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कहानी

सती
अरविंद कुमार सिंह


दरवाजे की ओट से झाँकती उसकी आँखें देख हमारी बाँछें खिल उठीं। पढ़ाई-लिखाई और दूसरे काम-धाम से हमारा मन उचट गया था। हम ताक में थे कि कैसे बिल्लियों जैसी उन आँखों के साथ हो लें। भाई पर सख्त नजर रखी जा रही थी, उस साल उनकी हाईस्कूल की पढ़ाई थी। वे शरारती तो माने ही जाते थे। भाई ने इशारा किया। मेरे नजरंदाज करने पर वे मुझे मनाने लगे। उनकी इच्छा का मुझे चुपचाप पालन करना पड़ा - झाँकनेवाले लड़के को बाग की तरफ ले गया। पीछे भाई भी आ गए।

उस लड़के का नाम नक्कू था। यह नाम उसे जन्म से ही मिला होगा। उसकी नाक पैदाइशी जो आधी थी। हमारे घर से नक्कू को और भी कुछ उपनाम मिले थे। ये नाम उसे और उसके घर को नहीं, हमारे लोगों को मन बहलानेवाली हँसी और सुकून देते थे। 'हंडिया' कहने से उसका निकला हुआ पेट सामने दिखाई देता। 'नकबहने' से होठ तक झूलती नाक। कलुआ और नट्टू उसके रंग और कद को जाहिर करते हुए नाम थे। हाथ-पैर पतले होने से माँ उसे सींका कहतीं। वह बतातीं, सींका यानी नक्कू अब ज्यादा दिन नहीं जिएगा, उसे सूखा रोग है। हालाँकि वह हमारे ही हलवाहे का भतीजा था। उसकी माँ बगैर नागा हमारे घर जानवरों का गोबर उठाने आती। फिर भी, माँ उन दोनों से घृणा करती थी।

हम तीनों बाग में पहुँचे। भाई ने आम की एक ऊँची डाल नक्कू को पकड़ा दी और खुद अलग हटकर खड़े हो गए। नक्कू का सिर चकरा गया। फटी-फटी आँखों से वह जमीन को ताकने लगा। डर के मारे चेहरा काठ हो गया। वह लाश की तरह अधर में लटका हुआ था और हम मजा लेते हुए शोर मचा रहे थे, फिकरे कस रहे थे। हम उसके गिरने की प्रतीक्षा कर रहे थे। भाई के सब्र का बाँध जल्दी टूट गया। तब उन्होंने डाल हिलाना शुरू कर दिया। 'धम्म' की आवाज हुई और जक्कू जमीन पर आ गिरा। मगर वह फिर भी नहीं रोया। जबकि हमारी हँसी थक कर बेजान हो गई।

ऐसी घटनाएँ अक्सर घटती ही थीं और यह हमारा शगल हो गया था। कई बार हममें जालिमाना गुस्सा उतर आता। हम उसके बदन में काँटे चुभाते, आँखों में हरे नींबू का रस निचोड़ देते। कान ऐंठते। कभी-कभी मुर्गा भी बनाते। इसके बाद भी हम हार जाते। उसमें सिसकियाँ तक न उभरतीं, न ही आँसू आते।

भाई ने मान लिया था कि यह पिछले जनम में घाघ चोर था, पुलिस पीटते-पीटते थक जाती थी, फिर भी वह जुबान नहीं खोलता था। नक्कू अपने बारे में खुद भी बड़े चाव से सुनता।

उसकी माँ मेरे भाई से चिढ़ती थी। उन्हें शैतान और बदमाश कहती थी। भाई नक्कू को पीट कर बदला ले लेते थे। उस समय उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया होता। वे तय करते, एक दिन साले को रुला कर ही रहूँगा। हमारी हरकत को माँ अनदेखा कर जातीं। माँ सोचती थी कि तंग आ कर वह एक दिन घर आना छोड़ देगा। लेकिन नक्कू को हमारे घर से बची-खुची बासी रोटियाँ मिलती थीं। फटे कपड़े मिलते थे। पुराने-टूटे खिलौने और हमारा साथ। फिर उसका आना भला कैसे रुकता।

गर्मी की एक सुनसान दुपहरी। बाग का एकांत। भाई ने पके आम की डाल हिलाई थी। अब आम को चूस कर हम दोनों गुठलियाँ खाट के नीचे डालते जाते थे। तभी किसी के आने की आहट हुई। पेड़ के पीछे से झाँकती वही दो आँखें दिखाई दीं। ये वही आँखें थीं जो हमें हसरत से ताकतीं और हम समान रूप से उसे सताने में मजा लेते। भाई मुस्करा कर मुझे देख रहे थे। मैंने उसे नजदीक आने का इशारा किया। वह नहीं आया। उसकी लुका-छिपी कुछ देर तक चलती रही।

भाई ने आम खाना छोड़ पेड़ की तरफ निगाहें टिका दीं। बिल्लियोंवाली आँखें जैसे ही दिखीं, भाई का अचूक निशाना नक्कू के मुँह पर था। वह एक खटैले पेड़ का ज्यादा पका हुआ आम था। जो उसके चेहरे पर छितरा गया था। हँसते हुए मैं पेड़ तक गया, नक्कू को घसीटते हुए मैंने उसे भाई के सामने ला कर खड़ा कर दिया।

वह सिर झुकाए जैसे हमारी अगली सजा की प्रतीक्षा करने लगा।

'भगा इसे, अब पेट खराब हुआ।' भाई ने दिखावटी हिकारत से कहा।

भाई की आशंका में माँ का डर दिखाई दिया।

पहले मैंने आम की गुठलियों की तरफ देखा, फिर आम से भरी बाल्टी को। कुछ भी छिपाना अब व्यर्थ था। नक्कू की निगाहें उन्हीं पर ठहरी थीं।

इन्हीं निगाहों में माँ ने एक दिन इनसानी भूख और 'हाय' देखी थी। फिर घृणा की गाँठ हमेशा के लिए बाँध ली। तभी से हम माँ की चिंता, हिदायत और डाँट सुनते आ रहे थे। खाते समय हमें नक्कू और उसकी माँ की निगाहों से बचना होता। कभी घर के अंदर उसका अचानक आना होता और हम खाते रहते तो अपनी-अपनी थाली उठा ओसारे या आँगन से कमरे के एकांत कोने में भागते।

हमारी हरकत पर माँ एक बार परेशानी में पड़ गई थीं। पड़ोस की एक बुआ घर में आईं और हम थाली ले कर भागे। बुआ ने हमें और माँ को भला-बुरा सब सुना दिया। माँ ने उन्हीं के सामने मुझे और भाई को समझाया, 'मजदूरों' की छूत और नजर से बचा करो।

भाई ने प्रश्न किया, 'सिर्फ उनसे ही क्यों?'

बुआ भी अब माँ के साथ थीं। भाई को डाँटा, बड़ों से सवाल नहीं करते। माँ ने कहा, 'वे दरिद्र और भूखे होते हैं। नक्कू और उसकी माँ को ही देखो, कितनी तेज नजर है!' जब भी हम बीमार होते, दस्त या उल्टियाँ होती, सर्दी-जुकाम या बुखार होता - माँ गुस्सा करतीं, 'नक्कू और उसकी माँ की नजर लग गई है।' वे कहतीं।

नजर की काट भी माँ के पास थी। पहले तो वे बस्ती की एक आजी से नजर झड़वातीं। फायदा होने में देर दिखती तो खुद भी टोना-टोटका करतीं। खड़े नमक के कुछ ढोंके ले चूल्हे की आग में डालते हुए कहतीं, 'अगनी माई, नकुआ और उसकी महतारी की नजर को जला दे।' आग से पटाखे जैसी आवाजें होतीं, जो हमें अच्छी लगतीं। माँ के साथ हम भी खुश होते, 'लो नजर जल गईं।'

अब हमारे यहाँ जब भी किसी को ऐसी बीमारी होती हम आग में नमक डालना शुरू कर देते। गाँव में जिससे भी हमें घृणा होती, लड़ाई होती, हम उसका नाम आग के हवाले कर देते। कभी लड़ाई-झगड़े में भाई मेरा नाम लेते तो मैं भाई का। अम्मा गुस्सा करतीं तो हम उनका भी नाम लेते। यहाँ तक कि हम प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को आग में जला चुके थे। अम्मा जान चुकी थीं कि पटाखे जैसी आवाजें सुनने के लिए ही हम तमाशा करते हैं। वे नमक का डिब्बा हमसे छिपा कर रखने लगी थीं।

आम देख नक्कू के मुँह में पानी आ चुका था। अब हमें उल्टी-दस्त या कुछ भी होने का डर था। माँ कभी-कभी नक्कू की माँ को बासी-बची रोटियाँ दे कर उसकी भूख और बेबसी को दूर किया करती थीं। शायद भाई ने भी इसीलिए नक्कू से पूछा, 'आम लेगा?' नक्कू की चुप्पी में से भी 'हाँ-ना' के संकेत समझे जा सकते थे। जैसा चाहो, खुद तय कर लो।

भाई एक शर्त पर आम देने को तैयार थे, खाट के नीचे पड़ी गुठलियों को वह फिर से चाटे।

वह जमीन पर बैठ गया। फेंकी गई गुठलियों को एक-एक कर उठाने लगा। हम मजे लेने के मूड में थे ही। बाल्टी से आम उठाते, आधा तिहाई चाटते और गुठलियाँ उसके आगे फेंकते जाते थे। बीच-बीच में भाई उसे डाँट भी देते, 'पूरी तरह चाटा कर, हरामी।'

नक्कू की माँ जाने कब आ गई। गुठलियाँ चाटते हुए बेटे को उसने देख लिया था। हमारी बेफिक्री, मस्ती और शरारत को भी उसने देखा ही होगा। हालाँकि हम चौकस हो गए थे और नक्कू को गुठलियाँ चाटने से मना करने लगे थे। फिर भी नक्कू नहीं मान रहा था। अपनी माँ को भी वह नहीं देख पाया था।

उसकी माँ को हमारी हरकत बुरी लगी। आँखों में घृणा और गुस्से की आग जलने लगी। तो भी हम डरे नहीं, शातिर अपराधियों की तरह बेशर्मी से तने रहे। उसे चिढ़ाने के लिए फिर से गुठलियाँ फेंकने लगे।

उसकी माँ बर्दाश्त नहीं कर सकी और नक्कू पर पिल पड़ी, 'भूखा दरिद्दर है, तो मिट्टी खा ले। घास-गोबर खाया कर।' उसने नक्कू के कान उमेठते हुए दो-तीन झापड़ लगा दिए। बेटे को ठोंकने-पीटने के बाद वह कमजोर पड़ गई। लेकिन हमारे प्रति उसका गुस्सा वैसा ही बना रहा, 'दो जून रोटी मिलने लगी है तो राजा मत समझो खुद को। बड़े-बड़े को बिलाते देखा है हमने। बड़े घर के दुलरुआ हो तो अपनी औकात में रहो, हमसे मत लगो।' भाई ने आज शराफत दिखाई और गुस्सा नहीं किया। पीछे माँ जो आ खड़ी थी। माँ का चेहरा खिंच गया 'चमारिन की जात, तू हमें औकात बताएगी? औकात में तू रहना सीख। भूखा दरिद्दर नहीं है तो क्यों लाती है इसे अपने साथ!'

माँ अब नक्कू की माँ की सफाई और आरोप को भी सुनने को तैयार नहीं थी। दोनों में कुछ देर तक वाकयुद्ध चलता रहा। आखिर में पता नहीं माँ जीती कि वह। माँ सबक सिखाने की धमकी देते हुए घर की ओर मुड़ी। वह भी रोते और बड़बड़ाते चली गई। जाते-जाते यह पैसला भी सुना गई थी कि कोई दूसरी गोबर उठानेवाली ढूँढ़ लेना।

पहली बार हमारे घर में उसकी जरूरत को समझा गया। शाम को दोपहरवाली घटना का जिक्र माँ ने पिताजी से किया। पिताजी पहले नक्कू की माँ पर ही क्रोधित हुए। मजदूरों की अकड़ वे भी सह नहीं पाते। उन्होंने हमें भी नसीहतें दीं, कल से गोबर खुद उठाओगे तो सारी शेखी और लफंगई निकल आएगी। माँ ने हमारा पक्ष लिया तो पिताजी ठंडे पड़ गए। उनकी चिंता अगले मजदूर को ले कर थी, जिसका तुरत-फुरत मिल पाना मुश्किल लग रहा था।

'यही सोच कर तो चुप कर गई। नहीं तो आज उसका मुँह चप्पल से न पीट देती।' माँ का बचा-खुचा गुस्सा था या अपनी गलती का एहसास - उनके उखड़े स्वभाव से यह तय कर पाना संभव नहीं था। मैं और मेरा भाई माँ के साथ चिपके खड़े थे। 'कल से नहीं आती तो न आए, हमारी बला से। हम खुद गोबर उठा लेंगे... उस दिन दवा के लिए पैसे माँग रही थी, अच्छा हुआ नहीं दिए।' भाई ने सुकून की साँस ली लेकिन माँ तन कर बोली, 'पैसे! वह खाट पर तड़पती रहे तो भी न दूँ।'

अगली सुबह हमारी आँखों मे हैरत थी। विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि वह काम करने फिर से चली आएगी। हमने दौड़ कर घर में माँ को सूचना दी, नक्कू की माँ आ गई है। वह तो दो दिन भी हमारे बिना नहीं रह सकती।

माँ चुप ही रही। सिर्फ एक ठंडी निगाह मुझ पर डाल कर अपने काम में लग गईं। हम निराश हुए... साथ में नक्कू नहीं था। भाई ने कहा, पूछ नक्कू के बारे में। लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई । अब नक्कू कभी नहीं आता। हमारी शरारतें तो जैसे उसी के लिए थीं, धीरे-धीरे वे कम होने लगीं। हमने नक्कू की परवाह करनी ही छोड़ दी।

जाड़े की एक शाम। हमारे घर में उदासी घिर आई। पिताजी दुखद सूचना ले कर आए थे। पहले उन्होंने माँ को बुलाया, जैसा कि उनकी आदत थी। फिर उस दुख और संकट का खुलासा किया जिसका संबंध हमारे घर से था। क्षण भर के लिए हम सभी काठ से बने रहे। पिता की खबर बेचैन करनेवाली थी... नक्कू का बाप मर गया था और माँ सती होने जा रही थी।

'सती?' माँ का मुँह खुला रह गया। विस्मय से पिताजी को देखा।

पिताजी ने फिर अपनी बात दुहरा दी। सती होने की बात माँ को कबूल नहीं हुई, सफेद झूठ लग रही थी। वह घाट-घाट का पानी पी चुकी है, फिर कैसी पतिव्रता? किसके लिए सती हो रही है वह? क्यों मरने जा रही है?' माँ की तकलीफ उपहास के रूप में प्रकट हो रही थी।

'वह कहाँ मरने जा रही है, उसे तो मारा जा रहा है।' पिताजी की आवाज में तल्खी थी।

'क्यों?' माँ ने हैरानी और उत्सुकता के साथ पूछा। नक्कू के बाप को छूत की बीमारी थी। इसका इलाज ही नहीं था। ट्रकों पर बेलदारी की। जाने किस शहर से यह बीमारी ले आया। औरत को भी दे गया है। विधवा जवान शरीर, कल जाने किसको यह बीमारी वह दे बैठे। उसका घर पास-पड़ोस, टोला... सभी तो सती होने को उसे मजबूर कर रहे हैं। गाँव में और भी कई लोग साथ हैं।'

'कोई रोक नहीं रहा?', माँ ने पूछा।

'सब तमाशा देखना चाहते हैं, सभी तो जिंदगी से ऊबे हुए हैं।'

'गाँव में सब हिजड़े ही हैं, तो वह क्यों नहीं जुबान खोलती। वह तो गरब और गरूर की भी तेज थी।' माँ की आवाज पहली बार सख्त होती हुई दिखी।

'उसे धतूरे का बीज खिला दिया गया। होश में नहीं है।' पिताजी ने गहरी साँस ली। धीरे-धीरे पिताजी भी असहाय और निरीह होते दिखाई दिए। उनका भी कहना था कि उसका मर जाना ही ठीक है। अब है कौन उसका! कल को लोग मारें, पीछे ताने कसें और दस लांछन लगाएँ।

'तो क्या उसे जिंदा आग में झोंक दोगे?' माँ ने हिकारत से पिताजी को देखा।

पिताजी ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप बैठे रहे। फिर कल की चिंता करने लगे, 'माघ का महीना है। जेठ से पहले कोई गोबर उठानेवाली तो मिलने से रही।'

'तो इस साल उपले भी नहीं बनेंगे। मैं नहीं पाथनेवाली।' माँ गुस्से में उठीं। उनका गुस्सा पता नहीं उसके सती होने को ले कर था या पिता की कमजोरी और तटस्थता पर या गोबर उठानेवाली के न मिल पाने से।

आधी रात को माँ कसमसा कर बैठ गईं। नदीवाले बाग से आवाजें आने लगीं थीं। ढोल और नगाड़ों की आवाज सुनाई दी। जयकारे, हलचल और हल्ले में बदल गए।

माँ ने आप ही से कहा, 'वह सती हो गई है।'

स्तब्ध, खामोश और मूर्ति जैसी जड़ मुद्रा में माँ के कान उठ रहे शोर की तरफ लगे रहे। फिर न जाने क्या हुआ, वह घुटने में सिर डाल कर सुबकने लगीं। माँ के टूटने में सिर्फ मोह ही नहीं, अतीत की गलतियाँ, वर्तमान का सच और भविष्य की चिंता ही रही होगी। हमारी भी नींद टूट चुकी थी और हम माँ से सटे हुए उनके चुप होने का इंतजार कर रहे थे। भाई ने मुझे छेड़ते हुए कहा, 'कल से गोबर तुझे उठाना है।' मैंने इनकार कर दिया। फिर माँ से पूछा, 'अम्मा, तुम भी सती हो जाओगी?'

आँसुओं से भीगा माँ का चेहरा ऊपर उठा, 'आग लगे तेरी जुबान को।' उन्होंने कहा।

दूसरे दिन वही हुआ जिसकी शंका पिता को पहले से थी। धुंध छँटने से पहले वे घर छोड़ चुके थे। यही हाल गाँव के हर मर्द का था। कुछ दिनों के लिए औरतें ही घर की मुखिया थीं। यह भी सबको पता ही था कि पुलिस, प्रशासन और नेताओं का ड्रामा कुछ दिन तक चलेगा ही।

गाँव का वातावरण धीरे-धीरे बदल रहा था। पुलिस की उपस्थिति अब जलने की जगह तक सीमित रह गई थी। धूप में खाट डाले दो-चार सिपाही गप में लगे रहते। उनकी तरफ से सिर्फ जयकारों की मनाही थी। हालाँकि उसका भी बीच-बीच में उल्लंघन होता रहता था। दर्शनार्थियों के लिए सती महान थी। दूर-दूर से लोग दर्शन करने आ रहे थे। पिता जी भी दर्शन कर आए थे।

एक सुबह माँ जल्दी उठीं। हमें भी नहा कर तैयार होने को कहा। हमारी जानने की उत्सुकता पर माँ डाँट लगा देती। हमें इतना ही पता था कि कहीं घूमने जाना है। फिर भी हम उत्साह में थे। भाई ने माँ के मन की बात पकड़ ली। मेरे कान में बताया, 'नक्कू की माँ जहाँ सती हुई है, आज हम वहीं चलेंगे।' कौतूहल अब और बढ़ गया। माँ ने नई साड़ी पहनी। बिंदी और सिंदूर लगाया। हमने भी धुले कपड़े पहने। माँ ने एक थाली में लाल कपड़े के नीचे कुछ चीजें रखीं। वह फूल, अगरबत्ती, लौंग, कपूर, सिंदूर, बताशा और नारियल था। माँ ने भाई को देखने के लिए कहा, कुछ भूल तो नहीं रही। भाई ने एक-एक कर सबका फिर नाम लिया। माचिस की याद भाई ही ने दिलाई। माँ वह केला भी उठा लाई; जिसे पिछली शाम हमारी नजर से बचा कर जाने कहाँ रख छोड़ था। अब हम दौड़ते हुए नदीवाली बगिया की तरफ जा रहे थे, जहाँ नक्कू की माँ सती हुई थी।

वहाँ पहुँच कर हमारा कौतूहल अब ठंडा पड़ चुका था। वहाँ जलती हुई चिता नहीं थी। समाधि के नाम पर चार-छह ईंटें जोड़ दी गई थीं, जिसके नीचे राख दबी रही होगी। ऊपर ढेर सारा चढ़ावा। हमें पता चला कि पुलिस यहाँ समाधि नहीं बनाने दे रही है। कुछ दूरी पर गड़े बाँस के ऊपरी सिरे पर बँधा एक लाल कपड़ा दिखाई दिया। जिसे हम मंदिर की मुंडेरों पर देखा करते थे। कीर्तनिया पार्टी ने फिर भजन गाना शुरू कर दिया था। उनकी पुलिस के साथ नोक-झोंक चल रही थी। पुलिसवाले चिता से पाँच सौ मीटर दूर बैठने को कह रहे थे। गाँव के ही एक पंडित जी मिले। माँ को एक परची देते हुए बोले, 'माता जी, दो रुपया दान में दीजिए। यहाँ सती के लिए मंदिर बनेगा।'

माँ ने साड़ी की टोंग से दो रुपया निकाल कर पंडितजी के हवाले किया और परची को टोंग में बाँध लिया। माँ समाधि के साथ बैठ गईं। अगरबत्ती जलाई। एक खुली ईंट को सिंदूर का टीका लगा दिया। लौंग, फूल और बताशा चढ़ाए, फिर नारियल तोड़ा। माँ के होंठ कुछ क्षण तक बुदबुदाते रहे। उठने से पहले माँ ने सामाधि पर फिर से सिर नवाया। हमें भी ऐसा करने को कहा। हमने भी माँ के साथ समाधि के चक्कर लगाए। कुछ भी बोलने और पूछने के लिए माँ पहले ही मना कर चुकी थीं। चलने से पहले माँ ने समाधि की मिट्टी का टीका मुझे, भाई और खुद को भी लगा लिया।

दूर धूप में बैठा हमें नक्कू दिखा। वही झाँकनेवाली आँखें, बुझा चेहरा, मुँड़ाया हुआ सिर और शरीर से कमजोर। सूखा रोग जैसे धीरे-धीरे उसमें बढ़ रहा था। उसके सामने बिछे अँगोछे पर फल, बताशे और घी में तली टिकरियाँ थीं। कुछ मूँगफली के दाने भी थे। जिसे दयावश लोग डाल गए थे। हमारे पीछे माँ भी आ गईं। माँ ने थाली से प्रसाद का केला उठा कर उसके अँगोछे पर रख दिया। साड़ी की टोंग खोली, एक सिक्का नक्कू के हाथ में दिया। पैसा देख भाई की आँखें चमक उठीं। माँ की नजर बचा भाई ने नक्कू के सिर पर एक मुक्का दे मारा। क्षण भर में ही सिक्का भाई की मुट्ठी में था। लेकिन, तभी एक हैरत भरी घटना हुई, जो हमारी उम्मीद और नक्कू के स्वभाव के विपरीत थी। रुँधे स्वर में दर्द से कराहते हुए नक्कू ने भाई की ओर देखा। विक्षोभ में आँखें सिकुड़ गईं। होंठ फिर हिले - शब्द अंदर ही घुटते हुए। शरीर उसका काँप रहा था। अचानक पागलों जैसी सनक उठी। माँ का दिया हुआ केला उठा कर उसने समाधि की ओर फेंक मारा। अँगोछे को उठा कर हवा में उछाल दिया। सब कुछ बिखर चुका था... टिकरियाँ, मूँगफली के दाने, फल और बताशे।

हम डरे-सहमे नक्कू को देख रहे थे। वह रुका तो हमने राहत की साँस ली। लेकिन वह फिर हिंस्र जानवर की तरह भाई की तरफ पलटा। भाई चीख उठे। भाई की हथेली पर नक्कू ने अपने दाँत गड़ा दिए थे। सिक्का अब नक्कू की मुट्ठी में था और भाई की हथेली पर खून।

सिक्का हाथ में आते ही नक्कू शांत और स्थिर हो गया। अब वह हमसे दूर जा बैठा। वह लगातार सिक्के को घूरे जा रहा था।

चोट खाए, हतप्रभ खड़े भाई बदला लेने के लिए आगे बढ़ते, किंतु माँ ने रोक दिया। माँ ने शंकित हो कर अगल-बगल देखा। हम किसी की नजर में नहीं थे। माँ ने प्रसाद की थाली मुझे दी। फिर हम दोनों की बाँहें पकड़े हुए माँ हमें घर की तरफ ले जाने लगी।

माँ अब वहाँ एक क्षण भी रुकने को तैयार नहीं थीं... 'नक्कू की हरकत हमारे लिए अपशकुन है। सब सती मैया का कोप है। जल्दी चलो।'

माँ ने एक बार फिर समाधि की ओर देखा, 'सती मैया, मेरे बच्चों की रक्षा करो।' माँ की आँखों में आँसू आ गए।

चिंता, बेचैनी और भय से हम सभी के चेहरे मलिन थे।


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हिंदी समय में अरविंद कुमार सिंह की रचनाएँ