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कविता

अज्ञेय की कविता
ए. अरविंदाक्षन

अनुक्रम

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

किरीटि तरु की तरह
सबके लिए बसेरा बनकर
हवा में झूलती रहती है
एक प्रेम-तरु है वह।

 


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