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कविता

नई हँसी
रघुवीर सहाय


महासंघ का मोटा अध्यक्ष
धरा हुआ गद्दी पर खुजलाता है उपस्थ
सर नहीं,
हर सवाल का उत्तर देने से पेश्तर
बीस बड़े अखबारों के प्रतिनिधि पूछें पचीस बार
क्या हुआ समाजवाद
कहें महासंघपति पचीस बार हम करेंगे विचार
आँख मार कर पचीस बार वह हँसे वह पचीस बार
हँसे बीच अखबार
एक नई ही तरह की हँसी यह है
पहले भारत में सामूहिक हास परिहास तो नहीं ही था
जो आँख से आँख मिला हँस लेते थे
इसमें सब लोग दाएँ-बाएँ झाँकते हैं
और यह मुँह फाड़ कर हँसी जाती है
राष्ट्र को महासंघ का यह संदेश है
जब मिलो तिवारी से - हँसो - क्योंकि तुम भी तिवारी हो
जब मिलो शर्मा से - हँसो - क्योंकि वह भी शर्मा है
जब मिलो मुसद्दी से
खिसियाओ
जातपाँत से परे
रिश्ता अटूट है
राष्ट्रीय झेंप का


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