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कहानी

चश्मदीद
एस.आर. हरनोट


कोर्ट नंबर एक। बाहर-भीतर और दिनों की अपेक्षा ज्यादा भीड़। खूब चहल-पहल। आगे की चार-पाँच पंक्तियों की कुर्सियाँ काले कोटधारियों से भरी हुई। अभी भी कई वकील और दूसरे लोग भीतर आते और बीच-बीच में खाली कुर्सियों पर बैठ जाते। कई लोग कोर्ट हाल के दरवाजे के बाहर इस चाह में खड़े थे कि उन्हें भी भीतर जाने का मौका मिल जाए। सभी के मन में आज के मुकद्दमे को सुनने की तीव्र जिज्ञासा थी। अभिसाक्षी और प्रतिवादी पक्ष के वकील अपनी-अपनी जगह पर बैठे बहस की तैयारी में मग्न दीख रहे थे।

जज महोदय जैसे ही भीतर पधारे हॉल में बैठे सभी वकील और दूसरे लोग खड़े हो गए। न्यायगद्दी पर विराजमान होते हुए उन्होंने सभी का अभिवादन स्वीकार किया। उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक था। सिर के अधिकतर बाल काले थे। चेहरे पर गजब का तेज। हल्की मूँछें। आँखों पर नजर का चश्मा उनके व्यक्तित्व को और भी निखार रहा था। दोनों हाथों की उँगलियों में कई सोने की अँगूठियाँ जिनमें ग्रह निवारण के कीमती नग जिनसे साफ लगता कि जज साहब अपने भाग्य के प्रति कुछ अतिरिक्त रूप से सतर्क रहते हैं। उम्र पचास के आसपास पर कोई अनुमान लगाने लगे तो चालीस से एक वर्ष भी ज्यादा न बता पाएँ। रीडर ने मामले की फाइल उनके सामने प्रस्तुत की। जैसे ही उन्होंने केस का टाइटल पढ़ा चेहरे के पूर्व भाव तब्दील होने लगे। मानो किसी विशेष स्वाद से चेहरे पर रंगत आ गई हो।

अपने को गंभीर बनाए रखने की दृष्टि से उन्होंने एक गहरी साँस लेते हुए एक साथ फाइल के कई पन्ने उलट-पलट दिए। फिर आँखों पर से चश्मा उतारा। भरी नजर न्यायालय-दीर्घा में डाली। पता नहीं क्यों आगे की कुर्सियों पर बैठे सभी वकीलों के चेहरे पर पसरे भाव को देख कर उन्हें लगा कि वे कोर्ट में न हो कर किसी सर्कस हाल में आए हैं और तमाशे का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। चश्मा पुनः आँखों पर चढ़ाया और केस आरंभ करने का आदेश दिया।

चपड़ासी मुश्किल से लोगों को इधर-उधर हटाते दरवाजे तक गया और जोर से पुकारना शुरू किया।

कुमारी सुमना... बनाम कैलाश... उर्फ काकू हाजिर हो...!

उसकी आवाज बाहर कम भीतर ज्यादा गूँजी। सभी की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ गईं। ये नजरें साधारण नहीं थी न ही सहज। मन में उमड़ते-घुमड़ते कई विचारों के मिश्रित द्वंद्वों की तल्खी उनमें थी।

काकू बाहर से नहीं आया। वह मध्य में कहीं अपने विधायक पिता के पास बैठा था। शायद किसी की नजर उन पर नहीं गई। वह ऐसे उठ कर चल दिया जैसे कोई पुरस्कार लेने मंच पर जा रहा हो। अपराधी जैसे कोई भाव उसके चेहरे पर नहीं थे। माथे और कान पर झूलते बाल। छाती पर कमीज के दो बटन खुले हुए। भीतर पहनी बनियान के ऊपर से सोने की चेन बाहर निकली हुई। हल्की नीली जीन की पैंट और मोटे सिरवाले जूते... जिनकी खड़खड़ाहट कई पल दीर्घा में भीड़ और दीवारों से टकराती रही। चेहरे पर अजीब-सा नशा। लाल-डरावनी-सी आँखें। उच्छृंखलता और उद्दंडता जिनमें नाच रही थी।

जिस किसी ने उसको मन की आँखों से देखा उसने जान लिया कि यह सब एक ओढ़ा हुआ बनावटी यथार्थ है... नंगे पहाड़ पर बर्फ जैसा... जिसका अस्तित्व सूरज निकलने तक बचा रहता है। या फिर दो चार टुकड़े बादल आने तक... वे आए कि बर्फ की स्वर्णिम, श्वेत आभा उड़न छू...। उसका विधायक पिता जो हाल में हैं... शायद पिता नहीं है। उसके भीतर बाप की सत्ता भी नहीं है। न तो उस जैसा कोई स्नेह और न अधिकार। होता तो जिस जुर्म के लिए बेटे पर मुकद्दमा चल रहा है उसकी शर्म-हया तो चेहरे पर होती। मन-आँखों पर विधायक होने का आवरण जो चढ़ा है... राजनीति भीतर पसरी है। नस-नस में... खून के साथ अफीम के नशे की तरह।

इस बीच टीन की छत पर जोर की टनटनाहट हुई। दरवाजे के साथ दीवार से नीचे बारीक मिट्टी झरती रही। कुछ देर छत पर बंदरों का एक दूसरे पर आक्रमण चलता रहा। एक बंदर खिड़की से भीतर घुसने लगा तो चपड़ासी ने उसे भगा दिया। ऐसा वहाँ रोज ही होता। इसके सभी अभ्यस्त भी थे।

सभी ने काकू पर चलती-उड़ती-सी नजर डाली। लेकिन स्थायित्व तो दहलीज पर बना था। कुमारी सुमना के भीतर आने की राह पर।

सुमना के कानों में आवाज गर्म तेल की तरह पड़ी। अपना ही नाम खंजर की तरह मन में गड़ गया। लकड़ी के बैंच पर से ऐसे उठी मानो साँप छू गया हो। साथ उसका बापू भी उठ गया। पाँव में एक अजीब-सी थरथराहट। काँपती टाँगे... जैसे अब गिरा कि अब। कोई उसके मैले से कुरते ओर सदरी के बीच से हाथ डाल कर छाती पर रखता तो जानता कि भीतर दिल मशीन की तरह धड़क रहा था। लाठी के सहारे उसने मुश्किल से अपने शरीर का संतुलन बनाया। कंधे पर झोला ठीक किया और भीड़ के मध्य रास्ता बनाते सुमना को सहारा देते भीतर ले गया। साथ दो महिलाएँ भी थीं। भीतर सुमना का बापू और महिलाएँ पीछे रह गई। सुमना को चपड़ासी ने कटघरे तक पहुँचाया।

बूढ़े बाप ने कुर्सियों के मध्य एक जगह टटोली और बैठ गया। पीछे दोनों महिलाएँ खड़ी हो गई। किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। कटघरे तक वकील और दूसरे लोग सुमना का आँखों ही आँखों में पीछा करते रहे। वहाँ पहुँच कर वह चुपचाप खड़ी हो गई। हॉल में बैठे लोगों की अनगिनत आँखें उस पर केंद्रित हो गई थीं। कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बलात्कार के परिदृश्य के साथ। जैसे वह कोई गाँव की गरीब, असहाय और मासूम लड़की न हो कर किसी प्रदर्शन के लिए लाई गई कोई चीज हो। ...कठपुतली जैसी। एक क्षण में ही उन आँखों ने पता नहीं कितनी बार उसे निर्वसन कर दिया...? समाज के उन न्याय-रक्षकों की आँखों में सिनेमा की तरह अनेकों परिदृश्य उमड़ रहे थे... जैसे वे किसी कोर्ट में नहीं बल्कि सिनेमा हाल में बैठे केवल बालिगों के लिए फिल्म देख रहे हों।

जज महोदय ने एक सरसरी निगाह सुमना पर डाली। उन्हें लगा जैसे एक छोटा-सा गाँव उस लड़की के साथ कटघरे में खड़ा हो गया हो। उलझे हुए बाल... जैसे कई महीनों से धोए ही न हो। कई लटें माथे से गालों पर गिरतीं-पड़तीं। शर्मसार आँखें। जैसे तमाम दुनिया की लज्जा उनमें समा गई हो। सिर पर ओढ़ी मैली-सी चुनरी। मुरझाया हुआ चेहरा। सूखे-फटे ओंठ। पीड़ाओं से लदे-भरे। उन्हें मिट्टी और गोबर की गंध अपनी तरफ आती महसूस हुई... जैसे वे किसी न्याय-गद्दी पर नहीं बल्कि गाँव के किसी खेत की मुँड़ेर पर बैठे हो।

कार्यवाही शुरू हो गई। भीतर गहरा सन्नाटा पसर गया था। प्रतिवादी पक्ष का वकील अपनी जगह से उठा। लंबा काला चोगा सँभाला और सुमना के पास जा कर खड़ा हो गया। ...परमदत्त सहाय नाम था उसका। उसकी चाल में एक अनोखी-सी कशिश थी, मानो वह मंच पर किसी फैशन शो की नुमाइश में आया हो। आँखों में अजीब-सा नशा। चेहरे पर बेढंगी-सी मुस्कान मानो किसी अश्लील दृश्य पर चलते-चलते नजर पड़ गई हो। बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों का माहिर वकील। अभियुक्तों को बरी करवाने की विशेषज्ञता। दूर-दूर तक उसे ऐसे मामलों में पैरवी के लिए बड़े लोग और राजनीतिज्ञ ले जाया करते... क्योंकि उसकी जितनी फीस थी शायद ही कोई भला आदमी दे पाता। वह कानूनी दाँवों-पेंचों के साथ कई दूसरी तिकड़में भी भिड़ा लिया करता जिससे ऐसे मामले अपने पक्ष में करना उस के लिए दाएँ हाथ का खेल हो जाता। जजों तक मुँह माँगी रकमें देने में भी वह न हिचकिचाता।

कोर्ट में बैठे सभी वकील और दूसरे लोग वर्तमान प्रभाव क्षेत्र में आने लगे थे। वे जानते थे कि जब वकील सहाय सुमना से पूछताछ करेंगे तो कई जीवंत रोमांचकारी परिदृश्य सामने उभरने लगेंगे। ऐसे क्षण बार-बार कहाँ आते हैं। हालाँकि वे सभी इस सच्चाई से वाकिफ थे कि जब ऐसे अपराध होते हैं तो वे प्रत्यक्षदर्शियों के सामने नहीं होते। गाँव या शहर के लोगों के सामने नहीं होते। लेकिन कानून तो गवाही माँगता है। सबूत माँगता है... इसीलिए एक बार फिर सुमना के साथ वही सब कुछ होगा... लेकिन आज अकेले में नहीं... सभी के सामने... जज के सामने... वकीलों की मौजूदगी में... उसके अपने बापू के समक्ष... उसके कपड़े बारी-बारी उतारे जाएँगे... उसे निपट नंगा कर दिया जाएगा... जिस शर्म और लज्जा को वह बचपन से ले कर जवानी तक सँभालती-सहेजती रही उसके चिथड़े-चिथड़े किए जाएँगे। आज जैसे उस कृत्य का भागीदार काकू न हो कर बीसियों लोग होंगे... पर यह सब होगा कानून की सीमाओं में... कानून की मान्यताओं के बीच, अधिकृत तौर पर।

और अब यही सब कुछ शुरू हो गया था। कितने अनोखे प्रश्न... अश्लील... बेबुनियाद... सुमन बेचारी सर झुकाए खड़ी थी। चुपचाप। सिर का दुपट्टा आँखों पर से नीचे तक सरक आया था। आँखों से अविरल आँसुओं की धारा बहती जा रही थी। पर वकील सहाय के प्रश्नों की चौंध के बीच उसकी सिसकियाँ गुम होती गई। उसने किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। जैसे उसकी जबान ही बंद हो गई थी। वह सोच रही थी कि काश! वह सीता होती तो धरती माँ को पुकारती और वह फट जाती। उसमें समा कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती। पर वह जानती है... वह सुमना है। गरीब और असहाय हरिजन की बेटी। इकलौती।

कोई उसके बापू को कुर्सी के बीच उकड़ूँ बैठे देखता तो जानता कि वह किसी तरह एक जीती जागती देह से मोटे पत्थर की तरह फर्श पर गड़ गया था। वकील सहाय ने इस मामले को नया मोड़ दे दिया। चुनाव नजदीक थे। वकील की दलील थी कि कैलाश के पिता विधायक गणेशदत्त सत्तारूढ़ पार्टी के हैं इसीलिए कुछ शरारती तत्वों ने कई विपक्षी नेताओं के झाँसे में आ कर उनकी छवि बिगाड़ने के लिए ही यह मामला गढ़ा है। इसके लिए एक गँवार, असहाय और हरिजन की गरीब लड़की को ढाल बनाया गया है। जितने भी गवाह पेश किए उन्होंने इस घटना के बारे में अनभिज्ञता जाहिर कर दी। केवल सुनी-सुनाई बातों पर ही उन्होंने गवाही दी। कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था।

आश्चर्य था कि जिन लोगों ने इस मामले को पंचायत से ले कर कोर्ट तक पहुँचाया था वही आज पीछे हट गए थे। कुछ महिलाएँ और गाँव के लोग चश्मदीद भी थे। इनमें जो कुछ प्रभावी लोग शामिल थे उन्हें पार्टी की तरफ से कई पुरस्कार और ओहदे बाँट दिए गए थे। मसलन जिस डाक्टर ने सुमना की मेडिकल रिपोर्ट दी थी उसे रिपोर्ट को बदलने के एवज में मुख्य चिकित्सा अधिकारी बना दिया गया था। जिस पुलिस निरीक्षक ने चालान बदल कर कोर्ट में पेश किया उसे पदोन्नत करके मुख्यमंत्री की सुरक्षा टीम का इनचार्ज बना दिया गया। गाँव की महिला मंडल की प्रधान जिसने प्रारंभ में इस मामले की पुरजोर आवाज उठाई उसे चुप्प रहने के पुरस्कार बतौर जिला महिला कल्याण मोर्चे की महासचिव नियुक्त कर दिया गया था। और जो दो-चार दूसरे लोग इसमें शामिल थे उन्हें भी उनकी हैसियत के मुताबिक दाना-पानी दे दिया गया था। जो एक-दो गाँव की महिलाएँ सुमना के साथ आती-जाती थीं वे भी गवाही के दिन अपने-अपने मायके चली गई थी।

सुमना कहीं नीचे धँसती चली जा रही थी। आँखें बंद किए हुए वह अपने साथ हुए कुकृत्य की चश्मदीद उन दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में खो गई। उसके मस्तिष्क में वे दृश्य घूमने लगे थे।

कितना बुरा दिन था वह। गाँव में महिला मंडल के नए भवन का शिलान्यास विधायक ने करना था। अगली बार तो वह अपने बेटे को टिकट दिलवाने के चक्कर में था। इसीलिए वह जहाँ जाता अपने बेटे को भी साथ ले जाया करता। उस दिन भी वह साथ था। बेटे की कारगुजारियाँ अच्छी नहीं थी। करतूतें धेले की भी नहीं थी। बाप तो बखूबी परिचित था। जानता था कि बेटा कितना होनहार है? पर अपने सिक्के को खोटा कौन कहे। जमा दो भी न कर सका। जितने दिन स्कूल में काटे मास्टरों की नाक में दम किए रहा। चार बार इम्तहान दिया पर निकला ही नहीं। पिता ने फिर उसे एक पेट्रोल पंप ले लिया।

पहले सोचा था कि बेटे को खूब पढ़ा कर डाक्टर या अफसर बना देंगे। पर बीस-बाईस सालों तक जो बेटे की करतूतें रहीं उससे उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया था कि बेटा राजनीति में ही फिट हैं। पढ़ना-लिखना वैसे भी अब उन्हें बेवकूफों का काम लगने लगा था। खुद भी आठवीं फेल थे पर राजनीति की सारी परीक्षाएँ बखूबी पास करते गए। अब नजरें राज्यसभा पर लगी थीं।

सुमना के अम्मा-बापू उस दिन गाँव में नहीं थे। घर में वह अकेली थी। पहले भी वह कितनी ही बार अकेली रही पर कोई डर-डराव नहीं। अपना गाँव। अपने लोग। ...जलसा समाप्त हुआ। विधायक तो लौट आया पर बेटा वहीं रहा। अब प्रधान उसकी आवभगत कैसे न करता। होनेवाला विधायक जो ठहरा। साँझ हुई तो मन की बात प्रधान जी को बता दी। प्रधान जी को तो इंतजाम करना ही था। उसने सोचा-विचारा। पहली नजर सुमना के परिवार पर ही गई। वैसे भी गाँवों-बेड़ में ऊँची जातवालों की आँखें गरीब दलितों की जमीन और बहू-बेटी पर ही लगी रहती है। सोचा कि अपना न सही विधायक के बेटे का भी भला हो जाए।

देर रात तक दोनों खूब खाते-पीते रहे और फिर सुमना के घर की तरफ हो लिए। सुमना के पास एक किन्नौरी काला कुत्ता था। नाम था शेरू। साँझ ढलते ही उसने उसे साँकल में बाँध दिया था। गाँव में कुछ दिनों से बाघ का डर हो गया था। प्रधान को यह मालूम था कि वह आज अकेली ही है। उसने जब आवाज लगाई तो वह सो चुकी थी। यमुना ने ज्यों ही पहचाना, दरवाजा खोल दिया। वह तो उसकी इज्जत अपने बापू की तरह करती थी। डर की तो कोई बात ही न थी। शेरू भौंकता रहा। सुमना तो उसी पर गुस्सा होती गई कि प्रधान जैसे इज्जतदार आदमी पर वह भौंकता ही जा रहा है। पर उसे क्या पता कि इस घने अँधेरे में वह बाघ कुत्ते के लिए नहीं बल्कि आदमी के रूप में उसे ही झपट लेगा।

दरवाजा खुलते ही विधायक का बेटा उस पर बाघ की तरह ही टूट पड़ा। वह चीखती-चिल्लाती रही पर किसी ने मदद नहीं की। अब प्रधान की जीभ भी लार टपकाने लगी थी पर सुमना का रोना-धोना उन्हें वहाँ से भागने को विवश कर गया। उनका घर अकेले में था। थोड़ी देर बाद जब महिला मंडल की प्रधान ने चीखना-चिल्लाना सुना तो वह लोगों को ले कर वहाँ पहुँच गई। सुमना के हाल देख कर वह हैरान रह गई। मुश्किल से सँभाला था सुमना को। दूसरे दिन बात आग की तरह फैल गई। महिला मंडल की प्रधान नहीं चाहती थी कि केस दब जाए। वह एक तीर से दो शिकार करना चाहती थी।

सुमना के अम्मा-बापू जब लौटे तो बेटी की हालत देख कर दंग रह गए। उनकी एक ही तो बेटी थी। वह अपने आप को कोस रहे थे कि उन्होंने क्यों उसे अकेला छोड़ा। पर होनी को कौन टाल सकता था। सुमना का बापू इस मामले को वहीं पर खत्म करना चाहता था। अपनी गरीबी के कारण वह विधायक से कैसे लड़ता। पर महिला मंडल की प्रधान तथा कुछ दूसरे लोगों ने उसकी बात नहीं मानी। इस अत्याचार के खिलाफ आगे तक लड़ने का संकल्प किया था। ताजी घटना थी इसीलिए पूरा गाँव साथ हो गया। इस तरह एक विश्वास उस लुटे हुए घर और सुमना के बापू के दिल में भी जाग गया था कि इस पाप के लिए सजा मिलनी ही चाहिए।

इस मामले को पुलिस तक ले जाया गया। एफ.आई.आर. पुलिस को मजबूरन दर्ज तो करनी पड़ी लेकिन उन्होंने कार्यवाही केवल कागजों पर ही की और चालान कोर्ट में पेश कर दिया। सुमना को सरकार की ओर से एक सरकारी वकील भी दे दिया गया था।

सुमना चुपचाप कहीं अतीत में खोई रही। पक्ष, प्रतिपक्ष के बीच कितनी देर बहस चली, सुमना को नहीं पता। उसने जब भी कटघरे में अपने खड़े होने को महसूस किया तो लगता रहा कि वह निपट नंगी है। लोग, कानून की रक्षा करने वाले वकील और जज सभी तमाशबीन है। उसने कटघरे के ऊपर की लकड़ी को पूरे जोर से पकड़ रखा था। इतने जोर से कि उन से खून बहने लगा था। उसके हाथों को किसी ने नहीं देखा। उसके मन को किसी ने महसूस नहीं किया। उसकी पीड़ाओं को किसी ने नहीं जाना।

अब फैसला होना था। विधायक और उसका बेटा प्रसन्न थे। वे तमाम लोग भी जो किसी न किसी तरह से उनके करीब थे। जिस तरह गवाहियाँ उनके पक्ष में हुई, साफ था कि फैसला उन्हीं के हक में दिया जाना है। ...और उसी क्षण एक अप्रत्याशित घटना घटी। एक काला कुत्ता हाँफता हुआ कोर्ट हॉल में पहुँचा। उसका इस तरह भीतर आना सभी को आश्चर्य में डाल गया। बाहर तो कई आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं लेकिन इस तरह कोई भीतर ही आ जाए तो अनहोनी जैसी बात थी। भीतर पहुँचते ही उसने सुमना की तरफ हामी भरी। सुमना ने सिर उठाया। उसे देख कर हैरान रह गई। अचानक मुँह से निकला... शेरू! वह नीचे उतर कर उसे जी भर प्यार करना चाहती थी। शेरू बावला-सा हो गया। उसकी तरफ उछलता, कूदता। कटघरे की लकड़ियों के बीच से ऊपर चढ़ता और पाँव से उन्हें कुरेदता और अपने आव-भाव से कुछ बोलता-जैसे सुमना को सांत्वना दे रहा हो कि उसके साथ भले ही और कोई न हो लेकिन वह तो उसके साथ है। इस स्नेह और अप‌नेप‌न की भाषा केवल वही समझ सकती थी, बाकी लोगों के लिए तो वह भीतर एक परेशानी का कारण हो गया था।

दूसरे पल शेरू पीछे मुड़ा। उसकी आँखों में स्नेह की जगह खून उतर आया। वह उसका दूसरा ही रूप था। किसी को पता न चला कि कैसे उसने दूसरे कटघरे में खड़े कैलाश के उपर छलाँग लगा दी। ऊँचाई ज्यादा होने के कारण वह उस तक न पहुँच पाया। पहुँच जाता तो उसके लीथरे-लीथरे कर देता। अब कोर्ट का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया था। जो लोग कुर्सियों पर बैठे थे वे खड़े हो गए। यहाँ तक कि जज महोदय भी आश्चर्य से खड़े हो कर देखते रहे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। शेरू ने अपने नाखूनों से नीचे बिछी दरी ओर कटघरे की लकड़ी को बुरी तरह से छिल दिया। वह पीछे हटता और फिर कैलाश की तरफ उछल जाता।

सुमना ने ही इस स्थिति को सँभाला था। उसने हल्की-सी डाँट लगाई तो शेरू उसकी ओर आ गया। पर आँखों में आग और पंजों में आक्रोश पसर गया था। तीन-चार सुरक्षा कर्मी हाथों में डंडे ले कर भीतर पहुँचे लेकिन जज साहब ने उन्हें रोक दिया। उनके अपनी सीट पर बैठते ही सभी अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गए।

कुत्ते की इन हरकतों को देख कर जज साहब की उत्सुकता जागी। उन्होंने सुमना से सीधा प्रश्न किया था, कुत्ता तुम्हारा है क्या? हल्का का सिर हिला कर उत्तर दिया था सुमना ने। जी...। कितने सालों से तुम्हारे पास है? जी... तीन सालों से। जज साहब कुछ देर चुप रहे। प्रतिवादी पक्ष का वकील कुछ कहने के लिए उठा था लेकिन जज ने उसे रोक दिया। उसे बैठना पड़ा।

कुत्ता इस बीच एक बार फिर कैलाश की तरफ लपका। उसके बाद भीड़ में बैठे उसके साथियों की तरफ भौंकता रहा। फिर पीछे कुर्सियों के बीच बैठे सुमना के बापू के पास चूँ-चूँ करता आया। दो-चार पल बैठा और पुनः सुमना के पास कटघरे के साथ बैठ गया। जब यह घटना घटी तो वह कहाँ था। जैसे ही वकील ने यह प्रश्न सुना वह फिर खड़ा हो गया। जज ने फिर उसे बैठने को कहा। वकील का चेहरा उतर गया था। वह माथे पर से पसीना पोंछता हुआ बैठ गया। दूसरे कटघरे में खड़े विधायक के बेटे के हाल देखनेवाले थे। जो कभी किसी बुरे से बुरे काम करते न घबराया हो उसके लिए एक मामूली-सा कुत्ता बाघ बन कर भीतर चला आया था। जज ने दोबारा वही सवाल सुमना से पूछा।

सुमना ने आँखें जमीन पर गड़ा ली थीं। कुछ देर पहले जो अतीत का आवरण छँट-सा गया था उसने सुमना को दोबारा ढँक लिया था। लेकिन उसे उत्तर तो देना ही था। जी मैंने उसे बाँध दिया था। क्योंकि गाँव में बाघ का डर था। जज साहब ने सुना तो कुछ देर गंभीर रहे। एक नजर दूसरे कटघरे में डाली। सोचा होगा कि जंगल के बाघ से कुत्ता तो बच गया पर आदमीनुमा बाघ से वह अपने आप को न बचा सकी।

अब सुमना के सब्र का बाँध टूट गया था। उसकी आँखें बरस गईं। कोर्ट हाल सिसकियों से भर गया। भीतर उपस्थित सभी की आँखों में रोमांच और आश्चर्य की जगह नमी थी। तड़प थी। स्नेह था। दर्द था। अब सुमना किसी को अपनी बेटी जैसे तो किसी को बहन की तरह लगने लगी थी।

प्रतिवादी का वकील घबरा गया। जज साहब कुछ देर चुपचाप कुछ सोचते रहे। फिर उन्होंने भीड़ में नजर डाली। उनमें कैलाश का विधायक पिता भी बैठा था। दोनों की नजरें मिलीं। आँखों के इस मिलन के साथ ही फैसला अगली तारीख के लिए टाल दिया गया।

कुत्ता एक बार फिर कैलाश की तरफ लपका। सुमना ने उसे फिर झाड़ दी। उसे डर था कि सुरक्षाकर्मी कहीं उसे पीट कर घायल न कर दें।

जज साहब जैसे ही उठे अचानक कुत्ते ने उनकी तरफ छलाँग लगाई लेकिन जज साहब उसकी पहुँच से बहुत ऊपर थे। जज ने कुत्ते के आक्रमण पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की और चुपचाप निकल गए, लेकिन कुत्ता उस तरफ देख कर भौंकता रहा। इस बार सुमना की डाँट का भी उस पर कोई असर न हुआ।


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