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कविता

व्यक्तिगत
दिविक रमेश


(एक संवाद खुद से भी)

अगर मान भी लूं महल है यह
तो भी खुद चिना है मैंने इसे।

गवाह है मेरा यह सिर
जिसने ढोई हैं ईंटें,
ये पांव
धंस रहे हैं जो गारे में
ये आंखें
तराई की है जिन्होंने रात-दिन।

समूचा शरीर
जो आज दिन नज़र आता है तुम्हें
खुद को कुछ आराम पहुंचाता
कुछ प्रकोपों से खुद को बचाता
इसे देखा नहीं तुमने
ईंट पर ईंट
संभाल कर रखते,
देखा नहीं तुमने
गलती से

एक भी ईंट टूट जाने पर
समूचे शरीर को
जड़ से हिलते।
यह जो महल नहीं है, मान भी लूं है
तो भी/इसको सींचा है/खुद अपने रक्त से
यह वह नहीं है
जिसे रक्त किसी और का चढ़ाया गया हो।

गवाह है मेरा शरीर
शरीर की ये तमाम शिराएं
जिनमें कोई बोध नहीं गुनहगारी का।

पेड़ की उन्मुक्त शाखाओं-सी फैली ये नसें --
सबूत है इनका
अपने सामान्य आकार में होना --
न दबी हैं, न फूली हैं।
अगर मान भी लूं, महल यही है
तो काश
सबने

खुद चिने होते अपने-अपने महल,
ज़मीन पर टिके
अपने पांवों पर खड़े पूरे शरीर से
खुद खड़े किए होते!
खुद को आराम पहुंचाना
बचाना कुछ प्रकोपों से
तब
किसी भी उंगली की नोक का
निशाना न होता!

काश
पांव सभी के होते
टिके ज़मीन पर
और खुद या किसी के भी हाथ में
कुल्हाड़ी न होती!

 


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