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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 5
नदी के द्वीप

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम उपसंहार पीछे    

'वहाँ', 'बर्मा फ्रंट में कहीं पर', भौगोलिक अनिश्चितता की धुन्ध में खोकर भुवन जब-तब गौरा को छोटे-छोटे पत्र लिखता रहा था। लेकिन क्रमशः भौगोलिक अनिश्चितता के कृत्रिम वातावरण ने उसे छा लिया था, यह जानते हुए भी कि वह कहाँ है, वह मानो कहीं नहीं रहा था। फिर दो महीने तक उसने कोई पत्र नहीं लिखा।

लेकिन अक्टूबर 1942 में सहसा उसने पाया कि अपने बाँस के घर में वह बिलकुल अकेला है। बाँस के उन घरों का वह आदी था-कीचड़ में खड़ी बाँस की चटाई की दीवारें कीचड़ पर बिछी बाँस की चटाई का फ़र्श, बाँस की चटाई की टट्टियों से ढँकी खिड़कियाँ, बाँस की खाट पर बाँस की चटाइयों के पलंग, बाँस की चटाई से ढँके चौखटे की मेजें॓...और जंगल में अकेलापन भी कोई नया अनुभव नहीं था-यों तो उस भीड़ में रहकर सभी अपने भीतर के अकेलेपन में खिंच जाने के आदी थे, पर उसके अलावा शारीरिक अकेलापन भी बहुधा हो जाता था। पर इस अकेलेपन में कुछ विशेष था। उसका घर जो उसका दफ़्तर भी था, वास्तव में तीन अफ़सरों का संयुक्त घर-दफ़्तर था, जंगल में औरों से अलग और कँटीले तारों से घिरा हुआ : वहाँ पर नाना प्रकार के रेडियो और विद्युत् यन्त्रों से घिरे हुए वे तीनों निरन्तर प्रयोग करते थे, अनुलेखों का संग्रह करते थे, और केन्द्रित रेडियो-रश्मियों द्वारा अदृश्य चीज़ों को पहचानने के नये आविष्कार को सम्पूर्ण सफल और व्यावहारिक बनाने के काम में योग देते थे। पर उस दिन सवेरे उसके दोनों साथी शिविर में गये थे और अब तक लौटे नहीं थे; उधर लड़ाई की आवाज़ भी उसने सुनी थी; निकट ही कहीं जापानी हैं यह ज्ञात था और आक्रमण की सम्भावना भी की जा रही थी। क्या हुआ? वह नहीं जानता था। क्या होगा, यह भी नहीं। सम्भव है, रात में उठकर उसे और कुछ दूर पर बने दूसरे वासे में रहने वाले आर्डरली-अफ़सर को एकाएक सब यन्त्र वगैरह विस्फोटक से उड़ाकर जंगल में निकल जाना पड़े, अकेले-अकेले; सम्भव है वह भी अवसर न मिले, पकड़े ही जायें; और-यह भी सम्भव है कि शाम को उसके साथी कुछ अच्छा समाचार लेकर लौट आवें, अख़बार और डाक ले आवें-अज़ब होता है युद्ध-मुख का भाई-चारा, जिसमें अज़नबी भी एक-दूसरे को अपने अन्तरंग पत्र सुनाते हैं...

भुवन की इच्छा हुई कि पत्र लिखे। पर वह बैठा नहीं, उसे टालने के लिए इधर-उधर यन्त्रों को देखता हुआ घूमने लगा। पर नहीं, कहीं कुछ करने को नहीं था। सहसा उसने एक यन्त्र के सामने पड़ी हुई कापी निकाली, क्षण-भर उसके चार-खाने पन्नों को देखता रहा, फिर पेन्सिल से द्रुत गति से उन्हें रंगने लगा।

गौरा,

फिर दो महीने से मैंने तुम्हें पत्र नहीं लिखा। जहाँ हूँ, वहाँ पत्र भी अवास्तव लगते हैं-केवल मन के भीतर जो है वही वास्तव लगता है। तुम ने एक बार शब्द को अधूरा बताया था उच्चारण की मर्यादा के कारण; पर सभी कुछ अधूरा है जिसके साथ गोचर होने की शर्त है-सम्पूर्ण वही है जो बिना इन्द्रियों के माध्यम के ज्ञात है...

आज भी पत्र लिखने लगा हूँ तो यथार्थता कुछ अधिक नहीं है, कदाचित् और भी कम है, क्योंकि आज बिलकुल भरोसा नहीं है कि यह चिट्ठी डाक में पड़ेगी या नहीं, कभी जाएगी या नहीं। फिर भी लिख रहा हूँ, यह एक तो मानव की सहज प्रतिकूलता है; दूसरे इसका एक तात्कालिक कारण है। मुझे कुछ कहना है-कुछ पूछना है। और जब पूछ लूँगा तब तुम यह भी जान लोगी कि दो महीने मैं चुप क्यों रहा।

गौरा, मैं लौटकर आऊँगा या नहीं, क्या पता; कब आऊँगा यह भी कौन जाने। पर अगर आया-आने के साथ यह 'अगर' न होता तो शायद अब भी मैं यह पत्र न लिख पाता!-अगर आया तो क्या तुम मुझसे विवाह करोगी? तुम्हें जानते हुए मैं जानता हूँ कि तुम स्वतन्त्र निर्णय करने के योग्य होते हुए भी चाहोगी कि मैं तुम्हारे पिता से पूछूँ; वह मैं पूछूँगा जब पूछने का समय होगा, अभी तुम्हीं से जानना चाहता हूँ कि उनसे पूछूँ भी या नहीं...

लिखते-लिखते भुवन रुक गया। गौरा के पिता का चित्र उसके सामने आ गया, फिर मसूरी के घर का, फिर गौरा के साथ बिताये हुए उस एक सप्ताह का, अपनी आत्मस्वीकृति का; क्षण-भर के लिए वह केशों का मेघ उसकी आँखों के आगे छा गया, फिर उसमें झलकती हुई चीड़ की सुगन्धित आग : ''गौरा, यह आग तो तुम्हारी है''...वह फिर लिखने लग गया और भी द्रुत गति से; चार-पाँच पृष्ठ लिखकर वह फिर रुका, पेंसिल घिसकर उसकी नोक निकाली, और उसे हाथ में साधे हुए फिर चित्र देखने लगा।

व्यक्ति के सभी कर्मों का बीज सभी दूसरे कर्मों में निहित है; कार्य-कारण-सम्बन्धों की खोज और उनका निरूपण एक वैज्ञानिक समय है, नहीं तो सभी कार्य कारण हैं और उनकी यह परस्परता व्यक्ति के जीवन-वृत्त में ही बँधी नहीं है, बाहर तक फैली है। सब कुछ है, क्योंकि और सब कुछ है...फिर भी, हम लोग काल के बिन्दु चुनते हैं जहाँ से घटनाओं का आरम्भ मानते हैं-वह भी एक ऐतिहासिक समय है...गौरा के प्रति उसके जो भाव हैं, जो भाव थे-क्या वे अलग हैं?

''समर्पण है तो वह न बाँधता है, न अपने को बद्ध अनुभव करता है; केवल एक व्यापक कृतज्ञता मन में भर जाती है कि तुम हो, कि मैं हूँ। एक-दूसरे को पहचानने के बाद आश्चर्य यह नहीं है कि प्रेम है, कि हम प्यार करते हैं; आश्चर्य यही है कि हम हैं; होना ही एक नये प्रकार का संयुक्त होना है। मैं पहले भी था, अब भी हूँ; पर क्या दोनों 'होने' एक हैं? हाँ, पर नहीं...सोचता हूँ, यह परिवर्तन कब से हुआ, तो नहीं जानता; लगता है कि जो हुआ, वह पहले भी था, नहीं तो हुआ कैसे? पर वह परिवर्तन चेतना में कब आया, यह जानता हूँ...तुम कह सकती हो कब? तुम्हें अचम्भा होगा। एक वर्ष पहले, जब लम्बी चुप्पी के बाद मैंने जावा से तुम्हें दो-तीन पत्र लिखे थे, तब जब मैं अस्वस्थ था और तुम्हें 'होम-सिक' होने की बात लिखी थी...तभी मैंने जाना था कि मैं तुम से भाग कर वहाँ गया था, तुम्हीं से; और यह जानकर आसपास फैली विशालता में खो गया था और फिर मैंने जाना था कि वह विशालता भी तुम हो। तुमने मुझे घेर लिया था, छिपा लिया था; और उसमें एक सान्त्वना थी, एक मरहम था...सहसा मुझे लगा कि उसी विशालता के आगे हथियार डालकर-अपने सब कवच-बन्धन-रक्षण छोड़कर मैं स्वस्थ हो जाऊँगा, मेरे क्षत भर जाएँगे...मैं कहता हूँ तभी, पर 'तभी' का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अगर मैं पहले नहीं जानता था, तो भागा क्यों था? 'शब्द, शब्द, शब्द'-शब्द अधूरे हैं, सभी कुछ अधूरा है...और इतिहास तो बिलकुल ही अधूरा है...''

भुवन उठकर टहलने लगा। सब कुछ अधूरा है, और ज्यों-ज्यों वह आगे पूरेपन की ओर बढ़ता है, नयी अपूर्णताएँ भी उसके आगे स्पष्ट हो जाती हैं...कितना बड़ा है जीवन, कितना विस्तृत, कितना गहरा, कितना प्रवहमान; और उसमें व्यक्ति की ये छोटी-छोटी इकाइयाँ-प्रवाह से अलग जो कोई अस्तित्व नहीं रखतीं, कोई अर्थ नहीं रखतीं, फिर भी सम्पूर्ण हैं, स्वायत्त हैं, अद्वितीय हैं, और स्वतःप्रमाण हैं, क्योंकि अन्ततोगत्वा आत्मानुशासित हैं, अपने आगे उत्तरदायी हैं; स्वर्ग और नरक, पुण्य और पाप, दण्ड और पुरस्कार, शान्ति और तुष्टि, ये सब बाहर हैं तो केवल समय हैं, सत्य तभी हैं जब भीतर से उद्भूत हों...

वह फिर लिखने बैठ गया :

''वह रूपक मेरा नहीं है, पर बार-बार मुझे याद आता है और मैं पाता हूँ कि उस में नया अभिप्राय है : हम सब नदी के द्वीप हैं, द्वीप से द्वीप तक सेतु हैं। सेतु दोनों ओर से पैरों के नीचे रौंदा जाता है, फिर भी वह दोनों को मिलाता है, एक करता है...गौरा, मैं तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाता हूँ-अनुरोध के हाथ; क्या तुम भी अपने हाथ मेरी ओर बढ़ाओगी-वरद हाथ; कि इस प्रकार हम एक सेतु बन सकें जिस पर ईश्वर अगर है तो उसका आसन है?''

वह फिर उठकर टहलने लगा। उस बँगला गीत के बोल उसके मन में गूँज गये जो उसने कुछ दिन पहले वहीं सुना-'तोमार-आमार एइ विरहेर अन्तराल कत आर सेतु बांधि सुरे-सुरे ताल-ताल?' पहले वह पत्र की ओर बढ़ा कि यह भी गौरा को लिख दे, लेकिन पत्र पर झुककर उसे लगा कि नहीं, पत्र इसके बिना ही सम्पूर्ण है; और वह फिर चक्कर काटने लगा। फिर एक चक्कर उसने यन्त्रों की ओर लगाया। सहसा उसका ध्यान केन्द्रित हो आया; थोड़ी देर बाद उसने दूर विमानों की घरघराहट सुनी-एक-साथ कई विमानों की-और विमान-भंजकों की पटापट...यह क्या है? आक्रमण कि प्रत्याक्रमण? अभी थोड़ी देर में वह क्या कर रहा होगा-यन्त्रों की सँभाल या कि विस्फोटकों की-? अभी उसे खबर मिलेगी-फ़ोन से या रेडियो से-

खिड़की के आगे खड़े होकर बाँस की टट्टी को उसने पूरा हटा दिया। ढलती रोशनी में उसने देखा, उसके सहयोगी आ रहे हैं। उनकी चाल देख कर अपने प्रश्न का उत्तर उसने जान लिया : कोई चिन्ता की बात नहीं है।

फिर वह पूर्ववत् टहलने लगा।

थोड़ी देर में उसके साथी वहाँ पहुँच जाएँगे; यह जो अप्रत्याशित एकान्त उसे मिला, उसका अन्त हो जाएगा। और कल के-कल क्यों, अभी थोड़ी देर बाद के बारे में अनिश्चय ने जो मुक्ति उसे दे दी थी, उसका भी अन्त हो जाएगा। यों जीवन में किस बात का भरोसा है, पर तत्काल यह मानने का कोई कारण नहीं रहेगा कि कल का भरोसा नहीं है-कि कल का सूर्योदय देखने की आशा रखना मूर्खता है।

भुवन ने अनुद्विग्न भाव से चिट्ठी के पन्ने समेटे, उनके कोने और सिरे बराबर-बराबर मिलाये, और फिर सहसा उन्हें फाड़ डाला। फाड़ कर स्टोव के पास की एक काली ट्रे में रख दिया जहाँ प्रायः ही वह और उसके साथी जलाने से पहले अपने कागज़ रखा करते हैं-अभी वह उन्हें जला देगा।

कल-अब तो यह मान लिया जा सकता है कि कल होगा!-वह गौरा को अपने कुशल-समाचार का और पत्र लिख देगा। उससे अधिक कुछ लिखना क्यों आवश्यक है? दो महीने के अन्दर उसने अगर जान लिया है कि हाँ, वह गौरा से यह प्रश्न पूछेगा, प्रश्न पूछने के और उसका उत्तर पाने के लिए अपने को तैयार कर लिया है, तो उतना ही यथेष्ट है। उससे आगे-जब समय आएगा तो प्रश्न का पूछा जाना भी अपने आप हो जाएगा-उत्तर भी अपने आप मिल जाएगा! तब तक-गहरी अनुभूतियाँ संचयधर्मा ही होती हैं; उनके आन्तरिक दबाव का संचय इतिहासों को बदल देता है, इतिहास के मलबे को साफ कर देता है-नयी नींवें खोद देता, ईंटें पका देता है...

एक बार फिर भुवन खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया। अब शायद दो-तीन मिनट ही उसके पास हैं : और फिर साँझ हो जाएगी, मच्छरों से रक्षा की कार्रवाई शुरू हो जाएगी-यन्त्र फिर उसे जकड़ लेगा। मानो चक्की के पाटों के बीच दाने को क्षण-भर की स्वतन्त्रता मिल गयी थी-किन्तु कितना मूल्यवान् हो सकता है ऐसा क्षण-सम्पर्क का क्षण-

मूल्यवान् क्षण? मूल्यवान् किसके लिए? सम्पर्क का क्षण? किसके साथ सम्पर्क? हाँ, मूल्यवान्-नश्वर किन्तु मूल्यवान् जिनका सम्पर्क है सभी के लिए चिरन्तन और मूल्यवान्; सम्पृक्त-जो प्रतीक्षा करते हैं उनसे सम्पृक्त, वे चाहे बोलें या न बोलें; प्रश्न से सम्पृक्त और उसके उत्तर से सम्पृक्त-प्रश्न चाहे न भी पूछा जाये, उत्तर चाहे न भी दिया जाये। मूल्यवान् और सम्पृक्त क्षण क्यों कि प्रतीक्षा के क्षण-वह प्रतीक्षा चाहे कितनी लम्बी हो, कर्म की इस अजस्र-प्रवाहिनी नदी से भी लम्बी; भुवन प्रतीक्षा करेगा, जैसे कि, निस्सन्देह, गौरा भी प्रतीक्षा करेगी...क्योंकि प्रतीक्षाएँ भी अजस्र, अनाद्यन्त काल की नदी में स्थिर, शिलित समय के द्वीप हैं।


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