदमी है। मगर साथियों ने बताया कि वह तो हमारा ही आदमी है। तब मुझे विश्वास हो गया। पीछे तो लखनऊ में और उसके बाद हम दोनों में वह घनिष्ठता हो गई जो शायद ही और किसी के साथ हो?किसान-सभा इस बात की चिरऋणी रहेगी कि श्री इंदुलाल जी ने शुरू में अपने ही उद्योग से आल इंडिया किसान बुलेटिन अंग्रेजी में निकाल कर किसान आंदोलन की अपूर्व सेवा की। वह पंद्रहवें दिन निकलती है।

हाँ, तो सम्मेलन तो संपन्न हुआ अनेक महत्त्व पूर्ण प्रस्ताव भी पास हुए। आल इंडिया किसान कमिटी का जन्म भी वहीं हुआ। उसमें हर प्रांत के तात्कालिक उत्साही किसान कार्यकर्ता लिएगए। उसका काम और अधिकार यही रहा कि जब किसान-सभा न मिल सके तो उसकी जगह वही समझी जाए। पीछे तो नियमावली बना के सम्मेलन को ही आल इंडिया किसान-सभा का वार्षिक अधिवेशन नाम दे दिया गया। उस समय आल इंडिया किसान-सभा के तीन मंत्री चुने गए। स्थायी सभापति रखने की बात उस समय तय नहीं पाई। सोचा गया कि अधिवेशन के समय के ही लिए सभापति का पद हो,न कि स्थायी। हालाँकि, पीछे तो विधान में सभापति का पद स्थायी हो गया। वे तीनों मंत्री थे,वही पुराने तीन─मैं, प्रो. रंगा और गौतम। गौतम जी के जिम्मे ऑफिस सौंपा गया। मगर थोड़े ही दिनों बाद वह बीमार पडेऔर ऑफिस मेरे जिम्मे आ गया। तब से बराबर मैं ही उस सभा का जेनरल सेक्रटेरी रहा हूँ और ऑफिस मेरे पास ही रह गया है। सिवाय सन 1938-39 ई. के, जब मैं कोमिला के अधिवेशन में फिर सभापति चुना गया और प्रो. रंगा प्रधानमंत्री। उसी दरम्यान में केवल एक साल ऑफिस रंगा जी के साथ रहा। लखनऊ के बाद फैजपुर में ही श्री इंदुलाल याज्ञिक अन्य साथियों के साथ उसके संयुक्तमंत्रीचुने गए। तब से बराबर उस पद पर हैं।

लखनऊ में ही सोचा गया कि आल इंडिया किसान दिवस मनाया जाए। लेकिन तैयारी के लिए कुछ समय चाहिए। इसलिए पहली सितंबर ठीक हुई। तब से बराबर ही भारत भर में पहली सितंबर को आल इंडिया किसान दिवस मनाया जाता है। यों तो 'मे डे' में हम बराबर ही मजदूरों का साथ देते हैं।

आल इंडिया किसान-सभा का ऑफिस ज्योंही मेरे हाथ में सन 1936 में आया कि मैं उसे दृढ़ बनाने में लग गया।बिहार प्रांतीय किसान-सभा के कार्य से जितना समय बच पाता, उसी में लगाता। प्राय: सभी प्रांतों में दौरे भी किए कहीं एक बार और कहीं तो अनेक बार। ज्यादातर जगहों में अनेक बार ही गया। इस मामले में मैंने श्री इंदुलाल याज्ञिक को बहुत ही मुस्तैद पाया। वे मुझसे जबर्दस्ती काम लेते। उन्हीं के करते मुझे खामख्वाह समय निकालना पड़ता। जब मैं दूसरी बार सभापति चुना गया तब भी यह मेरी कोशिश पूर्ववत रही। अभी-अभी तो गत वर्ष इतनी कोशिश के बाद दो-एक को छोड़ सभी प्रांतों में बाकायदा किसान-सभा के मेंबर बनवा के उनसे आल इंडिया का हिस्सा वसूल किया है। इसके पहले प्राय: व्यक्तिगत चंदे से,तथा कुछ प्रांतों से यों ही वसूल किए पैसों से ही किसी प्रकार ऑफिस चलता था।

मगर मैं इस बात का विरोधी हूँ। जनता की संस्थाएँ और गण-आंदोलन,जिन्हें किसानों, मजदूरों और अन्य शोषितों के हाथ में पूर्ण-रूपेण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकार दिलाना है या यों कहिए, कि जिन्हे लड़ के औरों से उनके द्वारा ये अधिकार छीनना है,वह तब तक मजबूत नहीं हो सकती हैं, और न अपने लक्ष्य को ही प्राप्त कर सकती हैं, जब तक दूसरों के चंदे से बाहरी आदमियों के द्वारा उनका संचालन होता है। इसीलिए कभी-कभी साथियों के कोप का भाजन बन के भी मुझे जबर्दस्ती यह काम करना पड़ा है। फलत:, स्वावलंबी बनने के रास्ते पर कुछ दूर तक भारतीय किसान-सभा को लाने में मैं समर्थ भी हुआ हूँ।

(3)

बिहटा की चीनी-मिल

यों तो सन 1932 ई. में ही बिहटा में चीनी बनाने की मिल का सूत्रपात हुआ। मिल के संचालक श्री रामकृष्ण डालमिया आदि ने मुझसे थोड़ी-बहुत मदद भी शुरू से कुछ दिनों तक ली। मगर उस मिल से मैंने जो कुछ सीखा और वहाँ जो कुछ मुझे करना पड़ा, वह मेरे जीवन-संघर्ष का एकमहत्त्वपूर्ण अंग है। वहीं मैंने सीखा है कि मालदार और स्थिर स्वार्थवाले पूँजीपति किस प्रकार चालाकी से जनता का शोषण करते हैं। बडे-बडे नेता और महात्मा उनके शिकंजे में किस प्रकार फँस के उनकी मदद भी इस शोषण में करते हैं! फिर भी समझ नहीं सकते कि वह ऐसा कर रहे हैं! प्रत्युत, उलटे यह मानते हैं कि वे पूँजीपतियों का प्रयोग जनता के लाभार्थ कर रहे हैं! हालाँकि, दरअसल पूँजीपति ही उनका प्रयोग अपने लाभ तथा पीड़ितों के शोषण के लिए करते हैं!

सबसे पहले मिल के लिए जमीन मिलने में उन्हें दिक्कत हुई। असल में बिहटा के जमींदार बड़े काइयाँ हैं। वे किसी की सुनते नहीं। मेरे पास मिलवाले पहुँचे कि सहायता करे। मैंने कहा,देखा जाएगा। इतने में एक दिन एक भलेमानस ने, जो दानापुर लोकलबोर्ड के वाइसचेयरमैन थे, मुझसे बात-बात में यों ही कह दिया कि आप आश्रम के लिए चंदे के पीछे हैरान क्यों हैं?मिलवालों को जमीन दिलवा दीजिए। फिर तो आपको पैसे की कमी न रहेगी! मेरे खून में यह सुनते ही आग लग गई। बस,चट उन्हें सुना दिया कि ''तो क्या मिलवालों की नौकरी या गुलामी कर लूँ? या कि उनकी दरबारदारी करूँ?'' वे बेचारे तो सकपका गए और उस बात का और ही मतलब लगाना शुरू किया। मैंने फिर कहा कि यदि मैं उचित यार कर्तव्य समझ के न कर सकूँगा,तो पैसों के लोभ से नहीं ही कर सकता। ऐसे पैसों पर पेशाब करता हूँ।

इस आखिरी बात का सिर्फ यह पहला ही मौका न था। 'लोक-संग्रह' के प्रेस के सिलसिले में ऐसी बात सुनाने का मौका आया था, जिसका उल्लेख हो चुका है। उसी प्रेस के सिलसिले में पटने के एक अच्छे जमींदार ने मुझे छ: सौ रुपए दिए थे। मगर मैंने उन्हें बचा रखा था। जब वह प्रेस मैंने कार्यी जी को सौंपा तो किसी के कहने-सुनने पर कुछ रंज हो कर उलाहना देते हुए उन्होंने मुझे पत्र लिखा कि प्रेस में मैंने रुपए इसलिए नहीं दिए थे कि वह गैरों को दिया जाए। मैंने उन्हें भी यही लिखा था कि ऐसे रुपयों पर पेशाब करता हूँ, जो मुझ पर किसी प्रकार का दबाव डालें और मेरी आजादी संकुचित करें। आप जब चाहें,सूद सहित आपके रुपए लौटा दूँ। आपने जिस प्रेम से उपकार के लिए, दिया था, उसी प्रेम से मैंने उन्हें बचा रखा और इस आश्रम को सौंप दिया है। यह बात आश्रम की रिपोर्ट में आप देख सकते हैं। इस पर वह बुरी तरह झेंपे और मुझसे क्षमा माँगी।

खैर, मैंने जमींदारों से कह के जमीन तो दिलवा दी। उन्होंने कीमत आदि के लिए ज्यादा झमेला भी छोड़ दिया। मैंने समझा कि चीनी की मिलें तो अब विलायती चीनी पर प्राय: साढ़े छ: रुपए मन टैक्स लग जाने के कारण यहाँ खुलेंगी ही। लेकिन यदि कोई विदेशी आकर खोले तो उससे कहीं अच्छा यह डालमिया है, जो गाँधी टोपी तो पहनता और अपने को कांग्रेसी तो बताता है! लोग भी उसे ऐसा मानते हैं। मगर इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ। उसे इससे हिम्मत हुई। फिर तो मुझे फँसाने के लिए उसने अनेक उपाय किए। शायद लोगों ने उसे कह दिया कि यह स्वामी विचित्र है। यों न सुनेगा। जाओ और धीरे-धीरे उससे हेलमेल करो, तो शायद चकमे में आ जाए। यों तो रुपए-पैसे का नाम लेने पर जूते से ही बातें करेगा।

यही हुआ और डालमिया परिवार ने धीरे-धीरे आश्रम में आना-जाना शुरू किया। फिर प्रस्ताव किया कि मेरी बहन का यह लड़का यहीं आश्रम में ही रहे। मैंने कहा,देखा जाएगा। बाद में लड़के की माँ और दादी से भी कहलवाया। मगर मैं टालता गया। एक दिन तो यहाँ तक बात उनने कह डाली कि मैं उसके लिए अलग मकान यहीं बनवा दूँगा। फिर आश्रम के एकाधा शुभचिंतकों से यह कह दिया कि अब लड़के को रखवाइए। उन्होंने 'हाँ' भी कह दिया। इस पर मैंने कह दिया कि ''लेकिन बिना मेरी आज्ञा के वह यहाँ नहीं आ सकता।'' इस पर वे लोग चकराए कि यह क्या? और जब एक दिन उन्होंने पूछा तो मैंने साफ कह दिया कि यहाँ गरीबों के लड़के रहते हैं, बारह मास सवेरे ही उठते हैं और आश्रम का सारा काम अपने हाथों ही करते हैं। यहाँ कोई नौकर है नहीं। आपका लड़का यह कर नहीं सकता। मैं उसके साथ रियायत करके परलोक में या दुनिया को क्या उत्तर दूँगा? मैं ऐसा कर नहीं सकता। इसलिए उसे यहाँ रख नहीं सकता। इस प्रकार यह बला टली।

फिर भी आना-जाना जारी रहा। वे लोग दस-बीस दिनों के बाद पाँच-छ: रुपए लड़कों के लिए दे जाते कि इनका भोज कर दीजिए। ये ब्रह्मचारी लोग खाएँगे। कारण बताते कि आज अमुक पूजा है, आज अमुक आदमी का जन्मदिन है, आज घर में ब्याह है, आज भोज है, आदि-आदि। मैंने सोचा कि यह दूसरी बला आई और अगर ऐसे ही महीने-पंद्रह दिन बाद बराबर इनके रुपए आते रहे तो अच्छा न होगा। क्योंकि इन रुपयों में बड़ी मोहनी शक्ति है। फलत:, मुझमें इनके प्रति मुरव्वत और रियायत धीरे-धीरे आ जायगी। इन्हें यहाँ मिल में मजदूरों से काम लेना और किसानों से ऊख लेनी है। उस समय जब ये मजदूरों और किसानों को कष्ट देंगे, उन पर ज्यादतियाँ करेंगे तो मेरे लिए ये रुपए खतरनाक और जाल सिध्द होंगे। इन्हीं के करते मुरव्वत के मारे बोलने की हिम्मत न होगी। कहते हैं कि चोर जब चोरी करने चलते हैं तो साथ में गुड़ ले लेते हैं और जब कहीं रास्ते में कुत्ते भूँकते हैं, तो वही गुड़ उनके आगे फेंक देने पर उनका भूँकना रुक जाता है। वे गुड़ खाने में फँस जो जाते हैं। ठीक यही बात ये पूँजीपति करते हैं। ये हमें भूँकनेवाले समझ पहले ही से गुड़ डालते हैं। इसलिए मैंने एक दिन बेमुरव्वत हो के कह दिया कि आप आइए, जाइए खुशी से। मगर खुदा के लिए वे रुपए न दिया कीजिए। नहीं तो एक दिन आप यहाँ गरीबों पर जुल्म करेंगे और इन रुपयों की मोहनी मेरा मुँह उस समय बंद कर देगी। उन्हें यह सुनकर आश्चर्य तो हुआ। मगर फिर उनने रुपए कभी न दिए। इस प्रकार यह दूसरी बला भी खत्म हुई।

मिल के संचालकों ने बाबू राजेंद्र प्रसाद को भी मिल का एक डायरेक्टर बना दिया। उसका उद्धाटन पं. मदनमोहन मालवीय करेंगे यह भी घोषणा हो गई। उधर यह भी प्रचार किया गया कि यहाँ तो मिल के मजदूरों के लिए आदर्श निवास स्थान बनेंगे। उनके बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल आदि का पूरा प्रबंध होगा। मुझ से बातों में वे यह भी कहा करते थे कि वेग सदरलैंड आदि अंग्रेजों की जो मिलें हैं उनमें खर्च ज्यादा होता है। हम तो खर्च कम करेंगे। फलत: किसानों को काफी पैसे देकर ऊख लेंगे, मजदूरों को पर्याप्त वेतन देंगे और इतने पर भी हमारी चीनी उनकी चीनी से सस्ती होगी। खैर, मालवीय जी तो नहीं आए।

इधर जब मिल बहुत कुछ बन गई तो एक दिन बातचीत में बोले किसान तो तीन आने मन की दर से ऊख देंगे! क्योंकि उन्हें पैसे की जरूरत जो है। हमने कहा कि वेग सदरलैंड तो छ: आने देता है। आप तीन ही आने की बात कैसे करते हैं? कहने लगे कि इतने ही में परता पड़ेगा। मेरे यह कहने पर, कि अभी तो कुछ दिन पूर्व कहते थे कि हमारा खर्च कम होने से हम काफी पैसे देकर भी सस्ती चीनी बेचेंगे। तो फिर आज क्या हो गया? बोले कि आमद और माँग (Supply and demand) का सिध्दांत भी तो देखना है। मैंने कहा, कि सिर्फ ऊख के बारे में ही यह वसूल लागू होगा या चीनी के बारे में भी? विदेशी चीनी पर गहरा टैक्स लगाने पर ही तो आपकी मिल खुल सकी है! यह बात भूल गए इतनी जल्दी? चीनी के बारे में भी यही सिध्दांत लगाकर मिल खोल लें तो देखूँगा। और अगर आपकी यही नीयत है तो मैं अभी से किसान को तैयार करूँगा कि मिल में ऊख न दें। तब कहने लगे आपकी कौन सुनेगा? वह तो गर्ज का बावला,खामख्वाह जिस दाम पर हम चाहें उसी दाम पर ऊख देगा ही। मैंने कहा,मैं मानता हूँ आपके पास पैसे हैं। इसलिए सरकार और पुलिस भी आपकी सहायता करेगी। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे जो किसानों को फुसलाएँगे। आप नोटिसें आदि छपवाकर और अखबारों के द्वारा भी अपना काम निकाल लेंगे और शुरू में ऊख पाजाएगे। फिर भी मैं अपना यत्न न छोडेगा। तब हँसकर कह बैठे कि,तो फिर यत्न से लाभ ही क्या, जब मुझे ऊख मिल ही जाएगी? इस पर मैंने सुना दिया कि पचास वर्ष पूर्व जब कांग्रेस बनी तो उसे कोई पूछता न था। मगर लगे रहने का फल हुआ कि आज सरकार को वह चैलेंज देतीऔर झुकाती है। यदि किसी के घर में लगातार दस-पाँच बार लोग बीमार हों और डॉक्टर,वैद्यादि के यत्न होने पर भी मरजाए,तो इसका अर्थ यह थोड़े ही होगा कि उसके बाद कोई बीमार पड़े तो डॉक्टर वगैरह बुलाए ही न जाए। इस पर वे चुप हो गए और मैं चला आया।

लेकिन बाघ के जबड़े का पता चल गया। और मैं पूरा सजग हो गया। मेरा प्रचार किसानों में खूब हुआ। बीसियों नोटिसों और सैकड़ों सभाओं के द्वारा मैंने उन्हें आगाह किया कि खतरा है। उधर उनने भी जोर लगाया। गुड़ बनाना किसान बंद कर दें तो मिल के गुलाम बन जाए, इस चाल से उन्होंने उनमें झूठे प्रचार करने में सारी ताकत लगा दी कि गुड़ न बनाओ। मैंने पूँजीवाद का नग्न रूप वहाँ देखा। ऐसे-ऐसे गंदे और झूठे प्रचार किसानों को धोखा देने के लिए किएगए कि मैं दंग रह गया। अंत में यह भी प्रचार हुआ कि मैं मिल से दो हजार रुपए माँगता था और न मिलने पर ही विरोधी बन गया। मगर''यहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं''। किसान तो मुझे खूब जानते हैं। फलत: उसकी एक न चली और गुड़ बनाना जारी रहा। यह मेरी पहली जीत पहले ही वर्ष हो गई। उसके बाद तो मैंने,उसी साल,और आगे भी, मिलवालों को मजबूर करवा के सात और आठ आने मन तक ऊख का दाम किसानों को दिलवाया। जबकि पाँच और छही आने दूसरी जगह मिलते थे। सरकार ने भी इतना ही नियत किया था। इस प्रकार,जानें कितने लाख रुपए मिल से छीनकर किसानों को दिलाया। यों मेरी जीत पर जीत रही। उनके साथ मेरी लड़ाई जारी हो गई। मैंने उनसे साफ कह दिया कि चैन से न रहने दूँगा।

उसके बाद वहाँ तीन हड़तालें हुईं, सन 1936 की जनवरी में पहली, सन 1938 की पहली जनवरी को दूसरी और सन 1938-39 में तीसरी। पहली तो सिर्फ किसानों की थी। उसमें महीनों ऊख बंद रही! लाखों रुपए उनके (मिल के) स्वाहा हो गए। बारह और चौदह आने मन ऊख की कीमत उन्हें दूर से मँगाने में पड़ी! फिर भी सूख गई! फलत: उनकी सब गर्मी उतर गई! किसानों के पाँव पड़ते-पड़ते बीता। तब कहीं हड़ताल टूटी। किसानों के साथ जो बदसलूकी मिलवाले करते थे,वह बहुत कुछ जाती रही। हालाँकि,वह हड़ताल सफल नहीं हुई। असल में मेरी अनुपस्थिति में बिना मुझसे पूछे ही एकाएक किसानों ने मिल की शैतानियत से ऊबकर वहीं मारपीट की और ऊख बंद कर दी। जब मैं लौटा तो हालत देखी। आखिर करता क्या?किसानों का साथ तो देना ही था। फलत: ऐसा संगठन,ऐसी पिकेटिंग और ऐसी मुस्तैदी महीनों रही कि पुलिस की मदद से गाँवों से ऊख की गाड़ियाँ मँगानी पड़ीं कितने ही स्वयंसेवक पिकेटिंग में पकड़े गए। हमने भी हड़ताल की पहली शिक्षा पाई।

दूसरी हड़ताल तो किसानों और मजदूरों─दोनों─की ऐसी सफल हुई कि 48 घंटे में मिलवाले थर्रा गए और मजदूर संघ के सभापति श्री श्यामनंदन सिंहएम.एल.ए. से सुलह करके मजदूरों की सभी शर्तें उनने मान लीं। मजदूरों की बात लेकर ही हड़ताल थी। मगर किसानों ने पूरा साथ दिया। जब हुक्म मिला तभी फिर मिल में ऊख आने लगी।

मगर इसके बाद भीतर-ही-भीतर मिलवालों ने बदला चुकाने की बंदिश की। कुछ नामधारी नेताओं को, जो गाँधीवादी और सोशलिस्ट सब कुछ बनते हैं और असेंबली एवं कौंसिल के कांग्रेसी मेंबर तथा पार्लिमेंटरी सेक्रेटरी भी हैं,बुलाकर एक नकली यूनियन खड़ी कर ली। इसके बाद दूसरी हड़ताल के बाद की गईशर्तें धीरे-धीरे तोड़ने लगे। टालमटूल में नाकों दम कर दिया। जब 1938-39 का सीजन (ऊख पेरने का समय) शुरू हुआ तो हमारी यूनियन के नेता लोगों ने केवल मजदूरों की हड़ताल कराई। मगर भीतर-ही-भीतर मार-पीट दबाव के करते सिर्फ दो-ढाई सौ के सिवाय और मजदूर हड़ताल न कर सके। फलत: वह विफल हुई। मुझे बड़ा कष्ट हुआ। यूनियन के काम से मेरा ताल्लुक न रहने से और उसके लिए समय न दे सकने के कारण मैं सारी बातें जानता न था। दूसरे साथी तो उसमें थे ही और उन्हीं पर मेरा विश्वास था, मगर वे लोग काम ठीक-ठीक करते न थे। इसी से गड़बड़ी हुई। अब तो शर्म के मारे वे लोग भागने को तैयार हो गए।

मुझे यह बात बर्दाश्त न हो सकी। मैंने कहा कि किसानों की ऊख बंद करवा के और रेल से आनेवाली ऊख की पिकेटिंग कर के मिलवालों को दुरुस्त करूँगा। मगर दोस्तों को इसमें विश्वास न था। वे इतने पस्त थे कि कहने लगे कि आप भी बेइज्जत होंगे। कोई सुनेगा नहीं और पचीस-पचास आदमी जेल में जाने के बाद टाँय-टाँय फिस हो जाएगा! मैंने दिन भर उनसे दलीलें करके उन्हें विश्वास दिलाना चाहा कि किसान ऐसा न करेंगे,मेरा विश्वास है। मगर मानने को वे लोग तैयार न थे। बड़ी दिक्कत के बाद शाम को माना। और मैंने घोषणा कर दी? फिर तो बिजली दौड़ गई और 48 घंटे के भीतर पिकेटिंग में दो-ढाई सौ आदमी जेल गए,ऊख की गाड़ियाँ कतई बंद हो गईं। मिलवालों ने फिर तो थर्रा कर सुलह की। वे मेरे पास दौड़े आए और सुलह की बात चलाकर मामला तय किया। इस प्रकार जैसे-जैसे मजदूरों की रक्षा पुनरपि किसानों ने की। सबकी इज्जत रख ली। पीछे तो साथी लोग भी शर्माए।

जनसमूह का काम करनेवालों को जनता में, अपने लक्ष्य में और अपने आप में अपार विश्वास रहना चाहिए। तभी सफलता मिलती है। मुझे तो किसानों में अमिट विश्वास है। फलत:, कभी भी मुझे निराश होना नहीं पड़ा है। उन्होंने बराबर साथ दिया है। पहली हड़ताल के समय तो बड़े-बड़े दलाल मिल की तरफ से मुझे ठगने आए। एक ने तो जरा गुस्ताखी भी की। गो बाकी लोग चालाकी से ही बातें करते रहे। उसने ज्यों ही कहा कि आश्रम को दस हजार रुपए एकमुश्त और दो सौ मासिक दिएजाएगे,कि मैं गुस्से में आकर तड़पा कि जबान खींच लूँगा रे नीच, नहीं तो भाग जा। मुझे ठगने आया है?किसानों के खून का पैसा लेनेवाला मैं? फिर तो सिटपिटाकर वह भाग गया।

मैंने मिल के साथ संघर्ष करके अनुभव किया है कि स्थिर स्वार्थवाले बड़े ही कमजोर होते हैं। यदि हिम्मत करके डटिए तो शीघ्र बम बोल जाते हैं। मैंने यह भी देखा किसानों और मजदूरों के परस्पर सहयोग के बिना सफलता नहीं मिल सकती। सबसे बड़ा अनुभव यह हुआ है कि नेताओं को ठगने का उनका तरीका मालूम हो गया! वह मीठी छुरी जैसा है। अगर मैं जरा सा ढीला पड़ता तो दो-चार सौ रुपए महीने और कुछ हजार एकमुश्त लेकर आश्रम में सुंदर मकान बनवा देता, कई पंडित रख के सैकड़ों लड़कों को पढ़वाता,सुंदर पुस्तकालय बनवा देता। फिर तो चारों तरफ इसका शोर हो जाता कि स्वामी जी बड़ा काम कर रहे हैं! मगर असल में क्या होता?यही न, कि मिलवाले आठ और बारह आने के बजाए तीन ही चार आने फी मन के हिसाब से ऊख खरीदते और मजबूरन किसान उन्हें देते। क्योंकि गुड़ बनना बंद हो जाने से उनके लिए दूसरा चारा रही नहीं जाता। चाहे सरकार कुछ भी दाम ठीक करती,मगर तिकड़मबाजी से मिलवाले बहुत कम पैसे देते। और मैं? मैं तो चुप रह के टुकटुक देखा करता, यह सारी लूट, यह सारी तबाही! मुझे हिम्मत न होती कि जीभ खोलूँ। क्योंकि फिर वे पैसे बंद हो जाते जो! अनेक लीडर वहीं यही बात कर भी रहे हैं। फल यही होता कि एक ही साल में किसानों के कितने ही लाख पैसे लुटकर मिलवालों को मिल जाते और उसी खून में से दो-चार बूँदें वे हमें देते रहते! यही बात सब जगह होती है। जो धनियों एवं पूँजीपतियों से पैसे लेकर सार्वजनिक सेवा का ढोंग रचते हैं वह गरीबों का खून इसी प्रकार लुटवाकर उसी में से दो-चार बूँदे पाते हैं। यह ध्रुव सत्य है।

 

(4)

केंद्रीय असेंबली का चुनाव

मिलवालों के साथ जो मेरा संघर्ष शुरू हो गया उसका परिणाम सभी दृष्टि से अच्छा हुआ। हमारे कांग्रेसी नेता ऐसे संघर्षों से बहुत डरते और इन्हें होने देना नहीं चाहते। इनमें मुल्क की, कांग्रेस की और जनता की भी हानि का भूत उन्हें नजर आता है। मगर यहाँ हमने उलटा ही पाया। सन 1935 ई. में जो केंद्रीय असेंबली का चुनाव हुआ और जिसने लार्ड विलिंगटन का 'कांग्रेस खत्म हो गई'वाला हिसाब गलत ठहरा दिया,उसमें पटना और शाहाबाद इन दो जिलों से कांग्रेस की तरफ से बाबू अनुग्रह नारायण सिंह खड़े थे। उनकेविरोधमें रुपयों के बल पर श्री रामकृष्ण डालमिया और हिंदू हितों की ठेकेदारी के बल पर हिंदू महासभा के मंत्री और योध्दा बाबू जगतनारायण लाल डँटे थे। डालमिया का यह भी खयाल था कि बिहटा और डेहरी-आन सोन की दो मिलें और उनके हजारों आदमी भी उसकी मदद करेंगे। इधरइन दो जिलों से अनुग्रह बाबू का कोई खास ताल्लुक न था। इसीलिए कांग्रेसी लीडर डरते थे। मगर फिर भी वह जीते और बहुत अच्छी तरह जीते। उधर दोनों ही प्रतिद्वंद्वी न सिर्फ हारे,प्रत्युत बाबू जगतनारायण लाल की जमानत तक जब्त हो गई! पटने में जो वोट डालमिया को मिले उनसे तो उसकी भी जमानत जब्त हो जाती, यदि शाहाबाद में भी उसी हिसाब से मिलते। मगर वहाँ कुछ ज्यादा वोट मिल गए। इसलिए राम-राम करके उसकी जमानत रह गई!

इस चुनाव में कुछ मजेदार बातें हो गईं। बिहटा से दक्षिण पालीगंज में एक सभा थी। उसमें अनुग्रह बाबू और बाबू श्रीकृष्ण सिंह मौजूद थे। लेक्चर हुए। किसानों ने सुना। उसके बाद एक किसान ने मुझसे साफ कहा कि आपकी बात तो हम मानेंगे ही और अनुग्रह बाबू को ही वोट देंगे। मगर यह तो बताइए कि यह भी जमींदार ही तो नहीं है? मैं सहमा। लेकिन अंत में जैसे-तैसे करके उसे विश्वास दिलाया। नहीं कह सकता कि उसे मैं संतुष्ट कर सका या नहीं। मगर इस घटना से मुझे अपार खुशी हुई कि किसानों में यह चेतना आ गई। अब आसानी से जमींदारों के चकमे में वह आ नहीं सकते।

मगर उसका भय तो ठीक ही था। क्योंकि वह जानता था कि यह भी जमींदार ही हैं। पीछे तो मुझे उलाहने भी मिले। कांग्रेसी मंत्रिमंडल के जामने में अट्ठारह वर्ष के एक उसी इलाके के कोइरी के जवान लड़के ने अजीब चेहरा बना के मुझे सुना दिया कि आप ही के कहने से तो वोट दिया और अब यह हालत?मैंने उससे स्वीकार किया कि वोट ले कर धोखा जरूर दिया है। मगर उस परिस्थिति में दूसरा होई नहीं सकता था। हाँ,अब आगे ऐसा हर्गिज नहीं होगा।

दूसरी बात यह थी मिस्टर डालमियाँ ने जैसा, कि पीछे अनेक जरियों से पता चला, प्राय: एक लाख रुपया चुनाव में खर्च कर डाला! इतनी बसें, मोटरें और दूसरी सवारियाँ लाई गईं कि औरों को उस समय सवारियाँ मिलना कठिन हो गया! बनारस तक की बसें उनके काम में आई थीं। रुपए पानी की तरह बहाए जाते थे। जैसा कि धनी आदमियों का होता ही है, कुछ जी-हुजूरों की दरबारदारीवाली बातों पर ही उनने विश्वास कर लिया था कि जीतेंगे। यह भी अभिमान उन्हें था ही कि रुपए से जो चाहें कर सकते हैं। लोगों ने उनसे रुपए भी, वोट दिलाने के बहाने, खूब ही कमाए। मगर मेरा विरोध तो तेज था। फलत:, वे अंटाचित्त गिरे। अगर मेरा संघर्ष उनसे न रहता तो यह बात कदापि न हो पाती। उनके कांग्रेस विरोध का नतीजा यह हुआ कि श्री राजेंद्र बाबू को मैं बिहटा मिल की डाइरेक्टरी से हटाने से समर्थ हुआ। जब उस मिल की नीति किसान विरोधी हो गई, तभी मैंने भूकंप के बाद ही उन्हें हट जाने को कहा था। पर टालमटूल कर रहे थे। लेकिन अब क्या करते?

हिंदू महासभा के महारथी को बड़ा गर्व था कि जरूर जीतेंगे। उस इलाके से वे एक बार डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मेंबर चुने जा चुके थे। साथ ही उधर उनका बराबर आना-जाना और सट्टापट्टा रहा करता था। नमक सत्याग्रह में वहीं पकड़े भी गए थे। इसलिए कई बार दृढ़तापूर्वक राजेंद्र बाबू से उनने कह भी दिया था कि अनुग्रह बाबू जरूर हारेंगे, आप उन्हें हटा लें। मगर हमने विश्वास दिलाया था। इसलिए वे डँटे रहे। उस समय जो गन्दी नोटिसें कांग्रेस के विरुध्द वे निकालते रहे, वह उन्हीं का काम था। कांग्रेस का सीमा प्रांत की पठान जातियों के साथ एक करके उन्होंने दिखलाया और कहा कि कांग्रेस की जीत होने पर न गाय बचेगी न मंदिर, न बहू-बेटियाँ, न किसी का शिखासूत्र और न हिंदूपन का एक भी चिद्द! मंदिरों में घड़ियाल भी बजने न पाएगा! मगर उनकी एक न चली। न जाने पीछे कैसे फिर कांग्रेस की ही पूँछ पकड़ के प्रांतीय असेंबली में पहुँचने की उन्हें हिम्मत हुई! किस विचार से नेताओं ने, न सिर्फ उन्हें मेंबर बनाया, प्रत्युत पार्लिमेंटरी सिक्रेटरी भी! यह तो रहस्य ही रह जाएगा। कम-से-कम जनसाधारण के लिए तो खामख्वाह।

(5)

बैनामी सूबा

पहले पहल मुझे बंबई की कांग्रेस में एक अजीब बात सुनने को मिली। लोगों ने मुझेगाँधी जी और राजेंद्र बाबू आदि काविरोध करते देख कई बार यह कहा कि आप तो बैनामी सूबे के हैं! वहाँ तो राजेंद्र बाबू की आज्ञा चलती है और अपना विचार ताक पर रखा जाता है। मतलब यह कि बिहार प्रांत उनके हाथ बैनामा किया हुआ या बिका है। मुझे हँसी आई सही। मगर यह बात चुभी बुरी तरह से। लेकिन आखिर करता क्या? इल्जाम लगानेवालों ने ऐसा ही अनुभव किया था। बात भी कुछ ऐसी ही थी। तब तक बिहार का एक भी आदमी उनकेविरोधमें जबान न हिलाता था। सभी एक साथ ही वोट करते थे।

इसके बाद लखनऊ कांग्रेस में युक्त प्रांत के तथा अन्यत्र के प्रतिनिधियों तक ने वही ताना मारा। वहाँ भी तो हमने उनका विरोध किया था। आल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सदस्यों के चुनाव में जो आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional representation) का नियम था उसे लीडर लोग निकाल कर फिर पूर्ववत बहुमत से चुनाव रखना चाहते थे। हमने इसका सख्तविरोधकिया। और भी बातें थीं जिनकाविरोधकरना पड़ा था। और बातों में तो हम लोग हारे। मगर आनुपातिक प्रतिनिधित्व में जीते। इतने पर भी लोगों को यह कहते पाया कि बिहार बैनामी सूबा है! हालाँकि लखनऊ के बाद फिर यह ताना न सुना गया। शायद यह कलंकधुल गया।

लेकिन फिर भी मेरे लिए यह पहेली ही रह गई कि इतना बड़ा कलंक इस सूबे के मत्थे क्यों मढ़ा गया! विचारों का संघर्ष तो जरूरी है। सो भी कांग्रेस जैसी संस्था में। जहाँ सभी विचार के लोगों को आने और बोलने का न सिर्फ मौका है, प्रत्युत वे सभी बार-बार नेताओं के द्वारा आमंत्रित किए जाते हैं कि आएँ, अपने खयाल जाहिर करें और कोशिश करके बहुमत अपने पक्ष में करें। इसीलिए तो आनुपातिक प्रतिनिधित्व कांग्रेस में रखा गया था कि सभी विचार के लोग आ सकें। शुध्द बहुमत के नियम से तो उनका आना असंभव था।

मगर लखनऊ के बाद, जो श्री कृष्णवल्लभ सहाय का एक लंबा पत्र मिला, खास लखनऊ में जो घटनाएँ हुईं और उसके बाद भी जो बराबर जारी रहीं उनने इस पहेली को सुलझा दिया। फिर तो मुझे मानना पड़ा कि यह कलंक सही था। श्री कृष्णवल्लभ बाबू हजारीबाग के नेता और राजेंद्र बाबू के भक्त हैं। उन्होंने मुझे लिखा कि बिहार जो भी आगे बढ़ा है, उसे जो भी प्रतिष्ठा मिली है वह सिर्फ इसलिए कि हम लोगों ने उनकी प्रतिष्ठा की है और आँख मूँद कर उनका साथ दिया है। मगर अब वह बात नहीं रही, इसकी वेदना मुझे है। यह बड़े ही दर्द की बात है कि आप एक ओर और राजेंद्र बाबू दूसरी ओर हों और कांग्रेस में यह कुश्ती हो! यह बात बंद हो जाए तो अच्छा। मुझे इसे पढ़कर ताज्जुब हुआ। मैंने उन्हें उत्तर दिया कि प्रतिष्ठा और प्रेम तो दिल की चीजें हैं। वह हाट में खरीदी नहीं जाती हैं। मैं आज भी राजेंद्र बाबू से प्रेम रखता तथा उनकी वैसी ही प्रतिष्ठा करता हूँ। मगर बंबई या लखनऊ में जो कुछ बोला या विरोध किया, वह तो सिध्दांत की बात थी। विचारों का संघर्ष तो अच्छा है। उसके स्वागत के बजाए विचारों को कुचलने की यह चेष्टा बहुत ही बुरी है, आदि-आदि। लेकिन उसी के साथ मेरी आँखें भी खुल गईं।

लखनऊ में आनुपातिक प्रतिनिधित्व हटाने की जो कोशिश नेताओं की तरफ से की गई और वहाँ हारने पर भी जो कोशिश बराबर जारी रही, जब तक कि गत वर्ष बंबई में वे सफल न हो गए, उसने साफ बताया कि वे लोग असल में प्रगतिशील विचारों को कांग्रेस में देखना नहीं चाहते! उनसे उनके नेतृत्व और अस्तित्व के लिए खतरा मालूम हो रहा है! दिल्ली की आल इंडिया कांग्रेस कमिटी के बाद , जो सन 1937 के मार्च में हुई , तोगाँधीजी ने साफ ही लिख दिया कि कांग्रेस में एक राय और एक मत चाहिए। उसके बाद से तो यह 'एक ही खयाल और एक ही राय' वाली बात ऐतिहासिक बन गई है। इसी को लेकर त्रिपुरी में और उसके बाद बड़े-बड़े कांड हुए और श्री सुभाषचंद्र बोस के विरुध्द जेहाद बोला गया! इससे पता लगता है कि शुरू से ही अंधनुसरण तो नेता लोग चाहते ही थे और बिहार इसमें आगे था। मगर लोगों को शक न हो इसलिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया। लेकिन जब उसके करते खतरा नजर आया तो चट करवट बदली।

(6)

किसानों की माँगें फैजपुर का कार्यक्रम

सन 1936 के अगस्त में आल इंडिया कांग्रेस कमिटी की बैठक बंबई में हुई। उसमें आगे के असेंबली चुनाव के लिए घोषणा-पत्र तैयार किया गया। बेशक चुनाव को दृष्टि में रख के जो बातें उसमें लिखी गईं, वह मुल्क के लिए बहुत कुछ प्रगतिशील थीं। मगर किसानों और मजदूरों के लिए जो कुछ और खास बातें रखी जाने का आग्रह प्रगतिशील विचारवालों ने किया वह न मानी गईं! फलत: सारा यत्न बेकार गया! फिर भी वही हमारी आल इंडिया किसान कमिटी की बैठक में विधान के सिवाय हमने भारत के किसानों की जो माँगें (Gharter of rights) तैयार कीं, वहमहत्त्वपूर्ण हैं और सदा हमारी सभा के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेंगी। उस दृष्टि से वह बंबई की बैठक ऐतिहासिक है।

लेकिन जब फैजपुर में सन 1936 के दिसंबर में कांग्रेस हुई और पं. जवाहर लाल फिर सभापति चुने गए तो एक बार हमने फिर कोशिश की कि किसानों की बातें कांग्रेस खास तौर से उठाए। लखनऊ में एक प्रस्ताव के द्वारा कांग्रेस ने प्रांतीय कांग्रेस कमिटियों को हिदायत की थी कि अपने-अपने सूबे में किसानों की दशा की जाँच करके सिफारिशें आल इंडिया कांग्रेस को लिख भेजें, ताकि उसी के अनुसार कोई कार्यक्रम भारत भर के लिए तैयार किया जाए। यह लखनऊ कांग्रेस में हमारी लड़ाई और वहाँ पर आल इंडिया किसान-सभा करने का ही फल था और आल इंडिया सभा की यह पहली जीत थी। उसके अनुसार बिहार प्रांत में एक जाँच कमिटी बनी भी थी। और उसने हर जिले में जाँच भी की थी, मगर उसकी रिपोर्ट नहीं छापी गई थी! इसका विवरण आगे मिलेगा।

इसलिए ज्योंही आल इंडिया कमिटी का काम पूरा करके सभापति विषय समिति के आरंभ की घोषणा करने उठे त्योंही मैंने उनका ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट किया कि फैजपुर के बाद ही असेंबली चुनाव होनेवाला है और ज्यादातर वोटर किसान ही हैं। मगर उनके बारे में कांग्रेस का कोई खास प्रोग्राम न होने के कारण हम क्या लेकर उनके पास वोट के लिए जाएगे?लखनऊ में जो प्रस्ताव हुआ था उसके अनुसार जाँच होने पर भी कम-से-कम बिहार में तो कोई रिपोर्ट न निकली और न वहाँ से सिफारिश ही आई कि किसानों की क्या माँगें हों और उनके लिए क्या किया जाए। अधिकांश प्रांतों की यही दशा है।

इस पर बिहार के कुछ नेता बिगड़ पड़े। मगर मैंने उनका मुँहतोड़ उत्तर दे दिया। फिर सभापति जी ने इस महत्त्व पूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाने के लिए मुझे धन्यवाद देकर आश्वासन दिया कि हम लोग इस कांग्रेस में कुछ-न-कुछ प्रोग्राम किसानों के लिए खास तौर पर बनाएँगे। फलत: वर्किंग कमिटी की ही ओर से एक प्रस्ताव आया जिसमें लखनऊ के प्रस्ताव का हवाला देते हुए जिन प्रांतीय कमिटियों ने अब तक जाँच करके रिपोर्ट न तैयार की उनके काम पर खेद प्रकट किया गया और फौरन रिपोर्ट भेजने की ताकीद की गई। मर जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक के लिए उसी प्रस्ताव के अंत में एक विस्तृत कार्यक्रम किसानों के संबंध में जोड़ा गया वह 'फैजपुर किसान कार्यक्रम' के नाम से पीछे प्रसिध्द हो गया। बेशक उसमें अनेक महत्त्व पूर्ण बातें किसानों के हकों के संबंध में हैं। मगर पीछे कांग्रेस की मिनिस्ट्री बनने पर उन बातों के बारे में प्राय: लीपापोती ही की गई। उनके अनुसार ठीक-ठीक अमल न हुआ।

फैजपुर में आल इंडिया किसान-सभा का दूसरा वार्षिक अधिवेशन हुआ।
प्रो. रंगा अध्यक्ष थे। अहमद नगर के श्री महादेव विनायक भुसकुटे स्वागताध्यक्ष थे। वहाँ महाराष्ट्र के कुछ जवान सोशलिस्टों की सरगर्मी के करते और डाक्टर भुनेकर की स्वभाव सिध्द स्पष्टवादिता के फलस्वरूप कुछ गड़बड़ी होते-होते बची और हमारा काम निर्विघ्न संपन्न हुआ। वहीं हमने तय कर लिया कि कांग्रेस का पुछल्ला बनाने से हमारी सभा शक्तिमती नहीं हो सकती। कांग्रेस के अधिवेशन के समय मुख्य काम उसी का होने के कारण न तो सभा के काम को महत्त्व ही मिलता है और न हम उसमें पर्याप्त समय ही दे सकते हैं। फलत: स्वतंत्र रूप से आल इंडिया किसान-सभा का वार्षिक अधिवेशन करना तय पाया गया।

फैजपुर में जो सबसे महत्त्व पूर्ण काम हुआ और जो उसके बाद बराबर कांग्रेस अधिवेशन के समय चालू है, वह था किसानों की लंबी पैदल यात्रा और प्रदर्शन (Kisan marchs and procession)। श्री भुसकुटे के अथक परिश्रम से दो और तीन सौ माइल से पैदल चलकर किसानों के जत्थे फौजी ढंग से मार्च करते हुए ठीक समय पर फैजपुर आ गए। श्री रंगा, श्री याज्ञिक आदि के साथ मैं तीन-चार मील आगे ही जाकर जत्थे से मिला। हमारे साथ स्त्री-पुरुषों का एक खास दल उन लोगों की अगवानी करने गया। वहाँ से पैदल ही सब लोग लौटे। गए भी पैदल ही थे। कांग्रेस नगर के झंडा चौक में बड़ी जबर्दस्त सभा हुई। उसके सभापति प्रो. रंगा थे। हम सभी ने अवसर के अनुसार ही भाषण दिया। अपार भीड़ थी। राष्ट्रपति पं. जवाहरलाल नेहरू भी थोड़ी देर के लिए वहाँ आए और शामिल हुए। दो-चार शब्द कह के चले भी गए।

लखनऊ में हमने कोशिश करके किसानों के लिए कांग्रेस में जो मुफ्त टिकट खुले अधिवेशन के लिए प्राप्त किएगए थे,वह बात यहाँ न हो सकी। लाख कोशिश करने पर भी हमें निराश होना पड़ा। देहात में यह पहली कांग्रेस थी। किसानों के ही बल पर कांग्रेस की ताकत बनी और बननेवाली थी। फैजपुर के बाद ही फौरन किसानों के ही वोट से कांग्रेस को विजयी होना भी था। कई सौ मील से पैदल चल के किसान आए भी थे। मगर उनकी कतई परवाह नहीं की गई! कांग्रेस और उसकी स्वागत समिति के नेताओं की मनोवृत्ति पर इससे अच्छा प्रकाश पड़ता है। देहात की कांग्रेस किसके लाभार्थ है, इस बात की कुंजी वहीं इस बात से मिल गई।

(7)

बिहार की किसान जाँच कमिटी

फैजपुर के बाद जो असेंबलियों का चुनाव हुआ उसका उल्लेख करने के पहले, जैसा कि पूर्व में जिक्र किया गया है,बिहार की किसान जाँच कमिटी का हाल देना जरूरी है। क्योंकि उसकासंबंधफैजपुर के प्रोग्राम से है। और भी अनेक बातें हैं। पहले कह चुका हूँ कि लखनऊ कांग्रेस के समय हमारी कोशिशों के फलस्वरूप जाँच का प्रस्ताव पास हुआ था। वहाँ हमने वर्किंग कमिटी की कई बातों का खासाविरोधकिया था और हम खूब लड़े थे। मुझे याद है, लाहौर में ज्यादा सर्दी के कारण गरीब दर्शकों और प्रतिनिधियों को बड़ा कष्ट हुआ था। इसलिएगाँधीजी के जोर देने पर वहीं तय पाया कि फरवरी-मार्च में ही गर्मियों के शुरू में ही कांग्रेस हुआ करे। पाँच रुपए से एक रुपया प्रतिनिधि शुल्क भी उन्होंने ही किया और कहा कि गरीबों की कांग्रेस है। गरीब पाँच रुपए कहाँ से देंगे? मगर लखनऊ में फिर दिसंबर में कांग्रेस करने का प्रस्ताव नेताओं ने ही किया। सो भीगाँधीजी की राय से ही! प्रतिनिधि शुल्क भी पाँच रुपया कर दिया और कांग्रेस के चुने मेंबरों एवं पदाधिकारियों को खद्दर पहनना भी जरूरी किया गया।

इस पर मैंने कहा कि ठीक ही है। अब तो कांग्रेस को गरीबों से काम हई नहीं। इसीलिए तो फिर दिसंबर में होने की बात है। अब तो कौंसिल की गद्दी तोड़नेवालों का जमाना है और फरवरी, मार्च में उन्हें फुर्सत नहीं रहती! पाँच रुपए भी वही दे सकते हैं। खद्दर तो महँगा होने से गरीब पहन ही नहीं सकते! फलत: कांग्रेस धनियों और महाजनों के हाथ में जाएगी! सो भी गाँधी जी की राय से! वे अच्छे दरिद्रनारायण के पुजारी निकले! इस पर डॉ. पट्टाभिसीतारमैया ने मुझसे धीरे से कहा कि आप भयंकर स्वामी हैं "You are a terrible swami"!

खैर, लखनऊ के बाद पटने में बिहार कांग्रेस की कार्यकारिणी की मीटिंग हुई और लखनऊ के प्रस्ताव के अनुसार किसानों के संबंध में जाँच कमिटी बनाने का प्रस्ताव तय पाया। कमिटी में कौन-कौन मेंबर रहें, जब यह बात आई तो स्वभावत: किसानों के दृष्टिकोण से मैं ही रह सकता था। मैं कार्यकारिणी का मेंबर तो था ही। मगर मेंबर होना तो जरूरी था भी नहीं। इस पर राजेंद्र बाबू ने कहा और बाकी लोगों ने उसी की हामी भरी कि आपके रहने से हो सकता है कमिटी की रिपोर्ट सर्वसम्मत न हो और हम चाहते हैं कि वह हो सर्वसम्मत। ताकि उसकी कीमत हो, उसका वजन हो। एक बात और। आपके रहने से जमींदारों की और सरकार की भी चिल्लाहट होगी कि यह रिपोर्ट तो किसान-सभा की है! अत: आप न रहें तो अच्छा हो।

मगर मुझे यह दलील समझ में न आई। रिपोर्ट सर्वसम्मत हो, यह अजीब चीज थी! ऐसा तो कहीं देखा नहीं। शायद बिहार की 'बैनामी' वाली बीमारी यहाँ भी काम कर रही हो! लेकिन मेरे अकेले ही के करते सारी रिपोर्ट किसान-सभा की कही जाएगी,यह भी निराली दलील थी! क्या मैं इतना खतरनाक और प्रभावशाली था कि बिहार कांग्रेस के आठ बड़े नेता मेरे असर में आ जाते और नौ मेंबरों की लिखी रिपोर्ट किसान-सभा की बन जाती? फिर भी देखा कि इस बात पर बहुत जोर दिया जा रहा है और अगर नहीं मानता तो शायद सारा काम ही रुक जाए।

लेकिन मुझे पता भी न चले और कांग्रेस कमिटी की रिपोर्ट छप जाए खास किसानों के बारे में, यह भी असह्य बात थी। यह कैसे होगा? न जानें क्या ऊलजलूल लिख मारा जाए? गारंटी क्या?मैंने यह भय बताया। इस पर कहा गया कि रिपोर्ट लिखने के पूर्व आपको कमिटी मौका देगी कि सारी बातों पर उसके साथ बहस कर लें। रिपोर्ट प्रकाशित होने के पूर्व भी आपको देखने तथा उसमें संशोधान सुझाने का मौका दिया जाएगा। इस पर मैंने स्वीकार कर लिया और राजेंद्र बाबू की अध्यक्षता में नौ सज्जनों की जाँच कमिटी बनी। मगर पटना,गया का कोई जरूर रहे,इसलिए हमारे सोशलिस्ट दोस्त श्री गंगा शरण भी उसके एक मेंबर बनाएगए। यह भी बात निराली थी कि एक सोशलिस्ट किसान-सभावादी के रहने पर भी अब जो रिपोर्ट तैयार होगी वह किसान-सभा की न कही जाएगी।

कमिटी ने सारे सूबे में घूम-घूम कर पूरी जाँच की। पटने में तो मैं भी कई जगह रहा। उसकी जाँच की बातें अखबारों में भी छपती रहीं। कई जगहों में बहनों और लड़कियों को बेच कर जमींदार का लगान देने के बयान किसानों ने दिए, जो अखबारों में भी छपे थे। दरभंगे में तो एक औरत ने यहाँ तक कहा कि महाराजा दरभंगा के तहसीलदार ने मुझे और मेरे ससुर को बुलाकर लगान माँगा। न दे सकने पर हुक्म दिया कि इसके कपड़े छीनकर इसे नंगी करो और ससुर की टाँग में इसकी टाँग बाँध दो! पीछे जो लोग मिनिस्टर बने उन्हीं के सामने यह बयान दिया गया! सारांश यह कि, जमींदारी जुल्म का कच्चा चिट्ठा सामने आ गया। किसानों की जो माँगें थीं वह भी साफ हो गईं।

पीछे कमिटी के मंत्री ने मुझे पत्र लिखा कि रिपोर्ट तैयार हो रही है। उसकी एक प्रति आपके पास जाएगी। मुझे आश्चर्य हुआ कि तैयार होने के पूर्व मुझे मौका क्यों न दिया गया, जैसा कि बात तय पाई थी। फिर भी दूसरे मौके को भी मैंने गनीमत समझा। लेकिन आज तक उस रिपोर्ट का दर्शन न हुआ और मैं ताकता ही रह गया! सुना है कि रिपोर्ट लिखी गई और उसकी प्रतियाँ मेंबरों के पास भेजी भी गईं! मगर मैं वंचित ही रहा! तकाजे भी किए। मगर अब तब की बात होती रही। आखिर नहीं ही छपी। इसीलिए तो मैंने फैजपुर में साफ-साफ सुना दिया था। क्योंकि जला-भुना तो था ही। और इसीलिए दो-एक हजरत ने झल्ला कर कुछ कहना भी चाहा। मगर कहते क्या? कांग्रेस के प्रस्ताव, बिहार की कार्यकारिणी के प्रस्ताव एवं अपने वचनों पर पानी फेरने और बार-बार वादाखिलाफी करनेवालों को मुँह था ही क्या कि बोलें? यदि फैजपुर की कांग्रेस के प्रस्ताव के बाद भी वह रिपोर्ट छाप देते तो भी एक बात थी। मगर सो भी न कर सके। इस प्रकार लगातार दो कांग्रेसों के प्रस्तावों को पाँव तले बेमुरव्वती से रौंदा। फिर भी गैरों को कांग्रेस के बागी कहने की हिम्मत करते हैं।

बात असल यह है कि उन लोगों ने एक बार सन 1931 ई. में भी तो जाँच की थी। मगर रिपोर्ट न छापी। क्यों? कहा गया कि सत्याग्रह छिड़ गया और रिपोर्ट छापने का मौका ही न लगा! क्योंकि बीच में ही पुलिस सब कागज पत्र उठा ले गई जो फिर वापस न मिली। और जब दोबारा कांग्रेस के प्रस्तावों के अनुसार जाँच हुई तब? तब तो पुलिस का बहाना था नहीं। फिर क्या बात थी? बात तो बहुत बड़ी थी और है। बिहार के कांग्रेसी लीडर जमींदार और जमींदारों के पक्के आदमी हैं। एक-एक के बारे में गिन-गिन के कहा जा सकता है। और वे आखिर रिपोर्ट लिखते भी क्या? जमींदारी प्रथा के चलते जमींदारों ने इतने पाप और अत्याचार किसानों पर किए हैं और अभी भी करते हैं कि इन्सान का कलेजा थर्रा जाता और मनुष्यता पनाह माँगती है। अब अगर वे सारी बातें लिखी जातीं तो अपनी, अपने संबंधियों की और अपने दोस्तों की ही छीछालेदर करनी पड़ती। फलत: अपने ही मुँह में कालिख पोतना होता! अगर ये बातें न लिखते तो किसानों में और बाहरी दुनियाँ में मुँह दिखाना असंभव हो जाता! साथ ही, असेंबली के चुनाव में कांग्रेस के वोट भी किसान नहीं ही देते। फिर मंत्रिमंडल कैसे बनता? यही दोनों ओर की आफत थी जिसने उनकी कलई खोल दी।

एक बात और भी थी। गो कांग्रेस ने निश्चय नहीं किया था। फिर भी भीतर-ही-भीतर मंत्रिमंडल बनाने की सारी तैयारी हो चुकी थी। ऐसी दशा में यदि उस रिपोर्ट में यह साफ सिफारिश होती कि किसानों के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए तो वे लोग बंधन में पड़ जाते। क्योंकि अगर केवल छोटी-मोटी सिफारिशें रखते तो किसान लोग उस रिपोर्ट को उठा कर लीडरों के मुँह पर ही बेमुरव्वती से फेंक देते। और अगर किसानों की मनचाही सिफारिशें करते तो किसान तो खुश होते और वोट भी देते। मगर पहले से ही भावी मंत्रियों का हाथ बँध जाता। फिर तो वह सभी बातें पूरा किए बिना गुजर न होती।

लेकिन ऐसी दशा में 'किसान-जमींदार' समझौता के नाम से जमींदारों से इन नेताओं की गुटबंदी और गँठजोड़ा कैसे होता?इसीलिए सोचा गया कि कुछ मत लिखो। सारी चीजें गोलमटोल रखो। चुनाव की घोषणा में राजबंदियों की रिहाई की बात साफ लिखने के कारण ही तो इस्तीफे की नौबत आ गई! किसानों की बातों को लेकर तो प्रलय ही मच जाती! किसानों से जो वोट लेना था। सो तो काम चुनाव के पहले जाँच करने से होई गया। अब रिपोर्ट छाप कर नादानी क्यों की जाती?

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असेंबलियों का चुनाव

सन 1937 ई. के शुरू में ही नए विधान के अनुसार, प्रांतीयअसेंबलियों का चुनाव हुआ। बिहार में प्रांतीय कांग्रेस की कार्यकारिणी के ही माथे कांग्रेसी उम्मीदवारों को नामजद करने का काम था। मैं भी उसका एक सदस्य था। फलत:, उम्मीदवारों की नामजदगी और चुनाव में जो कटु अनुभव मुझे हुए वह उल्लेखनीय है। बहुत पहले से बातें चलती थीं और कभी-कभी गाँधीवादी लोगों में किसी-किसी ने, जो प्रांत की पूरी खबर आज भी रखते हैं और पहले भी रखते थे, मुझसे कहा था कि आपको तो मिनिस्टर बनना और खेती वगैरह का चार्ज लेना चाहिए। क्योंकि किसानों की बात आप ही समझते हैं।

साथ ही एक बात और थी। पटना के बिहटावाले इलाके से अब तक जो हजरत चुने जाते थे उन्हें तथा गया के श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह को हराना भी जरूरी था। मगर किसी को भी हिम्मत न थी कि वहाँ खड़ा हो। बड़े-बड़े लीडर आज चढ़ा-बढ़ा के बातें भले ही करें। मगर सबों की रूह काँपती थी। इसलिए एक जगह तो मैं ही खड़ा होऊँ यह इशारा भी होता था। लेकिन मेरा सदा उत्तर यही होता कि मैं वैसे कामों के सर्वथा अयोग्य हूँ। मुझे तो जनता में काम करना चाहिए।

फिर भी मैं चौंक पड़ा था कि मौके पर दबाव पड़े और कहीं मुझमें कमजोरी आ जाए तो ठीक न होगा। इसलिए जब वोटरों की लिस्ट बन रही थी तभी मैंने बड़ी ताकीद के साथ अपना नाम उस लिस्ट में न आने दिया। हालाँकि,साथियों का बड़ा हठ था। मेरी धारणा यही है कि मेरा नाम वोटर लिस्ट में कभी न आए। फिर भी लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि कांग्रेसी मंत्रियों के जमाने में जब मुझसे और प्रांतीय कांग्रेस के लीडरों से तनातनी चली तो सत्य और अहिंसा के पुजारियों ने चंपारन, सारन और दूसरे जिलों में यहाँ तक प्रचार कर डाला कि मैं तो मिनिस्टर बनना चाहता था और जब ऐसा न हो सका तो कांग्रेस का शत्रु बन गया!

हाँ, तो प्रांतीय कार्यकारिणी जब कांग्रेसी उम्मीदवार चुनने लगी तो मैंने गजब का तमाशा देखा! मुझे पता ही न चला कि किस सिध्दांत पर उम्मीदवार नामजद हो रहे हैं। कहीं तो खाँटी कांग्रेसी जो जेल गए और तबाह हुए, छोड़ दिएगए और बड़े जमींदार एवं उनके दोस्त ले लिएगए, जो न जेल गए और न कल तक खद्दर ही पहनते थे? कहीं ऐसे लग लिएगए जो अपने जुल्म के लिए किसानों में मशहूर थे। कहीं जो खद्दर तक न पहनते थे एवं गवर्नर के स्वागत एवं दरबार में शामिल रहते थे तथा आगे भी रहे उनको भी लेने की सिरतोड़ कोशिशें बड़े-बड़े नेता करते थे। कहीं ऐसी गुटबंदी की गई कि वैसों के खिलाफ कोई उम्मीदवार मिलने न पाए, ताकि वही लिएजाए! मुझसे तो कइयों ने, जो पूरे जवाबदेह थे,यहाँ तक कहा डाला कि'लाला'के खिलाफ कोई खड़ा न होगा।'लाला'एक निराले सज्जन का नाम है जो बड़े महाभारत के बाद कांग्रेस उम्मीदवार बनने से वंचित रहे। कहीं जाति-पाँति की बात चलती थी, तो कहीं अपने प्रिय पात्रो और सगे-संबंधियों की।

ऐसी पैंतरेबाजी मैंने कभी न देखी थी। इसलिए हैरान था। रह-रह के सोचता था कि क्या यही लोग मुल्क को आजाद करेंगे और क्या इसे ही राष्ट्रीयता कहते हैं? असल में जातीयता (Communalism) और राष्ट्रीयता (Nationalism) इनमें बहुत ही कम अंतर है, जो एक दशा में जाकर लापता सा हो जाता है!

मेरे सामने तो तीन कसौटियाँ थीं और तीनों पर खरे उतरनेवाले ही मेरे लिए सबसे अच्छे थे। नहीं तो दो पर और अंत में एक पर भी। मैं चाहता था कि उम्मीदवार लोग सबसे पहले तो कांग्रेस और देश के लिए जेल जुर्माने की सजा आदि काफी भुगत चुके हों, गरीब हों या गरीबों के पूरे हिमायती और किसान-सभावादी हों। यदि ये तीनों गुण न मिलें तो किसान-सभावादी होना छोड़ देता और दो भी न मिलने पर गरीब होना भी छोड़ता था। जो मुल्क के लिए तबाह बर्बाद न हुआ तो उसे तो मैं देख भी न सकता था। मगर दिक्कत यही थी कि मैं अकेला ही इस विचार का था। फलत: बार-बार जहर के घूँट पीने पड़ते थे। सोचता था,कांग्रेस की प्रतिष्ठा की बात है। यदि कहीं विरोध कर के इस झगड़े से अलग हो जाऊँ तो गड़बड़ हो सकती है। इसीलिए बर्दाश्त करता गया। लेकिन आते-आते जब अति हो गई तो मैंने साफ कह दिया कि अब नहीं चलने का। मामला यहीं बिगड़ेगा। 'I have reached here the breaking point' फिर भी दोस्तों के गले के नीचे बात न उतरी और मैं इस्तीफा दे के कार्यकारिणी से अलग हो गया। उसमें साफ लिख दिया कि इसका मतलब यह नहीं कि मैं कांग्रेस काविरोधकरूँगा या उसकी मदद न करूँगा।विरोधकी तो बात ही नहीं। मदद भी करूँगा। मगर इन नामजदगियों की जवाबदेही नहीं ले सकता और जहाँ-जहाँ उचित समझूँगा वहीं मदद करूँगा। इस्तीफा देकर उत्कल चला गया। पुरी में उत्कल प्रांतीय किसान सम्मेलन का सभापतित्व करना था।

जब वहाँ से लौटा तो बाबू राजेंद्र प्रसाद की सात पृष्ठ की चिट्ठी मिली। उसमें नामजदगियों को ठीक ठहराने की कोशिश के साथ ही मुझसे इस्तीफा वापस लेने का आग्रह किया गया था। मैंने कभी बहुत पहले उनसे कहा था कि इस साल आप प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष बनें तो हमारे साथ न्याय होने के साथ ही कांग्रेस की जीत की आशा भी हमें है। इसी बात की याद उनने दिलाई और कहा कि आप ही के कहने से सभापति बना और आपने बीच में ही साथ छोड़ दिया! मैं बीमार हूँ। अब सोचिए मुझ पर क्या गुजरती होगी। इस इस्तीफे का असर बुरा होगा। मुझे यह भी पता चला कि जिस दिन मैंने इस्तीफा दिया उस दिन वे सारी रात सोए नहीं। फलत: मैंने उन्हें लिखा कि आपकी दलीलों का तो मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। लेकिन यदि आप सोचते हैं कि मेरे इस्तीफे का असर कांग्रेस की सफलता पर जरूर पड़ेगा तो लीजिए उसे लौटाए लेता हूँ। और इस्तीफा वापस ले लिया।

उसके बाद चुनाव में मैंने सारी ताकत लगा दी। जिन जमींदारों के विरुध्द मैंने किसान को काफी लड़ाया था और उन्हें उन जमींदारों के शत्रु बनाया था जब उन्हीं जमींदारों को वोट दिलाने के लिए मैं स्वयं गया,क्योंकि अन्यथा हार जाने की नौबत थी,तो मेरे सामने पहेली खड़ी हो गई। विरोधियों के उकसाने से और स्वभावत: भी किसानों ने मुझसे पूछा कि इस जल्लाद को ही वोट दें, ऐसा आप कहते हैं? क्यों इसे भूल गए? जमींदारों के सामने ही ऐसा सुनाया। मैंने उन्हें बड़ी कठिनाई से समझा कर राजी किया। कहा कि बातें तो ठीक हैं। किसान-सभा की दृष्टि भी वही है। मगर यहाँ तो कांग्रेस की बात है न और कांग्रेस बड़ी है। वे मान गए और कहा कि आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।

मैं आज सोचता हूँ कि मैंने ठीक किया था या उन्हें धोखा दिया। क्योंकि वह जमींदार आज तो कई गुना भयंकर बन गए हैं और वे किसान रो-रो के मेरे पास आते हैं। लेकिन बात असल यह है कि हमें उस परिस्थिति से गुजरना बहुत जरूरी था। एक-न-एक दिन वैसी बात करनी ही पड़ती। चलो अच्छा हुआ और पहले ही वह बात गुजर गई। अब वैसा मौका नहीं ही आएगा, यह ध्रुव सत्य है। फिर भी हमारी इतनी भूल तो जरूर थी कि हमने किसान-सभा के कुछ गिने-चुने भी स्वतंत्र उम्मीदवार खड़े न किए।

कांग्रेसी मंत्रिमंड बनने के पहले इस चुनाव के सिलसिले में ही, बीच की चन्द किसान आंदोलन संबंधी जरूरी बातों को छोड़, कुछ दूसरी बातें यहाँ कहना जरूरी है। बीच की और बातें पीछे लिखी जाएगी। चुनाव में कांग्रेस का बहुमत हुआ। एकाध को छोड़ सभी उम्मीदवार जीत गए। गया के रामेश्वर बाबू को, जो ललकारते रहते थे, हमने एक मध्यम कोटि के उम्मीदवार को ही खड़ा कर के बुरी तरह हराया और उनकी बुरी गत की। उन्हें अंत में कहना पड़ा कि किसान-सभा ने सब मामला चौपट कर दिया। नहीं तो देखते कि कांग्रेस कैसे जीतती। बिहटा के इलाके मे श्री रजनधारी सिंह इस तरह हारे कि होश न रहा! जमानत बची यही गनीमत! हालाँकि, उन्हें अत्यधिक विश्वास था कि खामख्वाह जीतेंगे। जिन पर उनका पूरा विश्वास था वह भी उनके विरोधी हो गए! सबसे अच्छा अनुभव हमें उस चुनाव में यह हुआ कि जो लोग पैसे के लोभ से जाली (bogus) वोट उनकी ओर से देने गए थे उनमें भी तीन चौथाई ने कांग्रेसी उम्मीदवार श्री श्याम नंदन सिंह को ही वोट दिया। उनमें जो पकड़े जाते थे वह हाथ जोड़ के कहते थे कि हम गरीब हैं पैसे के लिए जाते हैं। जाने और खाने दीजिए। मत रोकिए। उसी चुनाव में यह गीत भी खूब ही प्रचलित हुई कि 'मगर कोठरी में जाकर बदल जाएगे' इसका मतलब है कि अगर दबाव के करतेविरोधी की ओर से ही जाना पड़े, वही खिलाए, पिलाए और सवारी पर चढ़ाए तो कबूल कर लो। मगर वोट देने की कोठरी में जाकर कांग्रेस को ही वोट देना। इसका असर खूब ही हुआ। वह उसी वक्त से ऐतिहासिक चीज बन गई है।

गया के जहानाबाद इलाके से बड़ी मुश्किल से हमारे पुराने किसान-सभावादी डॉ. युगल किशोर नामजद किए जा सके। कांग्रेस के लीडरों ने तो औरों से यहाँ तक कह डाला कि डॉ. युगल किशोर को नामजद करवाया जो जिद्द कर के। मगर वह हारेंगे जरूर और कांग्रेस एक जगह खो बैठेगी! पता नहीं, उनकी आँखें नतीजा देखकर भी खुलीं या नहीं कौन बताए? जहानाबाद के इलाके में तो किसान-सभा का कुत्ता भी जीत सकता था। मगर हमारे दोस्तों के दिमाग ही निराले हैं! अन्य सभी जगह हजारों हजार रुपए कांग्रेस के चुनाव कोष से फूँके गए। मगर जहानाबाद में एक कौड़ी भी न दी गई! यह दूसरा जुल्म था। मगर किसानों ने जिताया ही और बहुत अच्छी तरह जिताया।

 

 

(9)

मसरख कॉन्फ्रेंस तथा कांग्रेसी मंत्रिमंड

चुनाव खत्म होते ही सारन (राजेंद्र बाबू के) जिले के मसरख में प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन हुआ। उसमें एक प्रस्ताव था कि कीमत देकर जमींदारी खत्म की जाए। उस पर जो संशोधान किसान-सभावालों का था कि बिना कीमत दिए ही जमींदारी खत्म की जाए वही पास हुआ। असली प्रस्ताव गिर गया! अजीब जोश था। लोग हमारा भाषण सुनने को आतुर थे। कुछ जमींदारों ने पुरानी पोथियों से जमींदारी सिध्द करनी चाही। मैंने मुँहतोड़उत्तर दिया! मगर नेता लोगों ने उस प्रस्ताव को अमल में ठुकरा दिया। यह भी देखा किमंत्रीबनने के पूर्व किसानों की सभाओं और कॉन्फ्रेंसों में भावीमंत्रीलोग जाते थे और जमींदारी मिटाने का प्रस्ताव पास करवाते थे! हालाँकि, सभी जानते हैं कि दिल से वे लोग नहीं चाहते थे। पर, किसानों पर मोहनी डालने का यह अच्छा रास्ता था। लेकिनमंत्रीहोते ही जमींदारों से समझौते पर समझौते होने लगे! ऐसी पैंतरेबाजी! ऐसी नटलीला!

चुनाव के बाद कुछ ही दिन के लिए दूसरा मंत्रिमंड बन पाया था। क्योंकि हमारे दोस्तों के लिए कुछ अड़चनें थीं। पीछे वे हट गईं और कांग्रेसी लोग गद्दी पर आ विराजे। पहले तो कांग्रेस का फैसला कुछ हुआ न था। इसीलिए सन 1937 के मार्च में दिल्ली में आल इंडिया कांग्रेस कमिटी की मीटिंग हुई। वहीं इसका फैसला हो गया कि कांग्रेसी लोग मंत्री पद स्वीकार कर सकते हैं! उस बैठक में जो दलीलें मंत्रीपद के लिए दी जाती थीं उन्हें सुन के हँसी आती थी। खद्दर का खूब प्रचार होगा। सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय झंडे उड़ेंगे। गोया, राजनीति और आजादी की लड़ाई का यही अर्थ है। ''किसानों और मजदूरों को कानून आदि के जरिए आराम देंगे। वह थक गए हैं। परेशान हैं। कुछ राहत उन्हें देना जरूरी है। हमीं यह काम बखूबी कर सकते हैं''। आदि की लेक्चरबाजी खूब ही हुई! असल में थके थे तो लीडर लोग और उनके दोस्त। मगर किसानों के मत्थे पार हो रहे थे। यही आसान बहाना जो था!

लेकिन हुआ क्या? सरकारी मकानों पर राष्ट्रीय झंडे उड़े? क्या गवर्नर के मकान,सेक्रेटेरियट, असेंबली के मकान और कचहरियों पर ये झंडे दीखे भी? और जगह तो, तथा खासकर युक्त प्रांत में कॉलेजों पर ये झंडे उड़े भी। मगर बिहार में वह भी नहीं हुआ! कचहरियों आदि का तो कहना ही नहीं। प्राइवेट स्कूलों वगैरह की बात छोड़िए। वहाँ भी कहीं-कहीं उड़े। मगर पीछे तो खटाई में पड़ गए। कहा गया कि मैनेजिंग कमिटी चाहे तो तिरंगे झंडे लगा सकती है। तो फिर कांग्रेसी मंत्रिमंड को क्या करना था? दिल्ली में तो भावी मंत्रियों ने ही यह बीड़ा उठाया था। अब मैनेजिंग कमिटी के मत्थे वह बला फेंकी गई। सो भी यदि लड़कों में मतभेद न हो तभी! सारांश, जितनी ज्यादा राष्ट्रीय झंडे की अप्रतिष्ठा कांग्रेसी मंत्रियों के काल में हुई, उतनी कभी न हुई थी! जलाए और पाँव तले रौंदे तक गए वही झंडे, जिनकी शान के लिए मुल्क ने पहले बड़े-से-बड़ा त्याग किया था! कहीं-कहीं तो हमारे लीडरों ने अपने हाथों स्कूल से यह झंडा उतारा, जब कि और कोई तैयार न हुआ! इस तरह झंडेवाली बात तो यों गई।

रह गई किसानों और मजदूरों की बात। सो तो बंबई और कानपुर की गोली और आँसू लानेवाली गैस के प्रयोग आदि ही बताते हैं कि मजदूरों ने क्या पाया। उनकी हड़ताल को तोड़ने, विफल बनाने में बंबई में सारी ताकत लगा दी गई। कानून भी ऐसा बना कि मजदूरों को उसका खुले आम विरोध करना पड़ा और जब उनने उसके विरोध में हड़ताल की तो कांग्रेसी सरकार और कांग्रेस की सारी ताकत उसे तोड़ने में लगी! हालाँकि,फिर भी उनकी हड़ताल सफल हो के ही रही! जमशेदपुर,झरिया,डेहरी,बिहटा आदि के मिलों के मजदूर बिहार मंत्रिमंड को क्या कभी भूलेंगे?

किसानों की सेवा की बात तो कुछ कहिए मत। मंत्रिमंड की तारीफ के पुल तो बहुत बाँधो गए कि यह किया, वह किया। मगर इस संबंध में मैंने दो पुस्तिकाएँ अंग्रेजी में लिखकर सारा पर्दाफाश कर दिया है। उनका हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। उनके नाम हैं (1) 'The other side of the shield' (2) 'Rent reduction in Bihar : How it works.' दोनों में एक की भी एकाध बातका भी उत्तर न तो अब तकमंत्री लोग ही दे सके हैं और न उसके पृष्ठपोषक ही।

जमींदारों से इस बीच में दो-दो बार गठबंधन कर के किसानों के गले पर जो भोथरी छुरी चलाई गई उसे कौन नहीं जानता? खड़ी फसल की जब्ती को कानून के जरिए आसान कर के किसानों को जो लाभ पहुँचाया गया उसे तो वे पुश्त दर पुश्त न भूलेंगे। लगान घटाने में जो गोलमाल मचा तथा सब मिलाकर अंत में किसानों के हाथ कुछ भी न लगा, वह कभी भूलने का नहीं! जो भी कानून की एकाध बातें किसानों के फाएदे की बनी, उनकी भी शब्दावली ऐसी बनी कि जमींदारों ने सब कुछ मिट्टी में मिला दिया। भावली जमीन की नगदी में आसानी की गई। मगर हजार चिल्लाने पर भी फसल के काटने की मजदूरी और दूसरी बातों का कोई निर्णय न करने से किसानों को लेने के देने पड़ गए।

इन बातों का तो लंबा इतिहास है, जो बिहार प्रांतीय किसान-सभा के इतिहास का एक महत्त्व पूर्ण अंग है। मगर संक्षेप में ये सभी और दूसरी बातें उक्त दोनों पुस्तिकाओं में लिखी गई हैं।

लोग कहते हैं कि मैंने तो शुरू से ही तय कर लिया था कि मंत्रियों का विरोध और उनकी बदनामी करूँगा। मगर मेरे विचार का पक्का सबूत तो यह है कि जुलाई के अंत में, मंत्रिमंड बनने के बाद ही, मैं पंजाब होता विश्राम के लिए काश्मीर चला गया। साथियों से विश्वासपूर्वक कहता गया कि फैजपुर का प्रोग्राम और कांग्रेस की चुनाव घोषणा ये दोनों तो हईं। वे लोग इन पर अमल करेंगे ही। आप लोग सलाह देते रहेंगे। फिलहाल मेरा काम ही क्या है? थोड़ा विश्राम कर आऊँ।

इतना ही नहीं। वहाँ से आकर प्रीमियर से दो बार मिला और मैंने साफ कहा कि एक-दो वर्ष या जितने दिनों के भीतर, एके बाद दीगरे जो कुछ करना चाहते हैं वह हमें साफ बता दें। ताकि हम किसानों को समझा दें कि कब क्या होगा। क्योंकि किसान घबराए हुए हैं। हमें भी कोई जानकारी न होने से हम भी उन्हें क्या कह के समझाएँ? मगर कुछ उत्तर न पा सके। तब आखिर करते क्या? हमें तो उनके साथ डूबना न था। हमारी मजबूरी थी। फिर भी जिस ठंडक से हमने काम लिया उसे लोग जानते हैं। यों तो बदनाम करने का काम कुछ लोगों ने उठा ही लिया है।

हम तो दिल्ली होते हुए पंजाब गए। वहाँ लाहौर तथा रावलपिंडी में सभाएँ कर के श्रीनगर चले गए। एक महीने के बाद ही कई कारणों से वहाँ से वापस आना पड़ा। काश्मीर यात्रा की बात दिलचस्प होने से आगे उसे लिखेंगे। लौटने पर हमें मालूम हुआ कि मंत्रियों पर प्रभाव डालने के लिए हमारे साथियों ने 23-8-37 को पचास हजार किसानों का एक अच्छा प्रदर्शन किया खास पटने के मैदान में। किसानों को लेकर असेंबली भवन तक भी गए! मगर परिणाम कुछ न हुआ! जरा-सा आगे बढ़के मंत्री लोग किसानों से मिले तक नहीं और न उन्हें ढाँढ़स ही दिया! उलटे बदनाम किया! इन प्रदर्शनों का भी संक्षिप्त जिक्र आगे मिलेगा। इससे क्षोभ होना जरूरी था।

इसी बीच में 24-8-37 को काश्मीर से लौट आया। देखा कि न कुछ हुआ और नहीं लक्षण ही अच्छे हैं। इसलिए मुझे गुस्सा जरूर आया। मैं घबराया और सोचने लगा कि समूचे कार्यक्रम पर कहीं पानी तो न फिरेगा। आखिर मंत्रियों को जानता तो खूब ही था। जमींदारों से उनका सट्टापट्टा पहले से था ही। इधर और भी चलने लगा था। इसलिए पहली सितंबर को सन 1937 ई. में जो आल इंडिया किसान दिवस मनाया गया उस समय मैंने गया में किसानों के एक बहुत बड़े जमाव में कस के सुनाया और साफ कह दिया कि हम यों न मानेंगे। अगर यही रवैया रहा तो नतीजा बुरा होगा! इससे मंत्री दोस्तों और उनके पिट्ठुओं को बहुत बुरा लगा कि खुले आम शिकायत की गई। मगर करता क्या? मेरी तो मजबूरी थी।

खैर, उसके बाद साथियों की राय और आग्रह से मंत्रियों से बातें हुईं। मैंने उनसे साफ कहा कि मैं सरकारी आदमियों से मिलता शायद ही हूँ। इसी से अब तक न मिला। फिर भी जब जरूरत होगी और आप लोग चाहेंगे आ सकता हूँ। मेरे स्वभाव की मजबूरी ही तो ठहरी। उनने कहा कि हम सरकारी आदमी हैं? मैंने कहा कि जरूर!

खैर बातें हुईं और कह दिया कि जो कुछ पूछना हो मेरे साथियों से पूछ लें। यह भी बात तय हुई कि कास्तकारी कानून में संशोधान करने का बिल मुझे दिखा कर बातें करने के बाद यदि उसे प्रकाशित करें तो दिक्कत कम होगी। नहीं तो खुल के विरोध करना पड़ेगा। मगर क्या कुछ किया गया? उलटे संशोधान में लगान वसूली के केसों को दिवानी अदालतों से हटाकर माल महकमे के अफसरों के जिम्मे करने की कोशिश की गई! ऐसा बिल बन भी गया! पीछे बड़ी दिक्कत से वह रुक सका!

पार्लिमेंटरी सेक्रेटरी श्रीकृष्ण वल्लभ सहाय ने दलील में कहा कि मालमहकमा तो हमारे अधीन होगा! इसलिए अफसरों से जो चाहें करवा लेंगे। मगर अदालतें तो स्वतंत्र हैं! मैंने उत्तर दिया कि क्या स्वराज्य मिल गया? सदा गद्दी पर बैठे ही रहिएगा?अब आजादी के लिए लड़ना नहीं है? और अगर आप गद्दी पर हों तो क्या होगा? जरा सोचिए तो भला। इस पर चुप रहे। मगर उनकी बात से यह भी पता चला कि अब उन लोगों ने लड़ने का खयाल छोड़ ही दिया है।

एक और सुंदर घटना हो गई और मैंने उन लोगों के दृष्टिकोण का अंदाज पा लिया। जब एक-दो बार बड़े-बड़े प्रदर्शन पटने में हो गए जिनमें लाखों किसान आए तो बाद में मुलाकात होने पर प्राइम मिनिस्टर ने मुझसे कहा कि स्वामी जी, इस हंगामे (Mob) से सजग रहिए! मैं चुप सुनता रहा! मगर भीतर-ही-भीतर सोचा कि एक दिन इसी किसान समूह को मास (Mass)कहते थे यही लोग। आज वही माब (Mob) हो गया! ये किसान समूह पहले भी माब ही थे। बीच में प्रयोजनवश मास बने! फिर वही माब के माब रह गए! क्योंकि शायद अब इनकी जरूरत इन नेताओं को नहीं और जिनकी जरूरत न हो उन्हें इसी नाम से स्थिर स्वार्थवाले सदा से पुकारते ही चले आते हैं! सरकार भी इन्हें सदा माब कहती है और अब हमारे मंत्री लोग भी सरकार बने हैं! शायद इसलिए भी यह माब शब्द आ गया है! लेकिन किमाश्चर्यमत: परम।

जो सबसे पहला संशोधान काश्तकारी कानून में किया गया और उसके लिए जो बिल पेश हुआ वह कांग्रेस पार्टी के सामने मंजूरी के लिए कभी आया ही नहीं! यह विचित्र बात थी! इस पर हमने श्री यमुनाकार्यी एम.एल.ए. के द्वारा असेंबली के दो तिहाई (69) सदस्यों के हस्ताक्षर के द्वारा प्रार्थना करवाई कि वह पार्टी में पेश किया जाए। मगर नतीजा कुछ न हुआ! इन्हीं मेंबरोंने उसी प्रार्थना में फैजपुर प्रोग्राम और कांग्रेस की चुनाव घोषणा के आधार पर किसानों की माँगों को गिनाकर उनकी पूर्ति की माँग भी की। मगर कौन सुने?

कर्ज के बारे में जो कानून बना वह किसानों के लिए तो खास तौर से बना ही नहीं! मगर उसमें सूद की दर जो दस्तावेजी और गैर दस्तावेजी कर्जों के लिए 9 और 12 फीसदी रखी गई थी उसे कांग्रेस पार्टी ने यद्यपि 6 और 7 कर दिया। फिर घुमाफिराकर वही रखी गई। वह कानून तो इतना रद्दी बना कि दो-दो बार हाईकोर्ट को उसकी जरूरी धाराएँ गैर-कानूनी बतानी पड़ीं। तीसरी बार तो उसकी ऐसी टीका उसने की है कि शर्म मालूम पड़ती है!

वे लोग (मंत्रीगण और उनके साथी) फैजपुर के प्रोग्राम को तो भूल ही गए। कई बातें उन्हें याद दिलानी पड़ीं। फिर भी आश्चर्य है कि 'ऐसा है?' कह के भी कोई परवाह न की! आखिरकार विवश होकर टेनेन्सी कानून के संशोधानों में दो-तीन मौके ऐसे आए जब कांग्रेस पार्टी के किसान-सभावादी सात-आठ सदस्यों ने किसान कौंसिल की राय से पार्टी की आज्ञा के विरुध्द भाषण किया और पार्टी के साथ वोट नहीं किया! मगर उनके विरुध्द कुछ करने की हिम्मत वे लोग कर न सके!

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काश्मीर यात्रा

काश्मीर यात्रा की बात कह चुका हूँ। उसका कुछ हाल यहाँ देकर और बातें लिखने का विचार है। पहले तो दो दिनों में रावलपिंडी से श्रीनगर बस ले जाती थी। मगर अब एक ही दिन में रात होते-होते वहाँ पहुँच जाते हैं। सो भी प्रात:काल ही चल कर। पहाड़ों की चढ़ाई और उतराई खूब है! मरी होकर जाना पड़ता है। मरी पहुँचने पर मेघ से मुलाकात जरूर होती है। यात्रा बड़ी ही मनोरम होती है। दोनों तरफ खड़े पहाड़ और हरे-भरे जंगल चित्त को मोह लेते हैं। अधिकांश तो झेलम के किनारे-किनारे ही सड़क बनी है। उसका कलरव खूब दिलचस्प होता है।

बीच में दो मेल नामक स्थान है। यहीं से काश्मीर राज्य शुरू होता है। बड़ी सख्ती से हर चीजों की जाँच कर के तब कहीं लोग और बसें आगे बढ़ने पाती हैं! हर आदमी से पूछते हैं कि किसलिए जाते हैं। कोई लेक्चर देना हो तो जाने में दिक्कतें हैं। मुझसे भी सवाल हुआ कि वहाँ लेक्चर तो न देंगे? मैंने'नाहीं'किया। क्योंकि पूर्ण विश्राम करना था। असल में पंजाब की खुफिया पुलिस की खबर उन्हें न मिली थी। तभी तक हम वहाँ पहुँचे। नहीं तो दिक्कत होती ही। श्रीनगर पहुँचते ही खुफियावाले दूसरे दिन सुबह हाजिर आए। फिर तो बराबर एक-दो बार दिन में आते ही रहते थे। जब हम पहलगाँव होते हुए अमरनाथ के लिए रवाना हो गए तो एकाएक वे बड़े ही घबराए। मगर जब हम लौटे तब उन्हें शांति मिली!

हमें वहाँ की वे खास-खास बातें लिखनी हैं जिनका हमारे ऊपर असर हुआ। हमने सर्वत्र गंदगी बहुत ज्यादा पाई। यहाँ तक कि तबीयत ऊब जाती थी। वहाँ वादी (वायु) की बहुतायत ऐसी थी कि पेट अफड़ता रहता और हर चीज फीकी लगती। नीबू बहुत महँगा था। बाहर से ही आता था। मगर टमाटो वगैरह सभी साग-तरकारियाँ काफी और सस्ती मिलती थीं।

जो लोग वहाँ चाय नहीं पीते उन्हें वादी की तकलीफ खूब ही भोगनी पड़ती है। मैं तो चाय पीता नहीं। इसीलिए बराबर यह कष्ट रहा। वहाँ के निवासी गरीब-से-गरीब भी चाय दिन-रात में पाँच बार पीते हैं। दूध और चीनी तो उनके लिए दुर्लभ है। इसलिए नमक डाल के ही पीते हैं। हम चलानेवाले खेतों में ही ले जाते और वहीं पीते हैं।

स्त्री और पुरुष की पोशाक तो एक सी होती है। हाँ, यदि टोपी पहने तो पुरुषों में विशेषता होती है। वहाँ समूचे काश्मीर में 95प्रतिशत मुसलमान बसते हैं, और हैं वे बड़े ही गरीब। यदि शिकारें (नावें) और ताँगे न चलायँ, हाउस बोट (नाव के ही घर) किराये पर यात्रियों को न दें, ऊनी कपड़े न तैयार करें और फल वगैरह न पैदा करें, तो वे भूखों मर जाए!

और जब कभी हिंदू मुसलिम दंगे हों तो भूखों मरने की नौबत आ ही जाती है। क्योंकि उस दशा में बाहर से यात्री जाते नहीं। फिर किराए पर किसे दें और सब चीजों को खरीदे कौन? इसीलिए दंगे से वहाँ की मुसलमान जनता बहुत डरती और खार खाती है! मैंने पहलगाँव से लौटते हुए 'बस' में एक मुसलमान जवान के, जो ऊनी कपड़े बेचने गया था, इस संबंध के उद्गार सुने और गद्गद हो गया। वह भुक्तभोगी था। क्योंकि ऊनी कपड़े बनाता था।

वहाँ किसानों को महाजन बहुत सताते हैं जो कर्ज पर रुपए देते हैं। किसानों की भाषा तो समझना कठिन था। मगर उनसे बातें कर के देखा कि सूदखोरों के नाम पर वे उबल पड़ते थे। राज्य का कर और लगान भी भरपूर है। फिर भी किसानों के लिए विशेष रूप से कुछ किया नहीं जाता। प्राय: ढाई करोड़ की आय में साठ लाख तो सिर्फ महाराजा को ही अकेले चाहिए। फिर शिक्षा और स्वास्थ्य की कौन पूछे?उसके लिए पैसे आए भी कहाँ से?

वहाँ मुसलमानों की दो पार्टियाँ पाईं। एक तो मुहम्मद अब्दुल्ला साहब की। वह अब काश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस को चलाती है। जातीयता की बात उसने छोड़ दी है। यही वहाँ आज जबर्दस्त पार्टी है। दूसरे एक मौलवी साहब हैं। मगर एक बार सत्याग्रह शुरू कर के पीछे राज्य से माफी माँग लेने के कारण वह दब गए हैं। पर, अब्दुल्ला साहब तो बराबर डटे हैं। दो-एक अच्छे और काम के सिख और हिंदू भी इनके साथ हैं। इसीलिए इनका प्रभाव अच्छा है। सरदार बुधा सिंह की बड़ी तारीफ सुनी। मगर उनसे मिल न सका। वहाँ आजादी का आंदोलन प्रारंभिक दशा में है। फलत: मध्यम श्रेणी के हाथ में ही है।

दो-तीन नौजवानों से, जो या तो ग्रेजुएट थे या कॉलेज में पढ़ते थे तथा एक मौलवी साहब से, जो एक उर्दू अखबार के संपादक थे, बातें कर के तबीयत बहुत खुश हुई। देखा कि वे लोग जमाने को खूब ही समझते हैं। उनमें धर्म की कट्टरता हई नहीं। यह भविष्य की अच्छी निशानी है। मौलवी साहब वहाँ के किसानों की समस्याओं को समझते थे यह भी खुशी की बात थी।

श्रावण की पूर्णिमा को बाबा अमरनाथ का दर्शन करते हैं। उसी दिन वहाँ के साधुओं का बड़ा सा दल अन्य लोगों के साथ वहाँ पहुँचता है। उसे छड़ी कहते हैं। असल में जब वह दल रवाना होता है तो उसके आगे-आगे एक सुंदर छड़ी या लाठी लेकर एक आदमी चलता है। उस पर फूल आदि चढ़ाए रहते हैं। इसी से उस दल को ही छड़ी कहने लगे। मैं और मेरे साथी कुछ पहले ही रवाना हो गए। क्योंकि छड़ी के साथ जाने में पड़ावों पर जगह और सामान आदि मिलना असंभव हो जाता।

पहलगाँव तक तो मोटरें और बसें चलती हैं। वहाँ से या तो पैदल चलना पड़ता है, या टट्टुओं पर। सामान लादने के लिए टट्टू रहते ही हैं। प्राय: 8-10 मील पर एक पड़ाव (चट्टी) रहती है। वहीं लोग टिक जाते हैं। पहली चट्टी चंदनबाड़ी है। हम वहाँ टिके। अगले दिन प्राय: सीधो दो-ढाई मील की चढ़ाई पार की और शेषनाग की चट्टी पर जाकर दोपहर खाया-पीया। शाम को पंचतरणी पहुँच गए।

बीच में सबसे ज्यादा ऊँचाई पर जाते ही पानी और छोटे-छोटे ओले से भेंट हो गई! पंचतरणी से कुछ ही पहले यह स्थान है। प्राय: रोज ही ऐसा होता है। एक मील के फासले पर टिन के दो कमरे बने हैं। जिनमें दौड़ के छिप जाते हैं। हम भी छिपे।

पंचतरणी के पहले, बल्कि चंदनबाड़ी के आगे ही पहाड़ों पर बर्फ ही बर्फ नजर आती है। हवा खूब तेज चलती है। न पेड़, न पत्तो। नीचे से (चंदनबाड़ी से) ही लकड़ी ले जाकर उधर जलाते हैं। थोड़ी दूर तक भोजपत्र के वृक्ष थे। फिर वह भी गायब! मगर काई जैसी घास थी जिसे भेड़ें चरती थीं उसे ही धीरे-धीरे चरती हुई पहाड़ों पर चढ़ जाती थीं। भेड़ोंवाले खेमे डालकर रात-दिन पड़े रहते हैं। कभी-कभी रात में ज्यादा बर्फ पड़ने से खतरा होता है और मर भी जाते हैं। हमने देखा, उस भयंकर सर्दी में भी टट्टू रात भर वही घास चरते रहते थे!

रास्ते में सर्दी ऐसी कि जो ही अंग न ढका हो वही सुर्ख हो जाता है। पीछे वहाँ से लौटने पर सुर्ख भाग के ऊपर से पपड़ी सूखकर छूटती है। हमारे मुँह की यही दशा हुई। हमने एक पंगु को सो के घिसकते हुए जाते देखा! वाह-री हिम्मत! वह नजदीक तक जा चुका था।

अमरनाथ की गुफा में एक बगल में एक बिहारी बाबा थे। यह रात-दिन वहीं रहते थे! और तो कोई रात में वहाँ ठहरता नहीं। जो जाते वही उन्हें कुछ खाने का सामान और लकड़ियाँ दे जाते। रात-दिन लकड़ियाँ जलाते रहते थे और उन्हीं के आधार पर पड़े थे।

गुफा चौड़े द्वार की है। उसके कोने में कुछ बर्फ जमी रहती है। उसी पर पानी की बूँदें रह-रह के टपकती हैं, शायद पहाड़ पर बर्फ गलने के कारण ही। इसी से वह बर्फ बराबर बनी रहती है और कुछ भी नहीं देखा। वही बर्फ बाबा अमरनाथ के नाम से ख्यात है।

नहाने-धोने के लिए पास में ही सुंदर, पर, सर्द जल का कुंड है। मैना या चकोर के ढंग के कुछ पक्षी नजर आए। सो भी बहुत कम। मंदिर में कुछ कबूतर दीखे। रास्ते में कौओं की ही शकल के पक्षी मिले। मगर टाँग का निचला हिस्सा और चोंच सफेद थी। आवाज भी अजीब सी थी। सामान ले चलने वाले तो गरीब मुसलमान थे। दूसरे उधर हई कौन? मगर उनमें स्वाभिमान देखकर दिल खुश हो आया।

श्री भीष्म जी साहनी, एम.ए. नाम के एक युवक ने श्रीनगर और उस यात्रा में हमारी सबसे ज्यादा फिक्र की और हमें आराम से रक्खा। वे रावलपिंडी के रहनेवाले हैं। वहाँ अपनी नातेदारी में थे।

जब वहाँ से हम लौटे तो रावलपिंडी से ही खुफियावाले हमारे पीछे थे। लाहौर में तो आधो दर्जन गाड़ी के सामने खड़े रहे जब तक ट्रेन न छूटी। एक-दो तो बराबर ट्रेन में चलते थे। यहाँ तक कि मेरठ के बाद भी जब हमने बार-बार उन्हें स्टेशनोंपर आते देखा, यहाँ तक कि हाथरस के आगे बढ़ने पर भी, तो गुस्सा आया कि कांग्रेसी मिनिस्ट्री भी क्या चीज है, जो ये पुलिसवाले हमें चैन से रहने नहीं देते! फिर जब मैं ऊपर वाले बर्थ पर जाकर सवेरे ही सो गया, तब कहीं उनसे पिंड छूटा।

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प्रांतीय किसान कॉन्फ्रेंसे

सन 1935 ई. में हाजीपुर में जो प्रांतीय किसान कॉन्फ्रेंस हुई थी उसके बाद अगले साल बीहपुर (भागलपुर) में होने को थी। वह साल बीतते न बीतते हो भी गई। श्री जयप्रकाश नारायण सभापति थे। यहाँ तक कोई खास दिक्कतें न हुईं। वह तो आगे आनेवाली थीं! हाँ, बीहपुर में ही 'जनता' नामक साप्ताहिक पत्र हिंदी में निकालने और उसके लिए 'जन साहित्य संघ' स्थापित करने का विचार मित्रो ने किया। मगर मैंने साफ कह दिया कि मैं उसमें पड़ नहीं सकता। अखबारों और संस्थाओं के जो कटु अनुभव मुझे हुए थे उनके बल पर ही मैंने 'नहीं' की। खास कर पैसे का प्रश्न था और सार्वजनिक पैसे को जिस लापरवाही से हम लोग देखते और प्रयोग या दुरुपयोग करते हैं वह मुझे बराबर अखरता है। हजार कहने पर भी और कुछ दोस्तों के रंज हो जाने पर भी, क्योंकि मैंने उनके गुण-दोष साफ सुना दिए, मैंने 'हाँ' नहीं ही किया। फिर भी श्री जयप्रकाश नारायण ने मेरा नाम उसमें मेरी रजामंदी के बिना ही दे दिया। मैं मुरव्वतवश इनकार न कर सका। यही मेरी भूल थी। उसका फल भी चखना पड़ा।

हाँ, तो बीहपुर में दूसरे दिन सभापति जी किसी अनिवार्य काम से चले गए और मुझे ही अध्यक्षता करनी पड़ी। हमारी सभा में झंडे का सवाल पहले से ही छिड़ा था। वहाँ वह तेज हो गया कि कौन-सा झंडा रखा जाए। बहुत लोग लाल और तिरंगे को एक ही साथ रखने के पक्ष में थे। इसको ले कर वहाँ बड़ी चख-चुख रही। कुछ कांग्रेसी दोस्तों ने बड़ी गड़बड़ी भी मचाई। प्रस्ताव तो यही रखा गया था कि इस मामले में सभी सभाओं से राय माँग कर फैसला करें। मगर कॉन्फ्रेंस में ऊधम मचाया गया। शाम का समय था। फिर रात हो गई। घंटों कुछ लोग, कुछ जवानों और छात्रो को बहका के (हू-हू) और शोर करते रहे। मेरे साथी बार-बार घबराए। मगर मैं ठंडा रहा। कई बार समझाया, हाथ जोड़ा। पर, जब वे लोग चुप न हुए तो मैंने कहा कि इन्हें थक जाने दो। फिर काम होगा। हुआ भी वही। जब वे लोग थक के ठंडे पड़े तो फिर काम शुरू हो के पूरा हुआ। यदि मैं घबराता, तो सारा गुड़ गोबर ही हो जाता।

सन 1937 में हमारी कॉन्फ्रेंस मुंगेर जिले के बछवारा में होने को थी। महंत सियाराम दास स्वागताध्यक्ष थे और पं. यदुनंदन शर्मा सभापति। लेकिन मुंगेर जिला कांग्रेस कमिटी, प्रांतीय कार्यकारिणी और प्रधानमंत्री की सारी ताकत लगा कर उसका विरोध किया गया, ताकि वह विफल हो जाए। फिर भी परिणाम यह हुआ कि किसान-सभा के इतिहास में वह अद्वितीय कॉन्फ्रेंस हुई। उसमें लाखों से ज्यादा किसान सम्मिलित हुए! हाँ लाखों से ज्यादा!

बात यह थी कि उसी साल मुंगेर जिला कांग्रेस कमिटी ने प्रस्ताव कर दिया कि कोई भी कांग्रेसी किसान-सभा में भाग न ले। पीछे उसका समर्थन प्रांत की कार्यकारिणी ने भी कर दिया। प्रधानमंत्री का तो वह जिला ही ठहरा! इधर वहाँ के हमारे प्रमुख किसान कर्मी ठहरे पं. कार्यानंद शर्मा जो पक्के कांग्रेसी हैं। स्वागताध्यक्ष का भी वही हाल! इसलिए कठिनाई हुई। स्वागताध्यक्ष ने वहाँ के कांग्रेसी नेताओं के पाँव पड़ के आरजू की कि सम्मेलन होने दीजिए। मगर वे तो अभिमान में चूर थे। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड उनका, कांग्रेस कमिटी उनकी और मंत्री लोग उन्हीं के! फिर तो 'करैला नीम पर चढ़ गया'!

इतना ही नहीं कि सिर्फ वह प्रस्ताव पास हुआ। हमारे बछवारा सम्मेलन को विफल करने के लिए कांग्रेस की सारी ताकत लगी। महीनों पहले सैकड़ों स्वयंसेवकों के जत्थे बाजे-गाजे के साथ उस इलाके में भेजे गए, ताकि लोगों को गुमराह करें, रोकें। मगर नतीजा उलटा हुआ और उन्हें मुँह की खानी पड़ी। स्वागताध्यक्ष ने अपने भाषण में सबको रुला दिया, जब उन्होंने सारी दास्तान सुनाई। स्वयं भी आँसू बहाते रहे। सभापति का भाषण तो निराला ही रहा। उसमें सुधारवादी नेताओं की मनोवृत्ति की कड़ी समालोचना थी।

सारांश, उस सम्मेलन ने हमारी धाक जमा दी। जब लोग लंबे से पंडाल में अँट सके नहीं, तो अलग भी मीटिंग करनी पड़ी! लाउडस्पीकर के होने पर भी यह हालत थी!

वहीं बिहार प्रांतीय प्रथम ऊख सम्मेलन पं. यमुना कार्यी की अध्यक्षता में हुआ। उसके बाद नेताओं तथा मंत्रियों ने हमारे दमन की आशा छोड़ किसानों का फायदा पहुँचाने की ओर ध्यान देना शुरू किया।

छठा बिहार प्रांतीय किसान सम्मेलन दरभंगा जिले के बैनी (पूसा रोड स्टेशन) में सन 1939 के शुरू में हुआ। दरभंगा जिले के कांग्रेसी नेता तो सदा से ही किसान-सभा को फूटी आँखों देख न सकते थे। फलत: सारी ताकत से उसकाविरोध किया। फिर भी लाखों किसान आए और हम पूर्ण सफल रहे। पंडाल और उसकी सजावट वहाँ की खास बात थी। पं. रामनंदन मिश्र स्वागताध्यक्ष थे। उनके तथा पं. धनराज शर्मा, पं. यमुनाकार्यी, डॉ. रामप्रकाश शर्मा एवं उनके साथियों के अटूट परिश्रम और पूर्ण तत्परता का नतीजा था कि शत्रुओं की एक भी न चली। उसके अध्यक्ष थे बड़हिया-टाल सत्याग्रह के योध्दा पं. कार्यानंद शर्मा। खूबी यह रही कि सभापति अपने लाल कुर्तीवाले सैकड़ों किसान सेवकों के साथ प्राय: अस्सी मील पैदल चल कर नंगे पाँव ही वहाँ पहुँचे थे!

वहीं श्री श्यामनंदन सिंह एम.एल.ए. की अध्यक्षता में द्वितीय प्रांतीय ऊख सम्मेलन भी हुआ।

सन 1939 के अंत में होने के बजाए सन 1940 के फरवरी मास में सातवाँ प्रांतीय सम्मेलन चंपारन जिले के मोतीहारी में खूब ठाट-बाट के साथ हुआ। मोतीहारी में किसान आंदोलन का जन्म तो सन 1927 ई. के बहुत कुछ बीतने पर हुआ ही। साथ ही, उसे गाँधीवादियों के जिस प्रबल और संगठित विरोध का सामना करते हुए आगे बढ़ना पड़ा वह एक निराली चीज है। वह गाँधी जी का जिला माना जाता है। वहाँ गाँधीवाद के सिवाय और बातों का नाम लेना भी पाप समझा जाता था! फिर तो किसान-सभा की बात 'काबे में कुफ्र' की बात हो गई! इसीलिए सारी दिक्कतें हुईं! मगर हमारे बहादुर और धनी कार्यकर्ताओं ने खूब ही किया। आज तो वहाँ किसान-सभा काफी दृढ़ है। फलत: सम्मेलन के पंडाल आदि की रचना तो दर्शनीय थी ही। उसकी सफलता भी अच्छी रही और कुछ बाहरी नेता भी आए। स्वागताध्यक्ष थे श्रीमहंत धनराजपुरी और सभापति श्री राहुल सांकृत्यायन।

वहीं पर मेरी अध्यक्षता में बिहार प्रांतीय तृतीय ऊख सम्मेलन बहुत जम के हुआ। मेरा भाषण छपा था। उसमें ऊखवाले किसानों की सारी समस्याओं का पूरा विचार है। असल में ऊखवाले किसानों की समस्या अब इतनी गहरी और पेचीदी हो गई है कि उसे अच्छी तरह हाथ में लिए बिना काम नहीं चल सकता। सचमुच प्रांतीय ऊख-सम्मेलन असल में मोतीहारी में ही हुआ। दस-बारह प्रस्ताव भी पास हुए जो सारी समस्याओं पर पूरा प्रकाश डालते हैं। एक उपसमिति भी बनी जो विधान तैयार करेगी। नियमित रूप से पदाधिकारी भी चुने गए। इसका सबसे सुंदर परिणाम यह है कि बिहटा के इलाके में जो बाकायदा ऊख संघ अब तक न था वह बन गया और फी बीघा एक आना पैसा दे कर ऊखवाले किसान उसके सदस्य बने हैं। उसकी सफलता के फलस्वरूप प्रांत भर में ऐसे ही ऊख संघ शीघ्र बनेंगे। बिना ऐसा किए काम चल नहीं सकता।

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किसानों के प्रदर्शन

सन 1937 और सन 1938 में बिहार में किसानों के अनेक विराट प्रदर्शन पटना शहर में हुए, जिनमें प्रांत के कोने-कोने से लाखों किसान जमा हुए। तारीफ तो यह कि किसान कोष के लिए वे लोग पैसे भी साथ लेते आए। सिपाहियों की ही तरह कतार बाँध कर शहर में आए, जिससे रास्ता भी बंद न हुआ और लोग प्रभावित भी खूब हुए! यों तो दूसरे शहरों में भी प्रदर्शन हुए। गया के पहले विराट प्रदर्शन की बात सन 1933 ई. में ही कह चुके हैं। पटने के पहले प्रदर्शन की बात भी लिखी चुके हैं।

19 वीं नवंबर को सन 1937 में ही किसान-माँग-दिवस प्रांत भर में शान से मनाया गया। हमने तय किया कि जितने चुनाव-क्षेत्र असेंबली के हैं, प्रत्येक में किसानों का जमाव एक ही दिन और एक ही समय हो। वहाँ से चुने गए कांग्रेसी प्रतिनिधि भी उसमें शामिल रहें। यों न आएँ तो किसान उन्हें खामख्वाह बुलाएँ और उन्हीं के सामने अपनी माँगें वे पेश करें। हमने सभी स्थानों के लिए एक सम्मिलित माँग तैयार की थी। एक ही दिन प्रांत के सैकड़ों स्थानों से उन्हें दुहरवाया। कोशिश यह रही कि चुनाव-क्षेत्र के कोने-कोने से लोग जमा हो जाए। गाजे बाजे, किसान गाने और नारों के साथ प्रदर्शन में आए। इसमें हमें पर्याप्त सफलता मिली। फिर 26-11-37 को पटने में एक लाख किसानों का दूसरा प्रदर्शन हुआ।

इसी प्रकार सन 1938 ई. में भी पटने में दो भारी प्रदर्शन हुए। पहला तो हुआ गर्मियों में बाँकीपुर के मैदान में। दूसरा भी वहीं हुआ, मगर बरसात में। गर्मियों में जो जमाव हुआ था उसका जुलूस भी सभा के बाद शहर में निकला बड़े ठाट के साथ। किसान-सभा के कार्यालय में आ के उसकी समाप्ति हुई। इसमें कांग्रेसी मिनिस्टर डॉ. महमूद आदि भी शामिल थे और कुछ बोले भी। उन्हीं के सामने हमने किसानों की माँगें पेश कीं और उन्हें मौका दिया कि वे क्या जवाब देते हैं। पीछे हमने उनकी बातों का जवाब दिया और किसानों से राय भी ली।

जब बरसात में हमने ता. 15-7-38 को प्रदर्शन की सूचना निकाली तो जमींदारों और सरकार ने बहुत विरोध किया। असल में मेरे संबंध की 'लट्ठ हमारा जिंदाबाद' वाली बात तब तक काफी फैलाई जा चुकी थी। फलत: जमींदारों के अखबार ने झूठे ही लिख के सरकार को उभाड़ा कि किसान लोग भाले, बर्छे और लाठी से लैस हो कर आ रहे हैं। हमने इसका खंडन तो कर दिया और किसानों को यह भी आदेश दिया कि रास्ते में कहीं कोई छेड़े भी तो न बोलें। क्योंकि पैदल ही आनेवाले थे। फिर भी सरकार ने पटने में पुलिस ऐक्ट और 144 धारा लगा ही तो दी। शहर से बाहर और देहातों में जमींदारों के आदमी और पुलिसवाले किसानों को भड़काते और डरवाते रहे कि मत जाओ, गोली चलेगी। ताहम कौन मानता है। खेती के दिन, बरसात और यह सभी कुचक्र होते हुए भी पचासों हजार किसान जमा हुए।

खड़ी फसल की जब्तीवाला कानून बन रहा था। हमें उसका तीव्र प्रतिवाद करना था। इसीलिए सारी शक्ति हमने लगा दी। हर प्रदर्शन के समय इसी तरह की खास बातें रहती थीं। इस बार तो कांग्रेसी लोग भी विरोध कर रहे थे। मिनिस्टरों के बँगलों के चारों ओर और असेंबली भवन को भी घेर कर लाल पगड़ीवाले खड़े थे। घुड़सवार और दूसरे हथियारबंद भी थे। मिनिस्टरों की यह हालत देख किसानों की आँखें खुल गईं!

खैर, सभा हुई। हसबमालूम मैं ही सभापति था। हर बार मैं ही होता था, सिवाय पहली बार के। क्योंकि था नहीं। उसी में यह भी तय पाया था कि इस बार असेंबली भवन, हाईकोर्ट, सेक्रेटेरियट की ओर जुलूस चलेगा और मैं ही आगे-आगे चलूँगा। किसी ऊँची सवारी पर चढ़ के, ताकि किसान इधर-उधर न जाए और असेंबली में न घुसें, जैसा कि पहली बार जा घुसे थे। वही हुआ। एक मील लंबा जुलूस था और खूबी यह कि बहुत ही चौड़ी खचाखच सड़क भरी थी। थोड़ा-थोड़ा पानी भी पड़ता था। कई घंटे लगे। मैंने इतने नारे लगाए कि मुझे भी ताज्जुब था कि क्या हो गया था। खूब मस्ती थी। हमने सरकारी महल्ले को उस दिन हिला दिया।

गत दोनों प्रदर्शनों में दानापुर के गोलेदार लोग भीगा चना, हरी मिर्च और नमक ला के बाँटते थे, ताकि दूर से आए और भूखे किसान जलपान कर लें।

मुझसे पीछे भेंट होने पर भी मुल्कराज आनंद ने कहा कि इन प्रदर्शनों के समय वे स्पेन में तथा दूसरे मुल्कों में थे। वहाँ वे इनका वर्णन पढ़ के उछलते थे। कहते थे कि एक-एक प्रदर्शन से स्पेन की लड़ाई में वहाँ की किसान मजदूर सरकार को काफी सहायता मिली। क्योंकि इनसे पता चलता था कि जब किसानों में असंतोष और बगावत के भाव भर रहे हैं तो अंग्रेजी सरकार कमजोर हो रही है और उसके कमजोर होने का मतलब ही था स्पेनवालों की हिम्मत का बढ़ना एवं उन्हें अधिक सहायता का मिलना! प्रदर्शनों का इतना बड़ा महत्त्व है!

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बुध्दिभेद लट्ठ हमारा जिंदाबाद

सन 1937 की फरवरी में चंपारन जिला कांग्रेस कमिटी ने एक प्रस्ताव के द्वारा यह तय किया कि स्वामी सहजानंद सरस्वती का जो दौरा चंपारन में होनेवाला है वह रोका जाए,उसमें कोई कांग्रेसी भाग न ले और स्वामी जी को लिखा जाए कि आपके दौरे से यहाँ के लोगों में'बुध्दि भेद'पैदा होने का डर है। अत: यहाँ दौरा न करें! मेरे पास वहाँ से कोईपत्रतो न आया। मगर मेरे दौरे को विफल करने में वहाँ के कांग्रेसियों ने सारी शक्ति लगा दी! असल में चंपारन ने तो पथ-प्रदर्शन मात्र किया। मगर यह बात प्रांत के कांग्रेस के लीडर नहीं चाहते थे कि किसान-सभा कायम रहे। इसीलिए चंपारन के बाद ही सारन में भी यही बात हुई और मुंगेर की तथा प्रांत की कांग्रेस कमिटी ने भी ऐसा ही किया। यह तो पहले ही लिखा जा चुका है।

चंपारनवालों ने गीता के'न बुध्दिभेदजनयेद' का अच्छा अर्थ लगाया। उन लोगों ने चाहा कि गाँधीवाद के सिवाय वहाँ कोई आवाज सुनाई न पड़े, जैसी कि तब-तक हालत थी। मगर मेरे पहले-पहल होनेवाले दौरे के बाद किसान-सभा स्थापित हो जाने पर उसमें खतरा था।

मगर मेरा प्रोग्राम तो रुकता नहीं। अत: शुरू मार्च से चौबीस मीटिंगें जिले भर में करने का प्रोग्राम शुरू हो गया! विरोध भी सारी ताकत लगा कर किया गया! न सिर्फ लोगों को रोका गया, वरन काले झंडे का प्रदर्शन भी जगह-जगह किया गया! अजीब चहल पहल थी! मगर मेरी तो हालत है कि'रोके भीम होय चौगुना'। जहाँ तक याद है,चौबीस में बाईस मीटिंगें तो हुईं! तीन मीटिंगें न हो सकीं और एक अन्य नई मीटिंग हो गई। ऐसा भी हुआ कि लौरिया जैसी जगहों में केवल 25-50 आदमी ही रहे। बाकी दूर खड़े तमाशा देखते थे,गोया मीटिंग में जाने से पाप लगेगा! कुछ मीटिंगों में तो हजारों लोग आए,खासकर शहरों में और कई देहातों में भी। मोटे अंदाज से फिर भी 40-50 हजार लोगों ने मेरी बातें सुनीं। तारीफ थी हमारे नए कार्यकर्ताओं और प्रबंधकों की।'जिमि दशनन महँ जीभ बेचारी'की दशा में भी उनने सारी ताकत लगा दी। पीछे हम मीटिंगें करते थे,और आगे वे लोग बढ़ते जाते थे।

भित्तिहरवा में तो जगह तक न मिल सकी! तब नूरमुहम्मद नामक एक मुसलमान जवान ने, जो मुझे जानता तक न था अपने खेत की कच्ची मटर उखाड़ डाली और वहीं सभा करने को कहा! उस पर कितना दबाव पड़ा था वह पीछे पता चला। बायकाट की धमकी के सिवाय उसके भाई के जो कुछ रुपए कहीं पड़े थे,उन्हें हड़प लेने तक की धमकी हुई,पर,उसने एक न सुनी। उसके तैयार होने पर तो पीछे सड़क के ही पास जमीन मिली और शामियाना भी। मैंने वहीं सभा भी की। मगर सभा के बाद सभी के साथ मैं उस खेत पर गया और उसकी मिट्टी सिर पर लगा कर कहा कि किसान-सभा के इतिहास में यह खेत और यह मुसलमान जवान अमर रहेंगे। ऐसे ही लोग इसकी जड़ दृढ़ करेंगे। वह जवान उसके बाद इस साल मोतीहारी में कॉन्फ्रेंस के समय मिला।

एक सभा में तो जब विरोधियों की कुछ न चली तो मीटिंग में ही शोरगुल करते रहे और बोलना चाहा। मैं बोलना बंद करके चला आया। पीछे न जाने क्या-क्या बक गए।

इसी दौरे में जिला किसान-सभा का जन्म हुआ। दस दिन में दौरा खत्म हुआ। इसके बाद दूसरा दौरा सन 1938 के गर्मियों में हुआ। तब तक तो हमारे आदमी मजबूत हो चुके थे। कांग्रेस के लोगों ने भी वैसा विरोध न किया। फिर भी मोटरें दौड़ीं। मुकाबले में दूसरी सभाएँ की गईं। लोगों को धमकियाँ दी गईं। मगर सुनता कौन था? पहली बार जो न आए वह पीछे पछताते रहे। अत: इस बार उन्होंने प्रायश्चित्त किया। उसके बाद तो जब मैं आश्विन में विजयदशमी के समय बेतिया मेले के समय सभा करने गया तो सभा में ही वहाँ के नेता श्री प्रजापति मिश्र ने पूर्व की भूलों के लिए क्षमा माँग ली। फिर तो झमेला ही खत्म हुआ। उनकी माफी ने किसान-सभा की धाक जमा दी। उन्होंने गाँधीवाद के सिध्दांत के अनुसार क्षमा माँग ली थी। ठीक ही था। मैं भी पिछली बातें भूल ही गया!

चंपारन के पहले दौरे के बाद सारन (छपरा) जिले में भी दौरा हुआ। वहाँ भी कांग्रेस के नेताओं ने खासा विरोध किया। राजेंद्र बाबू और प्रांतीय कांग्रेस कमिटी का हुक्म छपवा कर बाँटा गया और इस तरह लोग रोके गए। काले झंडे भी कई जगह दिखाए गए! भैरवा में तो उनके साथी मारपीट पर उतारू थे। फलत: सभा छोड़ देनी पड़ी। आगे-आगे मोटर पर कांग्रेस के नेता लोग दौड़ते जाते, सभा स्थान पर हुक्मनामा सुनाते और मना करते थे। मगर उनके जाने के बाद फिर लोग जमा हो जाते और मेरे जाने पर मेरी बात सुनते थे। कटया में काले झंडे ले कर लड़के लोग नाकों (रास्ते की मोड़ों) पर खड़े थे। मगर जब लोग टूट पड़े तो वे भी शामिल हो गए। वहीं'स्वामी जी लौट जाइए'सुनाई पड़ा। मगर पहली बार के दौरे में भी हमारा काम बन गया। जब1938 की फरवरी में हम दोबारा गए तोविरोधका वह तरीका छोड़ दिया गया! मगर शराबबंदीवाली सरकारी लौरी पर चढ़कर उसी के प्रचार के बहाने नेता लोग गए और हमारे चले आने पर एक-दो सभाओं में ऊलजलूल बोले भी। पहले तो नहीं। मगर पीछे हमें मालूम हुआ, फिर तो तीसरी या चौथी सभा में ही उनकी दुर्दशा हुई। भैरवा में भी इस बार उन्हें मुँह की खानी पड़ी। सिवान में तो वे लोग बोलने ही न पाए। लोग मेरे बाद उनकी सुनने को तैयार न थे। गोपालगंज में मेरी सभा के बगल में ही सभा करके मेरे ही साथ जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति चिल्लाते थे। पर,नतीजा कुछ न हुआ।

एक जरूरी बात, मेरे सामने एक भीषण समस्या इधर कुछ वर्षों से खड़ी थी। मैं समझने लगा था कि कांग्रेस के नेता अंत में किसानों को धोखा देंगे। नतीजा होगा कि कांग्रेसी होने के नाते हम किसान-सभावालों पर भी किसानों का अविश्वास हो जाएगा। फलत: इसका उपाय होना चाहिए। मगर रास्ता सूझता न था। यदि किसान-सभा को कांग्रेस से अलग किसानों की खास संस्था कहते तो वे लोग खामख्वाह कांग्रेस की अपेक्षा सभा में ज्यादा प्रेम करते! फलत: कांग्रेस कमजोर होती! अगर ऐसा कुछ न कहते तो अंत में गड़बड़ी का खतरा था। अजीब पहेली थी। मेरी परेशानी तथा मनोवेदना बेहद्द थी।

इसी बीच सारन,चंपारन और मुंगेर में उक्त घटनाएँ हुईं,जिन पर प्रांतीय कांग्रेस ने एक प्रकार से मोहर लगा दी! फलत:,कुछ रास्ता साफ हुआ। लेकिन मेरे ऊपर हिंसा का इल्जाम लगा कर सन 1938 की फरवरी में जो मेरी और किसान-सभा की निंदा का प्रस्ताव प्रांतीय कार्यकारिणी ने खास राजेंद्र बाबू कीअध्यक्षता में पास कर दिया उससे मेरा रास्ता कतई साफ हो गया! उन लोगों ने ही किसान-सभा को कांग्रेस से अलग सिध्द कर दिया! इसका खूब प्रचार भी किया। उनके ही आदमी कहने लगे कि अमुक व्यक्ति किसान-सभावाले हैं और अमुक कांग्रेसी।

मैंने उस प्रस्ताव के बाद प्रांतीय कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया। बात यह थी कि मैं उसका मेंबर था। फिर भी बिना मुझे एक मौका दिए ही मेरी अनुपस्थिति में ही वह प्रस्ताव पास किया गया। अत: वह अक्षम्य था। मेरे पास उस मीटिंग की खबर तक न पहुँची! फलत:,मैं पूर्वोक्त दौरे के लिए छपरा चला गया। शायद ठीक मीटिंग के दिन वह नोटिस बिहटा गई हो। मगर इससे क्या? मुझे तो खबर नहीं ही मिली। यदि ऐसी ही जरूरत थी तो मुझे तार क्यों न दिया गया?मैं जानता हूँ कि और मेंबरों को तार दिया गया था और पीछे यह खबर छपी थी। चाहे जो भी हो,मुझे तो खास तौर से खबर देना जरूरी था। मीटिंग टल नहीं सकती थी क्या?क्या इतना जरूरी था कि 13 फरवरी को ही प्रस्ताव पास हो?क्या बिगड़ रहा था?क्या छपरेवाले मेरे प्रोग्राम को जानबूझ कर चौपट करना था,क्योंकि उसकी खबर पहले से ही छपी थी? किसी भी हालत में मैं उस घोर अन्याय को बर्दाश्त क्यों करता? मेरा स्वाभिमान मुझे कहता था कि ऐसी कमिटी से फौरन हटो।

अब जरा'लट्ठ हमारा जिंदाबाद'या डंडा कल्ट (Danda cult) की बात सुनिए। वह मेरेसंबंधमें एक ऐतिहासिक चीज हो गई है। उसकी ओर न सिर्फ कार्यकारिणी के उक्त प्रस्ताव में इशारा था। प्रत्युत कानपुर में एक लंबा वक्तव्य दे कर स्वयं बाबू राजेंद्र प्रसाद ने मेरेसंबंधमें उसका स्पष्ट उल्लेख किया था! कहा गया कि मैं किसानों से कहता फिरता था कि जमींदारों से साफ कह दें कि'कैसे लोगे मालगुजारी,लट्ठ हमारा जिंदाबाद'। मगर मेरी सभी स्पीचों की शार्टहैंड रिपोर्ट तो बराबर दो सी.आई. डी. के इंस्पेक्टर लिखा करते थे। अत: मैंने ललकारा कि उसे पढ़ कर यह चीज सिध्द कीजिए तब जानूँ। श्री महादेव देसाई ने'हरिजन'में इसी बारे में लंबा लेख मेरे हीसंबंधमें लिखा था। मैंने उनका जवाब भी करारा दिया था। वह हरिपुरा कांग्रेस के समय अखबारों में निकला था। न जाने यह चीज कहाँ से और कैसे गढ़ी गई! मिथ्याप्रचार की हद की गई! वाह रे सत्य! धन्यरे अहिंसा!

लेकिन यह जरूर है कि मैं किसानों को आत्मरक्षार्थ लाठी या डंडा चलाने को कहता था। करता भी क्या?किसान थर्राते रहते,जमींदार के अमले जूतों तथा डंडों से उन्हें दुरुस्त करते और घर की चीजें लूट लेते थे! यहाँ तक कि बहू-बेटियों की इज्जत नहीं बच पाती थी! मैंने हजारों सभाओं में उन्हें समझाया सही कि यह गैरकानूनी काम है। इसे बंद कीजिए। नहीं तो ठीक न होगा। मगर सुने कौन? किसान तो मुकाबिला करेंगे नहीं। वे गरीब हैं,कमजोर हैं,इसलिए केस में भी पार पाएँगे नहीं। फिर क्या परवाह,यही वे सोचते थे।

तब मैंने आत्मरक्षार्थ डंडे आदि का प्रयोग किसानों को खुलेआम बताना शुरू किया। जाब्ता फौजदारी कानून इसका समर्थन करता है यह भी उन्हें समझाया। फिर तो किसानों की आँखें खुलीं। दो-एक जगह शैतानों को उनने दुरुस्त भी किया। फलत: यह शैतानियत और वह आतंक राज्य सदा के लिए खत्म हुआ। यही है मेरा डंडावाद या डंडाकल्ट। इससे गाँधीवादी बिगड़े जरूर। यहाँ तक कि मेरे साथी लोग भी काँय-काँय करने लगे कि अब इसे बंद करें। मगर मैंने साफ कह दिया कि यह उपदेश तो किसानों के लिए अमृत है। इसे क्यों छोडे?यह तो कानूनी हक है। फिर क्या बात?लोगों ने कहा,कांग्रेस इसे रोकती है। मैंने जवाब दिया कि वह अहिंसा केवल आजादी की लड़ाई के लिए ही है।

मगर इधर कुछ ऐसा हो गया था कि सर्वत्र अहिंसा के नाम पर नामर्दी का पाठ पढ़ाया जाने लगा था कि कहीं मत बोलो। हालाँकि, गाँधी जी ने ही अहिंसा के नाम पर नामर्दी की अपेक्षा हिंसा को अच्छा कहा है। सो भी बार-बार। मगर सुनता कौन था?लेकिन खुशी है कि इसी जून सन 1940 ई. में पुन: वर्किंग कमिटी ने साफ कह दिया है कि अहिंसा का प्रयोग सिर्फ आजादी के युध्द के ही लिए है,न कि और जगह के लिए भी। आज हमारे आका लोग भी इसे पसंद करते हैं। क्योंकि उन्हें जर्मनी के विरुध्द सशस्त्र युध्द की जरूरत है न?

यही है मेरा डंडाकल्ट और डंडावाद। असल में मैं तो दंडी संन्यासी कहाता ही हूँ। मेरे पास बाँस का एक दंड सदा रहता है। मगर वह अब तक धार्मिक था। लेकिन अब वह राजनीतिक और आर्थिक हो गया! इसीलिए उसी बुध्दि से मैंने उसे अभी तक अपना रखा है। इस डंडावाद ने उसमें मेरा नया प्रेम और मेरे लिए नया महत्त्व पैदा कर दिया है। इसी के संबंध से शायद यह डंडावाद मेरे नाम से प्रसिध्द होने को था!

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बड़हिया , रेवड़ा

सन 1936 से ले कर 1939 तक बिहार में कईमहत्त्वपूर्ण लड़ाइयाँ किसानों ने लड़ीं , जिनके करते न सिर्फ वे , प्रत्युत बिहार की किसान-सभा काफी प्रसिध्द हुई। यों तो उनकी छोटी-मोटी सैकड़ों भिड़ंतें जमींदारों और सरकार के साथ हुईं। उनमें बड़हिया , रेवड़ा और मझियावाँ के बकाश्त संघर्ष (सत्याग्रह) ऐतिहासिक हैं। उनसे मेरा घनिष्ठसंबंधभी रहा है। इसीलिए उनका संक्षिप्त वर्णन जरूरी है।

बड़हिया इनमें बड़हिया टाल का आंदोलन सबसे पुराना है। वह कांग्रेसी मिनिस्ट्री बनने के बहुत पहले सन 1936 ई. के जून में शुरू होकर सन 1939 ई. के मध्य तक चलता रहा। अभी भी आग भीतर-ही-भीतर सुलग रही है। बड़हिया मौजा पटना से पूर्व ई. आई. आर. का स्टेशन तथा मुंगेर जिले का बहुत बड़ा गाँव है। उससे दक्षिण-पूर्व-पश्चिम और लाइन से दक्षिण की लाखों बीघा जमीन को बड़हिया टाल सकते हैं। वह सख्त काली मिट्टीवाली है और उसमें सिर्फ रब्बी की फसल होती है। वर्षा के शुरू में ही सारी जमीन पानी से भर जाती है और अक्टूबर में सूखती है। उसे जोतने की जरूरत नहीं। सिर्फ बीज बो देते और फागुन-चैत में तैयार फसल काट लेते हैं। फसल खूब उपजती है। इसीलिए हजारों बीघे की खेती एक-एक जमींदार आसानी से करते हैं।

टाल में टापुओं की तरह दूर-दूर पर गाँव बसे हैं। उनमें वर्षा में नाव से ही आ-जा सकते हैं। सिर्फ एक हड़ोहर नदी बीच से गुजरती है। उसी का पानी प्राय: सभी पीते हैं। शायद ही किसी-किसी गाँव में कुआँ है। फलत: गंदा पानी पीना ही पड़ता है। मुंगेर जिले में कांग्रेसी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड 15 वर्षों से है। मगर गरीबों की खबर कौन ले?वहाँ पक्की सड़क का भला पता कहाँ?वहाँ के बाशिंदे अधिकांश धानुक,ढाढ़ी,मल्लाह वगैरह हैं। पुराने जमाने में वही जमीन के मालिक थे। बड़हिया तथा और गाँवों के जमींदारों ने कल,बल,छल से उनकी पीछे जमीनें छीन लीं। फिर भी बटाई के नाम पर उन्हें देते थे। फलत:,काश्तकारी कानून के अनुसार उन जमीनों पर उन किसानों का कायमी हक हो गया है। क्योंकि 12 वर्ष से ज्यादा तो सभी ने वे जमीनें जोती हैं।

बिहार के जमींदारों के कब्जे में जो जमीनें हैं वे जिरात (सीर) और बकाश्त (खुदकाश्त) दो ढंग की हैं।सन 1885 ई. से पहले जो जमीनें जमींदारों की खेती में लगातार12 वर्ष रहीं, वही जिरात कहाती हैं। वे तो निश्चित हैं। घट-बढ़ नहीं सकती हैं। मगर जो जमीनें ऐसी न होने पर भी उनके कब्जे में कागजों में लिखी हैं वही बकाश्त हैं। कानून यह है कि लगातार 12 वर्ष जिस बकाश्त जमीन पर कोई रैयत (किसान) खेती करे वह उसकी कायमी (occupancy) हो जाती है। वैसा किसान फिर जिस बकाश्त को 1साल भी जोतेगा वह भी उसकी कायमी हो जाएगी। असल में किसान के पास कोई मौरूसी या कायमी जमीन रहने पर ही जो भी जमीन वह जोतेगा वही कायमी होगी। किसी मौजे में जिसके परिवार में 12 वर्ष तक लगातार खेती होती रहे वह ज्योंही बकाश्त जमीन जोतता है त्योंही उसका कायमी हक उस पर हो जाता है।

इसी कानून के अनुसार टाल के किसानों का हक हो गया था। मगर वे इसे जानते न थे। जमींदारों को भी इसकी फिक्र न थी कि वे कभी जमीन पर दावा करेंगे। जमींदारों ने प्राय: किसी के भी पास इसका सबूत रहने न दिया कि वह जमीन जोतता है। रसीद या कागज-पत्र पर कुछ लिख के देते न थे! सारा काम जबानी रहता था! फिर उन्हें फिक्र हो क्यों?वे लोग कांग्रेसी और प्राइम मिनिस्टर के लाड़ले हैं! इसलिए तो'करैला नीम पर ही चढ़ गया'।

इधर किसान आंदोलन ने जब किसानों में चेतना पैदा की और उन्हें उनका हक समझाया तो उन्होंने उन जमीनों पर दावा किया। उधर जमींदारों ने उनका हक साफ इनकार किया। बस,यही झगड़े की जड़ है। किसान केस तो लड़ सकते न थे। कारण,कागजी सबूत उनके पास न था। फलत: वहाँ के हमारे योध्दा पं. कार्यानंद शर्मा की राय से उन्होंने सत्याग्रह (सीधी भिड़ंत) शुरू किया। ऐसे ही बकाश्त सत्याग्रह बिहार के रेवड़ा आदि गाँवों में हजारों जगह चले हैं। किसानों ने,उनके सेवकों ने मारे खाईं,हड्डिया तोड़वाईं,वे जेल गए,लूटे गए! मगर फिर भी जमीन पर से न तो हटे और न मार-पीट का उत्तर ही दिया। सैकड़ों लालवर्दीवाले स्त्री-पुरुष इस संघर्ष का संचालन पं. कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में करते रहे। उनने हँस-हँस के सब कष्ट भोगे,स्वयं कार्यानंद जी को दो बार उसी सिलसिले में जेल जाना पड़ा। दो-दो बार घुड़सवार और हथियारबंद पुलिस का धावा टाल में हुआ। पहली बार सन 1937 के मार्च में सैकड़ों की संख्या में,और दूसरी बार सन 1939 में भी उन्हीं दिनों में। कभी तीन और कभी पाँच खास मजिस्ट्रेट भी लगातार वहाँ रखे गए। यों तो जब फसल बोने का समय अक्टूबर-नवंबर में आया तभी खास पुलिस,मजिस्ट्रेट और सवार भी पहुँचते ही रहे।

शर्मा जी पहली बार सन 1937 ई. में5वीं फरवरी को पकड़े गए और जून में छोड़े गए। उन पर तथा 19 और साथियों पर120 बी., 117, 107 आदि धाराओं के अनुसार केस चले थे। वे पीछे खत्म हो गए! दो-ढाई सौ किसान भी पकड़े गए। उन पर प्राय: झूठे केस चले। पीछे अधिकांश खारिज हो गए। दूसरी बार शर्मा जी ता. 2-5-39 को गिरफ्तार हुए। उनके साथी भी पकड़े गए।

टाल के ही संबंध में सन 1936 के अक्टूबर में मुंगेर में, सन 1937 की फरवरी में शेखपुरा में, 1937 के अक्टूबर में लखीसराय में, 1938 के नवंबर में लखीसराय में और 1939 के फरवरी में टाल में ही पाली में किसान सम्मेलन हुए। लखीसरायवाले सम्मेलन में आते हुए सौ किसानों का जत्था श्री पंचानन शर्मा की नायकता में बड़हिया में बुरी तरह पीटा गया! यों तो टाल के सत्याग्रह में बूढ़े स्त्री-पुरुषों की हड्डिया भी टूटीं। मगर वे इतने शांत रहे कि सरकार के अफसरों को लाचार हो के कहना पड़ा कि सचमुच यही शांति सेना है।

दूसरी गिरफ्तारी के बाद ही पं. कार्यानंद शर्मा और श्री अनिल मिश्र ने'किसान-मजदूर बंदी राजबंदी करार दिए जाए'इस माँग के लिए पूरे डेढ़ मास तक जेल में अनशन किया। अंत में कांग्रेसी मंत्रियों ने उन्हें मरणासन्न समझ कर छोड़ा!'किसान बंदी राजबंदी'इस माँग के लिए श्री राहुल सांकृत्यायन को भी दो बार दस और अट्ठारह दिनों तक अनशन करना पड़ा। वह हालत खराब होने पर ही जेल से दोनों बार छोड़े गए। इसी सिलसिले में श्री जगन्नाथ प्रसाद और ब्रह्मचारी रामवृक्ष (दोनों ही सारन जिले के हैं) ने पूरे 90 दिनों की भूख हड़ताल जेल में की और मृत्युशय्या पर ही ये लोग भी रिहा हुए। यह सारी घटनाएँ कांग्रेसी मंत्रियों के समय में हुईं! मगर वे टस से मस न हुए! उनने किसान या मजदूर बंदियों को राजबंदी नहीं ही माना!

पहली बार श्री कार्यानंद जी की गिरफ्तारी के बाद पं. यदुनंदन शर्मा को हमने प्रांतीय किसान-सभा की ओर से टाल में भेजा। वे वहाँ चारों ओर घूमकर देखभाल करते रहे। मुझे तो न जाने कितनी बार टाल में जाना पड़ा है।

सन 1937 के जून में श्री राजेंद्र बाबू,श्री कृष्ण सिंह आदि की एक कमिटी बनी। उनने कुछ फैसले भी किए,गो किसानों को उनसे ज्यादा लाभ न था। फिर भी हमने उन्हें मान लेने की राय दी। मगर जमींदारों ने ही न माना। पीछे तो उस कमिटी का वह फैसला ही दबा दिया गया।

फिर सन 1938 के अक्टूबर में मुंगेर के कलक्टर ने एक दूसरी पंचायत बनाई और फैसले का भार उसे सौंपा। उसने भी काफी गुड़ गोबर किया और बड़ी दिक्कत तथा दूसरी बार शर्मा जी की अध्यक्षता में मुंगेर कचहरी पर ही धरना देने के लिए किसानों के अनेक जत्थे पर जत्थे जाने लगे और शर्मा जी आदि की गिरफ्तारी के बाद ही उसने कुछ किया। मुश्किल से केवल एक हजार बीघे जमीन पर उसने किसानों का अधिकार बताकर उन्हें दिया। अभी उससे कुछ ज्यादा ही जमीन पर किसानों का दावा बना है। कमिटी कुछ न कर सकी। हाँ,इसी बीच बड़हिया टाल से मिले कुसुम्भा टाल में 1800 बीघे जमीन पर जमींदार ने,जो पटने के कोई नवाब साहब हैं,किसानों का हक मान लिया है।

सन 1936 के जून में टाल के किसानों ने कलक्टर के पास पहली दरखास्त भेजी। उनके दो जत्थे जाकर कलक्टर से मिले भी। उसी के बाद जमींदारों की नादिरशाही शुरू हुई और इंच-इंच जमीन छीन ली गई! फिर 1937 के बीतते-न-बीतते कमरपुर में किसान खूब पिटे। उलटे 32 के ऊपर 107 का केस भी जमींदारों ने चलाया। बस,सारा गाँव उजड़कर बाल-बच्चे,पशु आदि के साथ रवाना हुआ। साथ में लंबे-लंबे पोस्टरों पर जमींदार का नाम और अत्याचार मोटे अक्षरों में लिखा था! कई दिन चलकर वे लोग मुंगेर पहुँचे। रास्ते में ही धूम मची। मुंगेर में जब हर गली में नारे लगाते हुए वे लोग घूमे तो खासी सनसनी फैल गई! अंत में कलक्टर के दबाव से कुछ कांग्रेसी नेताओं की एक तीसरी कमिटी पंचायत करने के लिए बनी। वह तो आज तक खटाई में ही पड़ी है।

इस प्रकार बड़हिया टाल में जमींदारों के दुराग्रह एवं सरकार तथा मंत्रियों की कमजोरी,बल्कि उनके द्वारा जमींदारों को प्रोत्साहन देने और लीपापोती के कारण ही किसानों के साथ न्याय न हो सका। हालाँकि उनने मर्दानगी से कष्ट भोगे और लड़ाई लड़ी। उनके पथ-दर्शक भी पक्के मिले। सबसे बुरी दशा रेपुरा गाँव की है। वहाँ के स्त्री-पुरुषों की मर्दानगी से मैं दंग रह गया। मगर उन्हें एक इंच भी जमीन न मिली! वे भूखे नंगे हैं! तुम धन्य हो न्याय! धन्य हो शोषण!

रेवड़ा- सन 1938 ई. के अंत में मसौढ़ी जिला पटना में पटना जिला किसान सम्मेलन होने को था। उसके पूर्व ही बड़हिया टाल की परिस्थिति नाजुक हो गई थी। न तोमंत्रीलोग ही कुछ कर सके और न पंचायत कमिटियाँ या कांग्रेसी लीडर ही! किसान ऊब रहे थे। वे भूखों मर रहे थे। हमने भी किसान-सभा की ओर से अभी तक उन्हें सिर्फ उपदेश ही दिया था। बड़हिया टाल का सत्याग्रह व्यक्तिगत रूप से शर्मा जी और हम लोग चलाते रहे सही। मगर किसान-सभा ने उसे खुल कर अपने हाथ में लिया न था। असल में उसने तब तक सत्याग्रह तक कदम नहीं बढ़ाया था। बिहार के हर कोने में यही हालत थी। कांग्रेसी मंत्रियों के जमाने में तो जमींदारों की हिम्मत और भी बढ़ी थी। खास कर कांग्रेस-जमींदार समझौतों के करते। इसलिए जुल्म बढ़ रहा था। जमीने धड़ाधड़ छिन रही थीं। फलत: किसानसर्वत्रऊब चुके थे। खतरा था कि यदि हम शांतिपूर्ण संघर्ष में उन्हें सभा की ओर से न लगाते तो वे मारपीट और लूटपाट पर आ जाते। इधरदो-तीन मास पूर्व से ही पं. यदुनंदन शर्मा ने हार कर रेवड़ा में,जो गया जिले के नवादा सबडिवीजन में वारिसलीगंज से 8-10 मीलउत्तरहै,किसानों को तैयार करने के लिए अपना कैंप भी खोल दिया था। वहाँ किसान-सेवक भर्ती करके उन्हें तालीम दे रहे थे।

रेवड़ा की हालत यह थी कि वहाँ प्राय: डेढ़ हजार बीघा जमीन थी और सभी जमींदार ने नीलाम करवा ली थी। वारसलीगंज के पड़ोसी साम्हे गाँव के श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह वगैरह उसके जमींदार हैं। गाँव में 5-6 सौ आदमी चिथड़ा पहने भूखों मरते थे। ब्राह्मणों की लड़कियाँ बेची गईं और जमींदार ने उसमें भी आधा मूल्य जमींदारी हक में ले लिया! शेष बाकी लगान में! फिर भी जमीन न बची! बूढ़ी होने पर उनमें जो बची हैं उनने अपनी कहानी हमें सुनाई! दो कद्दू कहीं छप्पर पर फला तो एक जमींदार का हो गया! दो बकरे हुए तो एक उसका! गाँववालों से एक बार उसने दूध माँगा। मगर नहीं मिला। था नहीं। उसने कहा,जैसा कि मुझे बताया गया, कि औरतों को दुह लाओ!

जमींदार के पास,मजिस्ट्रेट के पास और मंत्रियों तथा लीडरों के पास दौड़ते-दौड़ते किसान थक चुके थे। अंत में उनने पं. यदुनंदन शर्मा को पकड़ा। उन्होंने भी जमींदार को बहुत समझाया। तीस रुपए फी बीघा सलामी दे कर भी जमीन लेने को किसान तैयार हुए। इस प्रकार जमींदार चालीस हजार रुपए एक मुश्त पा जाता! किसान कर्ज ला के या किसी प्रकार देते ही! मगर कौन सुने!

तब शर्मा जी ने कहा कि खेत जोत लो और फसल काट लो,जो भी थोड़ा सा धान बोया है। किसानों ने उत्तर दिया कि हम उपदेश नहीं चाहते। हमने तो समझा था,आप कोई रास्ता पकड़ाएँगे। मगर जब आप भी लेक्चर ही देते हैं,तो जाइए। हमें मरने दीजिए। और अगर नहीं तो आगे हल ले कर चलिए और जोतिए। धान काटिए। पीछे हम भी रहेंगे,आपके साथ ही मरेंगे। शर्मा जी को यह बात लगी और वहीं डँट गए। मुझे खबर भेज दी कि अब मैं जेल जाऊँगा। ऐसी ही हालत है। आप एक बार आयें और देख जाए। बिना पूछे पड़ गया,एतदर्थ क्षमा चाहता हूँ। असल में दोनों शर्मा (कार्यानंद और यदुनंदन) ने अभी तक बिना मुझसे पूछे ऐसा कदम कभी न बढ़ाया और न कोई खास काम ही किया था। मैं वहाँ गया और पचीस हजार किसानों-स्त्री,पुरुष,लड़कों की अपूर्व सभा थी! मैं भी हालत देख के दंग रह गया।

उसके बाद मसौढ़ी कॉन्फ्रेंस के समय मैंने पहला वक्तव्य दिया कि अब कोई चारा नहीं कि किसान-सभा आगे बढ़े और किसानों की सीधी लड़ाई-सत्याग्रह-का नेतृत्व करे। नहीं तो किसान हमसे भी निराश हो जाएगे, यही समझ के कि हम भी सिर्फ लेक्चर ही देते हैं। ये लेक्चर और प्रस्ताव तो पढ़े-लिखों के ही लिए हैं। वह इससे ऊबते नहीं। मगर जनता तो सदा काम करती है और बोलती कम है। इसलिए अब उसे काम देना हमारा फर्ज है। हम कांग्रेसी मंत्रियों को परेशान करने के लिए नहीं,किंतु अपनी हस्ती कायम रखने और अपना फर्ज अदा करने के लिए ही आगे बढ़ेंगे। और जरूर बढ़ेंगे।

बस,मंत्रियों और जमींदारों में खलबली मच गई। मुझे बहुत बुरा-भला सुनना पड़ा। मगर सम्मेलन में मैंने अपील की कि रेवड़ा सभी किसानों का तीर्थ बने और पुकार होते ही किसान पैदल ही चारों ओर से दौड़ पड़ें। अन्न, धान की सहायता करें। हुआ भी ऐसा ही। सैकड़ों आदमी वहाँ खाते रहते। जेलयात्रियों की धूम थी। मैं भी ज्यादातर वहाँ जाता। शर्मा जी की गिरफ्तारी के बाद तो वहीं रहने भी लगा। प्रांतीय किसान कौंसिल की एक बैठक भी वहीं हुई। सभी किसान नेता और कार्यकर्ता जमा हुए। सरकार परेशान थी। सैकड़ों पुलिस के जवान,उनके अफसर,खुफियावाले और दो मजिस्ट्रेट वहाँ रखे गए थे। मगर किसान आगे बढ़ते ही गए।

वहाँ की स्त्रियों ने हमें विश्वास दिलाया कि मर्द पीछे जाए तो जाए। मगर हम तो आपका साथ सदा देंगी। ह्निटेकर साहब जिला मजिस्ट्रेट बन के हमें वहाँ सर करने आए थे। मगर स्वयं सर होके विलायत चले गए! सभी ताज्जुब में थे कि क्या हो गया! उन लोगों को तो वहाँ खाना मिलना असंभव था। दूसरे गाँव में रहते थे! फिर भी दुर्दशा थी! जमींदार लाठी खाए साँप की तरह फुँफकारता था,मगर बेकार। रेवड़ा जमींदार और सरकार दोनों ही के लिए आतंक बन गया!

गया जिला कांग्रेस कमिटी ने भी हमारे सत्याग्रह का समर्थन किया था। बस, प्रांतीय कांग्रेस कमिटी बिगड़ी और प्रस्ताव करके कार्यकारिणी ने उसे डाँटा। बिना आज्ञा लिए चलाए गए सत्याग्रह को उसने नाजाएज ठहराया।

इससे अधिकारियों को हिम्मत आई। स्पेशल मजिस्टे्रट ने फौरन ही हमें हिम्मत के साथ वह प्रस्ताव दिखाया। हम हँसे और बोले कि हमने यह सब बहुत देखा है। फिर तो उनकी हिम्मत पस्त हुई।

किसानों की दशा यह थी कि उनसे जो भी कोई कुछ पूछता और सुलह की बात करता तो मुँह फेर देते और कहते कि पं. यदुनंदन शर्मा से पूछिए। हम तो उन्हीं का हुक्म मानेंगे। किसी की एक न चली और अंत में हम जीते।

किसानों को जमीन मिली,जो हलवाहे,चरवाहे सभी को दी गई। बिना जमीन वहाँ एक घर भी न रहने पाया। शर्मा जी से कलक्टर ह्निटेकर साहब ने जमींदार की ओर से समझौता किया। क्योंकि जमींदार ने लिख कर उन्हें अधिकार दिया था। प्राय: डेढ़ सौ बीघा जमींदार को दे कर शेष जमीन किसानों को मिली। कांग्रेस की बकाश्त जाँच कमिटी ने डेढ़ सौ बीघे पर जमींदार का कब्जा बताया था। इसीलिए मजबूरन उतनी जमीन देनी पड़ी। आखिर करते क्या? अपनी ही कमिटी ने तो पहले ऐसा बताया था।

रेवड़ा में पहले तो पुलिस हल आदि छीन ले जाती,ज्यों ही किसान खेतों पर जाते थे। क्योंकि नोटिस लगा के खेत जब्त किए गए थे। पीछे तो एक-एक हल पर दस-बीस किसान लिपट जाते और छोड़ते न थे,क्योंकि गरीबों को घाटा था छोड़ देने में। बस,पुलिस हार गई! जिस दिन सभी किसान नेता वहाँ थे उस दिन औरतों ने ऐसे कमाल का सत्याग्रह किया कि पुलिस शर्मिंदा हो के लौट गई।'इनक्लाब जिंदाबाद' 'जमींदारी नाश हो' का नारा औरतों ने पुलिस के सामने और पीछे भी लगाया। असल में पुलिस औरतों का लाठा रोकने गई थी। मगर औरतें दल बाँध के डँटी रहीं और लाठा चलाती ही रहीं। वही आखिरी भिड़ंत थी। फिर तो पुलिस को हिम्मत न हुई। हम लोग सारा नजारा देखते और दूर से हँसते रहे। पीछे पास में भी गए।

त्रिपुरी कांग्रेस के समय ही शर्मा जी साथियों के साथ जेल से रिहा कर दिए गए। सरकार ने लड़ाई के दौरान में दफा 145 के द्वारा मजिस्ट्रेट से फैसला कराने का हजार प्रलोभन दिया, तारीखें रखीं, खबर भेजी। मगर किसान नहीं गए और नहीं गए। तब अंत में जीते।

मझियावाँ और दूसरी जगहें इन लड़ाइयों के अलावे गया के ही मझियावाँ,अनुवाँ,आगदा,भलुवा,मझवे,साँड़ा आदि गाँवों में किसानों ने सफलतापूर्वक सत्याग्रह संग्राम किया। इसके सिवाय शाहाबाद के बड़गाँव,दरिगाँव आदि में,सारन जिले के अमवारी,परसादी,छितौली आदि में,दरभंगा के राधोपुर,देकुली,पंडौल,पड़री (विथान) आदि में,पटना के दरमपुरा,अंकुरी,जलपुरा,तरपुरा,वेलदारीचक आदि में भी किसानों ने बड़ी मुस्तैदी से यह संघर्ष किया। चंपारन और भागलपुर में भी संघर्ष हुए और लोग जेल गए। पूर्णियाँ तो बहुत ही पिछड़ा हुआ है। वहाँ न तो किसान-सभा ही मजबूत है और न वैसेकार्यकर्ताही हैं। लेकिन खेद है कि मुजफ्फरपुर में न तो कोई संघर्ष हुआ और न किसान-सभा काइधरकोईमहत्त्वपूर्ण काम ही नजर आया। हालाँकि सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता उसी जिले के हैं। इधरवहाँ की किसान-सभा ने अपने अस्तित्व का सबूत भी नहीं दिया है,यह दु:ख की बात है।

मझियावाँ में तो असल में औरतों ने ही सत्याग्रह किया और न सिर्फ उस गाँव की, वरन आसपास के गाँवों की औरतों ने उसमें पूरा सहयोग दिया। जब टेकारी राज के गुंडे लाठियाँ ले कर खेतों पर से उन्हें हटाने गए तो डँटी रहीं और गुंडों को दो-तीन ने मिलकर पछाड़ा भी। और जब भाड़े की औरतें जमींदार ने भेजीं तो उन बहादुर स्त्रियों ने इन भाड़ेवालियों को बात की बात में भगा दिया। पटने के दरमपुरा में भी औरतों और बच्चों ने ही लड़ाई जीती। वैसी बहादुरी मुझे और कहीं देखने को न मिली।

साँड़ा में भी औरतों ने पुलिस का घेरा तोड़ कर खेत में हल जोता और पुलिस को भगाने को विवश किया। अनुवाँ में खेतों पर ही झोंपड़े बना कर बाल बच्चों के साथ सभी किसान जा डँटे। फिर तो सभी कोशिशें करके सरकार हार गई। उन्होंने 144, 147 और 107 आदि धाराओं की भी परवाह न की और न कचहरी या जेल ही गए। उन्होंने कहा कि या तो इसे ही जेल बना दीजिए या पशु आदि के साथ हमें जेल ले चलिए। हम इन्हें छोड़ के कहाँ जाए?

दरभंगा के राघोपुर में तो गोलियाँ भी चलीं। मगर खून से लथपथ होकर भी किसान डँटे रहे। पंडौल का सत्याग्रह तो कमाल का रहा। वहीं दरभंगा महाराजा को पाठ पढ़ना पड़ा। देकुली में सैकड़ों किसान जेल गए और तबाह किए गए। लेकिन वहाँ के सूदखोर जमींदार के नाकों दम करके ही छोड़ा। उसे एक आदमी तक मिलना असंभव हो गया! उसका ऐसा भीषण बहिष्कार किया गया। विथान में होनेवाली दरभंगा राज की नादिरशाही गरीबों ने धूल में मिला दी और जमींदारी-शान खत्म कर दी। हमारे सभी प्रमुख कर्मी बराबर जेल में बंद रखे गए। फिर भी उनने हिम्मत न हारी।

अमवारी की बात तो श्री राहुल सांकृत्यायन के उपवास को ले कर काफी प्रसिध्द हुई। वे दो बार जेल गए और प्रतिज्ञा के अनुसार उपवास किया। पहली बार तो सरकार (कांग्रेसी) किसान बंदियों को राजबंदी मानने को प्राय: तैयार भी हो गई थी। केवल राजबंदी की परिभाषा में उसे दिक्कत थी। वह भी करीब-करीब हल हो चुकी थी। मगर पीछे चुप्पी साध गई।

राजबंदियों के लिए न सिर्फ हमारे 8-10 प्रमुख कर्मियों ने प्राणों की बाजी लगा दी, किंतु हमने प्रांत भर में घोर आंदोलन किया,दिवस मनाया। अखिल भारतीय किसान-सभा ने भी उसमें हमारा साथ दिया। मगर सरकार टस से मस न हुई।

उस आंदोलन से हमने बहुत कुछ सीखा। उसमें कांग्रेसी नेताओं की मनोवृत्ति की पूरी झाँकी हमें मिली। यही क्या कम था?अमवारी के सत्याग्रह से ही इसका श्रीगणेश हुआ और प्रांत में यह बात फैली।

अमवारी में श्री रामवृक्ष ब्रह्मचारी ने जो स्त्री-पुरुषों का अपूर्व संगठन किया और वहाँ से पैदल 14 मील सीवान तक जुलूस का जो सुंदर प्रबंध किया, जिसमें स्त्रियाँ भी लाल कपड़ों में थीं, सीवान शहर में हमने उस जुलूस का जो महत्त्व देखा और उसने लोगों पर जो असर किया वह सभी बातें चिरस्मरणीय रहेंगी। जब वहीं ब्रह्मचारी जी को आधी रात के बाद पुलिस पकड़ने आई, तो औरतों ने घेरकर ऐसा रोका कि पुलिस दंग रही। पीछे समझाने पर कठिनता से हटीं। ब्रह्मचारी जी तो इस्पात के बने हैं। किसान बंदियों को ले कर पूरे 90 दिनों तक भूखे रहे और मृत्युशय्या पर ही छूटे। न सिर्फ उनके गाँव सबलपुर को,बल्कि किसान आंदोलन को और खासकर मुझे उन जैसा साथी पाने का गर्व है। श्री कार्यानंद, श्री यदुनंदन, श्री राहुल जी जैसे मेरे गिने-चुने साथियों में वह हैं। बेशक जैसे मुंगेर के लिए कार्यानंद,और गया के लिए यदुनंदन हैं। उसी तरह सारन (छपरा) के लिए राहुल जी हैं और उन्हें वैसा ही साथी मिला है।

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इन संघर्षों से शिक्षा

इन संघर्षों में दो हजार से ज्यादा किसान और किसान सेवकस्त्री, पुरुष, बच्चे-जेल गए। बहुत ज्यादा पीटे गए। कुछ मारे भी गए। मगर किसान हिम्मत से डँटे रहे। आज भी हिम्मत वैसी ही है। उन्होंने दिखला दिया किक्षेत्रतैयार है,हम तैयार हैं। स्त्रियों ने जो बहादुरी दिखाई उसका मौका तो हमें और तरह से मिलता ही नहीं। किसानों में श्रेणी की भावना ऐसी जाग्रत हुई और दूर-दूर के किसानों ने उनमें ऐसा भाग लिया कि सभी दंग रहे। हलवाहे, चरवाहे-बिना जमीनवाले भी उसमें शामिल रहे। सभी जातियों एवं धर्मों के लोगों ने भाग लिया। दरभंगे में तो हाजी लोग भी जेल गए।

मैंने हाल में पटने के बेलदारीचक में देखा कि दो किसानों को खेत में ही गोली से मार दिया गया। मगर शेष किसान ठंडे रहे और अपना काम करते ही रह गए। फलत: जमींदार को पुलिस के डर से छिपना पड़ा। मगर किसानों को कभी ऐसी दिक्कत नहीं हुई। मगर जहाँ जरा भी गड़बड़ी हुई कि उनमें भगदड़ मची और सारा काम चौपट हुआ। घर-गिरस्ती भी खत्म हुई। इसीलिए मोतिहारी के प्रांतीय सम्मेलन में मैंने ही प्रस्ताव किया कि हर हालत में─यहाँ तक कि हमला होने पर भी, मौजूदा हालत में पूर्ण शांति जरूरी है। क्योंकि जमींदारों ने यह सोचा है कि हमले करें और अगर किसान जवाब दें, तो खूनखराबी में उन्हें फँसा के त्रस्त कर दें। सौ-पचास जगहें ऐसा होने पर तो सारा आंदोलन ही दब जाएगा। इसीलिए मौजूदा हालत में साधारणतया आत्मरक्षार्थ भी हिंसा को मैंने रोकने की राय दी।

इन संघर्षों में हमने मुकदमे लड़ने से इनकार कर दिया। यों तो किसानों के लिए आमतौर से मुकदमा लड़ना ही असंभव है। असल में सत्याग्रह का खयाल और त्याग एवं हिम्मत के बढ़ाने की भी बात थी। केस लड़ने से हमारा ध्यान भी बँट जाता है और हममें कमजोरी भी आ जाती है। मगर कुछ दिनों के बाद धीरे-धीरे जब मजबूती आ गई तो हमने वह नीति नापसंद की और जरूरत देख के मुकदमे भी लड़ लिए। सब मिलाकर उससे फायदा ही हुआ। अब तो मैंने निश्चय कर लिया की कानूनी अस्त्र से जितनी मदद ली जा सके ली जाए। क्योंकि हमारा सत्याग्रह गाँधी जीवाला तो है नहीं। हमने तो इसमें शांति आदि को अपनाया है केवल फायदा देख कर। मगर केस न लड़ने से आसानी से हमारे अच्छे-अच्छे कार्यकर्ता ही जेल में ठूँस दिए जाते हैं,ताकि पथदर्शक बिना सारा संघर्ष ही बंद हो जाए। इसीलिए मैं मानता हूँ कि केसों को जरूरत समझ कर लड़ा जाए और जमानत पर लोग बाहर लाएँ जाए।

सबसे बड़ी बात यह रही कि हमने संघर्ष शुरू करके सुलह की बात करना अब पसंद किया। प्राय: सर्वत्र ऐसा ही हुआ। हमने कभी इससे इनकार नहीं किया। मगर अनुभव ने बताया कि यह चीज अच्छी नहीं। उसमें फँसा कर जमींदारों और अधिकारियों ने हमें बहुत परेशान किया। दरभंगे में तो हमारे आदमियों को बड़ा ही कटु अनुभव हुआ। कमबेश यही हालत अन्यत्रा भी रही। गया में भी कुछ ऐसा ही हुआ। यहाँ तक कि रेवड़ा में भी हमें पीछे अनेक दिक्कतें उठानी पड़ीं। वहाँ भी अभी तक कुछ-न-कुछ झमेला चलता ही है। इसलिए मैं तो इस नतीजे पर पहुँचा कि साधारणतया हमें सुलह के झमेले में, लड़ाई छिड़ने के बाद, पड़ना ही न चाहिए। हार भले ही जाए। ऐसे मौके पर हार से भी फायदा होता है। क्योंकि अपनी कमजोरियाँ मालूम हो जाती हैं।

हमने यह भी देखा कि यदि मुस्तैदी और विश्वास के साथ काम करें तो रुपए, अन्न या आदमी के बिना काम नहीं रुकता। ये तीनों चीजें किसान ही मुहय्या कर देते हैं, सो भी आसानी से। हमारी बड़ी भूल है यदि हम जनता की लड़ाई गैरों के पैसे और आदमियों से जीतना चाहते हैं। मैं उस जीत को अगर वह हो भी जाए, हार ही मानता हूँ। क्योंकि किसान उसमें स्वावलंबी तो बनेंगे नहीं और यही लड़ाई का असली उद्देश्य है। वह हक तो कभी फिर छिन जाएगा जो आज गैरों के बल से मिला है। मैंने तो किसानों को देखा है कि वह सब कुछ कर सकते हैं और भूखों मर के भी हमें मदद दे सकते हैं, यदि हममें नेताओं में विश्वास और मुस्तैदी हो। अगर यह विश्वास न हो तो हम निश्चय ही हारेंगे, यह भी मैंने अनुभव किया।

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कोमिल्ला , हरिपुरा , गया और पलासा

सन 1938 ई. के मई मास में अखिल भारतीय किसान-सभा का तीसरा अधिवेशन बंगाल के पूर्वीय छोर पर कोमिल्ला में हुआ। मैं ही उसका अध्यक्ष था। मेरा भाषण अंग्रेजी, हिंदी और बंगला में छपा था। उस पर किसान-सभा के कुछ विरोधियों ने─ जो वामपक्षी कहे जाते हैं─ कुछ आक्षेप भी पीछे किए थे। उसका कराराउत्तरमुझे देना पड़ा! लोग कहते हैं कि मुसलमान लोग किसान-सभा नहीं चाहते, खासकर बंगाल के मुसलमान। मगर कोमिल्ला जिले में तो 95 फीसदी मुसलमान हैं। वहाँ सरकार ने,हक की मिनिस्ट्री ने और कुछ अपने कहे जानेवालों नेभी विरोध में खूब ही प्रचार किया। यहाँ तक कि सरकार ने सभा होने में ही दिक्कतें पेश कीं। मगर
बंगाल प्रांतीय किसान-सभा के साथियों की मुस्तैदी और अथक उद्योग से उसका काम सानंद संपन्न हुआ। जिस परिस्थिति में उन्होंने सफलता प्राप्त की वह असाधारण थी!

मेरे पहुँचने पर जो जुलूस स्टेशन से चलकर शहर में घूमा वह लासानी था। विरोधी लोग सोचते भी न थे कि जुलूस को वैसी सफलता मिलेगी। उसके बाद उन्हें तमाचे लगे। फलत: सभा को सफल न होने देने में उनकी सारी शक्ति लगी। शहर के चारों ओर गुंडे तैनात हो गए और पीट-पीटकर आनेवाले किसानों के जत्थे लौटाए गए। हमारे प्रतिष्ठित साथी भी शहर में राह चलते पिटे और कोई पुर्सां हाल न था! चारों ओर मुसलिम लीगवाले शोर करते और जुलूस निकालते थे। कब कौन पिट जाएगा,यह खतरा बराबर बना था! फिर भी किसान आए और खूब ही आए। वहाँ मैंने जब धर्म के ढकोसले की पोल खोली तो मुसलमान किसान और मौलवी लोग लट्टू हो गए! वे उछल पड़े! मैंने साफ समझाया कि कैसे रोटी खुदा से भी बड़ी है।

मेरे भाषण का बंगला अनुवाद बीच-बीच में मेरे साथी श्री बंकिम मुखर्जी करते जाते थे। क्योंकि लिखित भाषण के अलावे मैं जबानी भी बोला था। लेकिन जब अंत में मुझे बोलने को कहा गया तो मैंने इस शर्त पर बोलना स्वीकार किया कि बंगला अनुवाद न हो और मेरी शादी हिंदी ही किसान समझ सकें। उन्होंने मान लिया और मुझे बुलवाकर ही छोड़ा। वहीं'ओरे भाई चासी, सत्य कथा शुन' नामक बंगाली गीत पर मैं मुग्ध हो गया। न जाने उसे कितनी बार गवाया!

कोमिल्ला की यात्रा में बंगाल में न जाने कितने ही स्टेशनों पर बंगीय युवकों का दल स्वागतार्थ मिला। कई अभिनंदन-पत्र भी मुझे मिले। मैं आश्चर्य में था। मेरी पूर्व बंगाल की, या यों कहिए कि बंगाल की ही यह पहली यात्रा थी। वे मुझसे परिचित भी न थे। थोड़ा सा जो किसानों में मैंने काम किया उसी का यह फल था।

यह चीज अच्छी भी है और बुरी भी। अच्छी तो इसलिए कि सार्वजनिक सेवकों को प्रोत्साहन मिलता है और इसी के बल पर कठिन-से-कठिन क्लेश वे भोग सकते हैं। मगर बड़ी हानि यह है कि इस तरह बरसाती मेढक की तरह नेताओं की संख्या हम बढ़ा देते हैं। जिसे हमने अच्छी तरह परखा नहीं और न ठोंक-ठाँक कर ठीक ही किया, उसे यों क्यों माना जाए?पीछे वही धोखा दे तो?आज तो किसानों तथा मजदूरों के संघर्ष में सबसे ज्यादा खतरा नेताओं से ही है।

कोमिल्ला के पहले ही उड़ीसा में प. नीलकंठ दास ने एक झमेला 1937 ई. की गर्मियों में खड़ा किया था। उनने स्वतंत्र किसान-सभा का विरोध करते हुए कही डाला था कि जो कांग्रेस का मेंबर न हो वह किसान-सभा का भी मेंबर नहीं बने, ऐसा ही किसान-सभा चाहिए। मैंने उन्हें उत्तर दिया कि उन्हें पता नहीं कि कांग्रेस और किसान-सभा के दृष्टिकोण में यह मौलिक अंतर है कि जहाँ कांग्रेस राजनीतिक आईने में अर्थनीति और रोटी को देखती और राजनीति से ही उस पर आती है तथा उसे राजनीति का साधन समझ के ही अपनाती है, तहाँ किसान-सभा अर्थनीति और रोटी के शीशे में ही राजनीति को देखती और वहाँ तक पहुँचती है उसे साधन समझकर ही। इसीलिए स्वतंत्र किसान-सभा अनिवार्य है।

पं. जवाहर लाल ने राष्ट्रपति की हैसियत से एक वक्तव्य में स्वतंत्र किसान-सभा का समर्थन तो किया था। मगर लाल झंडे पर आक्रमण किया और कहा था कि किसानों का झंडा तिरंगा ही होना चाहिए। इसी के बाद ही सन 1937 में ही आल इंडिया किसान कमिटी की बैठक नियामतपुर आश्रम (गया) में हुई। उसने किसान-सभा संबंधी मेरे उड़ीसावाले वक्तव्य का समर्थन करते हुए झंडे के बारे में पं. नेहरू का लंबा जवाब दिया। उसमें लाल झंडे का समर्थन भी किया। वहीं पर आल इंडिया किसान-सभा का विधान हमने पास किया। उसके बाद नवंबर में कलकत्ते में उसकी फिर बैठक हुई और लाल झंडा किसान रखें, यह प्रस्ताव पास हो गया।

सन 1938 के फरवरी में मैंने गुजरात का पहला दौरा किया। हरिपुरा कांग्रेस के समय किसानों के जत्थे पैदल चल के आए और सुंदर प्रदर्शन हो इसकी तैयारी भी की। श्री इंदुलाल जी याज्ञिक और उनके साथियों के अदम्य उत्साह एवं कार्यपरता के कारण वह प्रदर्शन अपूर्व रहा। 20-25 हजार किसानों ने उसमें भाग लिया। सरदार बल्लभ भाई की आज्ञा थी कि कांग्रेस नगर में कोई जुलूस नहीं निकाल सकता। मगर हमने उसे न माना और खूब ही जुलूस घुमाया। शाम को सभा करके भाषण भी हुए।

गुजरात की उसी यात्रा में मुझे पता लगा कि बारदोली का किसान सत्याग्रह केवल 10-15 फीसदी मध्यम श्रेणी और धनी किसानों की ही चीज थी। वहाँ के असली किसान तो रानीपरज, दुबला और हाली कहे जाते हैं। इनकी जमीनें छिन कर केवल 10-15 फीसदी लोगों के हाथ चली गई हैं। असली किसान लोग तो फसल का अर्ध्दभाग बँटाई में दे कर उन्हीं से धनियों से वही जमीनें लेते और जोतते हैं! जुल्म यह कि मूँगफली और रुई की फसलों में भी आधा देना पड़ता है। अगर फसल मारी गई तो वे लोग नगद रुपए ही देने को बाध्य किए जाते हैं! उनकी ओर अब तक न तो सरदार बल्लभ भाई का, न गाँधी जी का और न कांग्रेस का ही ध्यान गया है।

ये हाली और दुबला लोग महाजनों और धानियों के गुलाम होते हैं और उनकी राय के बिना कहीं आ-जा नहीं सकते! यदि गए तो पकड़ मँगाए जाते हैं। कोई उन्हें रखता भी नहीं!

मेरा दौरा गुजरात के कई जिलों में खूब सफल रहा। उसी साल गुजरात प्रांतीय किसान-सभा की नींव पड़ी उसे श्री इंदुलाल और उनके साथियों की लगन ने आज तो काफी मजबूत कर दिया है। हमारी सभा के करते ही हाली लोगों की गुलामी बहुत कुछ खत्म हो गई है और साहूकारों की नादिरशाही नहीं के बराबर रह गई। हालाँकि, अभी भी जुल्म होते हैं। आज हालियों में हिम्मत है।

हरिपुरा कांग्रेस में श्री सुभाष बाबू अध्यक्ष थे। उनने अपने भाषण में किसान-सभा का समर्थन किया। इसके विपरीत सरदार बल्लभ भाई ने अपने भाषण में बेमौके ही हम लोगों पर आक्रमण किया। फलत: विषय समिति में ऐसा हो-हल्ला मचा कि मजबूरन सभापति ने उन्हें बीच में ही बैठा दिया! तब कहीं शांति स्थापित हो सकी!

सन 1939 ई. के अप्रैल में रेवड़ा सत्याग्रह की सफलता के बाद और त्रिपुरी कांग्रेस के पश्चात शीघ्र ही गया में अखिल भारतीय किसान-सभा का चौथा वार्षिक अधिवेशन आचार्य नरेंद्रदेव की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। गया के हमारे असली स्तंभ पं. यदुनंदन शर्मा तो रेवड़ा सत्याग्रह के सिलसिले में जेल में थे। वे अधिवेशन से एक ही मास पूर्व छूटे थे! फलत: अधिवेशन की तैयारी का समय असल में 15 ही दिन मिला। उसी दरम्यान प्राय: 8-10 हजार रुपए और सामान आदि का संग्रह एवं सारी तैयारी करनी पड़ी। स्वागताध्यक्ष तो हमने उन्हें ही पहले ही चुना था। बेशक,हमारे कार्यकर्ता लोग उसमें पिल पड़े। गया शहर से उत्तर का जितना इलाका है, जिसमें कुछ हिस्सा सदर सबडिवीजन का और शेष जहानाबाद का पड़ता है,उसने धान संग्रह करने और किसान सेवक दल को तैयार करने में कमाल किया। प्राय: सब भार उसी इलाके के मत्थे पड़ा। नवादा ने भी थोड़ा-बहुत किया। औरंगाबाद तो लापता ही रहा।

जमींदारों और कुछ कांग्रेसी दोस्तों ने सारी शक्ति लगा कर उसमें विघ्न डालना चाहा। किसानों को भड़काने के सैकड़ों रास्ते निकाले गए। न जानें कितनी नोटिसें और कितने लेख विरोध में छापे गए। सभा में किसान न आए इसी पर ज्यादा जोर रहा। बात यह थी कि थोड़े ही दिन पूर्व गया में दंगा हो चुका था। इसलिए हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की बात कह के भड़का देना आसान था।

मगर हम भी पूरे सजग थे। मीटिंगें करके गया शहर का वायुमंडल हमने ऐसा कर दिया कि वह खतरा ही जाता रहा। सम्मेलन में सवा लाख से ज्यादा किसान आए, ऐसा अनुमान औरों का था। पंडाल गिरजाघर के मैदान में था। कम खर्च में वह खूब ही शानदार था। सभी ने माना कि हम सब तरह से सफल रहे। किसान कोष में पैसा देने की अपील तो किसानों से की ही थी। बीसियों बक्सों में ताले लगाने के बाद ऊपर सूराख करके स्थान-स्थान पर रख दिया था। लालवर्दीवाले सेवक किसानों को चेतावनी देते थे कि किसान कोष में पैसा डालो। पैसे पड़े भी बहुत।

वहाँ मेरी राय के विरुध्द कुछ दोस्तों ने प्रदर्शनी का झमेला खड़ा करके हमें बहुत परेशान किया। इसमें खद्दर ही रहेगा इस पर हठ करके और भी दिक्कत पैदा की। फलत: हजारों रुपए का घाटा हमें उठाना पड़ा। यदि किसानों के फायदे की चीजें रहतीं और सभी ढंग के सामान आने पाते तो घाटे के बजाए नफा रहता। वह तो कोई कांग्रेस की प्रदर्शनी थी नहीं।

उस मौके पर पुलिस ने तो हमारे साथ पूरा सहयोग किया, यह हम कहेंगे। प्रतिनिधियों और दर्शकों के लिए ठहरने आदि का बहुत ही सुंदर प्रबंध था। रेलवे ने शुरू में थोड़ी गड़बड़ी की और बिना टिकट स्वागतार्थ जाने के लिए भी प्लैट फार्म पर रोक लगाई, मगर जब हम बिगड़े तब इजाजत मिल गई। मगर थोड़ी रोक का भी नतीजा उसे बुरी तरह भोगना पड़ा। जब सभा के बाद समूची गाड़ी में बिना टिकट के किसान बैठ गए और ट्रेन रोकना पड़ा। आखिर पुलिस ने रात में हमें खबर दी और जब हमने मोटर से बजीरगंज में जाकर किसानों को समझा के हटाया, तब कहीं गाड़ी जा सकी। उनने ट्रेन ही रोक दी थी। उससे पहले मानपुर में भी ऐसा ही हुआ था। वहाँ भी पुलिस के जवान हार चुके थे। तब हमने ही किसानों को वहाँ भी हटाया था। असल में पं. यदुनंदन शर्मा की गिरफ्तारी के बाद पटना-क्यूल लाइन पर हजारों किसान गया जाते-आते थे, जब-जब उनका केस होता था। वेकभी टिकट लेते न थे। पहले भी हमें एकाध बार भरी ट्रेन में से उन्हें उतारना पड़ा था। वहाँ के किसानों को इसका अभ्यास हो गया है। मगर खास-खास मौके पर ही।

गया के अधिवेशन में और प्रस्तावों के साथ विधान के संशोधान के लिए एक कमिटी बनी। उसने पीछे किसान-सभा के विधान का संशोधान तैयार किया और उसे सन 1939 ई. के जून में बंबई में अखिल भारतीय किसान कमिटी ने पास किया। आज उसी विधान के अनुसार किसान-सभा का काम हो रहा है।

उस सभा में एक बात और हो गई। सभापति जी ने लाल झंडे के विपक्ष में अपने भाषण में जो छपा हुआ था, कुछ बातें कही थीं। वे कुछ साथियों को खटकीं। फिर तो गड़बड़ी होते-होते बची। बड़ी दिक्कत से हमने सँभाला। सभापति जी ने कहा था कि किसान-सभा का रुख तिरंगे झंडे के प्रति पूर्ण सम्मानात्मक नहीं है। प्रत्युत उसे रखने का विरोधी जैसा है। मगर पीछे हमने नियामतपुर के तत्संबंधी वक्तव्य और उसके बादवाले कलकत्ते के प्रस्ताव की प्रतिलिपि उनके पास भेज कर उनसे पूछा कि इसमें आपकी लिखी बात कहाँ है और क्या कमी है जिसे आप पूरा करना चाहते हैं? मगर उनने कोई उत्तर न दिया। फलत: झंडे के बारे में हमारी किसान-सभा का जो पहले से मन्तव्य था वही रहा। इस प्रकार लाल झंडा, जिस पर हँशिए और हथौड़े का आकार बना हो, किसान-सभा का झंडा मान्य हुआ। फलत: बिहार प्रांतीय किसान-सभा को भी उसे ही मानना पड़ा। इस तरह उसका विवाद ही खत्म हो गया।

गया के बाद पाँचवाँ अधिवेशन आंधार देश में आमंत्रित हुआ। सन 1940 ई. के मार्च के अंत में विजगापटम जिले के पलासा स्टेशन के पास काशी बुग्गा में वह अधिवेशन हुआ। मगर उसकी ख्याति पलासा के ही नाम से रही। अधिवेशन तो,प्रतिदिन घोर वृष्टि के बावजूद सफल हुआ। पर्याप्त संख्या में किसान उसमें सम्मिलित भी हुए। उसकी कई बातें तो उल्लेखनीय हैं। एक तो उसके मनोनीत सभापति महापंडित श्री राहुल सांकृत्यायन ऐन मौके पर गिरफ्तार हो जाने के कारण वहाँ पहुँच ही न सके। केवल उनका छपा हुआ भाषण ही पहुँचा और वह वितीर्ण हुआ। उनके अभाव में पंजाब के पुराने किसान सेवक वयोवृध्द और योध्दा बाबा सोहन सिंह भकना ने सभापतित्व किया। पीछे तो सभापति इस साल के लिए वही स्थनापन्न चुन लिए गए।

दूसरी घटना यह हुई कि अधिवेशन के अंतिम दिन जमींदारी प्रथा का पुतला जलाने की घोषणा हो जाने से सरकार घबराई और मजिस्ट्रेट ने दफा 144 के अनुसार एक नोटिस सभापति जी, स्वागताध्यक्ष श्री श्याम सुंदर राव एम.एल. ए., श्री प्रोफेसर रंगा आदि छ: आदमियों पर तामील की कि जो यह घोषणा हुई है कि किसी जमींदार का पुतला जलाया जाएगा, उससे अशांति फैल सकती है। इसीलिए ऐसा काम न किया जाए। पुलिस और मजिस्ट्रेट को यह भी तमीज नहीं कि जमींदार का नहीं,जमींदारी प्रथा का, पुतला जलाने को था। जो पुतला बना था उस पर यही लिखा था भी। फिर भी पुलिस की बड़ी तैनाती थी और यह भी खतरा था कि रात में पुतला जलाने पर वह धरपकड़ के साथ शायद मारपीट भी करे। यह भी डर था कि जमींदारों के गुंडे बीच सभा में बैठे हों और ठीक उसी समय गड़बड़ी करें। इसलिए सभा के अंत में वह पुतला सभा के बीच में नहीं, किंतु थोड़ी दूर हट के जलाया गया। अत: कोई बाधा न हुई। श्री इंदुलाल जी ने अपने भाषण में अधिकारियों को फटकारा भी। वे अपना सा मुँह ले के रह गए। मैंने देखा कि दिन में उस पुतले को ले कर वहाँ के किसान जुलूस के साथ बाजार में घूमे और उसे जूते, लाठी आदि से पीटते थे। मैंने अजीब उमंग उनमें देखी।

उसी अधिवेशन के बाद ही श्री रंगा जी गिरफ्तार हुए और पीछे वहीं के भाषण के लिए भारत रखा कानून के अनुसार उन पर केस भी चला। हालाँकि गिरफ्तारी तो दूसरे कारण से हुई और एक वर्ष की सजा अलग ही थी। 500 रुपए जुर्माना भी था। इस प्रकार सभापति और उपसभापति दोनों ही जेल में गए। मैं बचा उसका जेनरल सेक्रेटरी, सो मैं भी पलासा से लौटने के बाद 19वीं अप्रैल को पकड़ लिया गया। लेकिन यह सब तो होना ही था और इसमें खुशी ही थी। खेद की बात सिर्फ यही हुई कि प्राय: दो ही मास के बाद पलासा के स्वागताध्यक्ष श्री श्याम सुंदर राव को सरकार ने उनके गाँव में नजरबंद किया और उसके बाद ही उनका शरीरांत हो गया!

पलासा में जो प्रस्ताव हमने राष्ट्रीय युध्द और यूरोपीय समर के संबंध में पास किया वह अखिल भारतीय किसान-सभा के इतिहास में एक ऐतिहासिक चीज रहेगी। सरकार ने उसे पीछे जब्त भी कर लिया। पलासा में मैं ज्यादा न बोला। पहले दिन जब लाल झंडे का उत्थान मैंने किया तो हिंदी में बोला। फिर दूसरे दिन अंत में 10-15 मिनट अंग्रेजी में ही भाषण किया।

 

(17)

प्रांतों के दौरे

शुरू से ही मैं इस बात की पूरी कोशिश करता रहा हूँ कि भारत के सभी प्रांतों में, यहाँ तक कि बर्मा में भी किसान-सभाएँ बनें और उनकासंबंधहमारी अखिल भारतीय सभा से हो। मुझे खुशी है कि इस काम में मुझे सफलता हुई है। प्राय: सभी प्रांतों में किसान-सभाएँ बन गई हैं और कुछ रियासतों में भी। यह ठीक है कि पश्चिमोत्तार-सीमाप्रांत,तमिलनाडु,आसाम,सिंध और महाराष्ट्र तथा महाकोशल की सभाएँ कमजोर हैं और अधिक मुस्तैदी से काम कर नहीं सकती हैं। मगर यह भी ठीक है कि बन जरूर गई हैं। उनने थोड़ा बहुत काम भी किया है। आशा है, अचिर भविष्य में उन्हें चुस्त और मजबूत बनाने में हम सफल होंगे।

बेशक हजार चाहने पर भी मैं सीमा प्रांत,सिंध,तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक प्रांतों के दौरे अब तक न कर सका। क्योंकि अवकाश ही न मिल सका। आंधार में भी सिर्फ पलासा ही जा सका। दौरा तो वहाँ भी नहीं ही कर सका। इन सभी प्रांतों के साथी मेरे ऊपर इसीलिए रंज भी हैं कि मैं उनकी उपेक्षा करता हूँ। परंतु मेरी मजबूरी को भी शायद वे समझते हैं। किसानों के संघर्षों के करते बिहार से अब तक फुर्सत ही कम मिलती रही है। फिर जाता कैसे?जब-जब मौका लगा तब-तब फिर भी गया ही। पंजाब में तो दो बार गया। मगर इधर तो सर सिकंदर ने रोक ही लगा दी। पारसाल जून में दिल्ली गया था। पंजाब जाने की बात थी ही नहीं। वहाँ के साथियों ने लिखा जरूर था। पर, मैंने इनकार किया था। फिर भी दिल्ली में ही पंजाब सरकार की नोटिस एक साल वहाँ न जाने के लिए मुझ पर तामिल हो गई! अब अगर जाता भी तो सर सिकंदर पकड़ के फिर पंजाब से बाहर ही कहीं रख देता। तो फिर इस नाटक से क्या मतलब?इसीलिए सीमाप्रांतवालों से क्षमा माँग ली।

यहीं पर प्रसंगवश एक जरूरी बात कह देना चाहता हूँ। जब मैं दिल्ली में ही था तो अखबारों में आश्चर्य के साथ अपने संबंध की बात पढ़ी और मैं दंग रह गया। बिहार के कांग्रेसी अंग्रेजी दैनिक पत्र'सर्चलाइट'ने कलकत्ते से अपने विशेष संवाददाता के द्वारा ऊपर किया गया हुआ बता के एक पत्र छापा। उसके बारे में यह बताया गया कि किसी भूतपूर्व वायसराय ने भारत में किसी के पास लिखा था। उसमें लिखा गया था कि स्वामी सहजानंद सरस्वती के विरोध से कांग्रेस कमजोर हो रही है। सरकार इससे फायदा उठाए। उसका यह भी मतलब था कि मैं सरकार के साथ गुप-चुप संबंध रखता हूँ और जानबूझ कर उसी के इशारे पर कांग्रेस का विरोध करता हूँ! मुझे इस पर हँसी आई। मैंने दिल्ली की खुली सभा में ही ऐसा कहनेवालों को ललकारा। पीछे तो एक वक्तव्य के द्वारा उस जाली पत्र का अक्षरश: भंडाफोड़ किया। फिर स्टेट्समैन ने भी उसे जाली बताया। लेकिन सत्यवादी लोग कहाँ तक जाल करके विरोधी को गिराने के लिए तैयार होते हैं इसका प्रमाण उस पत्र ने दिया। उफ! यह भयंकर सत्य!

गुजरात में तो दो बार घूमा और प्राय: हर जिले में सभाएँ कीं। इस साल तीसरी यात्रा थी और डाकोर के पास प्रांतीय किसान सम्मेलन का सभापतित्व भी करना था, 20-21 अप्रैल को। तब तक 19वीं को ही सरकार ने बंद कर दिया। वहाँ रानीपरज में मैंने सभाएँ की हैं और उन लोगों में जीवन लाने में साथियों का हाथ बँटाया है। मैंने उनका नाच और गान देखा और आतिथ्य स्वीकार किया है। सचमुच किसान-सभा ने उन्हें हाली तथा दुबला आदि को और खेड़ा के धाराला कहे जानेवाले क्षत्रियों को आत्मसम्मान और साहूकारों से त्राण दिया है। रानीपरज की एक गीत की पहली कड़ी का अर्थ ही यह है कि किसान-सभा में जरूर शामिल हो। इसका नतीजा जरूर अच्छा होगा। हमारे स्वागत में लड़के-लड़कियों और स्त्री-पुरुषों को हमने उमंग में पाया था।

युक्त प्रांत में तो तीन-चार बार गया। कुछ ही जिलों को छोड़ बाकी सभी में कई-कई सभाएँ कर चुका हूँ। पचास-पचास हजार किसानों की सभाओं में अवध में भाषण देने का मौका भी मिला है। श्री हर्षदेव मालवीय के साथ ज्यादातर जिलों में गया और उनने तथा उनके साथियों ने मीटिंगों का सुंदर प्रबंध किया। एक दौरे में तो रात में बलिया जिले में मोटर के साथ ही एक कुएँ में गिरते-गिरते बचा था। रास्ता ही भूल गया और सारी रात मोटर भटकती रही!

महाराष्ट्र,बरार,मराठी,मध्यप्रांत और महाकोशल में भी कहीं एक बार और कहीं दो बार जा चुका हूँ और अनेक जिलों में सभाएँ भी हो चुकी हैं। बंगाल की बात पहले कही चुका हूँ। आसाम के ग्वालपाड़ा जिले में इसी साल फरवरी महीने में गया था और जिला किसान सम्मेलन की अध्यक्षता भी की थी। उत्कल में भी दो दौरे हुए हैं। एक का तो वर्णन पहले ही आया है। दूसरी बार सन 1939 ई. के अगस्त में गया था, जब कि कटक में सभा हुई और अकर्मण्य प्रांतीय किसान-सभा को फिर कार्यशील बनाया।

मैंने यह देखा कि किसान सर्वत्र तैयार हैं। मगर हमारे कार्यकर्ता लोगों को या तो उनमें विश्वास नहीं है, या कांग्रेस और दूसरे दलों के कामों में फँसे होने के कारण उन्हें अवकाश ही नहीं है। मैंने आश्चर्य के साथ यह भी अनुभव किया है कि किसान-सभा के काम में सोशलिस्टों से अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा दिलचस्पी और मुस्तैदी कम्युनिस्ट विचारवाले रखते हैं। कारण,मैं नहीं कह सकता। मगर इतने दिनों के अनुभव के आधार पर ही मैं यह बात कहता हूँ। मैंने कई बार इसका उलाहना सोशलिस्ट साथियों को दिया भी है।

(18)

त्रिपुरी और उसके बाद

सन 1939 ई. के मार्च में त्रिपुरी (महाकोशल) में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसके सभापति श्री सुभाषचंद्र बोस चुने गए थे। यद्यपि कांग्रेस की वर्किंग कमिटी या बड़े नेताओं ने लगातार ही दूसरी बार उनका सभापतित्व नापसंद किया और डॉ. पट्टाभि को उनकेविरोधमें खड़ा करके उन्हीं का समर्थन किया। फिर भी सुभाष बाबू जीत गए! यह देश के बड़े नेताओं का ज्वलंत अपमान था। इसे वे बर्दाश्त न कर सके और अंत में सुभाष बाबू इस्तीफा देने के लिए मजबूर किए गए। इसका घृणितम नाटक त्रिपुरी के पहले ही खेला जाना कैसे शुरू हुआ, त्रिपुरी में उसके कौन-कौन से बीभत्स कांड हुए और उसके बादकलकत्तेकी आल इंडिया कांग्रेस कमिटी में तथा पहले क्या-क्या षडयंत्र किए गए यह मैं निकट से देख चुका हूँ। राजनीतिक गंदगी में बड़े-से-बड़े नेता तक इतना नीचे उतर सकते हैं जब किगाँधी जी ने उस पर सत्य और अहिंसा की मुहर लगा दी है ऐसा माना जाता है, यह मैंने प्रत्यक्ष देखा। सो भीगाँधी जी का नाम ले कर ही ऐसा होते देखा!

जिस प्रकार हरिपुरा में कांग्रेसी मंत्रियों को बोलने का मुँह न रहा था; क्योंकि उनके कामों से सर्वत्र किसानों में तथा औरों में असंतोष की अग्नि लहक रही थी,इसीलिए राजनीतिक बंदियों की रिहाई का सवाल उठाकर सबों का ध्यान उसी ओर आकृष्ट किया गया और बिहार तथा युक्त प्रांत के मंत्रियों से इस्तीफे हरिपुरा के ठीक पूर्व दिलाकर गुत्थी सुलझाई गई। ठीक उसी प्रकार त्रिपुरी के पूर्व गाँधी जी के राजकोटवाले उपवास की रचना करवा के, या यों कहिए कि उसकी शरण ले के सुभाष बाबू को गिराने की कुचेष्टा की गई! गाँधी जी पर कांग्रेस का विश्वास हो, भला इस बात से कौन इनकार करे? और गाँधी जी तो वहाँ थे नहीं कि पूछा जाता कि आप सुभाष को चाहते हैं या नहीं? उसी बहाने से द्रविड़ प्राणायाम के रूप में सुभाष को फाँसी पर लटकाने का श्रीगणेश त्रिपुरी की मायापुरी में किया गया, जब कि वह शख्स 105 डिग्री के ज्वर से आक्रांत मरणासन्न वहीं पड़ा था! मेरे लिए यह असह्य दृश्य था। इसीलिए बंबई के बाद वही पहली कांग्रेस थी जिसमें मैं बिलकुल ही मौन रहा! कुछ साथियों ने भी मेरी यह मनोवेदना समझी थी।

बात यह है कि त्रिपुरी से पूर्व सुभाष बाबू से मेरी न तो बातचीत कभी थी और न परिचय। केवल हरिपुरा के भाषण ने मुझे उनकी ओर आकृष्ट जरूर किया था। जब देखा कि गाँधी जी और श्री बल्लभ भाई के गढ़ में उन्होंने किसान-सभा का अत्यंत स्पष्ट समर्थन किया और प्रगतिशील विचारों का भी। उनकी पूर्व प्रकाशित'इंडियन स्ट्रगल' (Indian Struggle) को पढ़कर कोई भी ताज्जुब कर सकता है कि गाँधीवाद औरगाँधी जी के विचारों और कामों का शुरू से ही कट्टर विरोधी होकर भी उनके गढ़ में वह शख्स कैसे राष्ट्रपति बन सका। विरोधियों ने जरूर ही उसका लोहा माना होगा।

लेकिन जब दूसरी बार उनके राष्ट्रपति होने की बात उठी तो मैं नहीं पसंद करता था। क्योंकि डरता था कि लगातार दो बार होने पर अवश्य गाँधी जी का जादू उन पर लगेगा। फलत: उनके पुराने विचार बदलेंगे, जैसा कि औरों के बारे में मैंने अनुभव किया है। मगर जब चुनाव के दो-चार ही दिन पूर्व किसान-सभा के ही काम से कलकत्ते गया और कुछ समाजवादी साथियों ने समझाया कि सुभाष के समर्थन में हार या जीत हर दशा में लाभ है, तो मैं मान गया। वहीं से लौटकर हमने और समाजवादियों ने वक्तव्य द्वारा केवल एक दिन पहले उनका समर्थन किया। उसके बाद जब वे जीते तो वही समाजवादी लोग नाचते रहे, सारी रात चैन नहीं लिया और न हमें लेने दिया। मगर फिर पीछे वही उनके सख्त विरोधी बन गए! पर, मुझे तो विरोध का कारण आज तक न मिल सका।

त्रिपुरी में उनकी भयंकर बीमारी के समय दो-एक बार उनसे बातें करने का जरा सा समय पहले पहल मिला था। मगर वह तो कुछ न था। इसलिए वहाँ जो मेरी मनोवृत्ति थी वह स्वाभाविक थी न कि उनकी घनिष्ठता के फलस्वरूप। सच बात यह है कि समाजवादी साथियों ने अंत में वहाँ जो रुख लिया और गाँधी जी पर विश्वासवाले प्रस्ताव का विषय समिति में विरोध कर के भी पीछे ऐसा न किया, वह चीज भी मैं आज तक समझ न सका। यह बात मुझे बुरी भी लगी। मगर मैंने अपना विचार वहाँ दबा रखा। प्रस्ताव के विरोध में वोट जरूर दिया। लोग जानते भी थे कि मैं उसका विरोधी हूँ। मगर किसी से भी विरोध में वोट देने को न कहा। इससे समाजवादी पार्टी में फूट होती और मैंने उसे उस समय बचाना चाहा। प्राय: दो-चार को छोड़ उस पार्टीवाले भी सभी के सभी बड़े ही क्रुध्द थे। मगर पीछे न जानें क्या समझ कर चुप रह गए। यह तो प्रकट सत्य है। अखबारों में सभी बातें छपी थीं भी।

त्रिपुरी में ही मैंने पहली बार कोशिश की कि सभी प्रगतिशील विचारवाले एक स्थान पर बैठकर कोई सम्मिलित कार्यक्रम बनाएँ। मगर वहाँ असफल रहा।फिर भी पहली बार यह प्रत्यक्ष देखा कि वामपक्षीय दल के लोग एक पार्टी के सदस्यदूसरीपार्टीवालों पर कितना अविश्वास करते हैं। वहीं यह भी देखा कि बड़े-से-बड़े नेता भीकिस प्रकार प्रतिनिधियों के कैंप में जाकर कनवांसिग करते थे! बुरी तरह बेचैन थे!

त्रिपुरी के अवसर पर कई दिन पहले ही मैं जबलपुर जा पहुँचा और कटनी, मंडला आदि में घूमा तथा सभाएँ कीं। मेरे साथी श्री इंदुलाल जी तो थे ही। वह तो पहले ही से वहाँ जा बैठे थे। वही तो किसानों की पैदल यात्रा और प्रदर्शन का प्रबंध कर रहे थे। सचमुच एक दिन तो जबलपुर के पास से त्रिपुरी तक हमें भी उसी दल के साथ पैदल जाना पड़ा। वह प्रदर्शन तो खूब ही रहा। पैदल दूर-दूर से किसान आए और जुलूस एवं प्रदर्शन शानदार रहा। झंडा चौक में सभा हुई। कांग्रेस के वालंटियरों ने हमारा साथ पूरा-पूरा दिया! कोई बाधा न रही। यह देख हमें खुशी हुई। न जानें क्यों ऐसा हुआ? शायद बाधा देने पर वे लोग न मानते। इसी से स्वागत समिति ने बुध्दिमानी की।

वहाँ के किसान कैंप में हमारी कई सभाएँ हुईं और हमने किसानों को पूरा-पूरा तैयार तथा अपने साथ पाया। महाकोशल में किसान-सभा की जड़ त्रिपुरी में ही पड़ी।

त्रिपुरी के बाद कलकत्ते में आल इंडिया कांग्रेस कमिटी का तमाशा देखा। वहीं अन्याय की चरम सीमा देखी। सुभाष बाबू ने राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दिया। यह बात हम पहले नहीं चाहते थे। मगर पीछे तो हमें भी उचित जँची। वामपक्षियों के सम्मेलन की एक कोशिश फिर वहाँ भी हुई। हमें लोग मिले भी। मगर फल कुछ संतोषप्रद न हुआ समाजवादी और कम्युनिस्ट दोनों ही संयुक्त वामपक्ष के विरोधी थे। यह बात हम समझ न सके।

त्रिपुरी के बाद रामगढ़ में इस साल कांग्रेस हुई। बिहार को छोड़कर छोटानागपुर में उसे करने का अर्थ हमारी समझ में नहीं आया! हम तो यही मानते हैं, जैसा कि अखबारों ने लिखा भी कि किसान-सभा के डर से ही वहाँ की गई। पटना, गया, सोनपुर आदि में तो कई लाख किसान जमा हो जाते और नेताओं की एक न चलती। हम जो कहते किसान वही करते। मगर छोटानागपुर के घोर जंगल में यह असंभव था। वहाँ के किसान अभी पूरे जगे नहीं हैं और दो-तीन सौ मील से लाखों का जाना आसान न था। फिर भी किसानों का प्रदर्शन तो रामगढ़ में भी अच्छा हुआ। हालाँकि बिहार के लिहाज से अच्छा नहीं कहा जा सकता। ऐसा क्यों हुआ यह कहनेको यहाँ मैं तैयार नहीं,हालाँकि जानता हूँ। बेशक हमारा जुलूस कांग्रेस के राष्ट्रपति के जुलूस से कहीं शानदार और लंबा था। कांग्रेस तो मेघ के कोप से असल में हुई ही नहीं और जो कुछ हुआ वह तो निरा तमाशा था। इसे सभी मानते हैं। इधर यह पहली ही कांग्रेस थी जिसके अंदर या कांग्रेस नगर में मैंने पाँवतक नहीं दिया।

(19)

समझौता विरोधी सम्मेलन

इधर कांग्रेस के नेताओं और वामपक्षी पार्टियों के रुख से मैं निराश हो गया था और ऊब कर सारा समय किसानों में ही लगाने का तय कर लिया था। लोगों ने और कुछ साथियों ने इस पर यह भी दोषारोपण किया कि मैं तो राजनीति को छोड़ शुध्द अर्थनीति (Pure economism) में पड़ गया। मुझे इनकी बुध्दि पर हँसी आई और तरस भी।

मगर बराबर राजनीति में रहने के कारण एकदम तटस्थ होना असंभव था। सुभाष बाबू से बातें भी होती रहती थीं। इधर जब देखा कि समझौते की मनोवृत्ति कांग्रेसी नेताओं में धीरे-धीरे दृढ़ हो रही है और राष्ट्रीय आजादी का युध्द वे अब न छेड़ेंगे,तो कुछ साथियों और सुभाष बाबू के साथ तय पाया कि रामगढ़ में कांग्रेस के समय ही समझौता विरोधी सम्मेलन हो। फलत: उसकी तैयारी होने लगी। मगर समय महीने भर का ही था। तुर्रा यह कि लोगों ने मुझे ही स्वागताध्यक्ष बना दिया। जब मैंने जवाबदेही लेने से इनकार किया तो तय पाया कि मेरा नाम तो रहे। पर,जवाबदेही औरों पर रहे। मेरा नाम रहने से असर अच्छा होगा यही कहा गया। हुआ भी ठीक यही। सम्मेलन के अध्यक्ष सुभाष बाबू का जुलूस लासानी था। प्रकृति देवी ने भी सम्मेलन पर कृपा की और उसका खुला अधिवेशन जम के हुआ। जहाँ लाखों लोग जमा थे। कांग्रेस के ठीक उलटा हुआ। हालाँकि बड़े-बड़े नेताओं और पुराने साथियों तक ने इसमें बाधा डालने में कोई कोर-कसर न की। उन्होंने बेहयाई तक कर डाली।

मेरे विचार से उस सम्मेलन की सफलता का दारमदार यों तो अनेक साथियों पर है ही। पर, पं. धानराज शर्मा यदि न रहते तो यह बात कदापि न होती। सम्मेलन में मैंने कहा था कि यही समय कूदने का है। उसी के बाद तो कूदकर मैं जेल में आ बैठा। हमने यूरोपीय युध्द में सहायता का खुलेआम वहाँ विरोध किया और विरोध करने की प्रतिज्ञा की। फलत: राष्ट्रीय सप्ताह में शुरू से अंत तक मैं बिहार प्रांत में खुल के विरोध करता रहा। फलत: उसी अपराध में पकड़ा जाकर तीन साल के लिए जेल में बंद किया गया। ता. 29-4-40 को यह दंड मिला।

(20)

वामपक्ष का मेल

मैं अपने इस जीवन-संघर्ष की गाथा को पूरा करने के पहले एक जरूरी बात कह देना चाहता हूँ, जिसमें मैंने बहुत दिलचस्पी ली और अंत में ऊब कर जिसे छोड़ा, वामपक्षी मित्रा प्राय: कहा करते थे कि यदि आप चाहें तो वामपक्षीय दलों का परस्पर मेल हो सकता है। मगर मैं इसमें पड़ता न था। परंतु जब त्रिपुरी के बाद पड़ा तो देखा कि इस मेल काविरोधहोने लगा। जो सबसे समझदार थे वही ऐसा करते थे! लेकिन सन 1939 के जून में बंबई में जब फारवर्ड ब्लॉक की पहली कॉन्फ्रेंस हुई तो श्री नरीमान आदि ने मुझसे पूछा कि कोई कॉन्फ्रेंस वामपक्षियों की की जाए? मैंने हाँ, कहा। बंबई जाने पर सद्भाव प्रदर्शनार्थ वहाँ गया भी और बोला भी। उसके बाद सभी वामपक्षीय दलों की बैठक सुभाष बाबू के डेरे में हुई। कई दिन की कोशिश के बाद आखिर मेल हुआ और संयुक्त वामपक्ष कमिटी (Left Consolidation committee) भी बनी। उसमें सभी दलों के प्रतिनिधि रहे। मैं और प्रो. रंगा किसी दल के न होने के कारण किसान-सभा के ही समझकर उसमें रखे गए। बंबई में उस कमिटी का काम खूब चला। बराबर बैठकें हुईं और आल इंडिया कांग्रेस कमिटी में किस प्रस्ताव पर क्या किया जाए, कौन क्या बोले, क्या संशोधान लाएँ और कौन से प्रस्ताव लाएजाएआदि बाएँ तय हुईं।

उसी समय आल इंडिया कांग्रेस कमिटी में वर्किंग कमिटी के प्रस्ताव आए कि बिना प्रांतीय कांग्रेस की आज्ञा के कोई सत्याग्रह न करे और न प्रांतीय कमिटियाँ मंत्रियों के रास्ते में दिक्कतें डालें। सीधा अर्थ था बिहार का किसान सत्याग्रह बंद करने का और कांग्रेस को मंत्रियों के अधीन करके वैधानिकता की छाप उस पर लगाने का। हम सबों ने दोनों का विरोध करना तय किया। बहुत साथी बोले। सुभाष भी बोले। मैंने साफ कहा कि मैं इसे मान नहीं सकता। आप साफ कहिए कि हम कांग्रेस से निकल जाए। यह द्रविड़ प्राणायाम क्यों? इसके बाद मैं बंबई से चला आया।

मगर वामपक्ष कमिटी ने तय किया कि 9 जुलाई को भारत भर में इन दो प्रस्तावों का विरोध हो। बस, यहीं से फिर गड़बड़ी हुई। रायसाहब का दल तो 9 जुलाई को ही उस कमिटी से अलग हुआ। दूसरे दल अलग तो न हुए। मगर 9 जुलाई को विरोध दिवस बहुतों ने न मनाया। हमने तो पटने में जम के मनाया। उसके बाद सुभाष बाबू कांग्रेस की चुनी कमिटियों से निकाले गए। फिर भी देखा कि समाजवादी लोग ढीले पड़ रहे हैं। प्रांतों में कुछ न किया गया।

फिर कलकत्ते में उस कमिटी की बैठक हुई जिसमें सभी दलवाले थे। लेकिन वे लोग उस कमिटी से डर रहे थे ऐसा अंदाज लगा। वहीं राष्ट्रीय-संग्राम सप्ताह मनाने का तय पाया। मगर मैंने बहुत दर्द के साथ देखा कि हमारे बड़े-से-बड़े समाजवादी पटने में बैठे रहे और मेरे लाख कहने पर भी उनने 31 अगस्त से 6 सितंबर तक एक दिन भी उस सप्ताह में मीटिंग तक न की। मुझे बड़ी तकलीफ हुई। पीछे तो बिहार कांग्रेस ने मुझे भी कांग्रेस से अलग कर दिया, क्योंकि मैं सत्याग्रह चलाता ही रहा। रोका नहीं।

यूरोपीय युध्द छिड़ने पर अक्टूबर में नागपुर में साम्राज्यविरोधी सम्मेलन सभी दलवालों से पूछ कर हुआ। मगर समाजवादी उसमें न आए। हालाँकि मैंने श्री जयप्रकाश बाबू से पहले ही पूछ लिया था। मुझे खेद हुआ। फिर 11-12 अक्टूबर को हम सभी लखनऊ में मिले। मगर देखा कि समाजवादी अपनी डेढ़ ईंट की मस्जिद अलग ही बनाएँगे। मैं उन्हें समझा कर हार गया। वहाँ से बिहार में लौटा और अन्य समाजवादी साथियों से बातें कीं। वे राजी हुए कि खुशी-खुशी मिल कर लड़ें। फिर भी न जानें क्यों बात कह के भी चुप्पी साध ली! बस, 7वीं नवंबर को मैंने एक लंबा पत्र सबों को लिख कर सबों से नाता तोड़ लिया। पत्र में इसके सभी कारण दिए गए हैं।

(21)

उपसंहार

मेरा खयाल था कि अंत में अपने मुख्य-मुख्य विचार भी लिख कर इस दास्तान को पूरा करूँ। मगर इसकी काया यों ही विस्तृत हो गई। इसीलिए मजबूरन वह खयाल छोड़ना पड़ा। वे विचार अब अलग ही लिखे जाएगे ऐसा तय कर लिया है।

लेकिन इतना तो जान ही लेना चाहिए कि मैं कमानेवाली जनता के हाथ में ही, सारा शासन-सूत्रा औरों से छीनकर, देने का पक्षपाती हूँ। उनसे ले कर या उन पर दबाव डाल कर देने-दिलवाने की बात मैं गलत मानता हूँ। हमें लड़कर छीनना होगा। तभी हम उसे रख सकेंगे। यों आसानी से मिलने पर फिर छिन जाएगा यह सत्य है। यों मिले हुए को मैं सपने की संपत्ति मानता हूँ।

इसके लिए हमें पक्के कार्यकर्ताओं और नए नेताओं का दल तैयार करना होगा। मगर जो किसानों, मजदूरों आदि को आर्थिक प्रोग्राम के आधार पर कहीं-न-कहीं उनका संगठन कर के उनकी लड़ाई में सीधे शामिल न हों वह लोग उनके और हमारे नेता या कार्यकर्ता नहीं हो सकते। मैं किताबी ज्ञान नहीं चाहता। केवल किताबी ज्ञान से धोखा होता है। मैं लड़ाई और लड़नेवाले चाहता हूँ। मैं आर्थिक लड़ाई को छोड़कर आजादी की लड़ाई का विरोधी हूँ। मैं आर्थिक युध्द को ही आजादी के युध्द में परिणत करना चाहता हूँ। मैं सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांति चाहता हूँ और यह दूसरे तरह हो नहीं सकती। मैं वैसे ही लोगों का साथ दूँगा।

मगर दलबंदियों से ऊब जाने के कारण किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने से डरता हूँ। भरसक किसी भी दल में शामिल न हूँगा।


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