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आलोचना

रामविलास शर्मा का प्रतिऔपनिवेशिक चिंतन
रूपेश कुमार


डॉ रामविलास शर्मा का रचना संसार अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने इतिहास, भाषा विज्ञान सहित साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई तथा कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया। वे मूलतः मार्क्सवादी लेखक हैं, इसीलिए सामंतवाद विरोधी तथा जनवादी विचारधारा उनके संपूर्ण चिंतन का केंद्र है। मार्क्सवादी होते हुए भी वे इतिहास एवं साहित्य को परखने के लिए परंपरा के प्रगतिशील तत्वों तथा प्रतिऔपनिवेशिक दृष्टि का सहारा लेते हैं। इस दृष्टि को केंद्र में रख कर वे एक ओर यूरो-केंद्रित इतिहास-दृष्टि का खंडन करते हैं तो दूसरी ओर इतिहास एवं साहित्य को देखने की विशुद्ध भारतीय दृष्टि देते हैं, साथ ही साथ साहित्य, राजनीति और इतिहास में आए परिवर्तन को लक्षित करते हुए राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के प्रवाह को रेखांकित करते हैं।

     हिंदुस्तान का प्रारंभिक इतिहास विदेशियों द्वारा लिखा गया और इन लोगों ने भारतीय इतिहास और ऐतिहासिक दृष्टिकोण को अनदेखा किया। विशेष रूप से अपने औपनिवेशिक हित के कारण अंग्रेज भारतीय धार्मिक ग्रंथों, दंतकथाओं, पौराणिक ग्रंथों आदि में उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के साथ न्याय नहीं कर सके, क्योंकि वे प्रत्येक दृष्टि से भारत में अपनी औपनिवेशिकता को उचित ठहराना चाहते थे और इसके लिए भारतीय इतिहास तथा साहित्य को हीन साबित करना उन्हें जरूरी लगता था। चूँकि किसी भी देश के निवासियों का ऊर्जा स्रोत उसकी परंपराओं और गौरवशाली इतिहास में होता है, इसलिए उपनिवेशवादी अंग्रेज लेखक भारत के इतिहास और साहित्य को नकार कर अपनी सत्ता के खिलाफ भविष्य में होनेवाले विरोध से भी निजात पाना चाहते थे। इन पूर्वाग्रहों के कारण अग्रेजों द्वारा लिखा गया भारत का साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जो भी इतिहास है, वह एकांगी और भ्रम पैदा करनेवाला है। आज अल्पसंख्यक, दलित और स्त्री अपने नजरिए से इतिहास लिख रहे हैं, किंतु इतिहास की व्याख्या इन पूर्वाग्रहों की अपेक्षा नही रखती।

    डॉ रामविलास शर्मा का लेखन काफी हद तक ऐसे पूर्वाग्रहों से मुक्त है। इन्होंने इतिहास को समझने की जो दृष्टि दी, वह अल्पसंख्यक, दलित और स्त्री के नजरिए से तो इतिहास को परखती ही है, साथ ही साम्राज्यवादी यूरो-केंद्रित इतिहास-दृष्टि का खंडन भी करती है। रामविलास जी इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं कि पता नहीं कैसे लोग औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से लिखे गए इतिहास पर विश्वास करते हैं? इसके लिए वे अशिक्षा को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखते हैं, "अग्रेजी राज ने यहाँ शिक्षण व्यवस्था को मिटाया, हिंदुस्तानियों से एक रुपए ऐंठा तो उसमें से छदाम शिक्षा पर खर्च किया। उस पर भी अनेक इतिहासकार अंग्रेजों पर बलि-बलि जाते हैं।" (सन सत्तावन की राज्य क्रांति और मार्क्सवाद, पृ. 67)

    रामविलास जी अंग्रेजों को उस हद तक प्रगतिशील भी नही मानते, जितना अन्य विद्वान मानते हैं। अंग्रजों की प्रगतिशील भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगते हुए ये लिखते हैं कि "अंग्रेज उदारपंथियों के आदर्श प्रजातंत्र संयुक्त राज्य अमरीका में गुलामों से खेती कराके बड़ी-बड़ी रियासतें कायम की गई थीं। गुलामों के व्यापार से लाभ उठानेवालों में अंग्रेज सौदागर सबसे आगे थे। यह गुलामी प्रथा न तो पूँजीवादी थी, न सामंती थी; समाजशास्त्र के पंडित उसे सामंतवाद से भी पिछड़ी हुई प्रथा मानते हैं । इस प्रथा का विकास और प्रसार करके अंग्रेज सौदागरों ने कौन-सा प्रगतिशील काम किया कहना कठिन है।" (सन सत्तावन की राज्यक्रांति और मार्क्सवाद, पृ. 53) स्पष्ट है कि रामविलास जी अंग्रेजों की प्रगतिशील भूमिका का मूल्यांकन तथ्यों की कसौटी पर करते हैं, इसीलिए वे उन्हें उतने प्रगतिशील नहीं लगते जितने अन्य विद्वानों को लगते हैं । शायद इसी कारण से डॉ रामविलास शर्मा अंगेजों की प्रगतिशील भूमिका का समर्थन करने के बजाय अपने लेखन में उन भारतीय तत्वों को उभारने का प्रयास करते हैं जो अंगेजों से भिन्न और कहीं अधिक प्रगतिशील थे ।

अंग्रेजों के आने के पहले भारतीय साहित्य एवं इतिहास की एक लंबी परंपरा थी, जिसकी इन उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने उपेक्षा कर आधुनिक साहित्य एवं इतिहास का संबंध पाश्चात्य जगत से जोड़ा और हिंदुस्तानियों पर यह आरोप लगाया कि इन्होंने अपना कोई इतिहास लिखा ही नहीं। डॉ रामविलास शर्मा जीवन भर अपने लेखन एवं चिंतन के माध्यम से आधुनिक भारतीय साहित्य एवं इतिहास की उसी जड़ को तलाशते रहे और काफी हद तक सफल भी हुए। इन्होंने इतिहास और परंपरा को समान महत्त्व देते हुए, प्रगितशील आलोचना के लिए परंपरा का ज्ञान आवश्यक माना हैं। लिखते हैं, "इतिहास के ज्ञान से ऐतिहासिक भौतिकवाद का विकास होता है, साहित्य की परंपरा के ज्ञान से प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है। ऐतिहसिक भौतिकवाद के ज्ञान से समाज में व्यापक परिवर्तन किए जा सकते हैं और नई समाज व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। प्रगतिशील अलोचना के ज्ञान से साहित्य की धारा मोड़ी जा सकती है और नए प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है। (परंपरा का मूल्यांकन, पृ. 9) निश्चय ही रामविलास शर्मा का साहित्य संबंधी लेखन इसी प्रगतिशील आलोचना का दस्तावेज है ।

     डॉ रामविलास शर्मा ही नहीं, नलिन विलोचन शर्मा भी इतिहास के बारे में प्रचलित इस भ्रांत धारणा का खंडन करते हैं। ये अपनी पुस्तक `साहित्य का इतिहास दर्शन` की भूमिका में लिखते हैं कि `इस संदर्भ में पाश्चात्यों की भ्रांति का कारण है भारतीयों का इतिहास विषयक विभाग। उन्नीसवीं शताब्दी में इतिहास लेखन की जो प्रणाली पश्चिम में प्रचलित थी, उससे भारतीय प्रणाली सर्वथा भिन्न थी। पश्चिम के तत्कालीन स्वीकृत प्रतिमानों के सहारे पाश्चत्य विद्वान न तो भारतीय साहित्य और कलाओं के साथ न्याय कर सके, न यहाँ की प्राचीन इतिहास लेखन की प्रणाली की विशेषता ही समझ पाए। इसलिए पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा लगाया गया यह आरोप कि भारतीयों ने अपने अतीत का कोई इतिहास प्रस्तुत नहीं किया, क्योंकि उनमें ऐतिहासिक विवेक का अभाव था, निरर्थक है। इतिहास रचना का विशेष श्रेय एशियाइयों, चीनियों, उससे भी अधिक इस्लामी लोगों को दिए जाने का मुख्य कारण यह है कि उन्हें कालक्रम का अच्छा ज्ञान था। मुसलमानों के आने के पूर्व इतिहास के संबंध में हिंदुओं की एक अनोखी धारणा थी। कालक्रम के बदले वे सांस्कृतिक एवं धार्मिक विकास या ह्रास के युगों के मूल तत्वों को एकत्रित कर और विचारों तथा भावनावों के प्रवर्तनों के सांकेतिक वर्णन करके तुष्ट हो जाते थे। इसलिए भारतीय इतिहास प्रारंभिक दौर में प्रायः काव्य रूप में मिलता है, जिसमें सब कच्ची-पक्की सामग्री मिली-जुली, उलझी और गुँथी पड़ी है। इस उलझाव को सुलझाने के प्रयत्न होने लगे हैं, किंतु कालक्रम की जानकारी के अभाव में अब भी अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

     भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की यह विशेषता रही है कि इसमें हमेशा वर्तमान तत्वों की जगह प्राचीन तत्वों को अधिक महत्व मिलता रहा है; यहाँ प्राचीन इतिहासकारों ने इतिहास की व्याख्या भी इसी दृष्टिकोण से की। अर्थात उन्होंने घटनाओं और क्रियाकलापों की व्याख्या सांस्कृतिक दृष्टि से की। इसीलिए, महाभारत में इतिहास को पूर्ववृत्त मानते हुए उसके महत्व को निम्लिखित प्रकार से स्थापित किया गया है -

धर्मार्थकाममोक्षमुपदेशसमंवितम्

पूर्व वृत्त कथा युक्तमितहास प्रचक्षते

(साहित्य का इतिहास दर्शन, पृ. 1-2)

अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में मानव सभ्यता एवं मानव व्यवहार का प्रत्येक क्षेत्र समन्वित है। घटनाओं की आवृति मात्र युद्धों तक सीमित रखना इतिहास की एकांगगिकता निर्धारित करना है। इतिहास सम्राटों की गाथा नहीं गाता, वह मनुष्यों को शिक्षा भी देता है।

    अंग्रेजों ने भारतीयों के इतिहास और साहित्य को पूरी तरह से खारिज करने के बाद, अपने औपनिवेशिक हितों के लिए जब इतिहास की व्याख्या करना प्रारंभ किया तो सबसे पहले हमारी ही भूमि पर हमें विदेशी साबित किया। उन्होंने कहा, `आर्य विदेशी थे।` यह कह कर वे अपने शासन को औचित्यपूर्ण आधार दे रहे थे। उन्होंने इतिहास की व्याख्या करते हुए बताया, आर्य विदेशी थे, वे जिस समय आए उनकी संस्कृति द्रविणों से अधिक समुन्नत थी और उन्होंने द्रविणों पर शासन कर उन्हें सभ्य बनाया। आज उन आर्यों की तुलना में हमारी संस्कृति अधिक समुन्नत है और हम उन पर शासन कर उन्हें वैज्ञानिक सीख दे रहे हैं। प्रश्न उठता है कि अंग्रेजों को ऐसे आधार तलाशने की जरूरत क्यों पड़ी? हमें याद रखना चाहिए कि ब्रिटेन सहित यूरोप में एक ऐसा बौद्धिक वर्ग था, जो लगातार भारत तथा अन्य उपनिवेशों में अनौचित्यपूर्ण शासन की निंदा कर रहा था। उन्हें संतुष्ट करने के लिए उपनिवेशवादियों ने ऐसी थोथी व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं।

     डॉ. रामविलास शर्मा ने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत की गईं ऐसी अनेक व्याख्याओं को खारिज करते हुए उनका प्रबल विरोध किया। आर्यों के संबंध में उन्होंने भाषा विज्ञान के आधार पर सिद्ध किया कि आर्य यहाँ से बाहर गए और आर्यों के साथ द्रविण भी। ये लिखते हैं, "दूसरी सस्राब्दी ई.पू. में जब बहुत-से भारतीय जन पश्चिमी एशिया में फैल गए, तब ऐसा लगता है, उनमें द्रविण जन भी थे। इस कारण ग्रीक आदि यूरोप की भाषाओं में द्रविण भाषा तत्व मिलते हैं यथा तमिल परि (जलना), ग्रीक पुर (अग्नि), तमिल अत्तन (पीड़ित होना), ग्रीक अल्गोस (पीड़ा), तमिल अन (पिता), ग्रीक अत्त (पिता)। यूरोप की भाषाओं में 12 से 19 तक संख्यासूचक शब्द कहीं आर्य पद्धति से बनते हैं, कहीं द्रविण पद्धति से।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, भाग २, पृ. 673) रामविलास जी पुस्तक के इसी अध्याय में जॉन हॉफमैन का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने मुंडा परिवार की मुंडारी भाषा पर एक बड़ा ग्रन्थ `इनसाइकिलोपीडिया मुंडारिका` तैयार किया था। इसकी भूमिका में हॉफमैन आश्चर्य प्रकट करते हैं कि "मुंडा भाषा परिवार के जो शब्द आर्य भाषाओं में नहीं हैं, वे भी यूरोप की भाषाओं में मिल जाते हैं।" इस संदर्भ में उन्होंने अनेक उदाहरण भी दिए। रामविलास जी का मानना है कि "पाश्चत्य विद्वानों ने जैसे इंडोयूरोपियन परिवार की कल्पना की है और समझते हैं उसकी एक शाखा भारत आई, वैसे ही उन्होंने एक फिनोउग्रियन परिवार की कल्पना की है, जिसकी एक द्रविण शाखा भारत आई। वास्तव में दूसरी सहस्राब्दी ई. पूर्व. में जब बहुत-से भारतीय गण और जन पश्चिम एशिया में फैले, तब उनके घुल-मिल जाने से स्लाव, ग्रीक, लैटिन, जर्मन आदि समुदायों की भाषाओं का निर्माण हुआ।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पृ. 673) इसी विवेचन में वे आगे लिखते हैं, "अवश्य ही इन प्रवासी जनों पर पीछे से बराबर दबाव पड़ता रहा होगा, जिससे ये यूरोप के उत्तर की ओर बढ़ते गए और इंडो-यूरोपियन परिवार की भाषाएँ बोलनेवाले यूरोप की अधिक उपजाऊ प्रशस्त भूमि पर बस गए। फिनोउग्रियन परिवार की भाषाएँ बोलनेवाले और भी उत्तर में ठेल दिए गए।"

     डॉ. रामविलास शर्मा से पहले राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंध रखनेवाले सभी इतिहासकारों लोकमान्य तिलक, रमेशचंद्र मजुमदार, ए.के. नीलकंठ शास्त्री, रामकृष्ण भंडारकर, हेमचंद राइ आदि ने आर्यों के मूल निवास के बारे में पहलेवाली मान्यता का ही समर्थन किया। रामशरण शर्मा के अनुसार, "1960 के बाद जो शोध-कार्य हुआ है, उसके आधार पर हिंद-यूरोपियों के मूल वास स्थल के विषय में एक दर्जन से अधिक प्रकार के मत दिए गए हैं। यदि यूरोप से प्रारंभ करें तो उत्तरी यूरोप, मध्य यूरोप, बाल्कन प्रायद्वीप, यूक्रेन, दक्षिणी रूस और बैक्ट्रिया इत्यादि में से प्रत्येक को भारोपीय के मूल निवास का क्षेत्र माना गया है।" (आर्य संस्कृति की खोज, भूमिका) रामविलास जी का मानना हैं कि "अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया। भारत के इतिहास को ब्रिटेन के इतिहास का अंश बना दिया।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पृ. 191) इसी विवेचन में वे आगे रणजीत सिंह गुहा के हवाले से लिखते हैं, "भारतीय इतिहास लेखन को स्वायत्त बनाने का अर्थ था, भारत पर ब्रिटेन के शासन करने के अधिकार को चुनौती देना।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पृ. 291) यही कारण था कि इस तरह के प्रश्नों पर खुल कर बहस नहीं हो सकी। जहाँ तक 1960 के बाद के शोधों का प्रश्न है तो उनका स्तर लगातार गिरा है। दूसरे, निष्कर्ष के लिए अधिकतर उसी आधार सामग्री का प्रयोग किया गया, जिसके आधार पर उपर्युक्त धारणा कायम की गई। यह विषय पुनः स्वतंत्र रूप से अन्वेषण व विवेचन की अपेक्षा रखता है। इस संदर्भ में रामविलास जी का कार्य सराहनीय है।

     डॉ. रामविलास शर्मा पूर्वाग्रह से मुक्त नए सिरे से इतिहास लेखन पर बल देते हैं, जिसके आधार पर आधुनिक भारत का निर्माण हो सके। आज तक यह कार्य क्यों नही हो सका, इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "अंग्रेजी राज के समय बहुत-सी बातें लोग डर के मारे न कहते थे। कहते थे तो किताब जब्त हो जाती थी। इसलिए इस ढंग से कहते थे कि कानून की पकड़ में न आए। अपेक्षा यह की जा सकती थी कि भारत के स्वाधीन होने पर लोग अंग्रेजी राज का सही रूप लोगों के सामने पेश करेंगे लेकिन प्रयत्न बिल्कुल दूसरे ढंग का हो रहा है। नए सिरे से इतिहास लिखना जरूरी था, जिससे अंगेजी राज का सही रूप लोगों के सामने आए, साथ ही भारत की सांस्कृतिक उपलब्धि का चित्रण भी होना चाहिए था, जिसके आधार पर नए भारत का निर्माण हो सके। लेकिन जो भारत पर विदेशी पूँजी का दबाव बना हुआ है, उसके फलस्वरूप अनेक विद्वान यह बताने लगे हैं कि भारत की ऐतिहासिक विरासत उल्लेखनीय नहीं है। ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश अंग्रेजों के आने के साथ फैला।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पृ. 291) रामविलास जी इस भ्रम का निराकरण अपनी नवजागरण संबंधी मान्यता में करते हैं, जिसकी व्याख्या उन्होंने हिंदी के विशेष संदर्भों में की।

सामान्यतः भारतीय नवजागरण का संबंध अंगेजी राज की नियामतों के नतीजे के साथ-साथ राजा राममोहन राय से (बंगाल के नवजागरण के साथ) जोड़ा जाता है। डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है, "हो सकता है बंगाल के लिए यह सही हो । आवश्यक नहीं हर प्रदेश में वही पक्रिया घटित हो।" उन्होंने हिंदी नवजागरण को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से अभिन्न रूप से संबद्ध मानते हुए लिखा -"हिंदी प्रदेश में नवजागरण 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से शुरू होता है ।" (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, भूमिका) इसे हिंदी प्रदेश का राष्ट्रीय व जातीय संग्राम मानते हुए रामविलास जी ने इसके प्रभाव का सविस्तार विश्लेषण किया और यह दिखाया कि किस तरह इस राष्ट्रीय संग्राम का असर सारे देश पर हुआ, किंतु हिंदी भाषी प्रदेश पर सबसे अधिक हुआ। डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र इस संदर्भ में लिखते हैं, "हिंदी जाति के नवजागरण के अंतर को अन्य जातियों के नवजागरण से भिन्न रूप में रेखांकित करके निश्चय ही उसकी प्रकृति को समझने में मदद की है।" (आलोचक और समीक्षाएँ, पृ. 24) रामविलास शर्मा का मानना है कि हिंदी नवजागरण सामंतवाद व साम्राज्यवाद का विरोध करके आगे बढ़ा, इसीलिए इसकी एक पुरानी परंपरा है । 1857 के पहले के नवजागरण को जन-जागरण का नाम देते हुए वे लिखते हैं, "भारतेंदु युग उत्तर भारत में जन-जागरण का पहला या प्रारंभिक दौर नहीं है; वह जन जागरण की पुरानी परंपरा का खास दौर है। जन-जागरण की शुरुआत तब होती है, जब यहाँ बोल-चाल की भाषाओं में साहित्य रचा जाने लगता है, जब यहाँ के प्रदेशों में आधुनिक जातियों का गठन होता है। यह सामंत विरोधी जागरण है।" (भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ, पृ. 13) रामविलास जी भक्ति काल मे फैलाए गए इस जन-जागरण को `लोक-जागरण` कहते हैं। प्लासी की लड़ाई से 1857 के स्वाधीनता संग्राम तक जो युद्ध हुए, उन्हें `जन-जागरण` का नाम देते हैं। पहले दौर के लोक जागरण को दूसरे दौर के जन-जागरण से अलग करते हुए बताते हैं कि पहले दौर में विरोध सामंतवाद से है जबकि दूसरे दौर में साम्राज्यवाद से है।

     डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण की व्याख्या करते हुए कई चरणों का उल्लेख करते हैं। पहला चरण गदर या 1857 का स्वाधीनता संग्राम और दूसरा भारतेंदु युग है। हिंदी नवजागरण का तीसरा चरण महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके सहयोगियों का कार्यकाल है। सन 1990 में `सरस्वती` का प्रकाशन आरंभ हुआ और 1920 में द्विवेदी जी उससे अलग हुए। इन दो दशकों की अवधि को `द्विवेदी युग` कहा जा सकता है। निराला साहित्य को रामविलास जी इसी नवजागरण की अगली कड़ी मानते हैं। ये लिखते हैं, "इस तरह नवजागरण जो 1857 के स्वाधीनता संग्राम से आरंभ हुआ, वह भारतेंदु युग में और व्यापक बना, उसकी साम्राज्य विरोधी और सामंत, साम्राज्य विरोधी प्रवृत्तियाँ द्विवेदी युग में पुष्ट हुईं। फिर निराला के साहित्य में कलात्मक स्तर पर तथा उसकी विचारधारा में ये प्रवृत्तियाँ क्रांतिकारी रूप में व्यक्त हुईं।" (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नव जागरण, पृ. 18) उन्होंने माना है कि नवजागरण की प्रक्रिया यहीं समाप्त नहीं हो जाती बल्कि अब भी जारी है । आज नवजागरण का संबंध पूँजीवाद से है।

      डॉ. रामविलास शर्मा के हिंदी नवजागरण संबंधी मान्यताओं की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं, जिनकी ओर डॉ. शम्भुनाथ ने अपने लेख `हिंदी नवजागरण की अवधारणा : संदेह के बावजूद` (अलोचना, सहस्राब्दी अंक पाँच, अप्रैल-जून 2001) में लिखा है। पहली विशिष्टता है कि उन्होंने इसे तेरहवीं शताब्दी से ही विस्तृत निरंतरता में देखा। दूसरी बड़ी विशिष्टता है कि इसका संबंध हिंदी जाति के निर्माण और आत्मपहचान से स्थापित किया। तीसरी विशिष्टता यह है कि आधुनिक नाटककार शेक्सपीयर के काल का उदाहरण रख कर वे स्पष्ट करते हैं कि आधुनिकता का संबंध मशीनी उत्पादन से नहीं होता। सामंती व्यवस्था के भीतर व्यापारिक हस्त-शिल्प, कृषि, वाणिज्य, बाजार और नगर ही व्यापारिक पूँजीवाद की आधारशिला के लिए पर्याप्त हैं। चौथी बड़ी विशिष्टता यह है कि रामविलास शर्मा नवजागरण के हिंदी जातीय संदर्भ का उद्घाटन करने की प्रक्रिया के संदर्भ में वस्तुतः `रिनेसाँ` से लगातार एक दूरी बनाते चले गए। उन्होंने प्राच्यविद्यावाद को चुनौती देते हुए, लगभग हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में घोषित किया कि "भारत में अंग्रेज न आए होते तो भी सांस्कृतिक नवजागरण संभव था।" इस नवजागरण की पाँचवी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे पहले चरण में सामंत विरोधी और दूसरे चरण में सामंतवाद, साम्राज्यवाद विरोधी कहा गया। छठवीं सबसे बड़ी और अंतिम विशेषता है कि हिंदी नवजागरण के पहले चरण में सामंतवाद, साम्राज्यवाद, पृथकतावाद, रीतिवाद, नस्लवाद और संकीर्ण जातीयतावाद का विरोध करते हुए भारतीय राष्ट्रीयता और संस्कृति के भीतर ही हिंदी जाति की परिकल्पना की गई। इसमें हिंदी और उर्दू दोनों को समान जगह दी गई।

     यह सत्य है कि डॉ. रामविलास शर्मा का नवजागरण संबंधी विवेचन पूर्ण नही कहा जा सकता, क्योंकि इसमें अनेक बातों का स्पष्टीकरण नहीं है। सबसे पहली बात तो यही है कि भारतीय नवजागरण का हिंदी नवजागरण से स्पष्ट भेद नहीं है। दूसरी बात भारतीय नवजागरण के संदर्भ में हिंदी नवजागरण की दिशा और स्वरूप का स्पष्टीकरण नहीं किया गया। इसी प्रकार अन्य अनेक प्रश्न उठाए जा सकते हैं। इसके बावजूद, कर्मेंदु शिशिर ठीक ही लिखते हैं, "सवाल और भी उठाए जा सकते हैं और उठाए जाने चाहिए भी। मगर नवजागरण की मूल स्थापना को उलट कर अंग्रेजों की भूमिका को प्रगतिशील सिद्ध करना अथवा हिंदी नवजागरण के अस्तित्व को ही विवादग्रस्त करना उचित नहीं, लेकिन निहित उद्देश्योंवाले संदिग्ध मार्क्सवादियों का एक अच्छा-खासा वर्ग है जो भारत की सभ्यता, विकास, यहाँ तक कि आजादी का श्रेय भी अंग्रेजों को देने में शर्म मह्सूस नहीं करता।" (रामविलास शर्मा का हिंदी नवजागरण, कल के लिए, जनवरी-मार्च, 2002) आज आवश्यकता है रामविलास शर्मा की इस मौलिक स्थापना को पूर्णता की ओर बढ़ाने की न कि इसे विवादग्रस्त बना कर खारिज करने या इसकी मौलिकता नष्ट करने की।

      `हिंदी जाति की अवधारणा` भी डॉ. रामविलास शर्मा की एक मौलिक अवधारणा है। उनकी सभी स्थापनाओं में से यह स्थापना सर्वाधिक विवादग्रस्त रही है। अपनी इस स्थापना में वे जाति शब्द का प्रयोग `नेशन` के अर्थ में करते हैं। इस अर्थ में जाति शब्द का प्रयोग सबसे पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने किया। उसके बाद कार्तिक प्रसाद व महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी किया, जिसकी चर्चा करते हुए रामविलास जी लिखते हैं, "हिंदी में तथा भारत की अन्य भाषाओं में जाति शब्द का पेशेवर बिरादरी (caste), नस्ल (race) और कौम (nationality) के लिए प्रयुक्त होता रहा है। कौम के लिए उसका प्रयोग अपक्षाकृत नया नहीं है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने `जातीय संगीत' नाम के निबंध में प्रदेशगत जाति के संगीत की चर्चा की थी, किसी पेशेवर बिरादरी के संगीत की नहीं। श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित जनवरी 1902 की 'सरस्वती' में कार्तिक प्रसाद के लेख का शीर्षक था - `महाराष्ट्रीय जाति का अभ्युदय`। जाति और साहित्य के संबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1923 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के कानपुर अधिवेशन में कहा था, `जिस जाति विशेष में साहित्य का अभाव या उसकी न्यूनता आपको दिखाई पड़े, आप यह निःसंदेह निश्चित समझिए कि वह जाति असभ्य किंवा अपूर्ण सभ्य है। जिस जाति की सामाजिक अवस्था जैसी होती है उसका साहित्य भी ठीक वैसा ही होता है।" (हिंदी जाति का साहित्य, पृ. 15-16)

      हिंदी को जाति के रूप में चर्चित करने का श्रेय डॉ. रामविलास शर्मा को ही जाता है। उनकी दृष्टि में मराठी, बँग्ला, उड़िया आदि जैसे जातियाँ हैं, वैसे ही `हिंदी जाति` है। हिंदी जाति उन सभी बोलियों को मिला कर निर्मित होती है, जिसे `हिंदी भाषी क्षेत्र` कहते हैं। रामविलास शर्मा अंग्रेजी के अध्यापक होते हुए भी अपना संपूर्ण जीवन इसी `हिंदी जाति` के उत्थान और इसकी सांस्कृतिक परंपरा को निर्मित करने के लिए लगा दिया। ये चाहते तो आज के अंग्रेजीदाँ लोगों की तरह अंग्रेजी में लेखन कार्य कर सकते थे, किंतु इन्होंने ऐसा नही किया।

      आज धर्म, संप्रदाय, जाति आदि के नाम पर सर्वाधिक बँटा हुआ हिंदी भाषी क्षेत्र ही है। रामविलास जी ने इसे `हिंदी जाति` के रूप में संगठित करने के लिए जो प्रयास किया, निश्चय ही वह आधुनिक भारत की मजबूती के लिए कारगर साबित हो सकती है। यद्यपि अनेक विद्वान इस पर शंका प्रकट करते हैं, जैसा कि रामचंद्र तिवारी लिखते हैं, "जैसे बाँग्ला जाति की भावना को ऊपर करने से धर्म, संप्रदाय आदि के भेद बंगाल में दब गए हैं, वैसे ही `हिंदी जाति` की भावना को ऊपर करने से हिंदी प्रदेश में भी धर्म और संप्रदाय का भेद दब जाएगा। हिंदी जाति के भीतर वे `उर्दू` को भी समाविष्ट करते हैं। उनकी यह स्थापना आज के माहौल को देखते हुए कम से कम हिंदी प्रदेश में व्यावहारिक प्रतीत नही होती । उर्दू भाषी अपने को `हिंदी जाति` के अंतर्गत स्वीकार नहीं करते। स्वयं मार्क्सवादियों में इस प्रश्न पर मतैक्य नहीं था। इसलिए चिंतन के स्तर पर `हिंदी जाति` की अवधारणा चाहे जितनी उपयोगी लगे, व्यवहार में इसकी चरितार्थता संदिग्ध है।" (कल के लिए, अप्रैल-जून,2002, पृ.28)।" ऐसी शंका करनेवाले विचारक शायद 1857 के पहले की स्थिति को भूल जाते हैं, जब न तो हिंदी और उर्दू का कोई सांप्रदायिक लगाव था और न ही हिंदी-उर्दू का विवाद। यह तो इस क्षेत्र को विभाजित करने की अंगेजों की रणनीति थी, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का षड्यंत्र था, क्योंकि इसी क्षेत्र से 1857 में उन्हें सर्वाधिक चुनौती मिली थी। इस क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा की आजादी के बाद इस अलगाव को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

      डॉ. रामविलास शर्मा के जातीयता संबंधी चिंतन में कहीं भी संकीर्णता दिखाई नहीं पड़ती है। जातीय संवेदना को उभार कर समाज को कितना गुमराह किया जा सकता है, रामविलास जी इसके प्रति सचे़त दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए वे हिंदी और उर्दू को बोल-चाल के स्तर पर एक भाषा मानते हुए भी उर्दू लिपि की रक्षा की आवश्यकता पर पूरा बल देते हैं। वे हिंदी को हिंदुत्व और उर्दू को इस्लाम से जोड़े जाने का लगातार विरोध करते रहे। इस संदर्भ में भगवान सिंह का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं, "उर्दू अपने साहित्य के कारण भारतीय समाज में एक ऐसा स्थान बना चुकी है कि इसके साहित्य की उपेक्षा संभव नहीं। हिंदी कवि स्वयं उर्दू के लोकप्रिय छंदों में लिखने की लालसा रखते हैं और जिन्हें किंचित सफलता मिलती है, वे इसे अपने लिए गौरव की बात मानते हैं। पर साहित्यिक भाषा के रूप में भी इसका हिंदी से उतना अंतर नहीं है; जितना हिंदी क्षेत्र की बोलियों का स्वयं हिंदी से।" (कल के लिए, जनवरी-मार्च, 2002, पृ. 53) हिंदी का अस्तित्व ही उर्दू सहित उसकी विभिन्न बोलियों से बनता है, इसलिए हमें उसकी विभिन्न बोलियों तथा उर्दू के विकास के साथ-साथ एक मानक हिंदी तथा हिंदी जाति को बढावा देना चाहिए।

      डॉ. रामविलास शर्मा जिस हिंदी संस्कृति की चर्चा करते हैं उसका निर्माण केवल हिंदुओं ने नहीं किया है। इस संस्कृति के निर्माण में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख आदि अनेक धर्मावलंबियों का, समाज के अनेक वर्गों का योगदान रहा है। रामविलास जी की हिंदी जाति की अवधारणा के पीछे उनका गहन अध्ययन है। अजय तिवारी के शब्दों में, "हिंदी समाज व्यापक दरिद्रता का गढ़ है। जैसे-जैसे यह समाज शिक्षित होगा, जैसे-जैसे यह समाज अपना भाग्य बदलने के लिए संघर्ष करेगा, वैस-वैसे रामविलास जी का महत्व बढ़ता जायेगा। उस संघर्ष का आधार अपनी सांस्कृतिक अहचान और अपनी वर्गीय एकता होगी। रामविलास इसी बात के लिए लड़े थे।" (कल के लिए, अप्रैल-जून, 2002, पृ. 28)

     डॉ. रामविलास शर्मा ने कोई परंपरागत `हिंदी साहित्य का इतिहास` नही लिखा और न ही वे मूलतः हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक थे। लेकिन अपनी अलग-अलग पुस्तकों में उन्होंने हिंदी साहित्य के बारे में जो भी लिखा है, उससे उनकी मौलिक स्थापनाओं का साफ पता चलता है। इस दिशा में इनका महत्वपूर्ण योगदान यह है कि ये हिंदी साहित्य के इतिहास की परंपरा की तलाश करते हुए वेदों तक गए और जो साहित्य उपनिवेशवादी अवधारणा का शिकार था, हर तरह से पश्चिम का ऋणी माना जाता था, उसे उसके मूल से जोड़ने का प्रयास किया। इसके केंद्र में भारतीय दृष्टिकोण को विकसित व स्थापित करने तथा हिंदी साहित्य एवं संस्कृति की एक परंपरा को निर्मित करने की चिंता है।

डॉ. रामविलास शर्मा इतिहास से अधिक संस्कृति और जातीय परंपरा की बात करते हैं और इस परंपरा में उन तत्वों को समेटते हैं जो आधुनिक और प्रगतिशील हैं। इन प्रगतिशील तत्त्वों को एकत्र कर लुप्त परंपरा की कड़ियाँ निर्मित करना उनका मुख्य उद्देश्य रहा है। परंपरा पर बल देते हुए वे लिखते हैं कि "परंपरा से कट कर हम आधुनिक नहीं कहला सकते हैं। हमें हमारी परंपराएँ ही आधुनिकता की सीख देती हैं। परंपरा में इतनी ताकत होती है कि इससे नए समाज का निर्माण किया जा सकता है और उसकी धारा भी मोड़ी जा सकती है।"


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