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कविता

नील विस्तार
ए. अरविंदाक्षन


जब असंख्य जल पक्षी
एक साथ आकाश को भेदकर
जल की गोदी में उतरते हैं
मछलियाँ उन्मादित होती हैं
मृत्युभय से।
नील विस्तार जल का
जीवन-मृत्यु के बीच
अति गहन
अति गह्वर
अन्दर ही अन्दर आंदोलित
नील से श्याम
श्याम से नील
अन्तर्प्रवहित।

 


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