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कहानी

कालिख
एस.आर. हरनोट


मनुआऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। ओ... रे मनु...।'

शामा आँगन की मुँड़ेर से आवाज दे रही है। कुछ देर चुप्प खड़ी रहती है। दाएँ हाथ में सुलगती बीड़ी है। मनु पता नहीं कहाँ खेलने में मस्त होगा। हाँक की कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती। खनकती आवाज से खेत के किनारे चूली के पेड़ पर बैठे दो-तीन कौए जरूर उड़ जाते हैं। गाँव के लोगों के लिए शामा का इस तरह आवाज देना कोई नई बात नहीं। लेकिन आज उनके कानों में ये डायनामाइट के ब्लास्टों की तरह पड़ी है। सभी के नाक-मुँह चढ़ गए हैं। सामने की पगडंडी से एक गाय बिदकती आ रही है। वह फूला पंडिताणी की है। पशुओं को चरा कर ले आते वक्त कुलच्छणी रोज ही गौशाला में जाने के बजाय शामा के घर की तरफ रुख कर देती है। फूला उसी को बोल कर गाय को रुकवा देती थी। पर आज पारा गरम लगता है। मन की चिढ़ गाय पर कम और शामा को देख ज्यादा है। उसी रफ्‍तार से पीछे डंडा ले कर भाग आती है। शामा भी परवाह नहीं करती। झटपट बीड़ी के दो-चार कश खींचती है। उँगलियों के बीच जब सेंक छूता है तो झट से नीचे फेंक कर पैर से मसल देती है। पुनः हाँक देती है मनु को,

'ओ रे मनुआ...। मनु ओए...।'

उसका कहीं अता पता नहीं है। गुस्से में गालियाँ बकने लगती है, 'पता नी कोढ़ी किस के दरवाजे घुस्सा होगा। कमजात, हरामी कहीं का। मेरा लहू पीणे पैदा हुआ है। आणा तू घर। आज तेरी टाँग नी तोड़ी तो मेरा मेरा नी बोलणा।'

बड़बड़ाती हुई भीतर जाने लगती है। अभी दरवाजे के पास ही पहुँची थी कि पंडिताइन गाय को 'गोट' कर ले आई। गाय सीधी जाने के बजाय शामा की तरफ मुड़ गई। इस आशा से कि पहले की तरह रोटी की पिन्नी या टुकड़ा मिल जाए। फूला तो गुस्से में थी ही। भीतर का गुस्सा गाय की पीठ पर उतरा। आठ-दस धर दिए। डंडा भी टूट गया। शामा जितने में भीतर जा कर रोटी का टुकड़ा लिए लौटी, गाय भाग ली। पीठ पर जहाँ-जहाँ भी मार पड़ी, लंबी धारियाँ बन गई थी। शामा दलहीज पर खड़ी-खड़ी देखती रहती। करती भी क्या। गुस्से से दाँत कटकटाती रही, मानो दर्द उसे ही हो रहा हो।

'पागल हो गई है बामणी। राँड़ गोमाता को भी नी छोड़ती। थू तेरे को।'

जोर से थूक दिया। रोटी के टुकड़े को इतने जोर से मसला कि चूरा-चूरा हो गया। उल्टे हाथ छत पर फेंक दिए। वे खपरैल के बीच जगह-जगह ठहर गए। दो-तीन कौए आ कर उन्हें चुगने लगे। भीतर खड़ी शामा काफी देर उनकी खटर-पटर सुनती रही। कुछ बारीक टुकड़े भीतर भी गिर गए। छत की तरफ देखा। खपरों के बोझ से एक-दो बाँस की कड़ियाँ मुड़ गई थीं। कई जगह इतनी बीच कि आसमान के तारे गिन लो। धुएँ से काली-बदरंग होती छत। घास के लंबे तिनकों में फँसा कीरा और उनसे लटकते मकड़ी के जाले। बरखा होती तो कई जगह से पानी टपकने लगता। एक-दो जगह तो पानी से, मिट्टी की भीत में खराद सी लग चुकी है। गारा-गोबर भी कितना पाथे शामा। एक तरफ लिपाई करे तो दूसरी जगह खुरने लगती है। पता नहीं कब खपरे-बाँस सिर पर आ जाए। बाहर से आती रोशनी ने उन्हें ज्यादा डरावना बना दिया है। वह भाग कर दरवाजा फेर लेती है। भीतर सब कुछ हलके अँधेरे में समा जाता है।

महज एक कमरे का घर है शामा का। पहले वह गौशाला थी। उसका दिल जानता है कि किस मुश्किल से सिर ढाँपने लायक किया था। लोग बताते हैं कि उसमें जो गाय-भैंस बँधी रही, न कभी बोली और न ही अगले आसरे हुई। पर उसके तो एक बेटा हो गया। आज उसी के लिए पंचायत... कि मनु बेतुख्मी औलाद...! याद आया तो जैसे सिर पर किसी ने ठंडे पानी का घड़ा उलटा दिया हो। शरीर से प्राण ही निकलने लगे। शर्म से अकेली ही पानी पानी। खड़े-खड़े चक्कर से आने लगे तो चूल्हे के पास बैठ गई। बिल्कुल सामने। इस कड़ाके की धूप में इतनी सिरहन...!

उसने चिमटा उठाया और राख को इधर-उधर करने लगी। दबे अंगारे जाग गए। वह निर्निमेष देखती रही और कहीं उन्हीं में खो गई। जलते-बुझते अंगारे। बाहर से हवा के झोंके आते तो जुगनुओं की तरह चमकने लगते। उनका सेंक बढ़ जाता। चिमटे से फिर उलटती-पलटती। कई पल छेड़ती रही तो टूट कर एक से कई-कई हो गए। इस होने-टूटने की क्रिया में उलझी न जाने कब तक यूँ ही बैठी रही। कुछ भी सूझ नहीं रहा था। कभी लगता जैसे शरीर जल कर राख हो गया है। चूल्हे में राख उसी की है। हड्डियाँ गल कर आग के कतरों में चमक रही है।

भीतर भी कुछ उसी तरह जल-बुझ रहा था। साँस लेती तो लगता आग की लपटें निकल रही है। कलेजा मुँह को आ रहा है। शरीर में भयंकर जकड़न। पल-पल सूखता गला। तालू से चिपकती जीभ। कोशिश करती कि मुँह में गीलापन आ जाए पर व्यर्थ। इतनी हिम्मत भी नहीं कि उठ कर घड़े से पानी निकाल कर पी ले।

धड़ाम से दरवाजा खुला तो चौंक गई थी शामा। चूल्हे पर गिरने से बची। सोचा कि मनु आया होगा। गुस्से में चिमटा उठा लिया। देखा तो पंचायत का चौकीदार था।

'तू आती क्यों नी शामा? कितणी देर से पंचायत तेरा इंतजार कर रही है। उठ जा। म्हारे को तेरी ही पंची नी करनी है। और काम भी है।'

जैसे किसी ने कीचड़ का टोकरा सिर पर फेंक दिया हो। बैठे-बैठे दरवाजे की तरफ देखती रही। पंचायत का चौकीदार अभी भी यमदूत की तरह खड़ा था। दाहिना पैर दहलीज के बीच और हाथ दरवाजे की साखों पर। साफ था कि उसने दरवाजा पाँव की ठोकर से खोला था।

बिना खड़खड़ाए या हाँक दिए दरवाजा खोलना कोई नई बात नही थी। तकरीबन सभी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करते। जैसे वह इंसान नहीं कोई चौराहे का ठिया हो। जिसका मन किया दो घड़ी उठ-बैठ लिए। आराम फरमाया। अपना बोझा टिकाया। या चौकड़ी जमा कर ताश खेलने लग गए। दारू-सुल्फा पीते लोट-पोट हो लिए। या फिर भीत में ठूँसी कोई खूँटी... कभी झोला लटकाया तो कभी कोट। कभी फटे-पुराने कपड़े। सदरी तो कभी पायजामा। किसी रोज कुरता तो कभी टोपी।

शर्म से फिर पानी-पानी। अतीत कहीं भीतर की टीस में गुम। आछन्न। घुप्प अँधेरा, मानो कभी सूरज उगा ही न हो।

उसने उठने का प्रयास किया। शरीर इस तरह अकड़ गया था जैसे किसी ने रस्सी से बाँध रखा हो। चिमटे का सहारा लेना पड़ा। भारी मन से उठी। उठते ही चौकीदार दरवाजे से हटा और रास्ते में तन गया। शामा ने एक-दो कदम आगे-पीछे दिए। दोनों बाजू झटकाए। कुछ खून का संचार हुआ। शरीर में हल्का सा ढीलापन आया तो मुड़ कर घड़े के पास गई और बैठ गई। टीन का डिब्बा खिसकाया और पानी उड़ेलने लगी। छलकाव सँभला नहीं उससे। डिब्बा तो भरा पर काफी पानी नीचे उलट गया। धार उसके पाँव के बीच से दौड़ती चूल्हे में घुस गई। आग और पानी ने मिल कर एक डरावनी ध्वनि उत्पन्न की... छ्‌छ ...छा।

कमरा काले-सफेद धुएँ से भर गया था। राख के कतरे सिर-माथे पर ऐसे बैठे जैसे किसी ने जानबूझ कर पोथ दिए हो। आँखें मीच गईं। कुछ देर बाद जब आग-पानी का धुआँ थमा तो उसने आँखें खोलने की कोशिश की। राख की किरचें बुरी तरह चुभ गईं। दो-चार दफा मुश्किल से पलकें झपकाईं तो चुभन कुछ हल्की हुई। कुरते के छोर से बाल, मुँह और आँखें पोंछी। फिर कपड़े झाड़े। डिब्बे में भरे पानी के ऊपर भी राख की तह जम गई थी। वहीं से बाहर फेंका। चौकीदार थोड़ा बाएँ न हटता तो सारा मुँह पर पड़ जाता। अचानक मुँह से निकला... राँड़ कहीं की। शुक्र है कि शामा ने सुना नहीं। वरना उसकी खैर नहीं थी। जिस स्थिति से वह गुजर रही थी न जाने क्या कर देती?

दोबारा पानी उड़ेला। पूरा डिब्बा खड़े गले पी गई। उठते-उठते सहजता के बजाय कुछ अटपटा सा लगा। भीतर जैसे कुछ बुझ गया हो। फिर उसका सेंक पूरे शरीर की शिराओं में पसर गया। उसी तरह जैसे चूल्हे में पानी के जाते ही अंगारे उफने थे। एक सरसरी नजर चूल्हे में डाली वह ठंडा हो गया था। बिल्कुल श्मशान में बुझाई छाई की तरह। बुझे मन से दरवाजे तक आई। बाहर देखा। दोपहर पूरे यौवन पर थी। घर की छत, पेड़ों और घाटियों की सिमटती परछाइयाँ। आसपास की गौशालाओं से आती गोबर और पशुओं की गंध। गलगल के पेड़ से लटकता पौ। उस के आर-पार बैठी दो गौरैया और उनके तीन छोटे-छोटे बच्चे... अपनी चोंच पानी में डुबोती और बच्चों के मुँह में डाल देती। अचानक कुछ याद आया। वापिस लौटी और चूल्हे के साथ रखी छाबड़ी पर से स्टील की थाली हटा दी। मन को तस्सली हो गई... मनु के लिए दो रोटियाँ रात की बची हैं। खुद तो आज कुछ खाया ही न था। कोने में रखा दराट उठाया, बूट लगाए और हड़बड़ी में बाहर निकल गई। एक-दो कदम दिए तो पीछे देखा। दरवाजा तो ओटा ही नहीं था। वापिस लौटी और शांगल चढ़ा दी। चौकीदार काफी आगे निकल गया था।

चलते-चलते शामा को महसूस हुआ कि आग के अंगारे भीतर चमकने लगे हैं। सेंक धीरे-धीरे बढ़ रहा है। पूरा शरीर धधकने लगा है। इतनी कसमसाहट कि आगे पाँव रखें तो पीछे आ जाए। उसने माथे पर चू रही पसीने की बूँदें उँगलियों से पोंछ दी। चादर के किनारे से माथा साफ किया। रास्ता कई घरों के आँगन-पिछवाड़े से होता हुआ स्कूल तक जाता था। आश्चर्य हुआ कि कहीं भी कोई आहट नहीं। न किसी के बतियाने की आवाज। न किसी बच्चे के खेलने या रोने का शोर। जैसे एक गहरा सन्नाटा गाँव-बेड़ में पसर गया हो। कहीं कोई औरत दिखती भी तो मुँह फेर लेती। मर्द एक अजीब सी हँसी हँस देते।

चाल आहिस्ता की। साँस फूल रही था या दिल की धड़कनें बढ़ने लगी थी, अंतर नहीं कर पाई। सोचती रही कि पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ। वरना जब भी कोई मिलता या देख लेता तो झटपट अठारह काम बताने लग जाता। शामा सभी के बताए काम करती रहती। कभी किसी को मना नहीं करती। उनका चिक्कड़-गोबर फेंकती भाँडे-बर्तन माँजती। घास-पत्ती काटती, लाती। साल-फसल की कटाई में बराबर का हाथ बँटाती। हारी-बीमारी में साथ। सुख-दुख में बराबर की भागीदारी। यानी जिसकी जो मदद हो पाती, किया करती। इसमें अपना स्वार्थ भी होता। हर घर से कुछ न कुछ मिल जाता। आई-चलाई चलती रहती। अपना पेट भर लेती।

अपनी छोटी सी जिंदगी में शामा ने शायद ही कभी सुख देखे हों। ब्याह क्या हुआ पूरा जीवन ही अभिशाप बन गया। माँ-बाप ने पाँच भी नहीं पढ़ने दी। जैसे ही स्कूल से हटी, सिर पर ब्याह थोप दिया। उम्र भी ज्यादा नहीं। सोलह से एक-दो महीना कम ही रही होगी। हँसना-खेलना जाता रहा। चंचलता छिन गई। मासूमियत खो गई। माँ-बाप की जिद के आगे एक न चली। चुपचाप उनके फैसले को एक ही घूँट में कड़वी दवा की तरह पी गई। जिसके साथ शामा का ब्याह हुआ था, वह उम्र में कोई दस साल बड़ा होगा। बचपन से ही खुराफाती दिमाग। माँ-बाप स्कूल भेजते, पर वह खेत-जंगल में छिप कर दिन पूरा करता। कामकाज में बिल्कुल निट्ठला। मुँह से दूध की बास भी नहीं गई थी कि दारू-सुल्फे की लत लग गई। बुरे काम। उल्टी संगत। झूठ बोलना तो उसकी रग-रग में बैठ गया था। बीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते कद तो खूब बढ़ा पर सूख कर काँटा रह गया। न कभी बाल बनाता। न नहाता। बढ़ी हुई दाढ़ी। गंदे नाखून। न ढंग के कपड़े। वह माँ-बाप के लिए एक अच्छी-खासी मुसीबत बन गया था।

कोई कहता कि लड़का मानसिक रूप से बीमार है। कोई उस पर भूत-प्रेतों का असर बताता। उसकी बातें समझ से परे होती। कभी पाताल की बातेंकरता तो कभी आसमान की। कभी परियों की तो कभी भूत-प्रेतों की। सोने के कमरे में तो किसी को नहीं मानता था। घंटो दरवाजा बंद करके कुछ बड़बड़ाता रहता। धूप का धुआँ कई बार दरवाजे-खिड़कियों से बाहर निकलता तो लगता कि भीतर आग लगी हो। एक दो बार उसके बाप ने डाँटना चाहा पर उसकी लाल-डरावनी आँखें देख कर घबरा गया। जैसे उल्टा उसे ही मार देगा। एक दिन तो उसने किसी बात पर पहले बाप को बुरी तरह पीटा और फिर अपनी माँ का सिर फोड़ कर घर से भाग गया। एक अजीब सा भय उस घर में पसर गया था।

किसी ने सलाह दी थी कि यदि उसकी शादी कर दी जाए तो उस विक्षिप्तता से छुटकारा मिल सकता है। कई दिनों बाद घर लौटा तो बाप ने प्यार से समझा-बुझा कर शादी के लिए राजी कर लिया। जहाँ रिश्ता हुआ, उनसे सब कुछ छुपाए रखा। और शामा जैसी मासूम और भोली लड़की के गले जैसे साँप पड़ गया हो।

शादी के बाद कुछ समय तक वह ठीक रहा। शामा का मन नई-नई दुल्हन के सपनों से भरता-सींचता चला गया। मायके का बिछोह भी भूलने लगी थी। लेकिन धीरे-धीरे कुछ दिनों बाद उसके पति के भीतर का जानवर बाहर निकलने लगा। उसकी ऊल-जलूल हरकतों से शामा परिचित होने लगी थी। उसे बहुत तंग करने लगा। बेवजह मारता-पीटता। कई बार शामा के कपड़े तक फाड़ देता। ब्याह के जो गहने उसने चाव से रखे थे उनमें से हर सप्ताह एक गहना गुम होता जाता। पहले बालियाँ फिर गोजरू उसके बाद चाँदी की छाप और पायलें। फिर सोने का चाक, सुहाग की चूड़ियाँ और कुछ दिनों बाद उसके पहनने का एक-एक कपड़ा। शामा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करे। एक दिन हिम्मत जुटा कर सास को सारी बातें बता दी। और सास ने अपने पति के पास। सब कुछ जानते हुए भी दोष बहू पर ही मढ़ना शुरू कर दिया। उल्टे आरोप लगाए गए कि वह कपड़े-गहने मायके ले गई है।

पति अब कई-कई दिनों तक घर भी नहीं आता था। कभी आया भी तो सारी-सारी रात जागता रहता। शामा को अपने कमरे में आने तक न मिलता। सोना भी बाहर पड़ता। वह सारी-सारी रात कुछ बड़बड़ाता जाता। धूप जलाए रखता। उल्टे-सीधे करतब करता उसके झोले में कई बार शराब की बातलें, मरे हुए तीतर, मुर्गे और पशुओं की हड्डियाँ होतीं। सिर के बाल भी उलझे हुए और डरावने हो गए थे। बेतरतीब दाढ़ी तो किसी झंखाड़ से कम न लगती।

शामा को किसी ने बताया था कि उसका पति कोई सिद्धि कर रहा है। दूसरे गाँव में एक 'डागी' के पास जाता रहता है। वही उसका गुरु है। शामा बात की तह तक गई तो मालूम हुआ कि गुरु उनके परिवार का कोई पुराना दुश्मन है। किसी बदले की इच्छा से उसके पति को अपने चंगुल में फँसा रखा है। लेकिन लाख कहने पर भी घरवालों ने कोई परवाह नहीं की।

एक दिन आधी रात को उसका पति हाँफता-हाँफता घर आया। शरीर तप रहा था। माथा सिंदूर से पुता था। सिर और दाढ़ी के बाल बीच-बीच से कटे हुए थे। आ कर निढाल सा गिर गया। झोला कंधे से लटक रहा था। शामा घबरा गई थी। सास-ससुर को जगा दिया। आस-पास के लोग भी पहुँच गए। वह अचेत हो गया था। कुछ देर बाद साँसें जाती रही। जब लोगों ने उसका झोला देखा तो हैरान रह गए। उसमें एक बच्चे का कटा सिर था। जिसमें सिंदूर लिपटा था। मौलियों की डोरियाँ थीं। धूप था, कुछ सफेद सरसों के दाने थे और कुछ हड्डियों के टुकड़े। उसकी मौत से कहीं ज्यादा उसके कृत्य का भय सभी को सताने लगा था। किसी समझदार बुजुर्ग ने सलाह दी थी कि यह सारा समान उसकी लाश के साथ इस सफाई के साथ बाँधा जाए कि किसी को कानों-कान खबर तक न हो। ऐसा ही किया गया और सब कुछ लाश के साथ जला दिया गया।

दूसरे दिन पड़ोस के गाँव से खबर आई कि एक घर से छोटा सा बच्चा बाघ उठा कर ले गया है। शामा के हाल देखने वाले थे। उसी के पति ने ही उस मासूम बच्चे को मारा होगा...? उसकी मौत से ज्यादा डर बच्चे की हत्या से लग रहा था। अपने माता-पिता को कोसती, भगवान को भला-बुरा कहती कि उसे किन पापों की सजा दी जा रही है!

उसका मन था कि ससुराल में रह कर सास-ससुर की सेवा करे। लेकिन वह भी उसके नसीब में नहीं था। एक दिन अचानक बीमार पड़ गई। किसी ने बात तक न पूछी। उसी हालत में उसका ससुर उसे मायके छोड़ आया था।

शामा की हालत बहुत बिगड़ गई थी। माँ-बाप देख कर हैरान-परेशान हो गए। फूल सी बच्ची काँटे की तरह सूख गई थी। आँखें भीतर को धँसी हुई। जैसे दो विवरों में किसी ने काँच की गोलियाँ अटा खी हों। ओंठ कई जगह से फटे हुए, जिन से खून टपकने लगा था। चेहरा काली छाइयों से भर कर डरावना हो गया था। जब अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि उसे टीबी हो गई है। कई महीनों दाखिल रही। लंबा इलाज चलता रहा। ठीक हुई तो मायके ही रहने लगी।

जब तक माँ-बाप का साया सिर पर रहा, शामा मजे में रही। पर उनके न रहने के बाद बुरे दिन फिर लौट आए। भावजों के ताने असहनीय होने लगे। भाइयों ने भी कोई परवाह न की। मायके में अब परायापन सालने लगा था। वह भीतर तक टूटती चली गई। रात-रात भर न सोती। उठ कर या तो आँगन में चली आती या फिर खलिहान की मुँड़ेर पर बैठी रोती रहती और वहीं सो जाती।

शामा बेहद परेशान और निराश हो गई। जीने का कोई मकसद नजर नहीं आया। जीवन को समाप्त करने की ठान ली। लेकिन ससुराल वालों का अन्याय आँखों में तैरता रहा। थोड़ी हिम्मत बाँधी। अपना मन पत्थर का कर लिया। पास जो दो-चार कपड़े थे, उन्हें समेटा और बिना किसी को बताए-कहे ससुराल चली आई।

उसका अचानक लौटना ससुराल वालों के लिए किसी आफत से कम नहीं था। सभी को जैसे साँप सूँघ गया। किसी ने सीधे मुँह बात तक न की। लेकिन वे इतना समझते थे कि कानूनन उसे घर से निकालना आसान नहीं है। उसे तरह-तरह की यातनाएँ देनी शुरू कर दीं। वह उनकी बेअदबी सहन करती गई। हिम्मत नहीं हारी। डटी रही। मजबूरन उन्हें शामा को एक-दो खेत देने पड़े। घर से बला टले इसीलिए एक कमरा गौशाला में दे दिया। उसने कोई विरोध नहीं किया। सर ढाँपने की जगह तो मिली। रात-दिन मेहनत की। कमरे को रहने लायक बना दिया।

समस्या दो जून रोटी की थी। गाँव की शर्म से कभी-कभार सास कुछ आटा-चावल दे जाती। लेकिन कितना गुजारा होता। शामा रात-दिन मेहनत-मजदूरी करने लगी। रोड़ी-पत्थर कूटती। उसी से रोटी-कपड़े जुटा लेती। कभी पैसे नहीं होते तो उधार के लिए दुकान में जाती। गाँव में एक ही दुकान थी। लाला धारी सिंह बड़ी पहुँच वाला साहूकार था। गाँव में जो भी नेता या अफसर आते, उसी के घर जमे रहते। प्रधान, पटवारी और मास्टरों का डेरा वहीं लगा रहता। वह बिना स्वार्थ के किसी को उधार न देता। शामा को देखते ही कुछ ज्यादा ही बघारने लग जाता। बेतहजीब बन जाता। अश्‍लील हरकतों पर उतर आता। मजबूरन सब कुछ सहन कर रह जाती।

एक दिन लाला ने शामा को सुझाया था कि वहा प्रधान से कह कर विधवा पेंशन लगवा देगा। साथ घर बनाने के लिए भी कुछ सहायता मिल जाएगी। राशनकार्ड बन जाएगा। सस्ता और मुफ्त राशन भी ले सकेगी। इस आस में अब रोज प्रधान के घर को चक्कर काटने लगी थी।

कुछ दिनों बाद उसकी पेंशन लग गई थी। राशन कार्ड भी बन गया। घर बनाने के लिए भी पंद्रह हजार स्वीकार हो गया था। ससुर को पता चला तो कान खड़े हो गए। कुछ ज्यादा ही स्नेह जताने लगा। आते-जाते हाल पूछ लेता। कभी दारू पी कर वहीं पड़ा रहता। कभी-कभार देवर भी चक्कर काट जाता।

घर बनाने का जिम्मा भी प्रधान ने ही लिया था। हालाँकि उसकी धूर्तता से भली-प्रकार वाकिफ थी लेकिन क्या करती। किसी से काम तो करवाना ही था। उसका ससुर भी यही चाहता था। दो कमरों का घर तो बन गया, पर जो सामान लगाया इतना घटिया था कि मुश्किल से सात-आठ हजार लगे होंगे। बाकि सारा पैसा शामा के घर के नाम उड़ गया।

एक दिन प्रधान के साथ मंदिर का पुजारी भी उसके घर आया था। हैरान रह गई थी वह। आते-जाते किसी बाहर की जाति से छू जाए तो दो बार नहा ले। शामा जैसी दलित विधवा के यहाँ?

वह समझने लगी थी कि कहीं कुछ साफ नहीं है। सभी के मन खोट से भरे हैं। न कोई नेता न प्रधान। न पंडित, न ठाकुर। न मास्टर और न पटवारी। अपनों की तो बात दूर। रिश्ते भी महज छलावा-दिखावा। कोई किसी का नहीं। अपने-अपने स्वार्थ। अपने-अपने काम। इनके धंधे चलते ही गरीबों का गला काट कर हैं। औरत मिल जाए तो न देवता का डर न धर्म की परवाहा। न जाति न कोई छू-छेड़। आठ-आठ बहू-बेटियों वाले खूसट भी साले भाँग-दारू पी कर कहीं भी कुत्ते की तरह मुँह मारते फिरें।

जैसे-कैसे नए घर की लिपाई की। रहने योग्य बनाया। लेकिन पहली ही बरसात में उसकी दीवार गिर गई। मदद के लिए सभी से गुहार लगाई पर किसी ने साथ नहीं दिया। कई बरसातें उस पर पड़ीं और घर कई जगह से गिर गया था। ससुराल वालों ने शामा को गौशाला से निकालने के भी बहुत प्रयत्न किए पर उसने हिम्मत बाँधे रखी और वहाँ से नहीं गई।

गाँव में जब भनक लगी कि शामा पेट से हैं तो सभी के कान खड़े हो गए। वह जब बाहर आती, पानी-पनिहार जाती तो छोटे से बड़ों तक उसकी चाल-ढाल देखते रहते। सभी की आँख उसके पेट पर टिक जाती। धीरे-धीरे पेट कोख से बाहर आने लगा। गाँव वालों का शक सच में बदल गया। ससुरालवालों ने तो तूफान खड़ा कर दिया था। गाँव-बेड़ के लोगों के लिए भी वह कुलच्छणी हो गई थी। पर शामा कान मूँदे रहती। आँख बंद कर लेती। लोगों की खरी-खोटी सुनते-सुनते वह थक गई थी। कई बार मन किया कि पहाड़ी से कूद कर जान दे दे लेकिन हिम्मत नहीं हुई। पेट में पल रहे जीव के साथ-साथ मन का स्नेह भी पलता-बढ़ता गया। एक आस जग गई... अकेलेपन से निस्तार। भविष्य का सहारा। ...और शामा की आँखें अपनी ही गोद भराई में बिछ गईं। नौ महीनों बाद जब बच्चा बाहर आया तो लड़का था। गाँव की औरतों ने ही सब कुछ भुला कर उसे सँभाला था।

बच्चा बढ़ने-पलने लगा। लोग उसकी शक्ल गाँव के छोकरे-छल्लों से मिलाते रहते। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। पर सही-सही अनुमान न लगा पाते। शामा के ससुराल वालों के लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो गई थी। ससुर जानता था कि यदि बच्चा पंचायत के रजिस्टर में चढ़ गया तो पूरे हिस्से का वारिस बन जोगा। शामा ने इतनी दूर कभी सोचा भी न था।

तीन-चार साल आँखों-आँखों में गुजर गए। शामा को पता ही न चला। साथ-साथ उसके सपने भी जवान होते गए। एक दिन बच्चे को ले कर प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर के पास चली गई। दाखिला दिलवाना था। हेडमास्टर ने सारे कागज पूरे किए। पिता का नाम पूछा तो शामा झेंप गई। लेकिन दूसरे ही पल सँभली। पति का नाम लिखवा लिया। बच्चा दाखिल हो गया। लेकिन दूसरे दिन हेडमास्टर ने उसे स्कूल बुला कर बताया कि बच्चे के बाप का नाम गलत लिखवाया है। ससुर ने शिकायत की थी कि बच्चा उसके पति के मरने के कई सालों बाद हुआ है। हेडमास्टर के लिए समस्या खड़ी हो गई थी। शामा खून का घूँट पी कर रह गई। आँखों में बसे सपने उड़ गए। उनमें खोई भागते-दौड़ते कितनी दूर निकल गई थी वह कि अपना अतीत ही भूल गई। ...अब बेटा पढ़ नहीं सकेगा। जहाँ भी जाएगा सभी बाप का नाम पूछेंगे। वह क्या करे। कहाँ जाए। किस के पास दुखड़ा रोए। छाती पर साँप लौटने लगे। कलेजा दहल गया। अनमने मन से घर चली आई।

बात स्कूल के आँगन तक ही नहीं रही थी। ससुर ने एक और मुसीबत खड़ी कर दी। पंचायत में दावा कर दिया था कि उस बदचलन औरत ने कुल पर कलंक पोथ दिया है। इतनी हिम्मत कि किसी ऐरे-गैरे की औलाद को उनके वंश पर मढ़ दे। अब न केवल बच्चे का दाखिला रद्द करने का सवाल था बल्कि शामा को गाँव से बेदखल करने की भी अपील की गई थी। मामला प्राइमरी स्कूल से शुरू हुआ था इसीलिए पंचायत वहीं बुलाई गई।

स्कूल के प्रांगण तक पहुँचते-पहुँचते शामा ने अपनी पूरी जिंदगी पढ़ ली। कदमों से नाप ली। आज सचमुच अथाह अकेलापन महसूस हो रहा था। मानो किसी बियाबान में फेंक दिया गया हो। जहाँ न कोई पगडंडी है न ठाँव। न धूप न छाँव। न कोई सहारा न आसरा। कोई भी जंगली जानवर झपट कर नोच दें। शरीर के रेशे-रेशे कर दे। लेकिन अब जाए कहाँ! क्या पता आज का दिन गाँव में आखरी दिन ही हो!

मन में कई तरह के खयाल आते रहे। बिजली की तरह कौंधे। उस कौंध ने भीतर की आग को हवा दे दी। वह अंगारे उसी तरह प्रखर होने लगे जिस तरह चूल्हे में हवा के स्पर्श से प्रचंड हो जाते थे। पसीने की बूँदें माथे से सरकती गालों तक आई तो चादरु से उन्हें इत्मीनान से पोंछ दिया।

स्कूल के प्रांगण तक छ्ह-सात सीढ़ियाँ थीं। चढ़ते हुए कानों में एक शोर घुस गया। लोग आपस में बतिया रहे थे। बीच-बीच में कोई ठहाका लगाता तो शामा के कानों में गर्म तेल की बूँदों की मानिंद पड़ जाता। पाँव जमीन में धँसने लगे। ऊपर चढ़ने की कोशिश में वह एक-दो बार गिरते-गिरते बची थी।

उल्टे पाँव पीछे उतरी। दीवाल के सहारे खड़ी हो गई। शोर बढ़ता गया। कानों में उँगलियाँ डालीं। लगा कि बाहर से कहीं अधिक वह शोर भीतर पसरा है। उँगलियाँ हटा लीं। चारों तरफ देखा। देखती चली गई। फिर आसमान की ओर। पश्चिम से आते बादलों के काले टोले। उनकी तरह-तरह की बनती डरावनी आकृतियाँ। बीच में दौड़ता-भागता सूरज। बादल राहू बनने लगे। जैसे अभी निगला कि अभी। पल भर यह खेल चलता रहा। लेकिन पकड़ से छूटता चला गया। जहाँ-कहीं आर-पार खेतों, घाटियों में छाया के टुकड़े पसरे हुए थे, वहाँ अब धूप का साम्राज्य था। शामा ने उसे अपने भीतर समेट लिया। एक साँस में सीढ़ियाँ चढ़ गई। उसे देखते ही आँगन में सन्नाटा पसर गया। न कोई बतियाहट, न कोई हरकत। न शोर न ठहाके। जैसे समय ठहर गया हो। शामा ने आँखों-आँखों में मैदान का मुआयना किया। गाँव-बेड़ उमड़ आई थी। ऐसे लोग भी भीड़ में थे जिन्हें कभी देखा न था। औरतें। जवान। बूढे़ और बच्चे। जैसे कोई बड़ा तमाशा होने वाला हो।

प्रधान ने शामा के चेहरे पर नजर डाली। डरावना चेहरा। आँखों में उमड़ता एक तूफान। छातियाँ मैले से कुरते के बीच पेट पर ढुलकती हुई। जैसे कोई जिंदा लाश हो। हालाँकि वह अभी काफी पीछे थी लेकिन उसकी परछाई इतनी लंबी हो गई थी कि भीड़ को चीरती प्रधान तक पहुँच गई। पता नहीं क्या हुआ। वह किसी अज्ञात भय से सिहरा और खड़ा हो गया। ससुर ने बैठे-बैठे गर्दन टेढ़ी की तो शामा से नजर न मिला सका। वह चलती रही...। प्रधान बैठ तो गया पर मन की दुरुहता चेहरे पर बैठे आई। उस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।

भीड़ के बीच पहुँचते-पहुँचते शामा के मन का रहा-सहा भय विलुप्त हो गया। पुनः नजर चारों तरफ घुमाई। लोग दूर-दूर तक बैठे थे। स्कूल के बरामदे में। पेड़ों और झाड़ियों की छाया में। जैसे यहाँ किसी देव जातर का आयोजन हो। या विधायक, मंत्री आनेवाला हो। अचानक मैदान के पूर्व से हवा का तेज अंधड़ आया। बीच में पहुँचा। एक वर्तुल बनाया। ढेरों मिट्टी और घास-पत्ते अपने साथ समेटे घराट की तरह घूमा और भीड़ पर बिछ गया। प्रधान के साथ कई जाने-माने लोगों के मुँह मिट्टी से पुत गए। घास के तिनके बालों से ले कर कपड़ों पर चिपक गए। शामा ने देखा तो हँसी निकल आई। चादरु से मुँह ओट लिया। वर्तुल इतना तेज था कि लोगों के आस-पास सोए कुत्ते भी डर कर भौंकने लगे थे।

कौवों का एक दल कहीं से आया और स्कूल के छत पर बैठे गया। एक-आध ने काँव-काँव की फिर चुप हो गए। कई कुत्ते इधर-उधर दौड़ते दिखे। शायद सभी ने यह भ्रम पाल लिया था कि आज यहाँ कोई धाम या देवता का भंडारा हो रहा होगा।

शामा पंचों के सामने आ कर खड़ी हो गई। इधर-उधर देखा। एक जगह खाली थी। वहाँ उसका ससुर बैठा था। दाएँ बैठ गई। उठने को हुआ तो बाजू पकड़ कर बिठा दिया। दराट बिल्कुल सामने रखा। उसकी तो जैसे साँस ही बंद हो गई। प्राणों पर बीतती नजर आई। कभी दराट देखता तो कभी कुर्सी पर बैठे प्रधान का मुँह। वह सिकुड़ने लगा था। जैसे बाँहें टाँगों से चिपक गई हो। ओंठ-मुँह सूखने लगे। कई पल चुप्पी रही। किसी ने कोई बात नहीं की।

शामा ने मन को बाँधा। पक्का किया। बोलने की पहल भी खुद ही कर दी,

'मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?'

सभी एक दूसरे का मुँह ताकते रहे।

प्रधान ने भीतर की क्षुब्धता मुश्किल से रोकी। खीज कर बोला, 'तेरा ससुर बोलता है तैने अपने बच्चे के बाप का नाम गलत लिखाया है?'

वह फिर से हँस दी। हँसती चली गई। जोर से ठहाका लगाया तो स्कूल की छत पर बैठे कौवों का दल उड़ गया। हँसी के मायने किसी को समझ नहीं आए। परंतु प्रधान झुँझला गया। जैसे कोई झंझावत सिर पर बैठ गया हो।

'तो आप मेरे ससुर को ही पूछ लेते कि बाप का नाम क्या लिखाणा चाहिए?'

कनखियों से ससुर को देखा। वह थोड़ा आगे सरका और खड़ा हो गया। काँपती जबान से बोलने लगा, 'प्रधान जी मेरा लड़का तो कभी का मर गया। ये लौंडा तो कई साल बाद पैदा हुआ।'

'मेरे बच्चे को गाली मत देणा रामदत्त...।'

शामा ने ससुर की लिहाज छोड़ कर सीधे नाम ले कर चेतावनी दी। एक जोर का तमाचा जैसे मुँह पर पड़ गया हो। वह सकपका गया।

कहते-कहते शामा की आँखों में खून उतर आया। हाथ दराट पर चला गया। खड़े-खड़े उसके ससुर की टाँगे काँपे जा रही थी।

प्रधान ने बात सँभाली।

'रामदत्त यह तेरा आँगन-द्वार नहीं है। सलीके से बोल जो बोलना है।'

प्रधान तो उसी की तरफदारी में था। दूसरे पंच भी। उन्हें भी सत्य कहाँ दिख रहा था। पेट में गया दारू और जेब में ठूँसे पैसे आज सिर चढ़ कर बोल रहे थे।

ससुर ने हाथ जोड़ दिए।

'मैं क्या बोलूँ प्रधान जी। आप तो खुद जानते हैं। इंसाफ तो आपको ही करना है।'

कह कर शामा से काफी दूर जा कर बैठ गया।

प्रधान कुर्सी पर बैठा हल्का सा आगे को तन गया।

'देख शामा! पूरा गाँव-परगना जानता है कि तेरा पति कब का मर गया है। उसका नाम कैसे तू लिखवा सकती है। पंचायत में तेरे को सच बोलना पड़ेगा, नहीं तो तेरे को पंचायत बेदखल कर देगी। सोच ले।'

प्रधान बोल तो गया लेकिन इतने भर शब्द बोलते-बोलते माथा और मुँह पसीने से तर हो गया।

'तो आप को इस बच्चे के बाप का सही नाम लिखणा है...?'

शामा ने अपने परिदाह का निवारण भीतर ही भीतर किया। आँखों और चेहरे पर निरपेक्षता भर आई। दराट उठाया और खड़ी हो गई। पंच हल्के से बिलबिलाए। लोगों ने कान खोल दिए।

'क्यों मास्टर जी?'

हेडमास्टर की तरफ रुख किया था उसने। वह कुर्सी पर सर झुकाए बैठा था। सामने रखी छोटी मेज। उस पर एक हाजरी रजिस्टर। स्याही का दवात और होल्डर। ...जैसे वे चीजें मास्टर का मजाक उड़ा रही हों।

'तो सोचते क्या हो। उठाओ होल्डर और लिखो बच्चे के बाप के नाम।'

'बच्चे के बाप के नाम' शब्द सुन कर कइयों की हवा उड़ गई। वह हेडमास्टर के साथ खड़ी हो गई थी।

शामा की पहली नजर प्रधान पर थी। प्रधान हेकड़ी में कुछ समझ न पाया। बात समझ आई तो चेहरा ऐसे उतरा जैसे सौ जूते पड़ गए हों। शर्म से पानी-पानी। न बैठते बना न उठते। भीतर से जर्जर। अस्तव्यस्त। मानो किसी सीधी पगडंडी से आते बाड़ में फँस गया हो। अपमान की सिलवटें चेहरे पर उभर आईं। बुरी तरह घबरा गया प्रधान। गंजे सिर पर जो कुछ बाल थे खड़े हो गए। शक्ल ऐसी बनी जैसे अफीमची का नशा टूट गया हो। दो-चार बार बिना हिले-डुले आँख की पुतलियाँ घुमाई। दाएँ हाथ से एक-दो बार सिर खुजलाया। माथे-मुँह पर उग आए पसीने को पोंछना चाहा पर हिम्मत नहीं जुटी। कुर्सी के पीछे से अपना बैग सरकाया और बिल्ली के पाँव खिसक लिया। सबकी आँखें पीछा करती रही। लेकिन शामा ने टोक दिया,

'प्रधान जी अपनी मोहर तो लेते जाइए।'

वह रुक गया। हड़बड़ी में सदरी की जेबें टटोलीं। उल्टे पाँव ऐसे हटा कि कोई अभी सिर पर डंडा जड़ देगा। मेज पर रखी मुहर उठाई और भाग लिया। पंचों की हालत देखनेवाली थी।

दूसरी नजर मंदिर के पुजारी पर टिका दी। सभी स्तब्ध रह गए। सिर पर से अचानक टोपी गिर गई। सँभाल तो ली पर पहन न पाया। सदरी की जेब में ठूँस दी। हाथ तालू पर गया। चोटी को इस तरह उँगलियों में फँसा कर घुमाता रहा मानो उखाड़ कर फेंक देगा। हवा ने लंबे बालों को बेतरतीबी से फैला दिया। पल भर में चेहरा पसीने से तर हो गया। माथे पर लगाया सिंदूर का तिलक ऐसे धुला कि गाल, नाक और ओंठ रँग गए। कंधे पर रखे परने से पसीना पोंछा तो पूरा मुँह लाल हो गया। शामा की आँख अभी तक उसी पर थी। पुजारी की शक्ल देख कर कई लोग हँस दिए। हँसी मन को नश्तर की तरह घोंप गई। धोती पकड़ी और टेढ़ा-टेढ़ा खिसक लिया। नंगे पाँव। चप्पल पहनने तक की होश भी न रही। भागते-भागते हाथ जनेऊ पर पड़ा। पता नहीं क्यों उसे कान पर लटका दिया।

तीसरी नजर में गाँव का दुकानदार था। उसके मन का चोर पहले ही जाग गया था। सिर झुकाए जमीन में गड़ता गया। ओंठों में बीड़ी फँसी रह गई। बिना कश लिए। ओंठ जले भी होंगे पर जलन से तीखी, मिट्टी में मिलती इज्जत की आग थी जिसने बुरी तरह भीतर तक जला दिया था। साहूकारी की ठीस पल भर में उड़न छू हो गई। जिंदा लाश की तरह कुर्सी पर लटका रहा।

अब शामा ने पटवारी की तरफ देखा। जमीन का भगवान। हवाइयाँ उड़ गईं। सरकारी नौकरी और गाँव-परगने में अफसरी का रोब जाता रहा। जमीन में उगी दूब के बीच इस तरह नजरें गड़ाई जैसे जमाबंदी-ततीमा बनाते लट्ठे के नंबरों को पढ़ रहा हो। लड़खड़ाता हुआ उठा और सिर झुकाए खिसक लिया।

शामा ससुर जमीन मे धँसता जा रहा था। नजरें बचा कर खिसकना चाहा, लेकिन शामा ने रोक दिया।

'ससुर जी अभी नाम पूरे नहीं हुए...।'

एक घृणित नजर ससुर की तरफ दी। हल्की सी सरसराहट हुई। शामा ने देखा कि उसके पाजामें के बीच से पैशाब की बूँदें जमीन पर गिर रही है। सिर झुका हुआ। टोपी खिसक कर माथे पर टँग गई थी।

धीरे-धीरे स्कूल का प्रांगण खाली हो गया। सभी बेजबान हो कर जा रहे थे जैसे इज्जत लुट गई हो।

हेडमास्टर ने रजिस्टर खोला। पन्ने पलटे और होल्डर का निब जोर से दवात में डुबो दिया। स्याही झाड़ी और बच्चे के बाप का पहला नाम काट दिया। नया नाम लिखा... मनु दत्त पुत्र श्रीमती शामा देवी।

शामा ने आते-आते पीछे देखा। ससुर अभी भी बुत की तरह खड़ा था। जैसे जमीन फटने का इंतजार कर रहा हो। मन में कड़वाहट भर गई। थूकना चाहा, पर ऐसा न कर सकी। ...जब स्कूल के मैदान की सीढ़ियाँ उतरी तो लगा कि वह किसी काजल की कोठरी से बाहर निकल आई है।

लोग बताते हैं कि रामदत्त अँधेरा होने तक उसी तरह खड़ा था।

जब तक हेडमास्टर स्कूल में रहा, बच्चे के बाप की जगह उसकी माँ का नाम चलता गया। बदलने के बाद दूसरा हेडमास्टर आया। उसने जब रजिस्टर देखा तो एक बच्चे के पिता का नाम 'श्रीमती शामा देवी' पढ़ कर खूब हँसा। एक दो गाली पहले हेडमास्टर की नालायकी को दी। फिर बड़े सलीके से उस नाम को दुरुस्त कर दिया... 'श्री शाम देव'।


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