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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 5
नदी के द्वीप

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल


रेखा द्वारा भुवन को :

वहाँ फूल थे, सुहानी शारदीया धूप थी, और तुम थे! और मेरा दर्द था! यहाँ गरम, उद्गन्ध, बौखलायी हुई हरियाली है, धूप से देह चुनचुना उठती है : और तुम नहीं हो। और दर्द की बजाय एक सूनापन है जिसे मैं शान्ति मान लेती हूँ...

नदी यहाँ भी है, किनारे बनी हुई पक्की रौंस पर दो-तीन सरुओं की ओट में-जो ऐसे बने-ठने रहते हैं कि नकली मालूम हों (और क्या यह समूचा बगीचा ही नकली नहीं है-नकली इटालियन बगीचे की नकल!)-मैं बैठकर दिन बिता देती हूँ। सामने दक्षिणेश्वर का मन्दिर दीखता है, और घास; उस पार और मेरी रौंस के बीच में गहरी लाल या कभी काली धारीदार सफ़ेद धोतियाँ पहने बंगालिनें आती हैं, नहाने, पानी भरने, कभी झगड़ने; उनके दुबले कमज़ोर शरीर ऐसे लचकते हुए चलते हैं कि जान पड़ता है उन्हें आधार के बिना चलने का अभ्यास नहीं है, मालंच पर पली हुई लता जैसे उससे गिरकर डोल भी नहीं सकती, वैसे ही-और सोचती हूँ कि सारा कलकत्ता ऐसी मालंचविहीन लताओं से भरा पड़ा है-क्यों ऐसा है कि जो केवल एक सामाजिक स्तर पर हमें स्वाभाविक लगता या लग सकता है, वह वहाँ पर ऊपर से नीचे तक सर्वत्र लक्ष्य होता है?

मैं क्या लिख रही हूँ, इससे तुम समझ लो कि ठीक हूँ, ठीक बल्कि बहुत अधिक शुश्रूषा पा रही हूँ, और सोच करने का अवसर मुझे बिलकुल नहीं मिलता है। यों बैठी रहती हूँ, और बादलों की तरह विचार तिरते हुए आते और चले जाते हैं; पर जिसे सोचना कहते हैं, वह नहीं हो पाता; कभी विचार की छाया भी चेहरे पर पड़ जाये तो मौसी 'बच्ची' को लेकर इतना 'फ़स' करती है कि बच्ची घबरा जाती है, और कान छू लेती है कि फिर कभी नहीं सोचेगी...

यों, बच्चों की तरह जीती हूँ! कितना आसान होता है वयस्क परिपक्व मनोवृत्तियों से फिसल कर बच्चों के दृष्टिकोण अपना लेना! लोग जब बूढ़े होते हैं, तो ऐसे ही अनजाने फ़िसल कर बच्चों की मानसिक प्रवृत्तियाँ अख्तियार कर लेते हैं, उन्हें पता भी नहीं लगता कि कब दूसरे बचपन में प्रवेश कर गये। क्या मैं भी बूढ़ी हो रही हूँ?

लेकिन मैं ठीक हो जाऊँगी-जागूँगी-भुवन, तुम कैसे हो? पत्र जल्दी लिखना...

रे.

रेखा द्वारा भुवन को :

भुवन मेरे,

क्यों नहीं तुम पत्र लिखते? इतने दिन बाट देखते हो गये, और अब नदी को देखना और अच्छा नहीं लगता, न अब मन बच्चों की तरह मुकुर बना बैठा रहता है। मेरे विचार उमड़ते हैं, तुम तक जाते हैं, तुम्हारी ओर से कोई संकेत नहीं मिलता तो एक भयानक उदासी मन पर छा जाती है, जिससे लगता है कि कभी उबर नहीं सकूँगी। कोई इशारा, कोई संकेत तो दो, भुवन-यों क्यों मुझे छोड़ दिया है तुम ने?

तुम्हारी ही

रेखा

रेखा द्वारा भुवन को :

भुवन, मैं क्या समझूँ? तुम क्यों नहीं लिखते? क्या तुमने मुझे छोड़ दिया, भुवन? उस दिन तुमने कहा था, ''अब भी-अब और ज़्यादा''-क्या वह उसी दिन तक था? ऐसा है भुवन, तो ऐसा ही लिख दो-जो भी है स्पष्ट लिख दो! मैं सब सह लूँगी। मैं सह ही नहीं, समझ भी लूँगी : वैसा ही है, तो शिकायत नहीं करूँगी; फिर भी कृतज्ञ रहूँगी...कुछ तो लिखो, मेरे भुवन!

रेखा द्वारा भुवन को :

भुवन,

तो 'इस तरह अन्त होता है सब-कुछ, धड़ाके के साथ नहीं, रिरियाहट के साथ!' क्या हो गया है, भुवन? कार्य-व्यस्त तुम हो सकते हो? पर क्या मुझे एक पंक्ति लिखने की फ़ुरसत भी तुम नहीं निकाल सकते? मैं नहीं मानती...या कि क्या तुम अस्वस्थ हो? सोचती हूँ, तुम्हारे प्रिंसिपल को तार देकर तुम्हारा पता पूछूँ, पर उसमें भी संकोच होता है। क्या करूँ?

कभी सोचती हूँ, हर वक़्त इस तरह तुम्हारा ध्यान नहीं करती रहूँगी...इसीलिए इधर कुछ काम भी शुरू किया है!...पर अगर सारा दिन भी अपने को उलझाये रखूँ, तो रात को जब सोने जाती हूँ-और फिर नींद में-मैं बिलकुल बेबस हो जाती हूँ, और तुम्हारी सुधि न जाने कहाँ-कहाँ खींच ले जाती है...कभी सवेरे सपना देख कर उठती हूँ, तो फिर वह दिन भर छाया रहता है, मुझसे कोई काम नहीं होता, नशे-से मैं बाहर आकर बैठ जाती हूँ, और नदी को देखती रहती हूँ, पर नदी भी नदी नहीं रहती, उसका प्रवाह मेरा तुम्हारी ओर प्रवाह बन जाता है...

भुवन, क्या मेरी सुध नहीं लोगे?

रेखा

रेखा द्वारा भुवन को :

मेरे भुवन,

आज मैं अकेली सैर के लिए गयी थी नदी के साथ-साथ! बादल घने होकर झुक आये थे, लग रहा था कि बारिश अब हुई, अब हुई; पर उनके नीचे छोटे-छोटे टुकड़े अलग भटक रहे थे और उनको सूर्य का प्रकाश एक नारंगी सुनहला रंग दे रहा था। भटकते हुए मुझ पर वही गहरी उदासी छा गयी और मैं तुम्हारे लिए छटपटा उठी; यों तो तुम्हारी इस उपेक्षा में सदैव उदास रहती हूँ और छटपटाती रहती हूँ...फिर मन में विचार उठा, तुम्हारे मौन से मुझे जो इतना कष्ट होता है, मैं जो तुम्हारे इस व्यवहार से मर्माहत हो रही हूँ उसका कारण यही है कि जो मुझे मिल चुका है उसी को और पाना चाहती हूँ। और यह लालच कितना अनुचित है...मैं क्यों उदास होऊँ? मान ही लो कि तुम उदासीन हो रहे हो, कि तुम मुझसे दूर चले जाओगे, तो भी विषाद क्यों-अवसाद क्यों! जो कुछ भी मैं चाह सकती, वह मैंने तुम्हारे साथ में पाया है-प्यार भी, वासना भी, दोनों का चरम सुन्दर रूप-तब और लालच क्यों? तुम्हारा मौन मुझे खलता है क्योंकि मैं अधिकाधिक माँगती हूँ और वह सम्भव नहीं है, वह उचित भी नहीं है, अतीत को कोई भविष्य नहीं बना सकता...

इसलिए भुवन, मैं पिछले पत्रों में कुछ उलटा-सीधा लिख गयी होऊँ तो मुझे माफ़ कर देना। तुम्हारे मौन पर क्लेश मुझे हुआ है, होता है; मेरा स्नायु-तन्त्र ऐसा जर्जर हो गया है कि ज़रा-सी बात से झनझना उठता है और मैं झल्ला उठती हूँ-पर इस समय मैं शान्त हूँ, और मैं अपनी आकुलता के लिए क्षमा माँगती हूँ। तुम मुक्त हो भुवन, बिलकुल मुक्त, मैं चाहती हूँ कि सर्वदा सगर्व कहती रह सकूँ कि तुम मुक्त हो मेरे भुवन, मुझे भूल जाने के लिए उतने ही मुक्त जितने मुझे प्यार करने के लिए थे और हो...तो भुवन, मेरे प्रिय, मेरे क्लेश की परवाह न करो, अगर चिट्ठी लिखने का मन नहीं है तो मत लिखना; या जब वैसा जानोगे तो मुझे एक पंक्ति लिखकर सूचित कर देना कि तुम्हारी भावनाएँ बदल गयी हैं। सह लूँगी...

इधर तीन-चार दिन से मैं सोचती रही हूँ कि क्या हमारा भविष्य एक हो सकता है-क्या उसकी कोई सम्भावना है? क्या हम फिर कभी मिलेंगे?...मैंने बहुत ठण्डे दिल से सोचा है, भुवन; और अब कभी यह भी सोचती हूँ कि क्या मुझे जैसे-तैसे वापस हेमेन्द्र के पास ही नहीं चला जाना चाहिए अगर वह राजी हो? मैं भीतर मर गयी हूँ, भुवन; तुमसे कटकर फिर मैं कहीं भी बह जा सकती हूँ-किसी भी बुरे से बुरे नर-पशु के साथ भी रह सकती हूँ...एक तुम्हीं ने मेरी जड़ित आत्मा को जगाया था-था!-और उसके बाद उसके फिर जड़ हो जाने पर मैं पहले से बदतर मृत्यु में सहज ही जा सकती हूँ। इसीलिए सोचती हूँ, क्या वही न ठीक होगा : टूटी हुई रीढ़ वाली इस देह के लिए एक सहारा-एक छत-आत्मा की बात तो अब कौन करे!

यह बात मैं कैसे लिख गयी-मैं-यह नहीं जानती। पर यह आत्मा की जड़ता की ही एक निशानी है, भुवन! आशा करती हूँ कि यह अधिक नहीं रहेगी-यह आहत पक्षी फिर वैसे ही उड़ सके यह तो असम्भव है, पर-वह अभी नहीं, वह कभी नहीं...

मेरी सब शुभाशंसाएँ तुम्हारे साथ हैं, भुवन!

तुम्हारी

रेखा

रेखा द्वारा भुवन को :

एक ज़माना था जब मैं स्त्रियों को ऐसे समय का हिसाब रखते देखकर हँसती कि अमुक घटना 'अमुक बेटे या बेटी के जन्म से तीन मास पहले' हुई थी, या कि 'जब अमुक एक वर्ष का था' या 'जिस साल अमुक की लड़की की शादी हुई...और आज मैं स्वयं हिसाब लगा रही हूँ, तुमसे पहली भेंट से दस महीने बाद, तुलियन से आठ महीने बाद, और तुम्हें अन्तिम बार देखा तब से चार महीने...कैसे मानव अपने सारे जगत् को अपने छोटे-से जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं के आस-पास जमा लेता है, और विराट् का समूचा सत्य उस निजी छोटे-से सत्य का सापेक्ष्य हो जाता है! लेकिन वह निजी छोटा सत्य छोटा क्यों है? विराट् असीम को दिखाने वाली मेरी खिड़की-वह लाख छोटी हो, एक तो मेरी है, दूसरे मेरे लिए विराट् को बाँधे हुए है, विराट् का चौखटा है...सोचते-सोचते यह ध्यान आता है, यह झरोखे से देखना गलत है, यह अपने को विराट् से अलग रखकर देखना है, उसे बाहर मान लेना; मुझे चाहिए कि उसमें लय हो जाऊँ...घर से बाहर निकलूँ, अपनी अनुभूति के पिंजरे से बाहर निकलूँ और विराट् के प्रति अपने को सौंप दूँ, उसी की हो जाऊँ-उसको झरोखे से न देखकर स्वयं उसका झरोखा हो जाऊँ...पर क्या यह भी निरा शब्द-जाल नहीं है, घूम-फिर कर अपने तक लौट आना नहीं है?

तुम्हें देखे हुए चार महीने-तुमसे बिछुड़े हुए चार महीने-तुम्हारी ओर से कोई पत्र, सूचना, संकेत पाये हुए चार महीने...विश्वास नहीं होता। लेकिन फिर सोचती हूँ, शायद अवचेतन मन में मैंने इसे स्वीकार ही कर लिया है, तभी तो मैं काल-गणना इस ढंग से करने लगी हूँ। क्योंकि हम केवल निजी के सहारे नहीं देखते, उस निजी को अपेक्षा में देखते हैं जो हमारे जीवन में महत्त्व का था लेकिन जो था, यानी अब नहीं है, यानी जिसका बीत जाना, बीत गया होना हमने स्वीकार कर लिया है...''जिस साल मेरा ब्याह हुआ', इस गणना का कारण एक तो वह सुख है जिसे प्रकारान्तर से याद किया जा रहा है; दूसरा यह है कि वह सुख आज दूर चला गया है क्योंकि अगर आज भी निकट और सजीव होता तो उसकी बात हम न कर सकते...

भुवन, तुम्हें एक ख़बर देनी है, तीन सुनाइयों के बाद अदालत ने फैसला दे दिया है : हमारा विवाह रद्द हो गया है; हेमेन्द्र तो अफ्रीका चला ही गया है और अब मैं भी मुक्त हूँ। मुक्त-किससे मुक्त-किसलिए मुक्त? मुक्त स्मृतियों को सेने के लिए, मरने के लिए-मुक्त अतीत के बन्धन में जकड़ी रहने के लिए...तलाक़ का विधान अच्छा नहीं है यह कौन कह सकता है, पर कितने अपर्याप्त हैं मानवीय विधान प्रकृति की समस्याओं के सामने-बल्कि मानव की ही समस्याओं के सामने...यों तो शायद यह विच्छेद अभी वैकल्पिक है; पक्का होने के लिए छः मास का अन्तराल होता है न? पर वह तो कम-से-कम इस मामले में कोरी फ़ार्मेलिटी है। आज न सही, पाँच-एक महीने बाद सही...रद्द तो वह हो ही गया। लेकिन क्या रद्द हो गया? वह दर्द? वह ग्लानि, वह आत्मावसाद, वे मर्माघात-क्या वे रद्द हो सकते हैं? कानून मान ले कि उसने मुक्ति दे दी है, कि एक अन्याय का निराकरण कर दिया है...

अब आगे, भुवन? मेरा जी नहीं लगता, और अब कलकत्ते नहीं रहूँगी। सोचा है कि मौसी को साथ लेकर तीर्थ-यात्रा को निकल जाऊँ। तुम शायद हँसो, क्योंकि तीर्थयात्रा के लिए जो श्रद्धा चाहिए वह तुमने मुझमें न देखी होगी; मौसी भी तितीषु हों, तीर्थों के भरोसे नहीं हैं। फिर भी, एक तो घूमने में, निरन्तर दृश्य-परिवर्तन में कुछ शान्ति मिलेगी; दूसरे अपनी श्रद्धा न हो तो श्रद्धावानों की श्रद्धा देखकर ही कुछ सान्त्वना मिलती है या मिल सकती है...दो-तीन दिन में ही हम लोग चल देंगे : पुरी से आरम्भ करके क्रमशः दक्षिण जहाँ तक जाना हो सके। यह फरवरी है, सोचती हूँ कि गर्मियाँ उधर कट जाएँगी और बरसात लगते इधर लौट आएँगे।

तुम पत्र तो लिखोगे नहीं, फिर भी कह दूँ कि पता यही काम देगा, यहाँ से चिट्ठियाँ जहाँ भी हम होंगे चली जाया करेंगी।

अच्छा, भुवन विदा दो। चाहती हूँ, झुककर एक बार तुम्हारे चरणों की धूल ले लूँ।

सदैव तुम्हारी

रेखा

चन्द्रमाधव द्वारा भुवन को :

माई डियर भुवन,

तुम्हें चिट्ठी लिखे, तुमसे चिट्ठी पाये या तुम्हारे बारे में भी कोई चिट्ठी पाये बहुत दिन हो गये। लेकिन जानता हूँ, तुम उन लोगों में से नहीं हो जो सम्पर्क छूट जाने पर खो जाते हैं, या जिनका कुछ अनिष्ट हो जाता है...जिस बोतल में कार्क का बड़ा-सा डाट लगा हो, वह पानी के भीतर छिपी रहकर भी डाट के सहारे डूबती-उतराती रहती है, डूब नहीं जाती। उसी तरह तुम्हारी जाति के लोग होते हैं-स्पिरिट के एक लचकीलेपन का डाट बाहर के बोझ को सँभाले और भीतर के खोखल को छिपाये रहता है और तुम लोग तिर जाते हो, जबकि मुझ जैसे डूब जाते हैं...मैं जानता था कि मैं हलका सफ़र करनेवालों में हूँ; बाहर का बोझ मुझ पर नहीं है, पर मैं पुरानी लकड़ी की तरह उतराता हूँ और पानी धीरे-धीरे मुझमें बस जाता है; लकड़ी सड़ जाती है और भारी हो कर डूब जाती है।

तुम कहोगे, यह चन्द्र को क्या हुआ कि ऐसा दर्शन बघारने लगा-और वह भी पराजय का दर्शन! न, पराजय का दर्शन वह नहीं है, थोड़ा आत्मावसाद है, ठीक है; पर चन्द्र हारनेवाला नहीं; मैं अब समझ रहा हूँ कि यह दृष्टान्तों के सहारे जीवन को समझना चाहना ही गलत है, ऊपरी साम्य भीतर के वैषम्य को ओझल कर देता है। लकड़ी गीली होकर डूबती है, ठीक है, पर वह क्या मैं हूँ? न, मेरी समझ में आ गया कि वह भी एक साँचा है, केवल क्लास-भावनाओं का एक पुंज; मैं नहीं सड़ता, केवल एक भद्रवर्गीय खोल सड़ गया है-सड़ जाने दो, सड़कर वह झर जाएगा और मुक्त मैं बाहर निकल आऊँगा! फिर मैं ही उस गली लकड़ी को पैरों से ठुकराऊँगा, उसे स्वयं अपनी ठोकर से अतल गर्त में डूबा दूँगा! मुझे उसका मोह नहीं है-मुझे किसी चीज़ का मोह नहीं है।

अवसाद का कारण रहा। लखनऊ मैं अकेला नहीं रहता रहा। बीवी-बच्चे आये थे, साथ रहते थे। वह अपने जीवन के साथ समझौता करने की मेरी आख़िरी कोशिश थी। कामयाबी नहीं हुई और अब जानता हूँ कि कोशिश ही गलत थी क्योंकि यह जीवन ही मेरा जीवन नहीं है। मैं क्यों इस बुर्जुआ ढाँचे के साथ समझौता करना चाहूँ, क्यों उन मान्यताओं से अपना जीवन बाँधने को राज़ी होऊँ जिन मान्यताओं को पैदा करनेवाले समाज को ही मैं नहीं मानता? उन सब को मैंने घर भेज दिया है। मैं भी लखनऊ छोड़कर बम्बई जा रहा हूँ दो-तीन विदेशी एजेंसियों का प्रतिनिधि बनकर। यहाँ से सम्बन्ध तो रहेगा पर ऐसा नियमित नहीं; संवाद भेजा करूँगा। बम्बई में ज़िन्दगी है-तेज़ बहती हुई आज़ाद ज़िन्दगी; वहाँ काम भी कर सकूँगा, और इस मनहूस ढाँचे को तोड़ गिराने में भी योग दे सकूँगा-उस नयी दुनिया को बनाने में, जिसमें मुझ जैसे मेहनतकशों का राज होगा, दूसरों के राज के निरीह साधन हम न बनेंगे...क्या इस बात को तुम समझोगे? तुम अपने विज्ञान को लेकर ही डूबे हो-लेकिन मैं कहता हूँ, यह विज्ञान ही तुम्हें लेकर डूबेगा : क्योंकि विज्ञान भी वर्ग-स्वार्थों का गुलाम है-तुम सत्य का शोध नहीं कर रहे, सत्य कुछ है ही नहीं, वह केवल एक वर्ग के उपयोगी ज्ञान का नाम है, दूसरे वर्ग का विज्ञान भी दूसरा होगा क्योंकि उसकी उपयोगिताएँ दूसरी होंगी। यह तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारा सारा विज्ञान किस काम का है, किसके काम का है, किस के काम आएगा?

जाने दो। ये सब बातें केवल तुम्हें थोड़ा प्रोवोक करने को लिख गया कि तुम जवाब जल्दी दो। असल में पत्र तुम्हें खुशख़बरी देने को लिख रहा हूँ। अभी मालूम हुआ कि रेखा देवी का डाइवोर्स हो गया है-जज ने फैसला दे दिया है। हेमेन्द्र यहाँ आया हुआ था, वह अफ़्रीका गया-वह तो अपनी मलय मेम से शादी करेगा ही; पर रेखा जी भी अब आज़ाद हैं। औरत के लिए आज़ादी सिर्फ एक ख़तरा है, इसलिए-रेखा जी में तुम्हारी दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए-तुम्हें दोस्ताना सलाह दे रहा हूँ कि अभी उपयुक्त समय है उनकी सेवा का। डिग्री पक्की तो छः महीने बाद होगी, पूरी आज़ादी तो तभी होगी, पर तब तक बैठे रहना तो हिमाकत है। जो मौसम में फूल चाहता है, वह वक़्त पर क्यारी तैयार करता है न! तुम मेरे पुराने दोस्त हो, इसलिए दुस्साहस करके यह परामर्श तुम्हें दे रहा हूँ और अपने स्वार्थ-त्याग की दुहाई नहीं दूँगा। नहीं तो मैं ही एक बार-पर जाने दो; आइ नो ह्वेन आइ'म लिक्ड! बेस्ट आफ़ लक टु यू!

तुम्हारा

चन्द्रमाधव

पुनश्च :

बम्बई का पता वहाँ पहुँचते ही लिखूँगा; तब तक दादर के पोस्ट मास्टर की मारफ़त लिख सकते हो।

चन्द्रमाधव द्वारा रेखा को :

प्रिय रेखा जी,

उस बार आप दिल्ली से अचानक गायब हो गयीं, तब से बहुत दिनों तक कोई पता ही नहीं मिला; फिर मालूम हुआ कि आप कश्मीर में हैं और बहुत बीमार रही हैं, कुछ आपरेशन की भी बात सुनी पर ठीक पता न लगा कि क्या हुआ, कैसी हैं? पता लगा तो यही कि कलकत्ते चली गयी हैं जिससे मैंने मान लिया कि स्वस्थ ही होंगी। यह भी पता लगा था कि भुवन भी शुश्रूषा के लिए गये थे; सोचा था कि उनसे ही पूरे हालात पूछूँ पर फिर उन्हें कष्ट देने का साहस नहीं हुआ। सुना है कि वह आज-कल अपनी ख़ोज में ऐसे डूबे हैं कि किसी को पत्र-वत्र नहीं लिखते; बल्कि शायद आयी हुई डाक भी नहीं पढ़ते-किसी से कोई मतलब उन्हें नहीं है, बस वह हैं और कास्मिक रश्मियाँ हैं। वैज्ञानिक में अनासक्ति की यही तो खूबी होती है : न जाने कहाँ से वे कास्मिक रश्मियाँ आती हैं, पृथ्वी के वायुमण्डल की परिसीमा से या सूर्य से, या तारा-लोक से या सर्वत्र फैले शून्य में पदार्थ मात्र के बनने-मिटने से-पर वैज्ञानिक का सारा लगाव उनसे है, और अपने आसपास की किसी चीज़ का होश नहीं, उनका भी नहीं जिन्हें वह प्रिय बताना चाहता है...ठीक कहते हैं लोग, कि वैज्ञानिक प्रेम कर ही नहीं सकता; क्योंकि उसके लिए स्थूल यथार्थ है ही नहीं, सब-कुछ एक एब्स्ट्रैक्शन है, एक उद्भावना...और जहाँ एब्स्ट्रैक्शन है, वहाँ प्यार कहाँ? हम लाल को चाह सकते हैं, हरे को चाह सकते हैं पर लाल-पन या हरे-पन की भावना को कैसे? प्रकाश को चाह सकते हैं, प्रकाशित होने के गुण को कैसे?

अभी-अभी दिल्ली की एक चिट्ठी से पता लगा कि आप आज़ाद हो गयी हैं। कुछ दिन पहले हेमेन्द्र से भेंट हुई थी-वह लखनऊ आये थे-तब ज्ञात हुआ था कि तलाक़ की कार्रवाई हो रही है; अभी पता चला कि इसी हफ्ते डिग्री हो गयी है और आप मुक्त हैं। रेखा जी, इस काम के इस प्रकार शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो जाने पर मैं आपको सच्चे दिल से बधाई देना चाहता हूँ, बधाई ही नहीं, आप अनुमति दें तो अपनी पूरी सहानुभूति प्रकट करना चाहता हूँ। और कोई होता तो आपको यह याद दिला कर गर्व या सन्तोष महसूस करता कि मैंने पहले से अनुमान कर लिया था कि ठीक यही होगा और इसी प्रकार होगा; पर वैसे आत्म-सन्तोष के भाव मेरे मन में नहीं हैं, मैं केवल आपकी उस शान्ति का अनुभव कर रहा हूँ जो इस समाचार से आपको मिलेगी-उस शान्ति का, और साथ ही मुक्ति की बात सुनकर उभर आने वाली अनेक स्मृतियों के दुःख का भी...आप ने बहुत दुःख पाया है, रेखा जी; पर उसकी ग्लानि को अब मन में न आने दें-पुराने दुःखों की भी नहीं, उस नये दुःख और निराशा की भी नहीं जिससे इधर निस्सन्देह आप गुज़री हैं...अधिक कुछ कहना नहीं चाहूँगा-कह कर आपके रिज़र्व को कुरेदना या आप की संवेदना को चोट पहुँचाना बिलकुल नहीं चाहता...

आप स्वस्थ तो हैं? आशा है कि इस लम्बे विश्राम से आपका स्वास्थ्य सुधर गया होगा। कहता कि और दो-एक महीने विश्राम कर लीजिए पर जानता हूँ कि अनिश्चित अवधि तक निठल्ले बैठ रहना आपके स्वभाव के विरुद्ध है, और आप कहीं बाहर जाना चाहेंगी ही। आप लखनऊ आवें यह सुझाने की धृष्टता तो नहीं कर सकता : मेरी अपात्रता के अलावा लखनऊ की घटनाओं का भी स्मरण कराया जाना आप नापसन्द करेंगी। पर क्या बम्बई का निमन्त्रण दे सकता हूँ? मेरी अपात्रता तो वहाँ भी उतनी ही रहेगी, पर बम्बई बड़ा शहर है, और वहाँ जीवन है, जागृति है, वह प्राणोद्रेक है जो संघर्षों में पड़ने पर होता है-बम्बई निस्सन्देह आपको अच्छा लगेगा और-मुक्त करेगा अवसादों से, अतीत के बन्धनों से, जर्जर मान्यताओं से, और-आप यह कहने की धृष्टता मुझे करने दें तो कहूँ-स्वयं अपने-आपसे, क्योंकि जिसे हम अपना-आप कहते हैं वह वास्तव में है क्या? अपने भीतर की घुटन, जिसे हम अपनी पीड़ा के मोह में एक मूल्यवान् तत्त्व समझ लेते हैं! अपना-आप कुछ नहीं है, वह घुटना अयथार्थ है, उसके प्रति हमारा मोह एक धोखा है; सच तो सामाजिक शक्तियों का खेल और खींचातानी और संघर्ष है, जिसमें हम या तो सहायक हो सकते हैं, या बाधक...आइये, हम सहायक हों; अतीत के बन्धन न मानें बल्कि वर्तमान का, नये भविष्य का निर्माण करें...

लेकिन यह तो मैंने बताया नहीं कि बम्बई मैं कैसे बुला रहा हूँ। लखनऊ मैं छोड़ रहा हूँ। और लखनऊ कहता हूँ, तो मेरा मतलब है वह सारा ढाँचा जिसे मैं मानता रहा। कौशल्या घर चली गयी है, दोनों बच्चों को लेकर-बल्कि कहूँ कि दोनों को और तीसरे की प्रतीक्षा लेकर; मैं जब उसे वापस घर लाया था तो किसी शर्त या बन्धन के साथ नहीं, वापस लाने और गिरस्ती चलाने के सब दायित्वों को स्वीकार करके ही...पर वह चली नहीं, मेरी पूरी कोशिश के बावजूद भी नहीं। और अब मैं खुश ही हूँ कि वह चली नहीं, क्योंकि वह झूठ थी। गिरस्ती का आइडिया ही असल में झूठ है; एक काल-विपर्यय है; उस वर्ग-जीवन का प्रतीक है जो वर्ग ही आज मर रहा है। क्यों हम उसके द्वारा स्वीकृत एक परिपाटी को मानते चलें, जबकि स्वयं उसमें ही हमारी आस्था नहीं है?

तो मैं बम्बई जा रहा हूँ। अतीत से नाता तोड़ कर जा रहा हूँ और उसके कोई बन्धन, कोई दायित्व आगे मानने का मेरा इरादा नहीं है। अपने वर्ग को मैं छोड़ता हूँ; उससे कुछ और मागूँगा नहीं और इसलिए आगे उसे कुछ देने को, उससे निबाहने को भी बाध्य नहीं हूँ।

आशा है यह पत्र आपको समय पर मिल जाएगा, और आप उत्तर देने का कष्ट करेंगी। मैं बराबर प्रतीक्षा करूँगा। आपको सर्वदा एक मुक्त व्यक्ति के रूप में ही मैंने देखा है, आपके पत्र मेरे लिए बड़ा सहारा होंगे।

आपका कृपाकांक्षी

चन्द्रमाधव

चन्द्र द्वारा गौरा को :

प्रिय गौरा जी,

इन दिनों में यह पहली बार नहीं है कि आप को पत्र लिखने बैठा हूँ; और कोई निश्चय करके ढुलमुल करते रहनेवाला स्वभाव भी मेरा नहीं है आप जानती हैं; फिर भी पत्र नहीं लिखा गया इसका कारण यही है कि मैं पाता हूँ, मुझमें और मेरे परिचितों में एक अजीब व्यवधान आ गया है-एक दूरी जिसका कारण समझ में नहीं आता...लखनऊ से बनारस कुछ भी दूर नहीं है, लेकिन मैं जब यूरोप में था और आप मद्रास में, तब अपने को इतना दूर नहीं महसूस करता था जितना अब, और कभी जब सोचता हूँ कि स्वयं जाकर मिल आया जा सकता है तब सहसा लगता है कि मैं मानो मंगल तारे तक हो आने के मनसूबे बाँध रहा होऊँ!

ऐसा क्यों, सोचता हूँ तो कोई कारण नहीं पाता। बाह्य कारण तो हो ही क्या सकता है-आख़िर लखनऊ से बनारस जितना है सो तो हुई है, न अधिक न कम; सब्जेक्टिव ही कारण हो सकता है-पर क्या? आप तो सदा से ही दूर रहती हैं, मुझे अधिक-से-अधिक एक अवहेलना-भरी अनुकम्पा ही मिलती है; उसमें कोई परिवर्तन आने का कारण तो हुआ नहीं। तब क्या मुझी में कोई बड़ा परिवर्तन आया है? शायद यही हो। आप मुस्कराएँगी कि चन्द्रमाधव भी इंट्रोस्पेक्शन करने चला-हाँ, यह भीतर देखने की बात मुझे हमेशा नकारेपन की दलील लगती रही है-पर यह देखता हूँ कि मेरे ही अनुभव मुझे अलग ले जा रहे हैं। एक तो इधर का जैसा जीवन रहा-आप कल्पना नहीं कर सकतीं, गौरा जी, कि साधारण जीवन की साधारण मर्यादाओं को निबाहने के लिए मैंने कितना बड़ा तप किया है, कितना क्लेश भोगा है, और अब मैं भी रेखा देवी की कही हुई बात मानने लगा हूँ कि गहरा क्लेश एक व्यक्ति को और सबसे पृथक् कर देता है...दूसरे इस क्लेश ने मुझे यह सिखा दिया है कि हमारी अधिकतर मान्यताएँ केवल एक ढकोसला हैं-हमारे जीवन को, हमारे वर्ग-स्वार्थों को, वर्ग से मिलनेवाली सुविधाओं को बनाये रखने के लिए रचा गया भारी प्रपंच; और यह देख लेने के बाद उसी प्रपंच में फँसे रहना कैसे सम्भव है? यह दूसरा कारण है जिसने मुझे औरों से अलग कर दिया है-अपने वर्ग से मैं उच्छिन्न हो गया हूँ। और देख रहा हूँ कि वह कितना सड़ा है; अब उसे भस्म कर देने में ही अपनी शक्ति लगाऊँगा...इसीलिए कहूँ कि मैं वास्तव में इंट्रोस्पेक्शन नहीं कर रहा हूँ-इंट्रोस्पेक्शन तो आदमी को निकम्मा बनाता है, कर्म-विमुख करता है, कर्म की प्रेरणा नहीं देता।

लेकिन क्या सचमुच उतना दूर चला गया हूँ? उस दिन दिल्ली में आपसे तबला सुना था; वह मानो कल की बात लगती है और उसके बोल अभी तक कानों में गूँज जाते हैं-संगीत में मेरी पहुँच नहीं है लेकिन उस दिन का अनुभव मानो एक लैण्डमार्क बन गया है और उसके सहारे मैं कई चीज़ों से सम्बन्ध जोड़ लेता हूँ जिन तक पहुँचने का और कोई सूत्र नहीं रहता...सेंटिमेन्टल बातें मुझे कहनी ही नहीं आतीं, गौरा जी; सच कहता हूँ कि उस दिन की वह भेंट मेरे लिए एक अकथनीय अनुभव था, और कदाचित् वहीं से मेरे जीवन में वह परिवर्तन शुरू हुआ जो आज देख रहा हूँ। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि आप इस प्रकार मेरी डेस्टिनी बन जाएँगी-आप! और आपने तो की ही क्या होगी, आपने तो कभी मुझे इस लायक ही न समझा होगा कि मेरी डेस्टिनी भी कुछ हो!

डॉ. भुवन से भी बहुत दिन से पत्र-व्यवहार नहीं हुआ। आपसे परिचय उनके द्वारा हुआ था, पर अजब बात है कि उन तक पहुँच आप ही के द्वारा हो। आशा है आप उनके पूरे समाचार देंगी। यों मैंने उन्हें पत्र लिखा है, पर आप से जो जान सकूँगा, वह उनसे थोड़े ही : वह तो पहले भी एक सीपी में रहते थे, और पिछले कुछ महीनों के अपने अनुभवों के बाद तो बिलकुल ही पहुँच से परे चले गये हैं। मैं समझता हूँ, कोई भी गहरी अनुभूति जब गोपन रहती है, तब धीरे-धीरे गोप्ता को भी ऐसे बाँध लेती है कि फिर वही अज्ञेय हो जाता है, फिर वह चाह कर भी अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाता; उसका रहस्य एक ऐसी दीवार बन जाता है जो कि स्वयं उसी को छिपा लेता है। कभी सोचता हूँ, क्या डा. भुवन फिर कभी हमसे, आपसे, हमारे आपके साधारण जगत् से साधारण सम्पर्क जोड़ सकेंगे? इधर आपकी उनसे भेंट हुई क्या?

रेखा जी की ख़बर जब-तब मिल जाती है। डाइवोर्स उनका हो गया है। यह जान कर आपको भी निश्चय ही सन्तोष होगा। विवाहित जीवन उनका अत्यन्त यातनामय रहा, फिर जब उन्हें जीवन में कुछ ऐसा मिला जो मूल्यवान् हो, जो जीवन को अर्थ दे, तो फिर विवाह का बन्धन ही बाधा बना...अब कदाचित् वह जीवन के बिखरे सूत्र फिर समेट सकें, उसके अर्थ को फिर पा सकें...मैं जब भी सोचता हूँ तो इसी परिणाम पर पहुँचता हूँ कि स्त्री-पुरुष का मिलन सबसे बड़ा सुख नहीं हो सकता क्योंकि उसमें प्रत्येक को साझीदार की, दूसरे की ज़रूरत है, वह परापेक्षी सुख है; सच्चा सुख निरपेक्ष और स्वतः सम्पूर्ण होना चाहिए। पर युक्ति एक बात है, और व्यवहार दूसरी; और वासना दोनों से ऊपर : हम सभी उस अनुत्तम सुख को ही चाहते हैं और पुरुष से अधिक नारी वह चाहती है...रेखा जी को मैं असाधारण स्त्री मानता था, पर अब देखता हूँ, उनका असाधारणत्व इसी में है कि वह साधारणत्व का चरमोत्कर्ष है, साधारण स्त्री की साधारण वासना अपने चरम रूप में उनमें विद्यमान है। और इसीलिए आज उनकी मुक्ति की सूचना से सन्तोष है : प्रार्थना करना चाहता हूँ कि उन्हें उनका वांछित मिले, तृप्ति मिले, शान्ति मिले...

आपकी संगीत-साधना कैसी चल रही है? संसार की जो गति है, उसमें नहीं दीखता है कि संगीत का भविष्य क्या है, विशेषकर भारतीय संगीत का जो इतनी साधना माँगता है, इतनी सूक्ष्मता, जिसका उदय भी रहस्य से होता है और जिसकी निष्पत्ति भी रहस्य में है-भविष्य में संगीत होगा तो जन का वह प्रकृत, पुरुष, सहज तेजस्वी स्वर सब बारीक़ियों को अपने विवाद में डुबा लेगा...फिर भी, आपकी साधना का कायल हूँ, और, और नहीं तो आपकी आनन्द-कामना से ही प्रार्थना करता हूँ कि आप को उसकी सुविधा और साधन मिले...

मैं लखनऊ छोड़कर बम्बई जा रहा हूँ। वहीं रहूँगा। पत्र वहीं दें-देंगी न? पता रहेगा : केयर पोस्टमाटर, दादर, बम्बई।

आपका ही

चन्द्रमाधव

भुवन द्वारा चन्द्रमाधव को :

चन्द्र,

तुम्हारा पत्र मिला। दूसरे दिन तुम्हारा रेखा देवी के नाम लिखा हुआ पत्र भी उनके द्वारा भेजा हुआ, मिला, इस उलाहने के साथ कि मैं तुम्हें पत्र क्यों नहीं लिखता?

उन्होंने कहा है, इसलिए यह पत्र लिखे दे रहा हूँ। पर चन्द्र, कैसा रहे अगर आज से हम मान लें कि हम दोनों अजनबी हैं? क्योंकि हम मानें न माने, बात यही है; हम दो विभिन्न दुनियाओं में रहते हैं जिनमें सम्पर्क के कोई साधन नहीं हैं। विज्ञान को तुम मानते नहीं, नहीं तो उसकी भाषा में कहता कि हमारे जीवनों के डाइमेंशन अलग-अलग हैं, और इसलिए वे एक-दूसरे को काट कर भी छू नहीं सकते।

और जब हम अज़नबी ही हैं, चन्द्र, तो मेरे प्रति किसी मिथ्या लायल्टी का बन्धन तुम न मानो; जिस भी चीज़ पर तुम्हारा लोभ है, उसके लिए निर्बाध होकर जुगत करो। और मैं तुम से ज़्यादा ईमानदारी से कहता हूँ, बेस्ट आफ़ लक टु यू।

-भुवन

भुवन द्वारा गौरा को :

प्रिय गौरा,

एक बार फिर तुम्हारी ओर से कोंच के बिना पत्र लिख रहा हूँ बल्कि अब कभी सोचता हूँ तो ख्याल आता है क्या यह तुम्हारा न कोंचना ही कोंच का एक नया प्रकार नहीं है? पर इस लिखने में न जाने क्यों, पहले-सा पुण्य-सुख नहीं है। लिखने की बात मैंने कई बार सोची है, पर न जाने क्यों लिखे बिना रह गया हूँ; आज लिखने बैठा हूँ तो अपने को कारण यह बता रहा हूँ कि बार-बार वचन-भ्रष्ट होने के लिए कम-से-कम माँफ़ी तो माँग लेना आवश्यक है-यद्यपि तुम्हें पत्र लिखने के लिए क्यों कारण ढूँढ़ निकालना ज़रूरी है, यह नहीं जानता, न पहले कभी ऐसा प्रश्न मन में उठा था।

मैंने कहा था, दशहरे में बनारस आऊँगा। कहा था कि शायद, पर तुम्हें शायद कहता हूँ तो उसमें अपने लिए छूट नहीं रखता, शायद इसीलिए होता है कि अगर किसी कारण न हो पाये तो तुम्हें निराशा न हो। पर वह नहीं हो सका-रेखा जी की बीमारी के कारण मुझे श्रीनगर जाना पड़ा और छुट्टियाँ उसी में बीत गयीं; फिर सोचा था कि अगली छुट्टियों में चला जाऊँगा, पर अगली छुट्टियाँ भी आ गयीं बड़े दिनों की, और मैं यहीं बैठा हूँ। अब की बार कोई बहाना नहीं है, पर जैसे वही सबसे बड़ा कारण है; मैं यहीं बैठा हूँ, यहीं पड़ा रहूँगा; न जाने का कोई बहाना नहीं है; इसलिए नहीं जाऊँगा; बिना कोई बहाना बनाये मान लूँगा कि मैं नहीं जाता, नहीं जाता; और इस अपराध को ओढ़कर बैठा रहूँगा। अपराध करने की कोई चाहना मन में नहीं है, पर यों अपराध ओढ़कर बैठ जाने में न जाने क्यों सान्त्वना का बोध होता है।

देखता हूँ कि यह माफ़ी माँगने का तो ढंग नहीं है। पर गौरा, तुम मुझे क्षमाकर ही देना, और मेरे बारे में कोई चिन्ता न करना। मैं बिलकुल ठीक हूँ, चिन्ता की कोई बात नहीं है, केवल चित्त अव्यवस्थित है, और ऐसी दशा में कहीं किसी के पास नहीं जाना चाहिए, अपने अस्तित्व का ही पता न देना चाहिए। मैं बिलकुल वैसा करता, पर माफ़ी माँगना तो आवश्यक था, इसलिए सम्पूर्ण लोप तो नहीं हुआ; फिर भी वहाँ आकर तुम्हें क्लेश न दूँगा। कभी आऊँगा, पर कब इसका अब वायदा नहीं करता।

आशा है तुम स्वस्थ और प्रसन्न हो; आशा ही नहीं, विश्वास भी है कि तुम उन्नति कर रही होगी। कभी लगातार बैठकर तुमसे संगीत सुन सकता, तो शायद चित्त को सान्त्वना मिलती-या कौन जाने तब भी न मिलती, अभी यह सोच लेता हूँ और जैसे उसकी दूर सम्भावना भी एक सहारा हो जाता है।

पिता जी को मेरा प्रणाम लिखना। आशा है माता-पिता स्वस्थ हैं। कहाँ हैं आज-कल?

तुम्हारा

भुवन

भुवन द्वारा रेखा को :

प्रिय रेखा,

जो पत्र लिखने की मैं निरन्तर कोशिश करता रहा हूँ, वह मुझसे लिखा नहीं जा रहा है। न जाने कितनी बार मैं लिखने बैठा हूँ, कभी एक-आध पन्ना लिख भी सका हूँ, लेकिन लिखकर फिर उसे फाड़ दिया है, फिर दुबारा नहीं लिख सका हूँ...रेखा, क्या कहूँ और कैसे कहूँ? मैं मानता हूँ कि जो कहना नहीं आता वह इसीलिए नहीं आता कि वह मन के सामने ही स्पष्ट नहीं है-हो सकता है कि मैं स्वयं ठीक नहीं जानता कि क्या कहना चाहता हूँ-फिर भी भीतर जो घुमड़न है, उसके सामने जैसे कुछ स्पष्ट है, यद्यपि मैं उसे नहीं जान पाया, और वही मानो मेरे और विचारों और कामों को निर्दिष्ट करती है भले ही वे निर्देश मैं नहीं समझता...

रेखा, तुम अब भी वही दिव्य स्वप्न हो, जो दीखने की तीव्रता से ही मूर्त्त हो आया था और यथार्थ हो गया था, लेकिन जब कभी मैं अपने साझे जीवन के अंशों को सामने मूर्त्त करता हूँ, तो वे जैसे मिलकर एक रूपाकार नहीं बनते, मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े अलग रहते हैं और फिर मेरे हाथों में ही मिट्टी हो जाते हैं। जीवन का एक चित्र, एक मूर्ति नहीं बनती, यद्यपि प्रत्येक खण्ड यथार्थ है-और अत्यन्त यथार्थ है वह व्यथा की टीस जो किसी-किसी खण्ड की कल्पना-मात्र से देह-मन को झनझना जाती है...

मैंने कहा कि 'जब कभी'। यह नहीं कि वैसा कभी-कभी होता है। मैं बराबर ही वैसे खण्डित स्वप्न देखता रहता हूँ; जागते हुए, काम के बीच में, क्लास में पढ़ाते हुए, लैबोरेटरी में काम करते हुए, राह चलते सड़क के बीच में बराबर ही ये स्वप्न-चित्र कौंध कर सामने आते रहते हैं। मानो आँखों के आगे हर वक़्त एक काल्पनिक चौखटा बना रहता है, जिसके भीतर का चित्र बराबर बदलता रहता है। बल्कि अधिक बदलता भी नहीं, क्योंकि बार-बार एक ही दारुण दृश्य सामने आता है, और मैं सुनता हूँ तुम्हारी दर्द-भरी आवाज़ मुझे पुकारती हुई, 'प्राण, जान, जान', अन्तहीन आवृत्ति करती हुई एक कराह, जिसे वर्षा की वह अनवरत टपटपाहट भी नहीं डुबा पाती जो कि उस स्मृति का एक अभिन्न अंग है। मैंने तब तुम्हें कहा था 'हाँ अब भी, अब और भी अधिक' वह ग़लत नहीं कहा था और आज भी अनुभव करता हूँ कि वे क्षण आत्म-दान के-अपने से मुक्त होकर अर्पित हो जाने के तीव्रतम क्षण थे; पर आज यह भी देखता हूँ कि ठीक उन्हीं क्षणों में मेरे भीतर कुछ टूट गया। टूट गया, मर गया। क्या, यह नहीं जानता। प्यार तो नहीं, प्यार कदापि नहीं, उससे सम्बद्ध कोई जादू, कोई आवेश, जिससे आविष्ट होकर मैं प्यार की मर्यादा भूल गया था, जो प्रेय है उसे स्वायत्त करना चाहने लगा था ऐसे जैसे वह स्वायत्त नहीं हो सकता...और मानसिक यन्त्रणा के उस चरम क्षण में यद्यपि प्यार-प्यार, रेखा, करुणा नहीं-अपने उत्कर्ष पर था, पर उसी क्षण में जैसे मैंने तुम्हें दोषी भी मान लिया था एक मूल्यवान् वस्तु को नष्ट हो जाने देने का। तुमने लिखा था कि यदि वैसा न हुआ होता और प्रेम ही मर गया होता या मैंने तुम्हें छोड़ दिया होता तब क्या होता, और इस प्रश्न का मेरे पास कोई जवाब नहीं है-ऐसा हुआ होता तो निस्सन्देह वह भी घोर दुर्घटना हुई होती-और जो बार-बार मेरे आस-पास होता रहा है, होता है, इसे मैं किस दर्प से असम्भव करार दे दूँ? वह ख़तरा तो था ही...भविष्य के बारे में कोई दावा करना बेमानी है, फिर उस भविष्य के जिसकी अब कोई सम्भावना नहीं रही। लेकिन आज भी मैं कितना भी कठोर होकर सोचूँ तो मानता हूँ कि उस अजात के कारण जो भी ज़िम्मेदारी मुझ पर आती उससे मैं भाग नहीं रहा था, भागने का विचार भी मुझमें नहीं था, और उसे स्वीकार करने में मुझे खुशी ही होती...मैंने तुमसे कहा था कि मैं सुखी होता, आज भी मानता हूँ कि सुखी होता। प्यार मर तो सकता ही है-एक अर्थ में चिरन्तन होकर भी वह मर सकता है, पर अगर भविष्य में कभी ऐसा होता ही, तो वह कम-से-कम उस शिशु के कारण न होता-उसके कारण हमीं में होते।

इस सबसे ध्वनि होती है कि मैं तुम्हें उलाहना दे रहा हूँ-वैसा नहीं है। वैसी भावना मन में कभी आयी भी होती, तो मानना होता कि तुम ने अगर भूल की भी तो उसका भरपूर शोध भी किया-नहीं रेखा, मैंने जो पहले कहा कि तुम्हें दोषी माना था वह ठीक नहीं है, दोषी तुम मुझसे अलग या अधिक कैसे हो?-अपने एक अंश को नष्ट होने देने के लिए स्वयं अपने को मर जाने दिया, रेखा; उस अंश को, जो स्वयं भी मूल्यवान् था, और उससे बढ़कर जो एक और मूल्यवान् अनुभूति का फल था-इस सब का अनुभव करते हुए मैं तुम्हारे आगे झुक ही सकता हूँ, समवेदना से भरकर तुम्हारे पास खड़ा हो सकता हूँ, दोष नहीं दे सकता। और जब यह सोचता हूँ कि यह बहुत बड़ा आत्म-बलिदान भी मुझ पर तुम्हारे स्नेह की अभिव्यक्ति थी-तब तो गड़ जाने को जी चाहता है।

रेखा, एक बात को तुम समझोगी-तुम नहीं समझोगी तो कोई नहीं समझ सकेगा-प्यार मिलाता है; व्यथा भी मिलाती है; साथ भोगा हुआ क्लेश भी मिलाता है; लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि सीमा पार कर लेने पर ये अनुभूतियाँ मिलाती नहीं, अलग कर देती हैं, सदा के लिए और अन्तिम रूप में? अनुभूतियाँ गतिशील हैं, अतीत होकर भी निरन्तर बदलती रहती हैं और व्यक्तित्व को विकसाती हुई उसमें घुलती रहती हैं, लेकिन यह सीमा लाँघ जाने पर जैसे वे गतिशील नहीं रहतीं; स्थिर, जड़ हो जाती हैं; एक न घुल सकनेवाला लोंदा, एक वज्र धातु-पिण्ड। फिर व्यक्ति मानो इन अनुभूतियों को चौखटे में जड़कर रख लेता है; जीवन एक चलचित्र न रहकर स्थिर चित्रों का संग्रह हो जाता है, और हर नयी सम्भाव्य अनुभूति के आगे व्यक्ति किसी एक चित्र को प्रतिरोधक दीवार की तरह खड़ा कर लेता है। मेरे पास अधिक चित्र नहीं हैं, कह लो कि एक ही है, पर वही-हमारे साझे अनुभवों का सम्पुंजन ही, रेखा!-हमारे बीच में दीवार-सा खड़ा हो जाता है। हम मिलेंगे, लेकिन मानो इस दीवार के आर-पार; हाथ मिलाएँगे, लेकिन मानो इस चौखटे के भीतर से; एक-दूसरे को देखेंगे, लेकिन मानो इस चौखटे में जड़े हुए-तुम उधर से, मैं इधर से...रेखा, मैं अब भी तुम्हें प्यार करता हूँ, उतना ही, पर...

भुवन द्वारा रेखा को :

रेखा,

तुम्हें पत्र लिखने की कई कोशिशें की पर अभी तक पत्र न लिखा गया, और अब मैंने मान लिया है कि जो पत्र लिखना चाहता हूँ, वह कभी नहीं लिखा जाएगा। इसलिए लिखने की पिछली अधूरी कोशिश ही अन्तिम कोशिश मान कर वह अधूरा पत्र ही तुम्हें भेज रहा हूँ। और उसे भी फिर पढ़ूँगा नहीं, नहीं तो शायद भेजूँगा नहीं। तुम्हारे सब पत्र मुझे मिल रहे हैं; प्रत्येक पर अपने को और अधिक कोसता रहा हूँ कि तुम्हें क्यों इतना क्लेश पहुँचा रहा हूँ, फिर भी इससे पहले नहीं लिख पाया हूँ, नहीं पाया हूँ। अब भी पाया ही हूँ, यह तो नहीं है, और कदाचित् यह पत्र भेजना भी उतना ही क्रूरता है जितना पत्र न लिखना-मैं नहीं जानता, रेखा। तुम मुझे क्षमा कर देना यह सोचकर कि मैं इस समय भ्रान्त हूँ।

तुम्हारा

भुवन

भुवन द्वारा रेखा को :

रेखा,

तुम्हारा पत्र पाकर थोड़ी देर विमूढ़-सा सोचता रह गया-क्या सचमुच चार महीने हो गये दिल्ली स्टेशन पर तुम्हें ट्रेन में बिठाये हुए और उसके बाद तुम्हें पत्र लिखे हुए? पर तुम्हारी गणना ठीक है...यों अभी दो-एक दिन पहले मैंने तुम्हें चिट्ठी डाली है-अब तक तुम्हें मिल गयी होगी।

तो विवाह रद्द हो गया या हो जाएगा। यह बात अपने को कहता हूँ, तो सहसा कुछ स्पष्ट नहीं होता है कि क्या हो गया। क्योंकि किसी चीज़ के होने में, और उस होने के हमारे बोध में, हमेशा ही एक अन्तराल रहता है; यह इतनी बार लक्ष्य करता हूँ कि किसे वास्तव में होना माना जाये यही सन्देह हो आता है। फिर तलाक तो एक कानूनी कार्रवाई है और कानून हमारे जीवन की जीवित यथार्थता कभी होता है तो तभी जब हम उसे तोड़ते हैं या तोड़ने की सज़ा पाते हैं, नहीं तो उससे हमें कोई सरोकार ही नहीं होता। फिर यह भी ध्यान आता है कि यही अगर पहले हुआ होता-समय पर हुआ होता-तो तुम्हारा जीवन कितना भिन्न होता। सहसा हार्डी की बात याद आती है, कि 'जब पुकार होती है तब आगन्तुक नहीं आता', और एक तीखा आक्रोश मन में उमड़ आता है...

फिर भी, यह मान लेना होगा कि इस प्रकार एक अन्यायपूर्ण, असत्य, अयथार्थ परिस्थिति का अन्त हो गया है-जो तुम हो (या नहीं हो) और जो तुम कानूनन हो, उसका विपर्यय अब मिट गया है। और इस पर सन्तोष होना ही चाहिए।

तुम यात्रा पर निकल रही हो, दक्षिण जा रही हो। अच्छा ही है। शान्ति की बातें कहने वाला मैं कौन होता हूँ, पर इससे तुम्हें सान्त्वना तो मिलेगी ही। क्षण-भर के लिए मन में उठा था, सागर-तट पर तुम्हारे साथ मैं भी खड़ा हो सकता-पर नहीं, उससे व्यथा ही जागेगी शायद; रेखा, उस विशाल एकाकी को, जो न प्रेम करता है न प्रेम है, तुम अकेली ही देखो-तुम्हें अकेले में ही वह सान्त्वना मिले जो मेरा साथ तुम्हें न दे सका-मैंने चाहा था देना, पर दे सका केवल नयी व्यथा...'सी, यू शैडो आफ़ आल थिंग्स, माँक अस टु डेथ विद योर शैडोइंग...

(अरी सागर, तू जो सब कुछ की परछाई है, अपनी छाया के व्यंग्य से हमारे प्राण हर ले!

-डी.एच. लारेंस)

कभी सोचता हूँ, इसी तरह मैं भी अकेला सागर पर चला जाऊँ-दर्द तभी तक क्लेशकर होता है जब तक हम उससे लड़ते हैं, जब तक हम अपने अपनेपन को बनाये रखना चाहते हैं। विशाल के आगे अपने को समर्पित कर देने के बाद सब क्लेश मानो झर जाते हैं या डँसते भी हैं तो उनका डंक निर्विष होता है...शायद मैं भी जाऊँगा कहीं-और सागर के पास ही जाऊँगा।

गॉड ब्लेस यू, रेखा।

तुम्हारा

भुवन

गौरा द्वारा भुवन को :

मेरे भुवन दा,

आप चिट्ठी-चाहे यही चिट्ठी-दो चार-दिन पहले लिख देते, तो मैं ही वहाँ न आ जाती? पर अब छुट्टियाँ खत्म हो चुकीं : अब छुट्टी लेकर आ तो सकती हूँ

पर उसमें कुछ दिन तो लगेंगे और फिर आपके काम के दिनों में मैं आ धमकूँगी तो आप नाराज़ होंगे-न भी होंगे तो मुझे अनुमति तो लेनी चाहिए।

भुवन दा, मैंने आपको न आने पर या चिट्ठी न लिखने पर कोई उलाहना दिया है कि आप मुझे ऐसी चिट्ठी लिखें? आप बड़े हैं, यही नहीं, मैं यह भी नहीं भूलती कि स्नेह करते हैं; माफ़ी माँगने का कोई प्रश्न नहीं उठता। मैं अबोध हूँ सही, पर मूर्ख नहीं हूँ; यह भी समझती हूँ कि आप कोई बड़ा क्लेश मन-ही मन सह रहे हैं; मेरा कोई दावा होता तो आग्रह करके पूछती, और जानकर कुछ मदद न कर पाती तो कम-से-कम कुछ बहला तो सकती ही; पर आप बताएँगे तो स्वयं बताएँगे, मेरे पूछने से कुछ न होगा यह मुझे मालूम है। इसलिए अगर मैं कहूँ कि मैं आपके किसी भी काम आ सकूँ तो आप इंगित-भर कर दीजिए, तो मेरी बात रामजी की गिलहरी की बात से अधिक कुछ नहीं हो सकती।

भुवन दा, आपके पत्र से मुझे बेहद क्लेश पहुँचता; पर नहीं पहुँचा तो केवल एक बात के कारण-आप ने लिखा है कि 'अपराध ओढ़कर बैठे रहेंगे, और उसमें आपको सान्त्वना मिलती है।' मुझे शायद इसकी ओर इशारा नहीं करना चाहिए, चुपचाप वरदान मान कर इसे ले लेना चाहिए-पर इसमें जो वात्सल्य बोल रहा है, उसके सहारे शायद मैं आप तक पहुँच सकूँगी, और-गर्व नहीं करती-आपकी कुछ सहायता भी कर सकूँगी। भुवन दा, मुझे अनुमति दे दीजिए न-मैं थोड़े दिन वहाँ आऊँगी-जल्दी ही, जितनी जल्दी छुट्टी मिल सकी क्योंकि इस महीने के अन्त में परीक्षाएँ भी हैं-तब तक आप चाहे जो ओढ़े रहिए, पर मेरे आने के बाद आप कम-से-कम अपराध ओढ़े तो नहीं बैठे रह सकेंगे। मैं क्या ओढ़ाना चाहूँगी वह तो नहीं बताती; आप अपने ही मन से ओढ़ेंगे तो बुजुर्गी चाहे ओढ़े बैठे रहिएगा, मैं घर-भर में किलकती रहूँगी।

पर नहीं भुवन दा, आपकी शान्ति भंग नहीं करूँगी; सच कहती हूँ। आप मुझे कुछ दिन के लिए आ जाने दीजिए। कहती कि आप बुलाइये, पर उतना मान मेरा नहीं है।

आप ही की

गौरा

गौरा द्वारा रेखा को :

प्रिय रेखा दीदी,

मेरा पत्र पाकर आपको विस्मय हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है; मैं शायद न लिखती। लिख रही हूँ तो इसलिए कि और एक चिट्ठी लिखने से बच जाऊँ।

चन्द्रमाधव जी का एक पत्र मिला है। उसमें उन्होंने अपने बम्बई जाने की बात लिखी है, और साथ ही आपके बारे में कुछ सूचना दी है। यों किसी की निजी बातों में हस्तक्षेप करते बड़ी झिझक होती है और विशेष कर आपकी, क्योंकि आपके जीवन के बारे में कुछ न जानकर भी मैं इतना जानती हूँ कि आपने बहुत सहा है और आपकी कोई भी निजी बात निजी कष्ट की ही बात होगी-फिर भी यह कहने की अनुमति चाहती हूँ कि चन्द्रमाधव जी की सूचना से शान्ति मिली, और मैं आशा करती हूँ कि आपको भी मिलेगी-अभी भी और भविष्य में भी छोटे आशीर्वाद नहीं देते, इसे मेरी प्रार्थना समझ लीजिए कि आपका जीवन शान्तिमय हो, कल्याणमय हो।

आपको यह पत्र लिखकर मैं मान लूँगी कि चन्द्रमाधव जी के पत्र का डिस्पोज़ल हो गया, उन्हें अब उत्तर न दूँगी।

दो महीने हुए, भुवन दा के एक पत्र से ज्ञात हुआ था कि आप पहले बहुत अस्वस्थ रही; आशा है अब आप पूर्ण स्वस्थ हैं। उसके बाद भुवन दा का पत्र नहीं आया, पर मुझे वह पत्र शायद ही कभी लिखते हैं। यों वह ठीक ही हैं, यद्यपि उद्विग्न रहते हैं।

रेखा दीदी, मेरे पत्र से नाराज़ तो नहीं होंगी न?

स्नेहाकांक्षिणी

गौरा

भुवन द्वारा गौरा को :

नहीं गौरा; नहीं, अभी नहीं-आइ फ़ारबिड यू! लेट मी स्ट्यू इन माइ ओन जूस*। थोड़े दिन बाद-शायद; तब मैं आऊँगा या मैं न आया तो तुम्हें बुलाऊँगा-आने की अनुमति नहीं दूँगा। बुजुर्गी मुझ से झड़ गयी है, यह मैंने पिछली बार ही कहा था; और जो तुम ओढ़ाओ सिर आँखों पर, मगर पहले यह अपराध की कँबली झाड़ लूँ तब न!

पर मैं तुम्हारा बहुत कृतज्ञ हूँ, गौरा; वह कहने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास।

तुम्हारा

भुवन

(* मैं मना करता हूँ। मुझे अपनी आँच में पकने दो।)

भुवन द्वारा रेखा को :

प्रिय रेखा,

तुम इस समय न मालूम कहाँ हो, क्या कर रही हो-शायद रामेश्वर के मन्दिर में बैठी होगी, या कन्याकुमारी में सागर-तट पर-सहसा मुझे जमुना की रेती की याद आती है और ख्याल होता है, उस समय जब मैं बालू का घर बना रहा था तो विधि निस्सन्देह हँसती रही होगी...कहाँ चले आये वहाँ से इन थोड़े से दिनों में हम-अब मैं सोचना चाहूँ कि वहाँ तुम ने मुझे मैन फ्राइडे कहा था और मैंने तुम्हें मिस राबिनसन तो विश्वास नहीं होता। लेकिन क्या अब भी हम कम खोये हुए हैं किसी अज्ञात द्वीप पर-कम असहाय हैं? इससे क्या कि आस-पास जो जलराशि है वह स्थिर सागर नहीं है, वह एक ओर-छोर भीम-प्रवाहिनी महानदी है-द्वीप तो फिर भी द्वीप है, और सब से सम्पर्क छूट जाने पर उत्पन्न होनेवाला करुण आत्म-विश्वास फिर भी करुण।

रेखा, मैं देश छोड़ कर जा रहा हूँ। एक और एक्सपेडीशन डच इंडीज़ में जा रहा है, उसी में जा रहा हूँ। एक वैज्ञानिक अमेरिका से जावा पहुँच रहे हैं-वह भी भारतवासी ही हैं वैसे-और मैं यहाँ से जावा जाऊँगा। वह तो अप्रैल में पहुँचेंगे, पर मैं पहले ही जा रहा हूँ कि वहाँ कुछ आरम्भिक प्रबन्ध कर रखूँ। कालेज से अभी एक वर्ष की छुट्टी ले ली है और होली की छुट्टी लगते ही चल दूँगा-सात-आठ दिन तैयारी के लिए काफ़ी हैं। परीक्षार्थियों की पढ़ाई तो अब तक लगभग पूरी हो ही जाती है इसलिए कालेज के काम में कोई व्यतिक्रम नहीं होगा।

जहाज कलकत्ते से पकडूँगा। पहले सोचा था कोलम्बो जाऊँ-रामेश्वरम् होते हुए जाने का मोह था-पर क्या होगा उससे रेखा...

तुम्हें क्या कहूँ, रेखा? तुम्हारे जीवन की खोज पूरी हो-उसे सार्थकता मिले...

भुवन

पुनश्च : फागुन की अष्टमी का धूमिल चाँद देखकर न जाने क्यों लारेंस की कविताएँ निकाल लाया; उसमें से एक कविता यह भेज रहा हूँ :

हाइ एण्ड स्मालर ग्रोज़ द मून : शी इज़ स्माल एण्ड वेरी फ़ार फ्राम मी,
    विस्टफुल एण्ड कैडिड , वाचिंग मी विस्टफुली फ्राम हर डिस्टैंस, एण्ड आइ सी
    टेंब्लिंग ब्लू इन हर पैलर ए टीयर दैट शोरली आइ हैव सीन बिफ़ोर ,
    ए टीयर ह्विवच आइ हैड होप्ड ईवन हेल हेल्ड नाट अगेन इन स्टोर।

(चाँद ऊँचा और छोटा होता जाता है : ऊँचा और मुझसे बहुत दूर , उदास और स्पष्टवादी, अपनी दूरी से उदास-भाव से मुझे देखता हुआ। और उसके पीलेपन में नीला काँपता हुआ मैं देखता हूँ एक आँसू जिसे मैंने निश्चय ही पहले देखा है और जो मैंने आशा की थी कि नरक में भी फिर देखने को न मिलेगा! -डी. एच. लारेंस)

गौरा द्वारा भुवन को :

भुवन दा, यह क्या सुनती हूँ-आप जावा जा रहे हैं-और आपने मुझे ख़बर भी नहीं दी? आज स्टाफ़ रूम में ही सहसा सुना-बात आपकी नहीं थी, यही थी कि एक दल जावा जा रहा है कास्मिक रश्मियों की खोज के सिलसिले में जिसमें दो भारतीय वैज्ञानिक होंगे : इससे सहसा कान खड़े हुए तो सुना कि एक आप हैं और एक कोई और...कब जा रहे हैं भुवन दा? मुझ से मिले बिना आप नहीं जा सकेंगे-मुझे फ़ौरन पता दीजिए-या तो आप बनारस होते हुए जाएँगे या मैं आऊँगी जहाँ आप कहें। चिट्ठी फ़ौरन लिखिएगा, फ़ौरन।

आपकी ही

गौरा

गौरा द्वारा भुवन को :

आपको चिट्ठी भेज चुकी तब आपकी यह सूचना मिली। आप मुझसे मिलकर नहीं जाएँगे, मुझे भी नहीं आने देंगे...आपकी इच्छा, भुवन दा, मैं क्या कहूँ? आप बनारस के पास से गुजरते हुए चले जाएँगे-बल्कि अब तक तो चले गये होंगे और मैं न मिल सकूँगी...फिर भी, मेरे भुवन दा, इसे मैं आपका अतिरिक्त स्नेह ही मानती हूँ कि आप ने मुझे इस अन्याय के लिए चुना-लेकिन क्यों, भुवन दा, क्यों, क्यों, मेरी कुछ समझ में नहीं आता, क्यों आप मुझ से दूर भागे जा रहे हैं जो आप को अपने पथ का प्रकाश मान कर जी रही है-क्यों?...

गौरा द्वारा भुवन को :

भुवन दा,

अभी एक चिट्ठी आपको डाल आयी हूँ। उसे वापस तो नहीं लेती, पर उसमें एक बात कहना आवेश में भूल गयी थी। आपकी यात्रा निर्विघ्न और सफल हो; आप शीघ्र ही स्वदेश लौटें...और इससे आगे अपनी प्रार्थना में यह भी जोड़ दूँ, भुवन दा, कि आप स्वदेश ही नहीं, मेरे पास लौटें तो क्या मेरी प्रार्थना आपकी किसी इच्छा से प्रतिकूल चली जाएगी? वैसा हो, तो कहूँगी, तो आपकी इच्छा ही जयी हो, वही पूर्ण हो-मेरी प्रार्थना यही हो कि मेरी प्रार्थना भी आपकी इच्छा के अनुकूल हो, उसकी अनुगता हो।

प्रणत

गौरा

पुनश्च : यह चिट्ठी कलकत्ते भेज रही हूँ कि चलने तक मिल जाये।

रेखा द्वारा भुवन को, कुछ पत्र और पत्र-खण्ड :

भुवन,

मेरा प्याला भरने में शायद यही कसर थी-तुम भी मुझे दोषी ठहराओगे। यही सही, भुवन, यह भी सही। मैं टूट चुकी हूँ, मुझमें न शक्ति बाकी है, न धैर्य, न युयुत्सा; शायद और व्यथा पाने का भी सामर्थ्य अब नहीं है; तुम जो चाहे कह लो, मुझे कुछ नहीं होगा। और क्यों हो, किसलिए हो-कौन-सी वह आशा है जिसके कारण कोई निराशा, कोई चोट मुझे खले? लेकिन भुवन, तुम क्या नहीं समझते कि मेरे लिए मानवी प्यार की आख़िरी अभिव्यक्ति तुम थे-थे नहीं, हो, रहोगे-और इसीलिए मैं मर गयी और अब नहीं जियूँगी? अगर मैं रो सकती, तो रोती-अतीत के लिए नहीं, अपने लिए नहीं, उस सबके लिए नहीं, जो अब नहीं रहा, रोती इस तुम्हारे अभियोग-क्योंकि यदि यह अभियोग है तो फिर मुक्ति न मेरे लिए है, न तुम्हारे लिए-मैं जो सोचती थी कि जो भी हुआ, मैं जो टूट गयी, उसकी बड़ी व्यथा हमारे चरित्र में फैलेगी, मेरे से अधिक तुम्हारे में, वह सब झूठ होगा; वह व्यथा एक अर्थहीन ट्रेजेडी हो जाएगी क्योंकि उसमें अभियोग होगा, और उसकी अर्थहीनता हम दोनों को ले डूबेगी। मेरा तो कुछ नहीं, मैं तो डूबी ही हूँ-पर तुम, भुवन, तुम! मेरी सारी आशाओं का केन्द्र तुम हो-मेरे अन्तर तम की सारी व्यथा को इस तरह व्यर्थ न कर दो, भुवन! व्यथा सृजन करती है, मेरी व्यथा बाँझ रह गयी, मुझे भी झुलसा गयी, पर मैंने मानना चाहा था कि वह तुम्हीं को बनाएगी, और मैं अपनी व्यर्थता तुम्हें अर्पित करके सार्थक हो जाऊँगी। वह सान्त्वना भी मुझे नहीं मिलेगी...

जाने दो। न मिले। अब और कोई सान्त्वना मुझे नहीं चाहिए, मुझे मर जाने दो, भुवन!

भुवन,

तुम्हारी अधूरी चिट्ठी का जवाब मैं तुरत लिख गयी थी, वह तुम्हें अब तक न मिला हो तो फिर उसे मत पढ़ना-पढ़ चुके हो तो क्षमा कर देना। तुम्हारी चिट्ठी मैंने फिर पढ़ी है, कई बार फिर, शायद दोष तुम ने नहीं दिया-तुम्हारे पत्र में परिताप ही है जिसे मैंने अभियोग माना। पर नहीं, मेरे सहभोक्ता, अभियोग वह नहीं है, मैं समझती हूँ; और जो आघात मैंने पाया था उसका घाव भर गया है-अपना आक्रोश मैं वापस लेती हूँ और क्षमा माँगती हूँ। तुम्हारी चिट्ठी पाकर जानूँगी कि तुमने माफ़ कर दिया-यद्यपि मेरे आग्रह से तुम लिखोगे नहीं यह जानती हूँ।

तुम्हारी

रेखा

...आज एक वर्ष होता है जब पहले-पहल लखनऊ में मिले थे-चन्द्रमाधव के यहाँ तुमने मुझे बाद में बताया था, तुमने मुझे क्लान्त और अपनी शक्तियों को समेटती हुई देखा था-वह क्लान्ति आज और बढ़ गयी है और समेटने की शक्ति ही अब मुझमें नहीं रही। मैं केवल स्मरण करती हूँ, और बिखर जाती हूँ-मुझे याद आती है काफ़ी हाउस की हमारी पहली ही बहस-और यह भी आज जैसे विधि का संकेत लगता है कि उस बहस में हम सत्य की वेदनामयता की बात करने लगे थे, और तुमने एक सन्दर्भ दिया था 'द पेन आफ लविंग यू इज़ आल्मोस्ट मोर दैन आइ कैन बेयर'...उस दिन पहली पंक्ति में से तुम 'डीयरेस्ट' शब्द छोड़ गये थे, चाहूँ तो मान सकती हूँ कि वह छूट जाना भी विधि का संकेत था, पर नहीं, वह नहीं, इतना ज़रूर है कि आज मैं एक शब्द और छोड़ जाऊँ 'आल्मोस्ट'-क्योंकि सचमुच यह दर्द मेरी सहन-शक्ति से परे है, मैं उसे नहीं सँभाल सकती...कोई भी नहीं सँभाल सकता शायद प्यार का दर्द, इसीलिए शायद प्यार रहता नहीं, दर्द रह जाता है-केवल ईश्वर सँभाल सकता है अगर वह-या कहूँ कि जो सँभाल सकता है वही ईश्वर है...''प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्' कितनी सार्थक वन्दना है यह ईश्वर की, वही सह सकता है, वही एक, और कोई नहीं...

भुवन,

तुम्हारी दो चिट्ठियाँ एक साथ मिली हैं-बहुत भटकती हुई कोई छः सप्ताह बाद। तो तुम जावा जा रहे हो-जा क्या रहे हो, अब तक तो पहुँच भी गये होंगे। ठीक है भुवन, जाओ, तुम्हारा मार्ग प्रशस्त हो।

हाँ, मैं हूँ सागर के ही किनारे-कदाचित् तुम भी सागर के किनारे होगे, पर ये किनारे दूसरे-दूसरे हैं-और क्या सागर भी दूसरे-दूसरे हैं भुवन? मैं दिन-भर बैठी लहरें देखती हूँ लेकिन उनकी दौड़ मानो गति-हीन, प्रेत-दौड़ हैं; उनका टकराना सुनती हूँ पर वह भी मानो शब्द-हीन, प्रेत-टकराहट है-केवल दौड़ की, टकराहट की अन्तहीनता ही सजीव है, प्रेत नहीं है।...

एक और वर्ष-गाँठ-आज हम तुलियन पहुँचे थे, और मैंने गाया था 'लव मेड ए जिप्सी आउट आफ़ मी', और...इस प्रेत कैलेण्डर की वर्ष-गाँठ गिनते-गिनते मैं भी प्रेतिनी हो गयी शायद-जी चाहता है कि ठठा कर हँसूँ-कैसी जिप्सी बनाया प्रेम ने। पिछले वर्ष आज उत्तर मेरु पर थी, आज दक्षिण मेरु पर हूँ, उस दिन दुनिया की छत पर थी, आज-इससे गहरा और कौन-सा पाताल होगा जिसमें मैं आज हूँ! और आगे सागर हहराता है आदिहीन और अन्तहीन; और सहसा स्वयं अपनी अन्तहीनता एक भयावना स्वप्न बनकर मेरे सामने आ जाती है-भुवन, यह अन्तहीन जिप्सी प्रेतिनी जाएगी कहाँ!

तुमने एक बार मुझे लारेंस की कविता भेजी थी। लो, आज मैं तुम्हें एक का अंश भेजती हूँ। कोई सिर-पैर इसका नहीं है, फिर भी कुछ प्रासंगिकता मानो उसमें है।

समथिंग इन मी रिमेम्बर्स एण्ड विल नाट
    फ़ार्गेट ;
    द स्ट्रीम आफ़ माइ लाइफ़ इन द डार्कनेस
    डेथवार्ड सेट।
    एण्ड समथिंग इन मी हैज़ फ़ार्गाटिन ,
    हैज़ सीज्ड टु केयर ,
    डिज़ायर कम्स अप एण्ड कटेंटमेन्ट
    इज़ डिबानेयर।
    आइ हू एम वोर्न एण्ड केयरफ़ुल
    हाउ मच डू आइ केयर ?
    हाउ इज़ इट आइ ग्रिन देन , एण्ड चक्ल्
    ओवर डिस्पेयर ?
    ग्रीफ़ , ग्रीफ़ आइ सपोज़ एण्ड सफ़ीशेंट
    ग्रीफ़ मेक्स अस फ्री
    टु बी फ़ेथलेस एण्ड फ़ेथफुल टुगेदर
    एज वी आल हैव टु बी।

(कुछ मुझमें है जो स्मरण करता है और भूल नहीं सकता ; अन्धकार में मृत्यु की ओर उन्मुख मेरी जीवन धारा।

और कुछ मुझमें भूल गया है और परवाह नहीं करता ; वासना फिर जागती है और सन्तोष मौज़ में आता है।

मैं जो क्लान्त और चिन्ता-ग्रस्त हूँ-मुझे कितनी परवाह है ? कैसे मैं हँसता हूँ और निराशा पर खिलखिलाता हूँ?

दुःख , दुःख-मेरी समझ में पर्याप्त दुःख ही हमें स्वतन्त्र करता है एक साथ ही वफादार और बेवफा होने के लिए, जैसा कि हम सभी को होना पड़ता है। - डी. एच. लारेंस)

 

प्रिय भुवन;

मौसी अब यात्रा से ऊबने लगी है; मैं भी ऊब गयी होती अगर पहले अपने से ही न ऊबी हुई होती, और हम लोग लौट रहे हैं। इस बीच में दो-तीन सप्ताह बीमार भी रही, उसने मौसी को और उबा दिया। लौटते हुए हम लोग श्री अरविन्द आश्रम भी और श्री रमण महर्षि के आश्रम भी होते आये। कोई आध्यात्मिक अनुभव मुझे हुआ हो, ऐसा तो नहीं, पर आश्रमों का वातावरण अच्छा लगा-यद्यपि था दोनों में कितना अन्तर! रमण महर्षि के दर्शन भी हुए, मौसी ने उनसे कई प्रश्न भी पूछे। उन्होंने क्या-क्या कहा यह न तो याद है न लिखने में कोई तुक, पर चलते समय मुझसे जो दो-एक बात उन्होंने कहीं उससे उनकी मानवी संवेदना का गहरा प्रभाव मुझ पर पड़ा।

अध्यात्म की ओर मेरी रुचि नहीं है, भुवन, उधर सान्त्वना खोजने की कोई प्रेरणा भीतर से नहीं है। पर सोचा है कि लौट कर फिर कुछ काम करूँगी-और अब आर्थिक आज़ादी की प्रेरणा से नहीं, आत्म-निर्भरता की प्रेरणा से नहीं, एक डिसिप्लिन के रूप में...दर्द है तो है; अपना जीवन मैंने उसे दे दिया, अब कहाँ तक उसे सँजोये फिरूँगी? इस कथन में कुछ विद्रोह का-सा स्वर है; विद्रोह मुझमें नहीं है, सम्पूर्ण नैराश्य ही है; इतना सम्पूर्ण कि अब उसकी दुहाई कभी नहीं दूँगी...

तुम अब पत्र लिखोगे, भुवन? तुम्हें गये चार महीने हो चले, तुमने अभी पहुँच की भी खबर नहीं दी! वैसे अखबार में मैंने पढ़ा था; तुम्हें नौ-सेना और वायु-सेना से भी मदद मिली है-गनबोट में तुम लोग माप लेने गये थे...भुवन, तुम्हारे समाचार

अखबारों से मिला करेंगे, यह नहीं सोचा था। अखबारों में भी निकलेंगे, यह तो विश्वास था, पर मैं भी उन्हीं पर निर्भर करूँगी, यह नहीं!

गाड ब्लैस यू

तुम्हारी

रेखा

भुवन,

अभी वकील की चिट्ठी आयी है कि तलाक़ की कार्रवाई सम्पूर्ण हो गयी-डिग्री को छः महीने हो गये और अब मैं मुक्त हूँ, सर्वथा मुक्त-और उन्होंने मुझे बधाई दी है। और हेमेन्द्र के वकील की भी इसी आशय की चिट्ठी आयी है। उन्होंने यह भी सूचना दी है कि हेमेन्द्र का विवाह अगले महीने हो रहा है और मुझे सलाह दी है कि मैं उसे अपनी शुभ-कामनाएँ भेजूँ, कड़ुवाहट बनाये रखने से कोई लाभ नहीं होता। इस सलाह की मुझे आवश्यकता नहीं थी-मुझे हेमेन्द्र से अब कोई शिकायत नहीं है, और उसके विवाह पर मैं बिना मन में कुछ रखे उसकी कल्याण-कामना करूँगी-पर वकील ने अनिवार्य कर्त्तव्य से आगे जाकर यह सब मुझे लिखा है इसके लिए मैं उसकी कृतज्ञ ही हूँ। उन्होंने मेरे लिए भी आशा प्र्रकट की है कि मैं पुराने आघातों को ही न सहलाती रहकर भविष्य का निर्माण करूँगी-उन्हें मेरे भविष्य में विश्वास है, और उनका अनुरोध है कि जब भी कुछ महत्त्वपूर्ण मेरे जीवन में घटे तो उन्हें सूचित करूँ। इसका क्या उत्तर दूँ; भुवन? हँस दूँ? लिख दूँ कि आपका आवेदन देर से आया-महत्त्वपूर्ण तो सब घट चुका?

वह सब मैं सोच लूँगी, भुवन! अभी मेरे मन में तुम्हारे भविष्य का विश्वास उमड़ आया है, और मैं तुम्हें आशीर्वाद दे रही हूँ। तुम्हारे पिछले पत्रों में जो गहरी निराशा थी, उसे मैं नहीं स्वीकार करती; तुम उसमें से निकल आओगे। जिस चौखटे की, जिस दीवार की बात तुमने कही है, उससे भी तुम ऊँचे उठोगे। मुझे छूने के लिए नहीं-मैं गिनती में नहीं हूँ-अपनी बाँहों में दुनिया को घेरने के लिए! निराश मत होओ, भुवन, अपने जीवन को परास्त-भाव से नहीं, स्रष्टा-भाव से ग्रहण करो; एक विशाल पैटर्न है जो तुम्हें बुनना है; तुम्हारी प्रत्येक अनुभूति उसका एक अंग है, प्रत्येक व्यथा एक-एक तार-लाल, सुनहला नीला...मैं-मैं भी उसी ताने-बाने के तारों का एक पुंज हूँ-तुम्हारे जीवन-तट का एक छोटा-सा फूल। मेरे बिना वह पैटर्न पूरा न होता, लेकिन मैं उस पैटर्न का अन्त नहीं हूँ-मैं इसमें सुखी हूँ कि मैंने भी उसमें थोड़ा-सा रंग दिया है-शायद थोड़े-थोड़े कई रंग...सब उज्ज्वल नहीं हैं, लेकिन कुल मिला कर यह फूल कभी अप्रीतिकर या तुम्हारे पैटर्न में बेमेल नहीं होगा यही मानती हूँ। मेरा आशीर्वाद लो, भुवन, और आगे बढ़ो, जहाँ भी तुम जाओ, जो भी करो, मेरा प्यार और आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। मेरा विश्वास तुम में अडिग है।

और मैं? मेरी चिन्ता मत करो। काल के पास एक अमोघ मरहम है। मैं भी काम कर रही हूँ। दो महीने से स्वयंसेविका नर्स का काम मैंने लिया है, साथ काम सीख भी रही हूँ; पूरा नर्सिंग सीखने में तो अधिक समय लगता पर प्रबन्ध का काम भी मैं करती हूँ; मेरे लिए वह आसान है पर नर्सों में प्रबन्ध-कुशल कम मिलती हैं और इसलिए वह काम मुश्किल समझा जाता है-या उस काम के लिए कार्यकर्ता पाना मुश्किल समझा जाता है। फलतः मेरा काम बराबर बढ़ता जाता है, और सोचने के लिए मुझे कम अवकाश मिलता है...कुछ सोचती हूँ तो कभी जब बीमार होती हूँ-और बीमार बीच-बीच में हो जाती हूँ-मेरी वाइटैलिटी बहुत कम हो गयी है। और भुवन, श्रीनगर में मैं मरकर भी नहीं मरी, पर तब से अधूरी मृत्यु कई बार हो चुकी है; अब डाक्टर ने कहा है कि एक आपरेशन फिर करना पड़ेगा नहीं तो इस तरह घुलकर मर जाऊँगी। मरने में और नया कुछ होगा यह तो नहीं लगता, पर घुलकर घिसट कर मरना नहीं चाहती...लेकिन आवृत्ति भी नहीं चाहती-नहीं, आवृत्ति तो नहीं हो सकती पर आजकल बड़े जोरों की बारिश होती रहती है यह ज़रा थम ले तो...वैसे भी बारिश का मौसम अच्छा नहीं होता। डाक्टर का कहना है, अगले महीने या अक्टूबर में आपरेशन हो जाये-और अगर दार्जिलिंग जा सकूँ तो और अच्छा, या कहीं पहाड़ पर। देखें...

भुवन द्वारा गौरा को :

गौरा,

आज छः महीने बाद तुम्हें फिर पत्र लिखने बैठा हूँ। इन छः महीनों में तुम्हारा भी कोई पत्र नहीं आया है। तुम्हारा पत्र क्यों नहीं आया, इसका कारण तो यही है कि मैंने पता नहीं दिया। न देने पर भी तुम पता लगाकर चिट्ठी भेज सकती थी यह मैं जानता हूँ, पर यह भी जानता हूँ कि फिर भी तुम चुप रही तो यह मानकर ही चुप रही होगी कि मैंने वैसा चाहा है-या कि उसमें मेरा हित है। तुम्हारा जो पिछला पत्र मुझे मिला था-कलकत्ते नहीं, सिंगापुर मिला वह-उससे भी यह स्पष्ट होता है। यह सब जानकर भी, मैं अपने को समझा लेना चाहता हूँ कि तुम मुझे भूल गयी क्योंकि, क्यों कोई मेरे हित को लेकर इतना चिन्तित हो, क्यों कोई मेरे अन्याय, मेरे आघात सहे? यह सब स्नेह, करुणा, वात्सल्य-सब मानो एक बोझ-सा मुझे दबाये डालता है...एक नये बोझ-सा, क्योंकि एक बोझ पहले ही मेरे कन्धों पर है-मानो एक सजीव बोझ, एक सजीव शाप का बोझ, सिन्दबाद के कन्धों पर सवार सागर के बूढ़े-सा, जो विवश न मालूम किधर ले जा रहा है। कई महीनों से जानता हूँ कि मेरा जीवन किसी नयी अज्ञात, अकल्पित दिशा में बहा जा रहा है, और शायद एक ट्रैजेडी की ओर। ठीक क्या है नहीं सोच पाता; और न काम में अपने को सोचने का मौका ही देता हूँ। पर कभी-कभी बहुत वृष्टि में काम बन्द हो जाता है, अपने बाँस और लकड़ी के घर में बन्दी होकर केवल वर्षा की टपाटप सुनता रहता हूँ जैसे आज तीन दिन से सुन रहा हूँ, सब कपड़े, कागज़, खुली हुई कोई भी चीज़ सील जाती है; तब खाली बैठकर सोचने को बाध्य हो जाता हूँ...तब लगता है, इस सागर-यात्रा के साथ जिस जीवन से निकला, उसमें अब लौटना नहीं है, कुछ मेरे भीतर बराबर मरता जा रहा है और कुछ नया उसके स्थान पर भरता जाता है जो स्वयं भी मरा है या जीता है नहीं मालूम...यहाँ काम समाप्त होगा तो शायद लौटना ही होगा, पर मानो लौटने का, लौटकर किसी से भी मिलने का मुझे डर है, जैसे मैं स्वयं अपना प्रेत हो गया हूँ, और डरता हूँ कि लौटकर जब लोगों से मिलूँगा तो पाऊँगा कि मैं तो अब सच नहीं हूँ, केवल प्रेत हूँ-और वैसा पाना मैं नहीं चाहता, नहीं चाहता!

लेकिन न जाने क्यों तुम से मिलने को, तुम से बात करने को, तुम्हें न जाने क्या कुछ बताने को मन होता है...मुझे लगता है कि मैं खड़े-खड़े बहुमूल्य वस्तुओं को नष्ट होते, मरते देखा किया हूँ, अकेले देखा किया हूँ और इसलिए साथ ही स्वयं भी मरता रहा हूँ; अगर उस अकेलेपन से निकल सकता, तो देखा है वह कर सकता, तो शायद उस मृत्यु से भी उबर सकता...

नहीं, गौरा! ये सब बातें लिखने की नहीं है। मैं अच्छी तरह हूँ, काम रुचिकर है और शायद कुछ उपयोगी भी। कास्मिक रश्मियों के साथ-साथ रेडियो का भी काम हम लोग कर रहे हैं। वैसे यहाँ अशान्ति है और बढ़ रही है, पर हमारा काम ऐसा है कि हमें सब कुछ से अलग ले जाता है। तुम क्या कर रही हो? आशा है कि अपने लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बना सकी हो, और अपने काम में तृप्ति पा रही हो-काम से अभिप्राय सिर्फ़ सिखाने का नहीं है, उसकी बात कह रहा हूँ तुम जिसे अपना काम जानती हो, जिसमें तुम्हारी अभिव्यक्ति है। लिखना ज़रूर। माता-पिता का भी हाल लिखना।

तुम्हारा

भुवन

गौरा,

नहीं, मेरा मन यहाँ से उचट चला-चला नहीं, एकदम असह्य रूप से उचाट हो गया...जगह बहुत सुन्दर है, लोग बड़े हँस-मुख, स्त्रियाँ रूपवती-उनके खुले कन्धों और बाँहों में ऐसी एक कान्ति है कि कही नहीं जाती, जैसे अखरोट की लकड़ी की पुरानी और पालिशदार मूर्ति पर कोई पारदर्शी ओप चढ़ा हो-पर नहीं, लकड़ी कैसे उस जीवित त्वचा की बराबरी कर सकती है? नृत्य भी मैंने देखे हैं, मन्दिरों में चर्मवाद्यों का संगीत भी-पर नहीं, नहीं, नहीं! सहसा भीतर कुछ उभर आया है कि नहीं, यह तुम्हारा स्थान नहीं है, चलो! और यह निरी 'होम सिकनेस' नहीं है-यहाँ का न होने में देश की भावना बिलकुल नहीं है, सारी परिस्थिति से असन्तोष है। मैं जैसे किसी सुदूर पोत-भंग का एक टूटा, बह कर आया हुआ विपन्न तख़्ता हूँ-फ्लाट्सम-लहरों के थपेड़े खाता लुढ़कता-पुढ़कता कहीं लगा हूँ और जानता हूँ कि नहीं, वह ठिकाना नहीं है, और वह पोत तो अब हुई नहीं जिसका मैं अंश हूँ-था! अपने को ऐसे बहते देखा जा सकता है एक प्रकार की तटस्थता से और निरन्तर देखते रहने से एक मोहावस्था भी हो जाती है, पर सहसा वह टूटती है तो...

तुम सोचोगी कि इस उच्चाटन की सूचना देने का क्या अर्थ हुआ अगर साथ यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं वापस आ रहा हूँ। पर नहीं। वापस तो नहीं आ रहा। और 'वापस' शब्द ही समझ में नहीं आता-वापस कोई कभी गया है? फिर भी मन हुआ कि इस मनःस्थिति की सूचना तुम्हें देनी चाहिए, वह दे दी...अगर इसे तुम उद्भ्रान्ति समझो, तो ठीक है, उदभ्रान्त तो मैं हूँ...

तुम्हारा स्नेही

भुवन

मेरी प्रिय गौरा,

इस स्थान के तीन ओर पानी है-समुद्र तो नहीं, पर समुद्र से लगी हुई खारी झील का-मैं चार महाकाय सागौन वृक्षों और छः-सात ताल वृक्षों की ओट में से उसे देखता हूँ, और यह ओट उसे और भी विस्तार दे देती है। पीछे एक छोटी हरी पहाड़ी है। पेड़ों की आड़ में पानी के दूसरी पार की नीची पहाड़ियों की शृंखला है, और सागौन के बड़े-बड़े पत्तों के गवाक्ष में से दीख जाती हैं थिरकती हुई पालदार नौकाएँ। और मैं 'होम-सिक' हूँ-मान लेता हूँ कि होम-सिक हूँ-यद्यपि यह मेरे लिए एक शब्द ही है, मैं तो निर्गृह ही हूँ और यह केवल ऊब का दूसरा नाम है! पर नहीं, सच कहूँ तो तुम्हारी स्मृति से भर गया हूँ। मेरा शरीर आज ठीक नहीं है; मैं दोपहर से ही आराम-कुर्सी पर बैठा हूँ, अब रात हो गयी है; इन छः-सात घंटों में मैंने कुछ नहीं किया है सिवा तुम्हारी बात सोचने के, एक-टक तुम्हें देखते रहने के। तुम्हारी पलकों की एक-एक झपक देखता रहा हूँ; और वेणी को किरीटाकार पहने हुए तुम्हारे सिर के-क्योंकि जिसे देखता रहा हूँ, वह आज की संगीत-शिक्षिका नहीं, कई बरस पहले की विद्यार्थिनी है!-एक-एक उड़ते ढीठ बाल को मेरी आशीर्वाद-भरी दृष्टि ने गिन डाला है। तुमने नहीं जाना-मेरा यह अवलोकन बिलकुल नीरव, निराग्रह, निःसम्पर्क है-मैं दूर, बहुत दूर वन की साँस हूँ, स्पर्शातीत...

पश्चिम धीरे-धीरे रंजित हुआ, फिर लाल, फिर और लाल, फिर उस लाली में उदासी आने लगी...मैंने कहा, गौरा, एक दिन तुम्हें मैं अपनी कहानी सुनाऊँगा, लाल और उदास...फिर धीरे-धीरे अँधेरा हो चला, आकार ओझल होने लगे और एक हलकी-सी हवा झील की ओर ले बह निकली। मैंने कहा, नहीं गौरा, कुछ नहीं सुनाऊँगा, सुनाने को है ही क्या, चुपचाप सिर झुका लूँगा और प्रतीक्षा करूँगा कि तुम्हारे क्षमा-भरे, करुणा-भरे हाथ मेरे माथे को छू दें...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हवा के झोंके से तरंगायित यह झील एकाएक सूख जाये, लुप्त हो जाये, कि उसे निरन्तर भागते हुए वाष्पयानों के धक्के न सहने पड़ें, समुद्र में मिलकर ख़ारा न होना पड़े-ख़ारेपन में अपने को खो देते हुए भी समुद्र के बेदर्द थपेड़े न खाने पड़ें-इस दुर्गति को आत्म-समर्पण न करना पड़े! फिर ध्यान आया, ये सब रूपक व्यर्थ हैं, यह सब सुनने-समझने की फुरसत किसे है...कोई भविष्य नहीं है, कोई अतीत नहीं है, अतीत से अपने को उच्छिन्न कर लिया है इसलिए और भी कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि भविष्य होता क्या है? अतीत का स्फुरण...केवल वर्तमान जीता है और उस वर्तमान को चाहे समझ लो-तीन ओर पानी, सामने सागौन के पेड़, दूर पहाड़ियाँ, तिरती पालदार नावें, सान्ध्य आकाश, अर्थात् सौन्दर्य और शान्ति-बाह्य वर्तमान; चाहे समझ लो एकाकीपन, ऊब, सूना, उच्चाटन, उत्कंठा अर्थात् आन्तरिक वर्तमान; दोनों एक ही हैं, एक ही वर्तमान, आगे अपनी-अपनी पसन्द है...

सवेरे। रात में दो-तीन बजे वर्षा शुरू हो गयी बड़े जोरों से; अब कुछ ठण्ड है। मेरा शरीर भी कुछ ठीक है। कल से शायद काम करने लायक हो जाऊँ, आज अभी और आलस करने का जी है। पत्र भी लिखता रह सकता हूँ-पर सोचता हूँ, इसे इतना ही छोड़ दूँ। और लिखा तो अलग भेज दूँगा।

तुम्हारा

भुवन

गौरा द्वारा भुवन को :

भुवन दा, मेरे भुवन दा! आज मेरी साधना फली है, और जी होता है, आपकी चिट्ठी सामने रखकर गा उठूँ, कोई वाद्य लेकर-सितार, नहीं वीणा लेकर बजाने बैठूँ मोहन रागिनी, और घंटों बजाती रहूँ, जब तक कि हाथ सन्न न हो जायें-हाथ ही, मेरा उत्साह नहीं, मेरे प्राणों की वह हँसी नहीं जो किसी तरह आप तक पहुँचकर आपके पैरों से लिपट जाना चाहती है!

लेकिन फिर दुबारा आपकी चिट्ठी पढ़ती हूँ, और मेरी मोहन रागिनी सहसा धीमी पड़कर नीलाम्बरी में बदल जाती है। भुवन दा, यह सब क्या है, आप क्या सोचते हैं, क्या वह कष्ट है जो आप इस तरह छिपाये बैठे हैं? छिपाये भी नहीं, कष्ट है यह तो दीखता ही है, और कष्ट के कारण आप अन्याय भी कर जाते हैं कि अगर कष्ट दीखता न होता तो आपका पत्र पानेवाला मर्माहत होकर बैठ जाता-क्या है यह कष्ट कि आप उससे ऐसे हो गये? मैं बार-बार पत्र पढ़ती हूँ, और सोचती रह जाती हूँ कि क्या यह भुवन दा का ही पत्र है, मेरे भुवन दा का...आप मुझे लिखिए-बताइये कि क्या बात है-क्या मैं किसी काम नहीं आ सकती? एक बार आपने कहा था, 'गौरा, अब से तुम से बराबर-बराबर बात करूँगा', बराबर तो मैं कभी नहीं हो सकती पर अगर आप बिलकुल छोटी ही नहीं मानते तो क्या मुझे अपना पूरा विश्वास देंगे?

ऐसी बुरी-बुरी बातें मत सोचिए, भुवन दा! मैं तो कहती हूँ, आप आइये, आकर आप पाएँगे कि आपका डर बिलकुल निर्मूल है। यह नहीं कि आप सच नहीं हैं, जैसा आप ने लिखा है, बल्कि आप ही सच हैं-क्योंकि आप दूसरों को भी जीवन देते हैं। सच भुवन दा, आप कब तक जावा में बैठे रहेंगे? अब आ जाइये न।

पिता जी मसूरी ही हैं, माँ भी। अब वहीं रहेंगे-वहाँ अपना मकान ले लिया है। अब की बार मैं जाऊँगी तो उसको ठीक-ठाक सजा दूँगी। और आप जब आवेंगे तो आप को पहले सीधे वहीं आना होगा-मैं हुई तो भी, और न हुई तो भी क्योंकि तब ख़बर मिलते ही आ जाऊँगी-फिर चाहे जहाँ आप जावें! पिताजी आप को बहुत याद करते हैं। आप जो ऐसे चुपके से चले गये, उसका उन्हें खेद भी है-यद्यपि कभी कहेंगे नहीं।

मैं बहुत परिश्रम कर रही हूँ, सोचती हूँ, अगले साल फिर दक्षिण चली जाऊँ; कम-से-कम एक वर्ष के लिए और हो सका तो दो के; पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं सोच पायी हूँ। आपका परामर्श चाहती-पर आप आवेंगे तभी पूछूँगी। कब आवेंगे आप? मैं दिन गिनती रहूँगी।

आपकी ही

गौरा

भुवन दा,

बस अब आप आ जाइये वापस-मैं पापा को लिख रही हूँ कि आप आकर मसूरी रहेंगे, और एक कमरा आपके लिए तैयार कर दिया जाये-वह आपके लिए तैयार ही रहेगा, आप जब भी आवें। वह आपका ही कमरा रहेगा, भूलिएगा नहीं।

गौरा

भुवन दा,

आप फिर चुप लगा जाएँगे? जब से आप को जाना, तब से कभी नहीं सोचा कि ऐसा होगा-यों आप चिट्ठी नहीं लिखते थे पर वह इसलिए नहीं होता था कि आप कुछ नहीं बताना चाहते, वह इसीलिए होता था कि बताने की ज़रूरत नहीं, मुझे मालूम है...पर अब? आहत होकर मैंने सीख लिया कि नहीं, ऐसा भी हो सकता है कि आप मुझे बहुत-सी बातों से दूर रखना चाहें-कुछ सीखकर फिर मैंने उसे भी स्वीकार कर लिया; आप ही ने दूर हटा दिया तो मैं कौन-सा मुँह लेकर पास आने या बुलाये जाने का आग्रह करूँ? अब फिर-आप ने मुझे माफ कर दिया है, मुर्च्छा से जगा दिया है-अब फिर आप दूर ठेल कर डूब दे जाएँगे? जैसे कोई दुःस्वप्न देखकर जब जागता है तो आँख खोलते डरता है-कि न जाने क्या दीख जाये, न जाने कहीं सपने के भयावने आकार सचमुच न सामने आ जायें यद्यपि आँख खोलने में ही उनसे निस्तार है-स्वप्न की मोहावस्था से छुटकारा है-वैसी ही मैं हो रही हूँ; दुःस्वप्न से डर गयी हूँ पर प्रकाश में आँखें खोलते डर रही हूँ; धीरे-धीरे आँख खोल रही हूँ, कि प्रकाश की अभ्यस्त हो जाऊँ, फिर चारों ओर नज़र डालूँ-भुवन दा, मुझे फिर डरा न दीजिएगा, प्रकाश में मैं फिर वे भयावने आकार न देखूँ...मैं तो यह भी कर सकती हूँ कि अब आँखें मीचे ही पड़ी रहूँ, जब तक आप ही आकर न जगायें और कहें कि उठो, कहीं कोई डर नहीं है, देखो मैं हूँ...आप कहेंगे कि यह वयस्क दृष्टि नहीं है, बच्चों की-सी बात है-कह लीजिए; आपके सामने बच्चा बनते भी मुझे डर नहीं है। आपने कन्धों चढ़ाया था, सिर चढ़ाया था; मैं उसी की आदी हो गयी हूँ। आप पटक दीजिए; तब बिना रोये चल भी लूँगी, तब तक अपने-आप तो अपनी जगह से हटती नहीं।

आप कहेंगे इतरा रही है-रही हूँ न? नहीं भुवन दा, आप कहेंगे तो तुरत हट जाऊँगी, नहीं भी कहेंगे, तो जभी जानूँगी कि आप वैसा चाहते हैं, चाह सकते हैं, या उसमें आपका हित या सुख या शान्ति है, तो भी हट जाऊँगी।

आप बिलकुल स्वस्थ हैं न? मुझे शीघ्र पता दीजिए।

आपकी

गौरा

भुवन दा, आप बड़े अच्छे हैं। पिताजी का पत्र आया है कि आपकी चिट्ठी उन्हें मिली है; चलिए आपने मुझे न लिखकर उन्हें तो लिखा, अच्छा ही किया। पर उन्होंने यह भी लिखा है कि आप फिर और कहीं दूर जाने की सोच रहे हैं-यह क्या मामला है? क्या इसीलिए मुझे पत्र नहीं लिखा-कि मैं दुःखी हूँगी? पर भुवन दा, मेरे लिए कितनी भी दुःखद खबर क्यों न हो, आप सीधे मुझे लिखिए। ख़बर कैसी भी हो, उससे मुझे जितना क्लेश होगा उससे ज्यादा इस बात से कि वह मुझे सीधे आपसे नहीं मिली, औरों के जरिये मिली...मैंने तो सोचा था-पर जाने दीजिए जो सोचा था!

आज तक किस का हुआ सच स्वप्न जिसने स्वप्न देखा ?
    कल्पना के मृदुल कर से मिटा किस की भाग्य -रेखा?

(- नरेन्द्र शर्मा)

भुवन दा, मुझे आशीर्वाद दीजिए, बल दीजिए कि आप दूर हों चाहे पास, आपके स्नेह से मँजकर शुद्ध होकर मैं चमकती रहूँ; असफलता और निराशा मुझे कड़वा न बना सकें...

आप की ही

गौरा

रेखा द्वारा भुवन को :

भुवन,

यह पत्र तुम्हें अस्पताल से लिख रही हूँ-नहीं, तुम घबराना नहीं, यह नर्सिंग होम है, और मैं अब बिलकुल ठीक हूँ। और शुश्रूषा पा रही हूँ। मौसी भी साथ हैं, और कलकत्ते से डाक्टर भी साथ आये थे, वह भी यहीं है। बीच में चले गये थे, अब मुझे लिवाने फिर आये हैं-दीवाली के दिन में कलकत्ते पहुँच जाऊँगी और दीवाली घर पर ही होगी। तुम उस समय कहाँ होगे? दिया जलाओगे? और नहीं तो एक आकाश-दीप जला देना-मैं प्रेतात्मा तो नहीं हूँ-या कि हूँ भुवन?-पर मेरी शुभाशंसा तुम्हारे चारों ओर मंडराएगी और तुम पथ दिखा दोगे तो तुम्हें छू जाएगी...

हेमरेज फिर हुआ था-बहुत-उसका तात्कालिक उपचार करके डाक्टर रमेशचन्द्र मुझे यहाँ ले आये थे। कुछ ग्रोथ थी भीतर। यहाँ आपरेशन हो गया; अधिक कष्ट नहीं हुआ और तब से मैं बिलकुल स्वस्थ हूँ। दार्जिलिंग का जलवायु और यह शरद ऋतु की धूप-एक अलस, ताप-स्निग्ध तन्द्रा देह पर छायी रहती है, पर उस अलसानेपन में भी शरीर का पुनर्निर्माण हो रहा है, और बहुत दिनों के बाद उसे स्वस्थता का बोध हो रहा है-जैसे अब जब वह हिले-डुलेगा, कर्म-रत होगा, तो कर्तव्य भावना के कारण नहीं, शून्यता के भय के कारण नहीं, कुछ करने की माँग के कारण, स्फूर्ति के कारण, प्रवृत्ति के कारण...कैसी अद्भुत लगती है यह भूल गयी-सी भावना! और इसका श्रेय बहुत-कुछ डाक्टर रमेशचन्द्र को है। आपरेशन उन्होंने नहीं किया-मैंने ही उन्हें नहीं करने दिया-पर शुश्रूषा-चिकित्सा सब उनकी रही; चिकित्सा से भी बढ़कर उन्होंने एक गहरी संवेदना मुझे दी जिसमें मेरी गाँठ बँधी हुई कचोट मानो द्रव होकर धीरे-धीरे बह गयी...वह भी तुम्हारी तरह धुनी और कार्य-व्यस्त जीव हैं, तुम्हारी तरह कम बोलते हैं, पर जिससे भी मिलते हैं, उस पर उनका गहरा असर होता है-थकी, झुकी, अवसन्न चेतना को जैसे उनकी संवेदना तुरत सहारा देकर सीधा कर देती है। 'राइज़ अप एण्ड वाक' (उठ और चल) और 'वेरिली ही थ्रू अवे हिज़ क्रचेज़ एण्ड वाक्ड, एण्ड द पीप्ल मार्वेल्ड' (सचमुच उसने अपनी बैसाखियाँ फेंक दी और चलने लगा और लोग चकित हो गये। -बाइबिल)...तुम न मालूम स्वदेश कब लौटोगे, नहीं तो तुमसे कहती, उनसे मिलना-तुम्हें उनसे मिलकर खुशी होती, मुझे पूरा विश्वास है।

तुम कैसे हो भुवन? तुमने पिछले पत्र में मुझे लारेंस की जो कविता भेजी थी उसी से अनुमान लगाऊँ तुम्हारी मनःस्थिति का तो वह स्वीकार नहीं होता-नहीं भुवन, दर्द को, परिताप को जी से चिपटा कर मत बैठो-देखो, यह तुमसे मैं कहती हूँ, मैं! एक निग्रो कविता है :

आइ रिटर्न द बिटरनेस
    ह्विच यू गेव टू मी ;
    ह्वेन आइ वांटेड लव्लिनेस
    टैंटेलैंट एण्ड फ़्री।
    आइ रिटर्न द बिटरनेस
    इट इज वाश्ड बाइ टीअर्स
    नाउ इट इज़ लव्लिनेस।
    गार्निश्ड थ्रू द यीअर्स।
    आइ रिटर्न इट विद लव्लिनेस
    हैविंग मेड इट सो :
    फ़ार आइ वोर द बिटरनेस
    फ्राम इट लांग ऐगो।

(मैं लौटाती हूँ वह कटुता जो तुमने मुझे दी थी , जबकि मैं चाहती थी सौन्दर्य, मुक्त और दोलायमान।

मैं लौटाती हूँ वह कटुता ; अब वह आँसुओं से धुल गयी है-अब वह वर्षों बीन-बीन कर संग्रह किया हुआ सौन्दर्य है।

मैं उसे लौटाती हूँ सौन्दर्य के रूप में , जो मैंने बनाया है, क्योंकि कटुता तो उसमें से मैंने कब की धो डाली।)

इसके पहले पद को उलहना न समझना, सार की बात अन्तिम पद में है : हम अपने भीतर पका कर व्यथा को सौन्दर्य बनाते हैं-यही सृष्टि का रहस्य है, बल्कि यह तुमने मुझे बताया था! पकाने में समय बीत जाता है, हम बूढ़े भी हो जा सकते हैं, परास्त भी हो सकते हैं, हमारी आकांक्षाएँ अधूरी भी रह जा सकती हैं-पर उस सबका कोई महत्त्व नहीं है, बूढ़े होने का नहीं, हारने का नहीं-महत्त्व है उस आन्तरिक शान्ति का जो पकने में मिलती है, उस तन्मयता का...मैं तो यही अनुभव करती हूँ, तुम मालूम नहीं ऐसा करते हो कि नहीं, पर उस गम्भीर शान्ति का बीज मुझमें तुम्हीं ने बोया था, और उसकी जड़ें निरन्तर गहरी होती जा रही हैं। मैं शान्त हूँ; जो भावनाएँ मुझे तोड़ती-मरोड़ती, चिथड़े करके रख देती थी, अब मुझे छूती भी नहीं। और यह नहीं कि मैं हृदय-हीन हो गयी हूँ, संवेदनशून्य हो गयी हूँ-नहीं, मैं अधिक संवेदनशील भी हूँ, पर अधिक अनासक्त भी...

लेकिन मैं बहुत बक रही हूँ-अपने बारे में बहुत बातें कर रही हूँ! भुवन, एक बार जड़ता की सीमा को छू आकर ही जीवन वास्तव में शुरू होता है; मुझे लगता है कि तुम भी उस अवस्था में से गुज़र रहे हो...एक बार अपने को मर जाने दो-अपनी ही राख में से फिर तुम उदित होगे-परिशुद्ध होकर, कान्तिवान्...

यह सब तुम्हें दम्भोक्ति या प्रलाप लगे तो ध्यान कर लेना कि मैं नर्सिंग होम की आराम-कुर्सी से लिख रही हूँ-ए जैबरिंग ओल्ड सिक हैग!*

मेरा हार्दिक स्नेह लो।

तुम्हारी

रेखा

(* एक बड़बड़ाती हुई बीमार बुढ़िया!)

भुवन,

तुम्हारी चिट्ठी मिली है। मैं कृतज्ञ हूँ। शायद सात महीने बाद तुम्हारी यह चिट्ठी है, लेकिन इसे पढ़कर मुझे लगा कि हम दोनों की मानसिक प्रगति लगभग समान्तर होती रही है। फिर मैंने तुम्हारे पिछले दो-चार पत्र भी निकाल कर पढ़े, और उससे यह भावना और भी पुष्ट हो गयी। समान सोचते हैं तो दूर नहीं हैं; इतना ही नहीं, मुझमें जो परिवर्तन-ठीक परिवर्तन वह नहीं है, विकास, प्रस्फुटन, भीतरी और घटना-जन्य सम्भावनाओं का स्फुरण-हो रहा है उसे लक्ष्य करके तुम्हारे बारे में आश्वस्त भी हो सकती हूँ...मैंने एक बार प्रतिज्ञा करनी चाही थी कि अपने कारण तुम्हारा कोई अहित नहीं होने दूँगी; फिर सहसा इस डर से रुक गयी थी कि क्या जाने, चाह कर भी इसे निभा पाऊँगी कि नहीं; इसलिए यही शपथ ली थी कि जहाँ तक हो सकेगा नहीं होने दूँगी...अब जानती हूँ कि वह प्रतिज्ञा शायद टूटी नहीं-अहित बिलकुल नहीं हुआ यह तो नहीं कह सकती, पर जहाँ तक सकी-नहीं, जितना हुआ, उसे घातक होने से शायद बचा सकी हूँ और मेरी आशाएँ तुममें जी सकेंगी, सुफल हो सकेंगी...

तुम भटक रहे हो, भटकोगे, और भटकना चाहते हो, यायावार हो जाना चाहते हो। चाहते हो तो क्यों नहीं हो जाते? भुवन, मैं तो स्त्री हूँ, और मेरा स्वास्थ्य भी चौपट ही है, लेकिन मैंने भी कई बार चाहा है यायावार होकर बन्धन-हीन विचरना। पर जहाँ, जैसे, जैसी हूँ, मैं जान गयी हूँ कि वह नहीं है मेरे लिए, कि कभी-न-कभी-और शायद जल्दी ही-मुझे कहीं टिक जाना होगा; स्थिर हो जाना होगा, मान लेना होगा कि पड़ाव आ गया-इसलिए नहीं कि मेरी आकांक्षा की दौड़ वहीं तक थी, इसलिए कि मेरी सकत की दौड़ आगे नहीं है...पर तुम, तुम घूमो, महाराज, मुक्त विचरण करो, प्यार दो और पाओ, सौन्दर्य का सर्जन करो, सुखी होओ, तुम्हारा कल्याण हो...

मैं बिलकुल ठीक हूँ; काम मैंने फिर आरम्भ कर दिया है। डा. रमेशचन्द्र के आग्रह और प्रयत्न से मैं अस्पताल से हटकर केवल व्यवस्था के काम में लग गयी हूँ : उनका आग्रह था कि मैं रोग और रोगियों के वातावरण में न रहूँ। और मैं अब अनुभव कर रही हूँ कि ठीक ही था-उसका मेरे मन पर निरन्तर बोझ रहता था; और इस व्यवस्था के काम में बढ़ते हुए उत्तरदायित्व से कुछ प्रेरणा भी मिलती है, कुछ सान्त्वना भी।

उधर युद्ध के बादल घिर रहे हैं। तुम कब तक उधर रहोगे, भुवन? अब तो फिर जाड़े आने लगे! कभी पढ़ा था, जाड़े आते हैं तो वसन्त भी दूर नहीं है-पर अब मालूम होता है कि यह बात भी किसी 'इनफ़ीरियर फिलासफ़र' की कही हुई है, जिससे बचना चाहिए।

तुम्हारी

रेखा

भुवन द्वारा गौरा को :

गौरा,

खबर तुमने सुनी? ज़रूर सुनी होगी! बड़े धड़ल्ले के साथ जापान युद्ध में कूद आया। और एक ही चोट में उसने अमेरिका को कितना बड़ा आघात पहुँचाया है। देश में बहुत होंगे जो इस पर खुश हो रहे होंगे-चालीस-एक बरस पहले जब जापान ने रूस को हरा दिया था और यूरोप चकित होकर देखता रह गया था कि एक छोटे-से एशियाई द्वीप-राज्य ने एक यूरोपीय साम्राज्य-शक्ति को पछाड़ दिया, तब जो एशियाई गर्व जागा था, उसे आज नया प्रोत्साहन मिलेगा। पर उसमें और इस में जो अन्तर है, उसकी लोग उपेक्षा कर पाएँगे : तब गर्व करना उचित था, क्योंकि एक दबी हुई जाति ने सिर उठाया था और उसमें दूसरी उत्पीड़ित जातियों के लिए आशा का संकेत था; पर अब? अब जापान भी एक उत्पीड़क शक्ति है, साम्राज्य भी और साम्राज्यवादी भी-और आज उसको बढ़ावा देना, एक नयी दासता का अभिनन्दन इस आधार पर करना है कि वह दासता यूरोपीय की नहीं, एशियाई प्रभु की होगी। कितना घातक हो सकता है यह तर्क! परदेशी गुलामी से स्वदेशी अत्याचार अच्छा है, यह एक बात है, यह मानी जा सकती है; पर क्या एशियाई नाम जापान को यूरोप की अपेक्षा भारत के अधिक निकट ले आता है, जापानी को यूरोपीय की अपेक्षा अधिक अपना बना देता है? जाति की भावना गलत है, श्रेष्ठत्व-भावना हो तो और भी गलत-हिटलर का आर्यत्व का दावा दम्भ ही नहीं, मानवता के साथ विश्वासघात है; पर अपनापे या सम्पर्क की बात कहनी हो तो मानना होगा कि यूरोप ही हमारे अधिक निकट है, आर्यत्व के नाते नहीं, सांस्कृतिक परम्परा और विनिमय के कारण, आचार-विचार, आदर्श-साधना और जीवन-परिपाटी की आधारभूत एकता के कारण...यह हमारे भारत के एक स्थानीय प्रश्न (विश्व की भूमिका में हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न को स्थानीय ही मानना होगा) से उत्पन्न कटुता के कारण है कि हम नहीं देख सकते कि न केवल यूरोप के बल्कि निकटतर मुस्लिम देशों के-'मध्यपूर्व' के-साथ हमारा कितना घनिष्ट सांस्कृतिक सम्बन्ध न केवल रहा है बल्कि आज भी है, और हम चीन से, और चीन की मारफ़त जापान से सांस्कृतिक आदान-प्रदान का नाता जोड़ते हैं। फ़ाह्यान और यूवान च्वांग थे, ठीक है; पर अतीत का ऐतिहासिक सम्बन्ध आज का सजीव सम्बन्ध नहीं भी हो सकता है; और केवल मूर्ति-कला को लेकर हम कहाँ तक दौड़े जाएँगे, धर्म और दर्शन, गणित और विज्ञान, आचार और विचार के सम्बन्धों की अनदेखी करके? और हाँ, अत्याचार और उत्पीड़न, दास-दासियों के क्रय-विक्रय, लूट और व्यापार और धर्षण और विवाह के सम्बन्धों की, रक्त के, रीति-रस्म के, कला और साहित्य के, भोजन-वसन के, भाषा के, नामों के मिश्रण की अनदेखी करके? हम किसी देश का, किसी देश की जनता का, अहित नहीं चाहते, पर एशियाई नाम को लेकर जापानी साम्राज्य-सत्ता का अनुमोदन करना या उसके प्रसार को उदासीन भाव से देखना, खण्ड के नाम पर सम्पूर्ण को डुबा देना है, अंग्रेजी कहावत के अनुसार अपने मुँह से लड़ कर अपनी नाक काट लेना है; मानवता के साथ उतना ही बड़ा विश्वासघात करना है जितना उन्होंने किया था जो मुसोलीनी द्वारा अबीसीनिया या हिटलर द्वारा चेकोस्लोवाकिया के ग्रास के प्रति उदासीन थे...

पर यह सब मैं क्या लिख रहा हूँ? कहना यह चाहता हूँ कि इस खबर ने मुझे झकझोर दिया है। यहाँ काम भी अब आगे नहीं हो सकता-बड़ी तेज़ी से फ़ौजी संगठन हो रहा है और और सब काम रुक गया है। हम तुरत यहाँ से जा रहे हैं-आजकल में शायद वायुयान से सब सामान समेत सिंगापुर ले जायें जाएँगे, वहाँ से आगे जैसा हो। मैं भारतवर्ष लौट रहा हूँ। क्रिसमस से पहले नहीं तो मासान्त तक अवश्य पहुँच जाऊँगा। यह नहीं कह सकता अभी कि कलकत्ते पहुँचूँगा, या कोलम्बो, या कहाँ-जैसा प्रबन्ध हो जाए। पक्का पता लगते ही तार से तुम्हें सूचित करुँगा। मेरे मन में अनेक विचार उठ रहे हैं-अनेक प्रकार के इरादे-पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं है, उस बारे में अभी नहीं लिखूँगा; पर सोचता हूँ, तुमसे मिलकर बात-चीत करूँ, तो विचार भी कुछ स्पष्ट हों, और आगे का मार्ग भी कुछ दीखे। गौरा, अगर मैं सीधा तुम्हारे पास न आ सका, और तुम्हें मैंने मिलने के लिए बुलाया, तो आ सकोगी न-आओगी न? या कि रूठ जाओगी? तुमने एक पत्र में लिखा था, ''आप बुलावें, उतना मान मेरा नहीं है'',-तुम क्या जानो कि कितना है! पर वह जो हो, उसकी बात मिलने पर; अभी इतना ही कि शायद बुलाऊँ ही-तो आना, क्षमामयी गौरा!

जल्दी में-सहसा बहुत-सा काम करने को हो गया है!

तुम्हारा

भुवन

गौरा के नाम भुवन का केबल :

सुरक्षित हूँ लौट रहा हूँ सबको सूचित कर दो निश्चित स्थान तारीख अनन्तर सूचित करूँगा।

भुवन

गौरा के नाम भुवन का केबल :

सिंगापुर सकुशल पहुँचा। आशा है कल कलकत्ता प्रस्थान पहुँचने की अनुमानित तिथि 23 दिसम्बर सको तो मिलो पता मारफत कुक़ या डच् एयरलाइन।

भुवन

गौरा का जवाबी तार, एक प्रति टामस कुक, नकल के. एल. एम. डच लाइन कलकत्ता :

सन्देश डा. भुवन के लिए अनुमानित पहुँच 23 दिसम्बर कृपया पहुँचा दीजिए सन्देश आरम्भ मसूरी प्रतीक्षा करती हूँ सीधे आइये असम्भव हो तो तार दें कहाँ मिलूँ आऊँगी मिलना आवश्यकीय स्नेह पिताजी के आशीर्वाद गौरा सन्देश समाप्त पहुँचने पर या देरी होने पर तार से सूचित कीजिए।

मिस नाथ सुकेत मसूरी

गौरा का पत्र, भुवन के नाम, उपर्युक्त दोनों पतों पर :

तो आप आ रहे हैं, भुवन दा! मैंने तार दिया है कि आप मसूरी आ जाइये। पापा का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है और मैं उनके पास हूँ। फिर भी आती ही-चिन्ता की कोई बात नहीं है-पर आप 23 दिसम्बर को पहुँचते हैं तो कालेज तो तुरत जाना नहीं होगा, इसलिए यहाँ आ सकेंगे यह मैंने मान लिया है। यहाँ आप को भी अच्छा लगेगा, पापा को भी; और मैं भी आपकी सेवा कर सकूँगी-कलकत्ता तो कैसी जगह है...न जाने। पर अगर कोई कठिनाई हुई तो मैं तुरत आऊँगी-कलकत्ते या और जहाँ आप कहें। मैं तैयार बैठूँगी-आप का तार आते ही चल दूँगी। भुवन दा, आप आ रहे हैं, सोच कर मैं पागल हुई जा रही हूँ-इतनी कि उस दुर्घटना को ही धन्य कह देती जिसके कारण आप को जावा छोड़ना पड़ा-पर नहीं, इतना अविवेक नहीं!

ओ मेरे सुख धीरे -धीरे गा अपना मधु-राग
    ऊँचे स्वर से सोयी पीड़ा जावे कहीं न जाग ...'

आपकी, आप ही की

गौरा


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