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विमर्श

जिस हिंसा के निशान दिखाई नहीं देते
सुधा अरोड़ा


उम्र - बासठ वर्ष। एक सामान्य गृहिणी। नाम - तृषा। वैसे नाम से क्या फर्क पड़ता है। फर्क इस बात से जरूर पड़ता है कि मैं संगीत विशारद हूँ। शादी से पहले मैं अपने शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में संगीत शिक्षक थी। पर शादी के बाद चार साल में दो बच्चे हुए और बच्चों को आया के सुपुर्द न कर, उनकी परवरिश के लिए मैंने नौकरी छोड़ दी। पति भी यही चाहते थे। मैं स्टेज सिंगर से बाथरूम सिंगर बन कर रह गई।

मेरे पति हमेशा बिना किसी कारण, बिना किसी मुद्दे के हर वक्त मुझ पर गरजते-बरसते रहते। कई बार मेरी आँखों में आँसू आ जाते। एक दिन जब मैं उनके दफ्तर जाने के बाद एक कोने में बैठी सुबक रही थी, मेरे बेटे ने कहा - 'माँ, आप क्यों रो रही हैं? पापा आपको मारते तो नहीं हैं न!' मैं सन्न! आठ साल का बच्चा अपने पापा की चीख चिल्लाहट को जायज ठहरा रहा था, सिर्फ इसलिए कि वह हाथ नहीं उठाते। बाद में पता चला कि उसके सबसे गहरे दोस्त के पिता अक्सर अपनी पत्नी को हमेशा पीटते थे। इसलिए उसके पापा अगर सिर्फ चिल्लाते हैं, उसके फ्रेंड के पिता की तरह हाथ नहीं उठाते तो कोई बात नहीं।

मुझे हाई बी.पी. (उच्च रक्तचाप), थायरॉयड और पेट में अल्सर रहने लगे। मुझे लग रहा था - मेरे भीतर धीरे धीरे कुछ मर रहा है। 45 साल की उम्र में मुझमें गाने की इच्छा जोर पकड़ने लगी। मैंने तानपूरे के तार बदलवाए और रियाज करना शुरू कर दिया। एक दिन, गुस्से में आ कर मेरे पति ने मेरा तानपूरा तोड़ दिया और चिल्ला कर बोले - यह क्या खटराग अलाप रही हो। मेरे जिन रागों पर मुग्ध हो कर उन्होंने मुझसे शादी की थी, वह उन्हें अब खटराग लग रहे थे।

अब पिछले तीन साल से मैं अकेली हूँ, खुश हूँ और अपने संगीत के साथ हूँ। जिसे मैंने घर सँवारने-सहेजने और बच्चों को बड़ा करने की यात्रा में खो दिया था। मेरे दोनों बेटे मुझे अपनी पहचान फिर से कायम करने में पूरी तरह सहयोग दे रहे हैं। मैं घर में लड़कियों को संगीत की शिक्षा देती हूँ। काश। मैंने पहले ही अपने अस्तित्व की पहचान की होती पर देर आयद, दुरुस्त आयद।


घरेलू मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए आयोजित एक कार्यशाला में मैंने 1995 में लिखा एक परचा पढ़ा था, जिसका शीर्षक था - 'आक्रामकता के खिलाफ - एक आम औरत की आवाज'। परचा समाप्त होने पर उस पर चर्चा शुरू हुई तो एक महिला ने कहा कि आप अपने परचे का वह पैराग्राफ फिर से पढ़िए जिसमें सूक्ष्म प्रताड़ना की बात कही गई है। वह पैराग्राफ यह था -

'हिंसा का एक बेहद सूक्ष्म प्रकार है जिसे मानसिक प्रताड़ना कहा जा सकता है। प्रत्येक पति कुछेक बरस साथ रहने के बाद यह सूँघ लेता है कि वह किस 'जाति' या 'किस्म' की औरत के साथ है। वह जानता है कि अपनी पत्नी को सजा देने का सबसे बेहतरीन तरीका या नुस्खा क्या है। उसे कितने नुकीले या कितने भोथरे औजार किस तरह से इस्तेमाल करने है। वह जानता है कि अपनी पत्नी पर शारीरिक बल का इस्तेमाल कर या उसे चाँटा मार कर वह उतनी तकलीफ नहीं पहुँचा सकता, जितनी उसकी उपेक्षा या अवहेलना कर। वह अपनी संभ्रांतता का मुखौटा 'इन्टैक्ट' रख कर एक साधुनुमा तटस्थता अपना लेता है। वह अपने ही घर में इस तरह रहता है, जैसे उस घर में बच्चे हैं, बुजुर्ग हैं, नौकर-चाकर है, आने-जानेवाले मेहमान हैं, नहीं है तो सिर्फ उसकी पत्नी। पत्नी की 'उपस्थिति' या उसके 'अस्तित्व' को पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से नकारता हुआ वह अपनी पत्नी को अवहेलना के धीमे जहर से खत्म करना चाहता है। 'संवादहीनता' की स्थिति से पैदा हुई इस 'स्लो डेथ' को जब तक पत्नी पहचानने की कोशिश करती है, वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी होती है। बहरहाल, बाहर से देखने पर यह एक हद तक आकारहीन स्थिति लग सकती है और इसे वही औरतें बखूबी समझ सकती हैं जिन्होंने इस 'धीमी मौत' को अपने भीतर घटते हुए देखा है, पहचाना है।'

महिला संगठनों में कार्यालय में होनेवाली यौन हिंसा (सेक्सुअल वायलेंस) का जिक्र होता है। घरेलू हिंसा में शारीरिक, लैंगिक, आर्थिक, शाब्दिक हिंसा तथा वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) आदि सभी का जायजा लिया जाता है। इन सलाहकार केंद्रों में मानसिक हिंसा को रेखांकित नही किया जाता क्योंकि बाकी सभी यातना के बहुत स्थूल प्रकार हैं और उन्हें पहचानना आसान है। पंद्रह सालों की काउन्सिलिंग के दौरान हमारे संगठन में मानसिक प्रताड़ना का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। जबकि एक औरत के लिए ज्यादा तकलीफदेह, लाइलाज और असमंजसवाली स्थिति मानसिक प्रताड़ना है, जिसका जिक्र तक नहीं किया जाता। शरीर पर लाल-नीले निशान या होंठों पर या आँखों के नीचे कटा हुआ घाव तो किसी मलहम या दवा से आखिर ठीक हो ही जाता है, पर शाब्दिक तिरस्कार, उलाहने, व्यंग्यबाण चला कर या संवादहीनता और निरंतर उपेक्षा से की गई चोट जैसा घाव मन पर बनाती है, वह शरीर पर हुए घाव से ज्यादा गहरा होता है। इस अदृश्य चोट को भरने में कहीं ज्यादा वक्त लग जाता है।

अपने साथी की निर्मम चुप्पी और सायास संवादहीनता भी हिंसा का ही एक प्रकार है और चूँकि शरीर पर इसके निशान दिखाई नहीं देते इसलिए यह भीतर ही भीतर देह को अमूर्त बीमारियों से लैस कर देती है। पति की मारक चुप्पी या चीख चिल्लाहट हमें शिकायत करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं लगते। ऐसी अमूर्त तकलीफें हमारे सरोकार का मुद्दा इसलिए नहीं बनतीं क्योंकि मानसिक यातना की शिकार औरत जब खुद ही मरते दम तक इसकी शिनाख्त नहीं कर पाती तो उसके बिना कहे कोई दूसरा व्यक्ति उसके मन के भीतर चलते ऊहापोह को कैसे पहचान सकता है। जहाँ शारीरिक हिंसा निम्न और निम्न मध्य वर्ग की औरतों की समस्या है, मानसिक यातना उच्च मध्य वर्ग और सुसंस्कृत, अभिजात, शालीन दिखनेवाले प्रगतिशील वर्ग का हथियार है। निम्न और निम्न मध्य वर्ग का पुरुष इतना शातिर और समझदार नहीं होता। वह गुस्सा आते ही आगा पीछा नहीं देखता और झट से हाथ उठा कर हिंसक हो जाता है। इस हिंसा के निशान शरीर पर दिखते हैं, इसलिए इसे ले कर निर्णय लेना आसान हो जाता है।

यह नामालूम और सूक्ष्म किस्म की मानसिक प्रताड़ना आम तौर पर आर्थिक रूप से संपन्न, संभ्रांत, अभिजात पुरुष या फिर सामाजिक फलक पर प्रतिष्ठाप्राप्त बुद्धिजीवी पुरुष देते हैं।

सामाजिक , मनोवैज्ञानिक और परिवेशगत कारण

भारतीय समाज में बेटों को शुरू से ही बेटियों की अपेक्षा ऊँचा दर्जा दिया गया है। विरासत में ऐसे संस्कार और ऐसा वर्चस्चवादी दृष्टिकोण ले कर जब वह कार्यक्षेत्र में उतरता है तो कई बार उसे अपने मन मुताबिक रुतबा नहीं मिलता। वह जिस शासन और नियंत्रण की स्थिति में स्वयं को देखना चाहता है, कार्यक्षेत्र में उसे न पा कर उसकी भरपाई वह घर के कार्यकलाप पर अपने शासन से करता है।

इसके ठीक विपरीत एक दूसरी स्थिति भी संभव है - जब वह अपने कार्यक्षेत्र में एक अफसरी ओहदे पर अपने को प्रतिष्ठापित कर लेता है और खास किस्म की जी हुजूरी और चापलूसी का अभ्यस्त हो जाता है। घर लौटने के बाद भी कुर्सी का वह प्रभामंडल उसका पीछा नहीं छोड़ता और अपनी पत्नी को भी वह अपने नीचे काम करनेवाले एक मातहत की तरह दुत्कारता चलता है। चूँकि वह घर के लिए अर्थ कमा कर लाता है इसलिए इसे वह अपना हक मानने के साथ-साथ यह भी समझने लगता है कि उसकी पत्नी, वह अनपढ़, गँवार हो या पढ़ी लिखी कामकाजी, ऐसा ही सुलूक डिजर्व करती है। उसे अपने व्यवहार में कहीं कोई गड़बड़ी, कोई अस्वाभाविकता महसूस नहीं होती। अपनी महानता से आक्रांत यह संपन्न, संभ्रांत पुरुष जीवन भर अपनी पत्नी को अपने कर्णभेदी शब्द बाणों से या संवादहीनता की उपेक्षा से बेधता है और उसके व्यक्तित्व की किरचें बिखेर कर एक त्रासजन्य आनंद (सैडिस्टिक प्लेजर) पाता है।

अपवाद हर जगह हो सकते हैं पर अमूमन होता यह है कि तकनीकी या प्रबंधन की उच्च शिक्षाप्राप्त, अभिजात घरों से आए इस श्रेणी के लड़के किसी इज्जतदार, प्रतिष्ठित घराने की जहीन, देखने में आकर्षक, कलाकार लड़की से सगर्व शादी करना चाहते हैं पर सारी मशक्कत सिर्फ उसे हासिल करने तक ही सीमित हो कर रह जाती है। एक बार वह लड़की 'घर की मुर्गी' बन गई तो उसकी कीमत 'दाल बराबर' भी नहीं रह जाती बल्कि यह समझदार ऊँचे रुतबे का पति शादी का शुरुआती जज्बा ठंडा होते ही अपनी पत्नी की कलात्मक अभिरुचि और सृजनात्मकता को न पहचान कर, शातिर तरीके से उसकी नफासत और रचनात्मकता को तहस नहस कर उसका मुख्य स्पेस रसोई घर को बना देता है। एक बार पत्नी 'खास' प्रतिभावान कलाकार से 'आम' व्यक्तित्वविहीन गृहिणी बन गई तो उसे यह भी सलीके से जता दिया जाता है कि उससे शादी कर उसके अफसर पति ने उस पर एहसान किया है। इसके बाद उस 'आम' व्यक्तित्वविहीन औरत से एक असंपृक्त रिश्ता कायम रख धीमी मौत की ओर उसे धकेला जाता है। भारतीय समाज में सैकड़ों महिला कलाकारों के उदाहरण हैं जिनके पतियों ने उनकी कला पर रीझ कर उनसे शादी का प्रस्ताव रखा और शादी के बाद उनकी कला से ही उन्हें परहेज होने लगा। विख्यात नर्तकी सोनल मानसिंह, दमयंती जोशी जैसी कई महिला कलाकार हैं जो अंततः अपनी कला के प्रति समर्पण और सरोकार के लिए विवाह बंधन से बाहर निकल आईं। अधिकांश ऐसी हैं जिन्होंने खुद अपनी कला और प्रतिभा को घर गृहस्थी और बच्चों की देख सँभाल में होम कर दिया। उन्होंने अपने होने की सार्थकता ताउम्र अपने पति की तरक्की और बच्चों के पढ़ लिख कर ऊँचे ओहदों तक पहुँचने में ही समझी और अपनी रचनात्मक कला और प्रतिभा को दरकिनार कर उस ओर कभी मुड़ कर नहीं देखा। घर की तथाकथित मालकिन की अपनी पहचान बिलाने की कीमत पर अक्सर घर परिवार बने और बचे रह जाते हैं।

आम तौर पर इस तरह के दंपति बाहर बाहर से बेहद सुखी और संतुष्ट दिखाई देते हैं क्योंकि न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि विदेशों में भी अपेक्षाकृत परंपरागत - कन्जरवेटिव - संस्कार ले कर आनेवाली पत्नियाँ घीरे धीरे हर तरह के माहौल की अभ्यस्त हो कर जीना सीख जाती हैं। एक औरत इस अनुकूलन - कंडीशनिंग - की इस कदर आदी हो जाती है कि घर के नौकरों - काम करनेवालों के सामने - भी जब उसे डाँट डपट कर उसके आत्मविश्वास को खंडित कर उसे जलील किया जाता है, तो भी वह घर में अपनी इस उपेक्षित और दोयम स्थिति को न तो कोई नाम दे पाती है, न इसे यातना का एक प्रकार समझने में समर्थ हो पाती है।

तालमेल बिठा कर रहना ही एकमात्र विकल्प है इसलिए वह अपनी इस बारीक अनचीन्ही तकलीफ का सामना करने से कतराती है, उसे बाहर आने से रोकती है और चूँकि पढ़ी लिखी और समझदार है इसलिए इससे अपने तईं जूझती है और अपने भीतर ही इससे मुठभेड़ कर इसे 'ठीक' कर लेना चाहती है और फिर भी अगर सुलझा न पाए तो अपने पति के सामने 'जो हुक्म मेरे आका'वाला रवैया अपना लेती है क्योंकि उसे लगता है कि पति हर बार सही होता है और वह गलत। पति के कार्यक्षेत्र का बड़ा स्पेस उसे आतंकित करता है और अपने छोटे से घर की छोटी सी रसोई उसके व्यक्तित्व को भी उतना ही छोटा बनाने में कामयाब हो जाती है। जब स्वयं औरत ही अपनी स्थिति से वाकिफ नहीं हो पाती तो वह इस अमूर्त सी दिखनेवाली तकलीफ का कैसे और किसके सामने बयान करे।

ऐसे पति के साथ एक लंबा समय बिताते हुए न सिर्फ वह इस उपेक्षा की आदी हो जाती है और उसका आत्मविश्वास तहस नहस हो ताता है बल्कि वह अपने भीतर यह मानने लग जाती है कि उसमें निश्चित रूप से किसी ऐसे गुण की कमी है जिसकी वजह से अपने पति की अपेक्षाओं पर वह खरी नहीं उतर पाती। अपने में कमी के इसी स्वीकार के चलते कई बार औरतें अपने पति के दूसरे विवाहेतर संबंधों को अनचाहे भी झेल लेती हैं और विवाहेतर संबंधों में पति के एक लंबे अरसे तक उलझे रहने के बावजूद पति के अपने ठीए पर लौट आने पर बाँहें फैला कर वे उसे समेट लेती हैं। गाँव कस्बे की अनपढ़ औरतों से ले कर प्रबुद्ध वर्ग की कामकाजी औरतों तक में 'सुबह के भूले भटके' पति के 'शाम ढले घर लौट आने' की स्थिति को स्वीकृति दिए जाने के बेशुमार उदाहरण मौजूद हैं।

कभी कोई औरत पति के तीखे स्वभाव या निरंकुश आचरण के प्रति अगर अपना प्रतिरोध जताती भी है तो औरत को परेशान देख कर घर परिवार के लोग भी समझ नहीं पाते और यही कहते हैं कि आखिर ऐसा उसने किया ही क्या है या क्यों राई का पहाड़ बनाया जा रहा है! पति चूँकि मारपीट नहीं करता इसलिए अपनी निगाह में भी वह एक बेहद शालीन, सभ्य, सुसंस्कृत इंसान है जिसके व्यवहार में कहीं कोई असामान्यता उसे भी अपने आप में दिखाई नहीं देती।

शारीरिक हिंसा और मानसिक प्रताड़ना में एक बड़ा फर्क यह है कि शराब के नशे में या शराब के नशे के बहाने से जब कोई पति अपनी पत्नी को रात के अँधेरे में पीटता है, दूसरी सुबह नशा उतरने के बाद हिंसा के आफ्टर इफेक्ट्स की गंभीरता जानने समझने के बाद ही अनजाने में ही उसका विवेक यह तय कर लेता है कि उसे पत्नी के शरीर पर अपने लात घूँसों के नीले काले निशानों के एवज में उसके पैर पकड़ कर रो धो कर माफी माँगनी है या जूते या चप्पल पहन कर पत्नी को फिर से दुत्कारते हुए अपने काम पर बाहर निकल जाना है।

मानसिक प्रताड़ना में स्थिति बिल्कुल अलग होती है। चूँकि पति पत्नी पर हाथ नहीं उठाता और उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं छोड़ता, इसलिए उसकी आत्मा पर कोई बोझ भी नहीं रहता। वह जीवन भर इसे महसूस ही नहीं कर पाता कि वह कुछ गलत कर रहा है। ऐसे पतियों के शब्दकोश में माफी या क्षमा जैसे शब्द का अस्तित्व ही नहीं होता। पढ़े लिखे, प्रगतिशील, प्रबुद्ध वर्ग में यह स्थिति ज्यादा है। पत्नी को चाँटा मारना या गाली गलौज करना, हाथ मरोड़ देना हिंसा में गिना जाएगा इसलिए एक शालीन, संभ्रांत पति गलती से भी ऐसी क्रियाएँ नहीं करता, वह इनसे बेहतर, अदृश्य लेकिन पैने, औजारों का इस्तेमाल करता है - जिसमें संवादहीनता या चुप्पी की हिंसा प्रमुख है।

ऐसे पुरुष दोहरी छवि रखते हैं। एक वह, जो उनकी सार्वजनिक छवि है जिसमें वे बेहद खुशमिजाज, जिंदादिल, मिलनसार, बेलौस ठहाके लगानेवाले इनसान दिखाई देते हैं। आपका पति आपसे बात नहीं करता जबकि अपने अन्य स्त्री या पुरुष मित्रों के बीच वह अपने उन्मुक्त, मिलनसार और जिंदादिल स्वभाव के लिए खूब सराहा जाता है। उसका जो चेहरा घर की चहारदीवारी के भीतर है, वह इस बाहरी चेहरे से काफी अलग है, इसलिए पत्नी हमेशा एक दुविधा की स्थिति में रहती है क्योंकि वह एक साथ एक ही व्यक्ति के अलग अलग दो चेहरों से जूझ रही है। सार्वजनिक स्थलों पर जाते ही या घर में करीबी मित्रों के बीच वह पति की जिंदादिली से भरपूर शालीन छवि के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाते हुए खुद भी मुस्कुराती है। दूसरी छवि घर के अंदर अपने कमरे या पढ़ने की मेज पर झुका हुआ एक चुप्पा, घुन्ना और लापरवाह आत्मकेंद्रित व्यक्ति है - जिसमें कोई सरसता-तरलता नहीं, जिसका घर के सदस्यों से कोई संवाद नहीं, जिसे देख कर घर परिवार के सदस्य या उसके मातहत काम करनेवाले लोग दहशत में आ जाते हैं और स्वीकार कर लेते हैं कि बाहरी सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य का यह जाना माना व्यक्तित्व उनके सामान्य पारिवारिक आकार से कहीं बड़ा, विराट-विशाल और उनकी पहुँच से बाहर है। अगर वह अपने किसी दफ्तरी काम या लेखन में जुटा है और इस बीच उसकी पत्नी चाय का खाली जूठा कप, जिस पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं, उसकी मेज से उठा लेती है या उसके छोटे बच्चों की गेंद खेल खेल में उसके कमरे की दीवार पर टकरा जाती है तो वह कलम कागज छोड़ कर आसमान सिर पर उठा लेता है बगैर यह सोचे कि घर जितना उसका है, उतना ही उसकी पत्नी या बच्चों का भी... और यही बात वह प्यार से, बिना सप्तम सुर में अलाप कर आराम से भी समझा सकता है।

आपके पति अगर चुप रहते हैं, आपसे कुछ शेअर नहीं करते, आपकी ओर देखते तक नहीं, इसमें असामान्य क्या है? आप पर हाथ तो नहीं उठाते, मारते-पीटते नहीं, आपके शरीर पर लाल-नीले निशान नहीं छोड़ते, इसकी शिकायत में आप क्या कहेंगे? इसका आप एफ.आई.आर दर्ज नहीं करवा सकते क्योंकि बात न करना, चुप रहना, उपेक्षा करना कोई अपराध नहीं है। इसे अगर मैं चुप्पी की हिंसा - वायलेंस ऑफ सायलेंस - की संज्ञा दूँ तो इसे हँसी में उड़ा दिया जाएगा या कहा जाएगा कि इन नारीवादी औरतों का दिमाग खराब हो गया है। इन्हें उठते बैठते हर जगह हिंसा ही दिखाई देती है।

वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी ने भी अपनी आत्मकथा में अपने प्रतिष्ठित लेखक पति के बारे में लिखा है - 'यों तो हर व्यक्ति के भीतरी और बाहरी दो रूप होते हैं लेकिन किसी के व्यक्तित्व के इन दो रूपों में बहुत बहुत फासला होता है - इतना कि अगर दोनों को सामने रख दिया जाए तो आप पहचान भी न सकें कि ये एक ही व्यक्ति के दो रूप हैं। ...मैं नहीं जानती कि कितने लोग अपने इन दो रूपों के प्रति सचेत भी होते हैं। राजेंद्र को तो जैसे इसका ऑब्सेशन जैसा है। कारण भी साफ है क्योंकि इनके दोनों रूपों में इतना अंतर है कि इनके बाहरी रूप को जाननेवाले कभी विश्वास ही नहीं करेंगे कि इनके बहुत भीतरी व्यक्तित्व का एक ऐसा भी हिस्सा है जो बहुत निर्मम, कठोर और अमानवीयता को छूने की हद तक क्रूर भी रहा है और इसकी मार झेली है उन लोगों ने जो बहुत अंतरंग हो कर उनके प्यार की सीमा में होने का भ्रम पालते रहे। वास्तव में राजेंद्र के प्यार और अंतरंगता की सीमा में कोई हो भी नहीं सकता, सिवाय खुद राजेंद्र के, क्योंकि किसी को भी प्यार की सीमा में लेते ही अधिकार की बात आ जाती है, जो राजेंद्र किसी को दे नहीं सकते... समर्पण की बात आ जाती है, जो राजेंद्र कर नहीं सकते। हकीकत तो यह है कि आत्म-केंद्रित और आत्मतोष के खोजी राजेंद्र ने जिंदगी में न अपने सिवाय किसी को प्यार किया, न कर सकते हैं, वरना राजेंद्र जैसा विवेकवान और संवेदनशील व्यक्ति क्या इस बात को भी नहीं जानेगा कि प्यार का विस्तार ही तो अधिकार है... प्यार की परिपूर्णता ही तो है समर्पण! इनसे परहेज करके क्या प्यार किया जा सकता है?' ('एक कहानी यह भी', पृष्ठ 206)

व्यक्ति की अपने प्रति घोर आसक्ति और अपने से जुड़े लोगों के प्रति अनासक्ति और अमानवीय आचरण को मनोवैज्ञानिक शब्दावली में आत्ममुग्ध व्यक्तित्व का असंतुलन - नारसिस्टिक पर्सेनेलेटी डिसऑर्डर (Narcissistic Personality Disorder) - कहा जाता है, जहाँ व्यक्ति अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की भावनाओं और व्यवहार का विश्लेषण करने में असमर्थ रहता है क्योंकि उसकी अपनी आत्ममुग्धता उसके विस्तृत सोच और भावनात्मक विश्लेषण के दरवाजे बंद कर देती है। अधिकांश कलाकार रचनाकार पति व्यक्तित्व के इस पहलू से आक्रांत होते हुए भी इससे अनजान रहते हैं। मन्नू भंडारी ने अपनी किताब 'एक कहानी यह भी' में जब यह पंक्ति लिखी थी - 'आत्म-केंद्रित और आत्मतोष के खोजी राजेंद्र ने जिंदगी में न अपने सिवाय किसी को प्यार किया, न कर सकते हैं,' तब उन्हें इस मनोवैज्ञानिक शब्दावली का कोई इल्म नहीं था।

तनावजनित व्याधियाँ

इस तरह के अनचीन्हे मानसिक तनाव (unidentified stress) शारीरिक बीमारियों को जन्म देते हैं। शरीर का जो अंग कमजोर होता है, वह इस तनाव से अवसादग्रस्त हो जाता है। कुछ औरतों की दमे की बीमारी जोर पकड़ लेती है। अपच और एसिडिटी जैसी पाचन क्रिया से संबंधित बीमारियाँ फौरन शरीर को अशक्त बना देती हैं। पाइल्स, पेट में अल्सर, साइनस, माइग्रेन - सभी बीमारियाँ शरीर में एड्रेनल ग्रंथि के नकारात्मक रिसाव से पैदा होती हैं और यह क्रिया सीधे मानसिक अस्तव्यस्तता और तनाव से जुड़ी हुई है।

इस तनावग्रस्त स्थिति का एक और परिणाम होता है जिसे बहुत सी घर की चहारदीवारी में सिमटी हुई, प्रतिभावान औरतें महसूस करती हैं। घर में खिड़कियाँ, दरवाजे खुले होने के बावजूद औरत एकाएक घुटन - सफोकेशन - महसूस करती है, उसे लगता है कि घर में हवादार झरोखों और रोशनदानों की कमी है। वह साँस नहीं ले पाती क्योंकि उसे लगता है - कमरे में ऑक्सीजन नहीं है। कमरे से निकल कर वह एकाएक बाल्कनी में आती है और फेफड़ों में ताजा हवा को खींचने लगती है।

महिला कार्डियोलॉजिस्ट अक्सर बताती हैं कि तनाव से गुजरती हुई उच्च मध्य वर्ग की धनाढ्य औरतें अचानक ई.सी.जी. कराने उनके क्लिनिक आ जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे दिल की भयंकर बीमारी से पीड़ित हैं और उनकी बीमारी को उनके अलावा कोई भी - यहाँ तक कि डॉक्टर भी - नहीं पहचान पा रहा है। जब ई.सी.जी. की रिपोर्ट सामान्य आती है तो वे निराश होती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि या तो डॉक्टर गलत है या उसकी मशीन वर्ना उनके दिल की धड़कन का एकाएक तेज हो जाना या खुली हवा में भी साँस न ले पाना, एक सामान्य स्थिति नहीं हो सकती। वे पाचन क्रिया की निष्क्रियता देख कर एंडोस्कोपी जैसे भीषण तकलीफदेह परीक्षण से गुजरने को तैयार हो जाती है क्योंकि उन्हें लगता है, वे अँतड़ियों के कैंसर से या पेट में अल्सर से जूझ रही हैं। वे अपनी बीमारी को मानसिक घुटन, अवहेलना और उपेक्षा से न जोड़ कर अपने शरीर के अवयवों से जोड़ बैठती हैं। कुछ महिलाएँ मनोचिकित्ससकों के पास भी जाती हैं क्योंकि आत्मविश्वास की कमी के कारण उन्हें अपने में ही कोई गड़बड़ी या असामान्यता महसूस होने लगती है।

मानसिक यातना से ग्रस्त संबंधों में औरत लगातार एक लंबे अरसे तक एक अनचीन्हे तनाव से त्रस्त रह कर अपने शरीर को बीमारियों की शरणस्थली बना लेती है और फिर डॉक्टरों के पास जाना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है - बगैर यह जाने कि इन बीमारियों का इलाज डॉक्टरों के पास तो है ही नहीं। विडंबना यह है कि या तो औरत डॉक्टरों के पास जाती है या मनोचिकित्सक के पास क्योंकि अपना खुश न रहना और निराशा के गर्त में चले जाना, उसे अपनी शारीरिक संरचना और बनावट में ही किसी खामी का परिणाम लगती है। वह यह कतई समझ नहीं पाती कि इसके सूत्र कहीं और हैं और इनका इलाज न डॉक्टरों के पास है, न मनोचिकित्सकों के पास। इन स्थितियों से उबरना उसके अपने हाथ में है - पहले वह इसे पहचाने तो सही कि इस बीमारी के कारण कहाँ जड़ें जमाए बैठे हैं।

इस समस्या की जड़ें हमारे संस्कारों में इतनी दूर तक और इतने गहरे तक पैठ चुकी हैं कि वे हमारे संस्कार और हमारे अस्तित्व का एक हिस्सा बन जाती हैं। और इसलिए इस प्रताड़ना की पहचान के बिना ही औरतें अपनी सारी जिंदगी गुजार देती हैं। ये महिलाएँ सलाह केंद्रों में सहायता के लिए तभी आती हैं, जब मानसिक प्रताड़ना एक लंबे अरसे के बाद अंततः गाली गलौज या शारीरिक हिंसा में धीरे धीरे तब्दील होने लगती है।

घरेलू हिंसा से त्रस्त महिला को रास्ता सुझाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है - मानसिक यातना झेल रही महिलाओं को समझाना क्योंकि इस स्थिति में पुरुष बहुत समझदार-शालीन दिखता है, उसके अंदर बैठे हुए उस व्यक्ति से साक्षात्कार हो ही नहीं पाता जिसे वह महिला घर में झेल रही है, जो लगातार उसे बौना बना रहा है और उसके व्यक्तित्व को, उसकी प्रतिभा को कुचल कर उसे व्यक्तित्वविहीन बना देना चाहता है। अव्वल तो सलाह केद्रों में बुलाने पर भी ऐसे पुरुष कभी नहीं आते। आते हैं तो अपना बाहरी सामाजिक संभ्रांत मुखौटा ओढ़ कर आते हैं। एक ही साँस में या तो वे अपनी पत्नी के अवगुणों की फेहरिस्त गिना देते हैं और काउन्सिलर के सामने कहते हैं कि बदलने की जरूरत इसे है, मुझे नहीं। यह खुश रहना ही नहीं जानती, मैं तो अपनी तरफ से इसे खुश रखने की पूरी कोशिश करता हूँ। या फिर मसीहाई अंदाज में पूरी शालीनता और संभ्रांतता से खामोश रह कर यह जताते हैं कि वे वैसे बिल्कुल नहीं है जैसी तस्वीर उनकी पत्नी ने उनके बारे में प्रस्तुत की है।

अधिकांश गैरकामकाजी गृहिणी औरतें हर कीमत पर समझौता कर घर को घर बनाए रखने के लिए तैयार होती हैं। वे अपने पति की हर ज्यादती भूल जाने को तत्पर दिखती हैं क्योंकि वे अपने बच्चों के सर से पिता की सुरक्षा का साया खोना नहीं चाहतीं। दूसरे, अपने घर के प्रति लगाव - जिसका तिनका तिनका वह बाहर से ढूँढ़ कर लाती है और अपना घर सँवारती है। शादी होते ही इस घर को वह अपना समझती है क्योंकि शुरू से ही उसे समझाया जाता है कि वह घर तुम्हारा है। इस घर का 'अपना' होना इस कदर उसको बाँहों में जकड़ लेता है कि वह सबकुछ झेल जाती है पर उस घर से छूटना नहीं चाहती जिसकी दीवारों से भी वह प्रेम करने लग जाती है। घर की चार दीवारों की तरह पति रूपी एक पाँचवीं दीवार भी उसके प्रेम के घेरे में आ जाती है और उससे कटना या छूटना उसकी कल्पना से बाहर होता है क्योंकि घर की चहारदीवारी के बाहर उसकी कोई दुनिया है ही नहीं।

सब कुछ सहर्ष अपने दायरे में समेटने के बावजूद अचानक एक दिन पति किसी दूसरी औरत के प्रेम में या प्रेम के भ्रम में पड़ जाता है और अपनी पत्नी को किसी अनचाहे सामान की तरह घर से बाहर धकेलने में जी जान से जुट जाता है। कई बार बच्चे भी संपत्ति पर अधिकार खो देने के डर से अर्थ कमानेवाले पिता के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं रखते और अपनी माँ का साथ नहीं देते। गृहिणी पत्नी के लिए यह इतना बड़ा धक्का साबित होता है कि वह अपना मानसिक संतुलन खो कर मानसिक चिकित्सा केंद्रों की शरण में जाती हैं और उन्हें वापस सामान्यता की ओर लौटाना मुश्किल ही नहीं, असंभव हो जाता है। कुछ मानसिक चिकित्सालयों का दौरा करें तो आप पाएँगे कि चालीस से उपर की औरतों से ये असाइलम अँटे पड़े हैं। ऐसी शादीशुदा औरतें, जिन्हें उनके किसी कुसूर के बिना ही उनके पतियों ने छोड़ दिया है, या डॉक्टरों से जबरदस्ती पागल होने का सर्टिफिकेट ले कर अस्पतालों की ओर धकेल दिया है और जिनके माँ-बाप, भाई-भाभी भी उन्हें नहीं पूछते, अंततः अपना बाकी का जीवन विक्षिप्तता के कगार पर ही काटती हैं। दिमाग पर निष्क्रिय होने की चोट उसे निष्क्रिय बना कर ही छोड़ती है

मानसिक यातना के संदर्भ में कुछेक औसत संवादों की पड़ताल की जा सकती है -

'यू डोंट हैव ब्रेन्स'

'यू आर ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स!'

'यू आर अ ब्रेनलेस वुमेन।'

'तुममें बुद्धि की बहुत कमी है।'

'अक्ल की बात तो कभी करोगी नहीं।'

'कभी अपनी अक्ल का इस्तेमाल भी कर लिया करो।'

'तुममें बुद्धि नाम की चीज ही नहीं है!'

'मुँह मत खोलो, वर्ना पता चल जाता है कि तुम्हारी अक्ल घुटनों में है।'

महिला अगर गृहिणी है तो उसे बाहरी स्पेस के मसलों पर जबान खोलने पर तत्काल टोक दिया जाता है। एक लंबे अरसे तक उसके स्पेस को दाल चावल भाजी तरकारी यानी रसोई के क्रियाकलापों तक ही केंद्रित कर दिया जाता रहा है।

मेरे दादाजी अक्सर मेरी दादी को टोकते थे - 'तुझे जिस बात की समझ न हो, उस पर जबान मत खोला कर!'

यही वाक्य कुछ अलग तरीके से मेरे पिता मेरी माँ से कहते थे - 'बिजनेस की बात जहाँ आए, तू अपनी सलाह मत दिया कर।' माँ जबान खोलें, उससे पहले उन्हें चुप रहने की हिदायत इस कदर झिड़क कर दी जाती थी कि माँ ने बोलना ही बंद कर दिया। हालाँकि बाद में पिता ने यह भी महसूस किया कि व्यवसाय को ले कर भी माँ की सलाह हमेशा सही साबित होती थी। इसके बावजूद माँ को किसी भी मसले पर मुँह खोलने का, सलाह देने का या अपनी शिकायत दर्ज करने का अधिकार कभी नहीं दिया गया।

आज महिलाएँ पढ़ी लिखी हैं। हर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर अपनी राय रखती हैं। उसके बावजूद पुरुष उसी धुरी पर अटका है जो उसके बाप-दादा तय कर गए हैं। आज भी एक पति अपनी समझदार गृहिणी पत्नी से यही कहता है कि बिजनेस में अपनी बेशकीमती राय अपने पास ही रखो, यू डोंट हैव एनी बिजनेस सेंस। या तुम्हारी औकात क्या है!

ऐसे में जब एक बच्चा अपनी माँ के आँसू पोंछते हुए कहता है - 'क्या हुआ ममा, एट लीस्ट पापा आपको मारते तो नहीं है न!' तो समझा जा सकता है कि उस आठ साल के बच्चे की भी इस माहौल में एक मानसिकता तैयार हो रही है कि पापा अगर माँ पर हाथ नहीं उठाते तो वह उतने बुरे नहीं हैं जितना कि वे हो सकते थे इसलिए हर वक्त डाँटने या ताने देते रहने को जायज ठहराया जा सकता है।

इन उच्च मध्यवर्गीय संभ्रांत पतियों के घरों में अक्सर यह होता है कि पति अपनी गाड़ी की चाभी या कोई जरूरी कागज कहीं रख कर भूल जाता है और इसके लिए पत्नी पर शब्दों की मूसलाधार बारिश करता है कि चाभी कहाँ रखी है! इसके लिए वह जमीन आसमान एक कर देता है। वह जब चीख चिल्ला कर अपना चेहरा लाल कर रहा होता है, पत्नी चाभी से ज्यादा अपने पति के बढ़ते हुए रक्तचाप को देख कर चिंतित होती है और उसे अपनी सेहत के लिए शांत रहने की सलाह देती है। अंततः चाभी पति के शॉर्ट्स की जेब में रखी हुई मिलती है। वह जानता है कि चाभी उसने रखी थी पर अपनी चीख चिल्लाहट पर सॉरी कहने के बजाय वह हफ्तों पत्नी से बात करना बंद कर देता है। पत्नी अपने घर और रसोई के छोटे से स्पेस में आखिर कब तक इस अबोले से जूझेगी? अंततः वह पति से संवाद कायम करने की कोशिश में उस गलती के लिए माफी माँगती है जो उसने की ही नहीं। ...और यह एक बेहद सामान्य स्थिति है, जिससे लगभग हर गृहिणी - हाउसवाइफ या होममेकर जो भी कहें - गुजरती है।

एक पढ़ी लिखी समझदार औरत को भी इसी तरह काट-छील कर अपने से निचले दर्जे पर पहुँचाने का, बार बार उसकी पोशाक पर उसके बेवकूफ, ईडियट, मूर्ख, कूढ़मगज होने के चमकदार तमगे टाँग कर उसकी रचनात्मक प्रतिभा और उसके भीतर के कलाकार को कुंद करने का त्रासद आनंद (सैडिस्टिक प्लेजर) किसी भी शालीन दिखनेवाले पति के खाते में दर्ज किया जा सकता है।

कई बार देखने में बेहद खूबसूरत और सलीकेदार, प्रतिभावान औरत का पति, असुरक्षा की भावना के चलते मौखिक रूप से आक्रामक हो जाता है। ऐसा पुरुष जानता है कि वह कमजोर है, इन्फीरियर है, इसलिए वह सुपीरियॉरिटी का स्वाँग रचता है। अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए वह अपनी पत्नी पर चिल्लाता है, नाराज होता है, उसे घर की नौकरानियों के सामने अपमानित करता है, उस पर बेबुनियाद आरोप लगाता है और अंततः हिंसक हो जाता है।

एक केस हिस्ट्री

उच्च मध्य वर्ग की एक संभ्रांत शालीन महिला से सुबह की सैर के दौरान पहचान हुई। उसकी उम्र साठ के लगभग थी। उस उम्र में भी वह अपनी जवानी के दिनों की कुछ धुँधली उम्मीदें, कुछ मुरझाए हुए सपने आँखों में समेटे हुए थी। बातचीत में बेहद शालीन और सलीकेदार। उसके घर की दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग्स लगीं थीं जो उसने शादी से पहले और शादी के दो चार साल बाद तक बनाई थीं। पर उसके चेहरे पर एक खोया सा भाव जमा बैठा था, जिसे कहते हैं 'लॉस्ट लुक' - ऐसा भाव जो लंबे अरसे तक 'सेंस ऑफ नॉन बिलांगिंग' और 'चुप्पी की हिंसा' झेलने से पैदा होता है। दो तीन दिन की पहचान में ही एकाएक खुल कर अपनी तकलीफ बयान करने लगी - 'सुधा, आय हैव अब्यूज्ड माय बॉडी सो मच। आय हैव पनिश्ड इट। टॉर्चर्ड इट। नाउ माय बॉडी इज टेलिंग मी - नो मोर! टेक केअर ऑर आय लीव यू एंड गो।' - मैंने अपने शरीर का, अपनी सेहत का कभी खयाल नहीं रखा। अपने को सजा दी, यातना दी। अब मेरा शरीर मुझसे कह रहा है - बहुत हुआ! अब मुझे सँभालो, नहीं तो मैं चला!

मैंने उससे कहा - तुम अकेली नहीं हो। सभी औरतें यही करती हैं। और कहीं तो जोर चलता नहीं, बस, अपने को सजा देने बैठ जाती हैं। और कोई रास्ता नहीं होता उनके पास। अपने को सजा दे कर ही उन्हें सुख मिलता है। घर को मिटने से बचाए रखने का सुख, अपने को तहस नहस करके भी अपने को त्याग के आसन पर बिठाने का सुख और बच्चों के सिर पर एक सुरक्षित छत देने का सुख।

उस महिला की शिकायत थी कि उसके पति उससे कभी बात ही नहीं करते। जब भी वह उससे कहती हैं कि मुझसे भी दुनिया की खबरें शेअर करो जो अपने दोस्तों से करते हो तो वे कहते हैं -

'यू डोंट हैव एन आई.क्यू.। बात उससे की जाती है जिसमें बात समझने लायक थोड़ी बुद्धि हो। आय कैन टॉक ओन्ली टु इंटेलिजेंट पर्सन!' (तुम्हारे पास बुद्धि नाम की चीज नहीं है, मैं सिर्फ दिमागदार लोगों से ही बात कर सकता हूँ।)

आगे बताने लगी कि बीसेक साल पहले जब कोई मित्र दंपति मिलने आते थे और उसके पति से कहते थे कि यू आर लकी टु हैव सच अ ब्यूटीफुल वाइफ - (आप खुशकिस्मत हैं कि आपकी बीवी इतनी खूबसूरत है) तो वे ठहाका मार कर फौरन विशेषण जड़ देते - 'ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स!' फिर अपनी पत्नी के माथे पर बिखरे बालों की लट सँवारते हुए माफी माँगते हुए कहते - 'अरे यार, मैं तो मजाक कर रहा था।' पर शादी के लगातार चालीस साल तक 'यू डोंट हैव ब्रेन्स' या 'यू आर अ ब्रेनलेस वुमेन' या 'यू हैव अ पॉल्यूटेड माइंड' का हथौड़ा अपने सिर पर झेलने के बाद उनका दिमाग धीरे धीरे सचमुच सुन्न हो गया, सोचने-समझने और रिएक्ट करने की ताकत खो बैठा, याददाश्त कमजोर हो गई और वह अपना आत्मविश्वास पूरी तरह खो बैठीं। अच्छी खासी चित्रकार होते हुए भी उसकी उँगलियाँ एक सीधी लकीर तक खींचना भूल गई,, मनोचिकित्सक के पास जाने लगी और एंटीडिप्रेसेंट गोलियों की अभ्यस्त हो गई।

उसकी शिकायत यह भी थी कि वह कभी अपने पति से बात ही नहीं कर पाती | घर गृहस्थी के सौ पचड़े होते हैं पर सुबह पति से बात करो तो वह कहता है - मेरे ऑफिस जाने के समय ही तुम्हें यह गृह पुराण ले कर बैठना होता है? ऑफिस से वह लौटे तब बात करो तो फिर बवाल कि अभी थका हारा लौटा हूँ, चैन से बैठने तो दो। छुट्रटी के दिन बात करो तो वह या तो क्रिकेट देखने में मशगूल या नेशनल ज्यॉग्राफिकल चैनल। या क्रॉसवर्ड या सूडोकू या अखबार।

अपनी शादी की सालगिरह के एक दिन हल्के मूड में उसने पति को उसके प्यार के नाम से पुकार कर कहा -

'अच्छा, यह बताओ, तुम्हें अगर क्रिकेट या अपनी बीवी - दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ जाए तो?'

उसने बिना पलक झपकाए उसी साँस में कहा - 'क्रिकेट ऑफ कोर्स! दरवाजा खुला है, बाहर जा सकती हो।' और उसने उँगली खुले हुए दरवाजे की ओर उठा दी। वह औरत यह घटना सुनाते हुए भर्राए गले से कह रही थी कि एकदम मन हुआ कि अभी घर छोड़ूँ और निकल जाऊँ? लेकिन कहाँ? अच्छी खासी जहीन, कामकाजी पढ़ी लिखी औरतें भी, शादी के बाद एक गृहिणी की भूमिका अपना कर अपने लौटने के सारे विकल्प खुद ही बंद कर देती हैं।

यह किसी एक महिला की कहानी नहीं है, हजारों पढ़ी लिखी समझदार औरतें अपने प्रबुद्ध प्रगतिशील पतियों से साल-दर-साल चौबीसों घंटे एक से औसत संवाद सुनती चली जाती हैं कि उनमें अक्ल की कमी है, कि वे बेवकूफ हैं, कि वे किसी काम की नहीं हैं, कि वे हर समय नुक्ताचीनी करती हैं - अंग्रेजी में जिसे नैगिंग वाइफ कहते हैं, और अंततः वे इस तथ्य में विश्वास जमा लेती हैं कि सचमुच उनमें कोई कमी है, उनका आई.क्यू. निचले दर्जे का है। हीन बना डालने की साजिश के हथौड़े के वार को लगातार दिमाग पर झेलते हुए उनके सोचने समझने की क्षमता धीरे धीरे क्षीण हो जाती है, घर आए मेहमानों के बीच बात करते हुए वे डरती हैं कि पता नहीं इस बौद्धिक चर्चा में वे कोई बेवकूफी की बात न कह बैठें और उनके पति उनकी कौन सी बात को अन्यथा ले बैठें और वे सबके बीच हँसने की सामग्री बन बैठें। काम करने या लिखने-पढ़ने का जज्बा भी इस जबरन पैदा की गई हीन भावना के चलते दम तोड़ देता है।

एक आदिवासी प्रथा है कि एक पेड़ को अगर काटना है तो उस पर आरी या कुल्हाड़ी नहीं चलाते बल्कि कुछ आदिवासी मर्द औरतें उस पेड़ को चारों ओर से गोलाकार घेर कर खड़े हो जाते है और पेड़ को अपशब्द कहने लगते हैं - तू सूख जा, तू मर जा, तुझ पर ईश्वर का कहर बरसे। गालियाँ देते हैं और कोसते हैं। कुछ ही दिनों में उस पेड़ के पत्ते सूखने लगते हैं और वह अपने आप टूट कर गिर जाता है। यही हाल उन औरतों का होता है जिन्हें हर रोज ब्रेनलेस या बेवकूफ होने का खिताब दिया जाता है।

हैरानी होती है कि औरतें इस कदर इन भ्रामक, गलत और झूठे इल्जामों के ढेर को अपने भीतर पैठने कैसे देती हैं? कि एक दिन वे सचमुच यकीन करने लग जाती हैं कि उनके दिमाग के साथ कोई गंभीर समस्या है, कि दे आर 'ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स, कि उनके दिमाग में प्रदूषण है! यह सुनते सुनते उनका दिमाग सचमुच सुन्न संज्ञाहीन हो कर काम करना बंद कर देता है। मानसिक तनाव के चलते उनकी सोचने की ताकत धीरे धीरे भोथरी हो जाती है। निस्संदेह इसके कारण उनकी परवरिश, उसके संस्कारों और उनकी हर कीमत पर घर को बचाए रखने की उनके सोच से बावस्ता हैं, जहाँ जहीन, प्रतिष्ठित और कामयाब पुरुष को पति के रूप में पाना ही उन्हें अपने जीवन का एकमात्र मकसद लगता है और इस संबंध को बचाए रखने की जिद में वह अपनी जिंदगी, अपने साँस लेने के अधिकार तक को दाँव पर लगा देती है।

ऐसे पुरुषों का एक और कॉमन संवाद है - 'तुम हो क्या! तुम्हारी औकात क्या है!' अपने से ज्यादा कमाने या अपने जैसे पोस्ट पर काम करनेवाली अपनी जहीन पत्नी को कहने में भी वे नहीं हिचकते कि 'तुम्हारी औकात क्या है?' यह बहुत से पतियों का बेहद प्रिय वाक्य है। वे अपनी औकात के प्रति इत्मीनान से आँखें मूँदे अपनी पत्नी को अनदेखा करते रहते हैं और उसके अस्तित्व को कुचल कर रख देनेवाले ऐसे तीखे संवाद उच्चारित कर अपने को स्वनिर्मित पेडेस्टल पर खड़ा कर लेते हैं।

सामान्य संवाद कई हैं और उनमें से एक है कि तुम कौन सा दूध की धुली हो। पति की प्रताड़ना से तंग आ कर जब कोई भी औरत अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है तो पुरुष उसके चरित्र पर अपना हँसिया रख देता है। जब भी पति पुरुष का खिलंदड़ापन या उसका लंपट होना पकड़ा जाता है, वह झट अपने चरित्र के दाग को छिपाने के लिए अपनी पत्नी के चरित्र पर लांछन लगाना शुरू कर देता है। अपने गुनाहों की लकीर को छोटा साबित करने के लिए पति, पत्नी के आरोपित गुनाहों की एक लंबी लकीर उसके सामने आँक कर आश्वस्त हो लेता है। अपनी पत्नी को झूठा या बदचलन करार देना उन कमजोर पुरुषों का हथियार है जो आत्मविश्लेषण करने या अपने भीतर झाँकने से इनकार करते हैं। आक्रामक होना रक्षात्मक होने का ही हथियार है। 14 जुलाई 2012 को बंगलुरु के एक दंत चिकित्सक डॉक्टर का मामला अखबार में आया था कि वह अपनी पत्नी को बदसूरत कह कर बार बार और दहेज की माँग करता था, अपनी पत्नी पर शक करता था और अपनी वफादारी साबित करने के लिए उसने अपनी पत्नी को अपना पेशाब पीने पर मजबूर किया था। कुंठा और अहंकार की चरम स्थिति व्यक्ति को यातना देने की खौफनाक परिणति तक पहुँचा देती है। यह पत्नी तो अपनी शिकायत ले कर पुलिस स्टेाशन तक चली गई, लाखों महिलाएँ ऐसी हैं जो किसी न किसी कारणवश अपनी यातना को निजी मसला कह कर उसे घर की चहारदीवारी के भीतर ही दफना देती हैं।

ऐसा नहीं है कि पुरुष स्त्रियों के हाथों यातना का शिकार नहीं होते। कई सामान्य नौकरीपेशा पतियों को अपनी कामकाजी दबंग पत्नियों के विवाहेतर संबंधों को आँखें मूँद कर स्वीकार करते और सामाजिक भय के कारण पत्नी की ज्यादती या आक्रोश को नजरअंदाज करते भी देखा जा सकता है। इसमें संदेह नहीं कि कई औरतें पुरुषों से भी अधिक खूँख्वार और सैडिस्ट होती हैं। ऐसी औरतों के तांडव के सामने दस पुरुषों की यातना फीकी पड़ जाए (बाजारवाद और उपभोक्तावाद की देन ऐसी औरतों की तेजी से पनपती हुई जमात के बारे में भी हमें बात करनी है क्योंकि पितृयार्की इन्हीं औरतों को आधारस्तंभ बनाकर पनपती है - जब कोई पुरुष अपनी पत्नी को यातना देता है तो अधिकांशतः इसके पीछे उसकी माँ, बहन या उसके जीवन में आई 'दूसरी औरत' होती है जो बखूबी 'पत्नी' की भावात्मक कमजोरी - वल्नरेबिलिटी - को पहचान कर उसे तहस नहस करने के लिए पुरुष को उकसाती बहकाती है पर क्या इससे पुरुष क्षम्य हो जाता है? एक पुरुष अगर दूसरी औरत के हाथ का खिलौना बनता है और अपने क्रियाकलाप, सोचने-समझने की सामर्थ्य की चाभी दूसरी औरत के हाथ में सौंप उसके इंगित पर अपनी पत्नी पर बेवजह खौलता है तो इससे उसका गुनाह कम नहीं हो जाता।) पर जब हम किसी सामान्य सामाजिक मसले पर बात करते हैं तो अनुपात के तहत ही धारणाएँ तय करते और उनका हल निकालने की कोशिश करते हैं और मानसिक यातना के मसले में अनुपात 95 : 5 का ही पाया गया है। हो सकता है, अब यह प्रतिशत बढ़ रहा हो। लेकिन यहाँ हमें उस बड़े अनुपात की बात करनी है, अपवाद की नहीं। हालाँकि दोनों तरह की प्रताड़ना से निबटने के तरीके एक ही है - स्त्री हो या पुरुष। जो पक्ष प्रतिकार करने में कमजोर होगा, वही प्रताड़ना सहने पर मजबूर कर दिया जाएगा।

पावर स्टेप्स - आखिर आउटलेट कहाँ है?

यह सवाल जरूर उठता है कि औरतें अपने को ही सजा देने क्यों बैठ जाती हैं। और कोई रास्ता क्यों नहीं होता उनके पास?

जब भीतर खलबली मची होती है, मन बेचैन होता है, अपने आप से डर लगने लगता है कि बिना वजह कुछ तोड़ फोड़ न कर दें, किसी पर बरस न पड़ें, तो यह बेचैनी उतरेगी किस पर? किस पर वश चले? जाहिर है, घर के मालिक पर तो नहीं ही - चाहे वह ससुर हो, जेठ हो या कोई और बुजु़र्ग, क्योंकि वहाँ जोर नहीं चलता। सास पर? नहीं, क्योंकि उसके पति की माँ है वह। हर हाल में इज्जत की हकदार है। हमारी माताओं ने हमारी पीढ़ी को यही सीख दी हैं कि सास को माँ समान समझो। पति पर? सवाल ही नहीं। वह तो जहाँपनाह हैं घर के। अन्नदाता हैं। एकल परिवार में उन्हीं का हुक्म चलता है। बचा कौन? अपनी सारी खीझ, गुस्सा, कुंठाएँ कहाँ निकालें? बच्चों पर? एक तो वे इतने मासूम होते हैं, दूसरे, पिता का प्यार नहीं मिलता उन्हें, तो दोहरी जिम्मेदारी औरत की बनती है कि उन्हें वह पिता के प्यार की कमी महसूस न होने दे। और दूसरा, वे घर पर रहते नहीं और अच्छा ही है कि नहीं रहते वर्ना वे मासूम ही शिकार होते इस खलबली का, इस बौखलाहट का। फिर भी ये मासूम बच्चे भी गृहिणी की कुंठा का शिकार होते हैं।

मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय घरों में, जहाँ काम करनेवाले मौजूद होते हैं, वहाँ बच्चे तो कमोबेश माँ की झल्लाहट का शिकार होने से बच जाते हैं, वहाँ सारी खलबली का शिकार होती है एक अदद गरीब, मासूम नौकरानी - वह, जो बिना किसी अपराध के, सिर्फ अपनी गरीबी और काम करने की मजबूरी के कारण आटे में घुन की तरह पिसती है। बच्चे भी अनजाने में अपना गुस्सा घर की नौकरानी, माली, अर्दली पर उतारते हैं क्योंकि घर में वहीं हैं जिनसे वे अपने आप को उपर पाते हैं।

अब अगर कामवाली बाई ने मेज नफासत से नहीं लगाई या चम्मच सलीके से नहीं रखे या सब्जी एक नपे-तुले अंदाज में नहीं काटी तो सोचने की बात है कि अगर उसे इतनी ही समझ होती तो आपके यहाँ इतने कम पैसों में चौका-बर्तन ही कर रही होती? अगर इतनी लियाकत और सलीका होता तो कहीं किसी बेहतर जगह न चली गई होती? झाड़ू-पोंछा ही करती रहती जिंदगी भर? नौकरानी पर ज्यादा नाराजगी जाहिर नहीं की जा सकती, उसके काम छोड़ कर चले जाने का अंदेशा है। फिर भी घर की मालकिन उसे बख्शती नहीं।

वजह यह है कि उस गृहिणी का भी घर में वही दोयम दर्जा है, जो उस नौकरानी का है। एक दोयम दर्जा दूसरे दोयम दर्जे पर गुस्सा, भड़ाँस निकाल कर अपने दर्जे को थोड़ा सा ऊँचा उठाना चाहता है।

घरेलू हिंसा की कार्यशालाओं में अक्सर हम इन पावर स्टेप्स के बारे में बात करते हैं...

ससुर

सास

पति

औरत

बच्चे

नौकर / आया

...

संयुक्त परिवार की सबसे ऊपरवाली सीढ़ी पर खड़ा है - घर का मुखिया यानी ससुर, जेठ या दूसरे बुजुर्ग। दूसरी सीढ़ी पर सास। उसके बाद पति का नंबर आता है। लेकिन इन तीनों सीढ़ियों पर जमी बैठी सत्ता का शिकार घर की गृहिणी है। जिसका दाँव लगता है, वह उस पर बरस लेता है। अब यह औरत, जो घरेलू चक्की में पिस रही है, दनादन तीन सत्ताओं का कहर झेलती है। उसके लिए आउटलेट है तो अगली सीढ़ी पर खड़े निरीह बच्चे, जिन पर वह बेवजह बरस तो पड़ती है पर उसका मन भीतर से जब कचोटता है तो वह अतिरिक्त लाड़ उड़ेलने लगती है। दोनों ही स्थितियाँ असामान्य हैं। बच्चों पर बिगड़ना भी और फिर उन्हें दुलार दुलार कर बिगाड़ना भी। ऐसे संबंधों में बच्चे हमेशा दुविधा में रहते हैं और समझ नहीं पाते - माँ उन पर क्यों बेवजह खीझती रहती है और फिर बेवजह अतिरिक्त दुलार जताने लगती है।

बच्चे बिना किसी अपराध के हमारे तनाव पर बलि चढ़ जाते हैं। जानते हैं, माँ सारा दिन घर के लिए खटती भी है और पापा के, दादी के तेवर का, बुलंद आवाज का शिकार होती है तो माँ के प्रति सहानुभूति के चलते उन्हें माँ की ऊँची आवाज से भी शिकायत नहीं होती। बचपन से ही उनके सिस्टम में जाने अनजाने यह सहनशीलता विकसित हो जाती है। ऐसे घरों के बच्चे अपने माता पिता के तनावों से दूर होने के लिए एक हड़बड़ी में अपने जीवन का फैसला कर लेते हैं।

दलित लेखिका कौसल्या बैसंत्री की बेटी सुजाता पारमिता बताती हैं कि जिस दिन मेरी माँ पिता से पिटती थीं, अगले दस दिन तक वह मुझे पीट पीट कर अपना गुस्सा निकालती थीं क्योंकि बेटों को पीटना नहीं चाहती थीं और नौकर नौकरानी घर में थे नहीं, तो ले दे कर एक बेटी ही उपलब्ध थी हर वक्त पिटने के लिए। यह पीटना इतना बढ़ता गया कि सुजाता ने आव देखा न ताव, उस घर से और माँ की रोज की पिटाई से बचने के लिए पहले ही प्रेम में झटपट शादी कर ली और वह शादी ही उसके तनावों, बीमारियों और बाकी की जिंदगी की अंतहीन तबाही का कारण बनी!

औरत को बाहरी स्पेस से काटना

पितृसत्ता के संस्कार ले कर आनेवाला मध्यवर्ग का पुरुष अपने घर पर और परिवार के सदस्यों पर शासन और नियंत्रण चाहता है इसलिए वह कभी नहीं चाहता कि उसकी पत्नी भी नौकरी करे। शादी से पहले कामकाजी औरत की भी नौकरी किसी न किसी बहाने छुड़वा दी जाती है। एक घर चलाने लायक औसत आमदनीवाले नौकरीपेशा मर्द की भी औरत को 'जिबह' करने की पहली चोट यही होती है कि छोटे भाई बहनों, सास ससुर या बच्चों की देखभाल का वास्ता दे कर उसकी नौकरी छुड़वा दो। शादी के बाद प्यार-मनुहार से अक्सर वह अपनी नई नवेली कामकाजी दुल्हन को मनाने में सफल हो जाता है कि नौकरी से ज्यादा जरूरी उसका परिवार है और परिवार की कीमत पर उसे नौकरी नहीं करनी चाहिए।

औरत नौकरी करेगी तो एक बाहरी बड़े 'स्पेस' से उसका साक्षात्कार होगा और बहुत कम पति इतने उदार होते हैं कि अपनी पढ़ी लिखी पत्नी को अपनी प्रतिभा सँवारने निखारने का मौका दें। वे उसे अपने अँगूठे के नीचे ही रखना चाहते हैं। इसलिए बेहतर तरीका यह है कि पत्नी के हर जन्मदिन पर पाककला की पुस्तकें उसे भेंट कर रसोई में स्वादिष्ट व्यंजन पकाने में और घर को होटल के कमरे सा साफ सुथरा बनाए रखने में उसे उलझाए-भरमाए रखो। घर आए मेहमानों के सामने घर के कलात्मक रखरखाव का सारा श्रेय पत्नी को दे कर और उसकी पाककला की तारीफ में कसीदे पढ़ कर उसका मुख्य स्पेस रसोई का चूल्हा-चक्की बना दिया जाए। रसोई के उस छोटे से दायरे में पहले अपने को झोंक कर और अंततः अपने को खो कर वह अपनी स्थिति और प्रतिभा को पहचान पाने में असमर्थ, पति और बच्चों के लजीज खाने के बाद उँगलियाँ चाटने और चटखारों से ही परम प्रसन्न हो जी लेती है और पति और बच्चों के लिए खाना बनाना उसे जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण काम लगने लगता है।

घरेलू श्रम तो अवैतनिक मानद कर्तव्य की इतनी ऊँची उपाधि पा जाता है कि औरत अपना पूरा अस्तित्व ही सहर्ष उसमें विलुप्त हो जाने देती है। अपने को ढूँढ़ने के लिए जब तक वह चेतती है, समय उसे पीछे धकेल कर बहुत आगे बढ़ चुका होता है। जीवन के अंतिम चरण में कभी भी उसे पति ताना दे सकता है कि वह बीस-तीस-पैंतीस सालों से उसे दो वक्त की रोटी दे रहा है और सड़क पर उतर कर वह 'चार पैसे' कमा कर तो दिखाए। आम तौर पर चालीस से पचास के बीच की औरतें अपने स्थायी पति से सड़क पर उतरने का आदेश पा कर और अपने पत्नीत्व के ओहदे के 'अस्थायीत्व' से एकाएक बौखला कर या तो मानसिक चिकित्सा केद्रों में पहुँच जाती हैं या महिला सलाहकार केंद्रों का रुख करती हैं। इन महिलाओं के लिए अपने पति के लिए गँवाए हुए लंबे समय को लौटा पाना एक स्थायी टीस बन कर रह जाता है।

औसत युद्ध स्थल : खाने की मेज

इस श्रेणी के सामंती पुरुषों का एक औसत युद्धस्थल है - खाने की मेज। पत्नी को यातना देने का सबसे बड़ा हथियार। खाने की मेज पर आने से पहले ही वे नाक-भौं सिकोड़ते हुए आते हैं, यह मानते हुए कि खाना उनके मन मुताबिक नहीं बना है। रोज का खाना एक ऐसी चीज है जिसमें हर रोज एक नया नुक्स निकालना बहुत आसान है।

खाने में नमक कभी कम है, कभी ज्यादा है। कोई सब्जी हर तीसरे दिन बन जाती है तो कोई एक महीने से क्यों नहीं बनी। कभी सब्जी ज्यादा पक गई है, कभी कच्ची रह गई है। कभी मसाला कम पड़ गया है, कभी ज्यादा। कभी सब्जी की रसा पतली रह गई है, कभी गाढ़ी हो गई है। कभी चिकन-मटन भी आलू मटर की सब्जी जैसा बन जाता है तो कभी सब्जी घास फूस जैसी लगने लगती है। अधिकांश गृहिणी पत्नियों के लिए यह रोजमर्रा की समस्या है कि खाना क्या पकाया जाय और कैसा पकाया जाए कि उनके पति खुश रहें। लेकिन वह कितनी भी कोशिश कर ले, लाख 'खाना-खजाना' की व्यंजन विधियों पर प्रयोग करती रहे, वह कभी अपने पति की माँ जैसा खाना नहीं बना पाएगी क्योंकि खाना वैसा कभी बन ही नहीं सकता, जैसा पति की माँ बनाती हैं या बनाती थीं। भारतीय परिवारों में सास और ननद इसमें ज्यादा बड़ा रोल अदा करती हैं। वे यह भूल जाती हैं कि उनके घर में दाखिल होनेवाली यह नई लड़की जिस माहौल में बीस पच्चीस साल रची-बसी रही है, जिसे जड़ समेत उखाड़ कर नई मिट्टी में रोपा गया है, अलादीन के चिराग को घिसते ही उसका कायांतरण नहीं हो सकता और ऐसी अपेक्षा उस लड़की से क्यों की जाए कि वह नए खाद पानी से एकाएक पलक झपकते ही तालमेल बिठा ले।

वे इस मुहावरे को सच मान लेती हैं कि पुरुष के दिल तक पहुँचने का रास्ता उसके पेट से हो कर जाता है - 'द वे टु अ मैन्'स हार्ट इज थ्रू हिज स्टमक'। यह वे नहीं समझ पातीं कि खाना एक 'कारण' नहीं, उसे उलझाए रखने और तनाव में बनाए रखने का एक बहाना मात्र है। इसे समझने के बजाय वे ताउम्र नए से नया खाना बनाने और खाने में नए से नए प्रयोग करने के तरीके ईजाद करती रहती हैं। इसके बावजूद पतिदेव या तो खाना खाए बगैर उठ कर चले जाते हैं या खाने के प्रति अपनी अरुचि जाहिर करने के लिए पत्नी को दिखा दिखा कर सब्जी को अचार की तरह छुआ कर रोटी का कौर मुँह में डालते हैं या घर का पका हुआ खाना एक तरफ सरका कर किसी महँगे होटल से थाई या मेक्सिकन खाना मँगवा लेते हैं।

कई बार नाराजगी दिखाने का यह तरीका भी आजमाया जाता है कि पति दो-चार दिन की भूख हड़ताल पर चला जाता है। वह पत्नी की कमजोर नब्ज पहचानता है। यह जानते हुए भी कि पति भूखा नहीं रहेगा, पत्नी अपराध भाव के मनों बोझ तले दब जाती है। पति का बिना खाए घर से निकल जाना उसे अपनी नाकामी का जबरदस्त अहसास दिला देता है। पति के पास बाहर की एक बड़ी दुनिया है। वह पत्नी पर नाराज हो कर ब्रीफकेस उठाकर घर से बाहर चला जाता है, ऑफिस जाकर बढ़िया ब्रेकफास्ट मँगवाता है और भूल जाता है कि जिस गृहिणी की दिनचर्या की सबसे बड़ी सार्थकता अपने पति को ढंग का खाना खिला कर खुश रखना है, उसे वह रोता-कलपता छोड़ आया है। इधर औरत अपनी छोटी सी घरेलू दुनिया में अपने आप को कोसती-खीझती अपने वजूद को रौंदती रहती है।

नाराजगी का ज्यादा प्रदर्शन करना हो तो खाने की थाली को मेज से उछाल कर दीवार पर अमूर्त चित्रकारी करने के लिए फेंक दिया जाता है। यह पति सब कुछ कर सकता है पर अपनी पत्नी पर हाथ उठाने की गलती कभी नहीं करता। ऐसी ही गृहिणियों के बच्चे अपनी माँ की आँखों में आँसू देख कर कहते हैं - 'तो क्या हुआ ममा, एट लीस्ट पापा आपको मारते तो नहीं है न!'

औसत युद्धस्थल के और भी कई फ्रंट हो सकते हैं जैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई, पत्नी का पहरावा या घर का रख-रखाव। अगर पुरुष को शिकायत ही करनी है तो अपने कमाऊ होने की बिना पर वह किसी भी मुद्दे पर शिकायत कर सकता है और इसे अपने अधिकार क्षेत्र में मानता है। इसे एक तरह का सैडिस्ट स्वभाव भी कहा जा सकता है, जहाँ अपने करीबी व्यक्ति को पीड़ा पहुँचा कर ही पुरुष अपने अहं को संतुष्ट कर पाता है।

सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह के अनुसार 'हिंसा का एक प्रकार यह भी है कि पति पत्नी को सेक्स से वंचित रखता है। शादीशुदा औरतों की अलिखित आचार संहिता के अनुसार औरतें सेक्स की माँग नहीं करतीं, सिर्फ सेक्स की स्वीकृति देती हैं। कानून की अपनी सीमाएँ हैं और दुनिया का कोई भी कानून सेक्स करने को बाध्य नहीं कर सकता और न ही इसे हिंसा के किसी प्रकार में गिनता है।' - ('द राइट टु लिव विथ डिग्निटी' - द हिंदू, 30 मार्च, 2008)

आर्थिक आजादी : दोहरी जिम्मेदारी

आज स्थितियाँ बदली हैं। बाहरी कार्यक्षेत्र में औरत का योगदान बढ़ा है। आर्थिक आजादी ने औरत को दोहरी तिहरी जिम्मेदारी में जकड़ दिया है और पुरुष औरत की आर्थिक आजादी से चुनौती पा कर, अपनी असुरक्षा को ढाँपने के लिए न सिर्फ गैर जिम्मेदार हो जाता है बल्कि उसके भीतर पत्नी के लिए शक का फन फुफकारता हुआ उसे हिंसक भी बना देता है। प्रताड़ना का स्तर यहाँ भी है। काम से लौटने में देर हो गई तो परिवार में बवाल उठ खड़ा होता है।

पत्नी को नौकरी में अगर प्रमोशन मिलता है तो पति इसका श्रेय उसकी काबलियत को न मान कर बॉस को खुश रखने के इतर कारणों में ढूँढ़ता है। यह शक की लाइलाज बीमारी हर वर्ग के पुरुषों में है। बिल्कुल निचले तबके से ले कर उच्च वर्ग के पुरुष तक इससे कतई मुक्त नही है। सोलहवीं शताब्दी का 'ओथेलो' सिर्फ शेक्सपीयर के समय का यथार्थ नहीं है, आज की इक्कीसवीं शताब्दी के पुरुष में भी 'ओथेलो' मौजूद है और यह कस्बे के अर्द्धशिक्षित' ओंकारा' में ही नहीं, विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों और करोड़पति उद्योगपतियों तक में फैला हुआ है। इनकी निरीह 'डेस्डिमोनाएँ' बेचारी समझ ही नहीं पातीं कि उनका आकर्षक व्यक्तित्व और मिलनसार स्वभाव उनके समर्पण के विपरीत जा कर बेवजह ही उनके जीवन का अभिशाप कैसे बन जाता है।

स्त्री स्वभाव की एक मूलभूत त्रासदी यह भी है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पत्नी का भी भावात्मक कोना उतना ही वल्नरेबल, अशक्त और अपेक्षाएँ रखनेवाला होता है जितना एक आश्रित घरेलू गृहिणी का। ग्रामीण, अशिक्षित, परंपरावादी औरत हो या पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा और पूरी तरह सजग चैकस एक्टीविस्ट - सारी त्रासद स्थितियाँ उस भावात्मक कोने की वजह से पैदा होती हैं जो प्रेम पाने की जगह अपने पुरुष से शक की बिना पर निरंतर चोट खाता रहता है। इसके बावजूद एक पत्नी भावात्मक लगाव से ताउम्र मुक्त नहीं हो पाती।

कुछ पौधे होते हैं - देखने में बहुत नाजुक, मुलायम से पत्तोंवाले, पर उनकी टहनियों को कहीं से भी काट दो, उन कटी हुई जगहों से ही फिर हरे हरे नाजुक से पत्ते निकल आते हैं। औरतें भी ऐसी ही होती हैं। कहीं से भी काट दो, छील दो, फिर उसी छिली हुई जगह पर कोमल भीगी सी नमी अंकुरित होने लगती है। सब कुछ भुला कर प्रेम देने के लिए औरत हमेशा तैयार खड़ी होती हैं लेकिन आत्मकेंद्रित और अहंकारी पति अपने इर्द गिर्द ऐसी दीवार बना लेता है कि सामनेवाला अगर प्रेम देना भी चाहे तो उस दीवार को भेदना आसान नहीं होता। उस तक सिर्फ वही पहुँच सकता है जिसे वह अपने पथरीले अभेद्य दुर्ग में आने की अनुमति दे।

सामाजिक संरचना का विक्टिम पुरुष

इस पूरे आकलन से संभवतः यही स्वर सुनाई दे रहा है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था और शोषण के विविध रूपों का धारक पुरुष है और इसलिए हिंसा तथा प्रताड़ना का जिम्मेदार भी वही है जबकि अगर हम कारणों की तह तक जाएँ तो सारा असामंजस्य और असंतुलन हमारी सामाजिक व्यवस्था का है जिसके तहत पुरुष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका से बाहर आ कर सोच ही नहीं पाता और अंतत: अपने और अपने परिवार के लिए ऐसा त्रासद माहौल खड़ा कर देता है जो ध्वंस की ओर ही ले जाता है।

यह पुरुष स्वयं भी उस सामाजिक व्यवस्था, परंपरागत सोच और रूढ़िग्रस्त संस्कारों का शि‍कार - विक्टिम) है जो बचपन से उसकी शारीरिक संरचना में, उसके सिस्टम में इस कदर पैठ गया है कि वह चाह कर भी इससे छुटकारा नहीं पा सकता। अक्सर हम कई सामाजिक रूप से प्रतिष्ठाप्राप्त पुरुषों के बारे में यह सुनते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों के साथ इतना हँसमुख, जिंदादिल, यारबाश इंसान है, वह अपनी पत्नी के प्रति इतना क्रूर, निर्मम और असंवेदनशील कैसे हो सकता है। अगर वह पुरुष भी अपने को टटोले तो उसे खुद भी अपने व्यवहार पर संदेह होगा पर जिस तरह के आचरण और व्यवहार का वह बचपन से आदी हो चुका है, उसके तहत उसे पता ही नहीं चलता कि दूसरों से हँसने बोलनेवाला व्यक्ति अपनी पत्नी को एक इंसान का दर्जा भी क्यों नहीं दे पाता। यह पुरुष अपने घर से लिए गए संस्कार और परंपरागत ढाँचे को इस तरह अपनी माँस-मज्जा का हिस्सा‍ बना लेता है कि चाहते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल पाता। दरअसल एक ओर वह खुद अपनी सामाजिक व्यवस्था और पुरुषवादी सोच का विक्टिम है, दूसरी ओर उसका अहंकार इतना दुर्दमनीय होता है कि अपने गलत आचरण को स्वीकार नहीं कर पाता। जो इस माहौल में रहते हुए भी अपने को थोड़ा सा बदलने की इच्छा रखते हैं, उनका परिवार तनावमुक्त स्थितियों में सामंजस्य बिठा कर रहता है और बच्चे‍ एक स्वस्थ माहौल में बड़े होते हैं।

दोस्तोएवस्की ने कहा था कि अंततः सुंदरता ही इस दुनिया को बचाएगी। उनके इस वक्तव्य का अर्थ स्त्रियों की कोमलता और संवेदना से था या नहीं, कहा नहीं जा सकता पर यह सच है कि स्त्रियाँ ही इस दुनिया को बदल सकती हैं, इसे ऩृशंसता और क्रूरता से बचा कर मानवीय संवेदना, प्रेम और रागात्मकता की ओर ले जा सकती हैं।

स्थितियों में परिवर्तन तभी आएगा जब भारतीय परिवारों में पुरुष की मानसिकता बदलेगी। पर बदलाव लाने की सबसे बडी जिम्मेदारी एक औरत की ही है। वह जब बेटे को बेटी से बड़ा दर्जा देती है, बेटे को घर के काम में हाथ बँटाने को नहीं कहती, अपनी बेटी के लिए अलग मानदंड बनाती है और बहू के लिए अलग, विषमता के बीज वह तभी बो देती है। वह क्यों चाहती है कि उसका दामाद तो उसकी बेटी के इर्द गिर्द घूमता रहे, उसकी बेटी के नाज-नखरे उठाए, उसे हथेलियों पर रखे पर उसका बेटा अगर यही सब करे तो वह उलाहना देती है कि वह तो अपनी बीवी का गुलाम हो गया है। एक माँ और सास के रूप में वह दोहरे मापदंड न अपनाए। एक औरत स्वयं अपनी सास से प्रताड़ना सहती है पर स्वयं सास के ओहदे पर आसीन होते ही वह अपनी शोषक सास का प्रतिरूप बन जाती है। भाभी बन कर अपनी ननद की प्रताड़ना सहती है पर खुद ननद बन कर अपनी भाभी के पक्ष में खड़े हो कर भाई की ज्यादतियों का विरोध नहीं करती। जब तक औरतों में एक वृहद स्तर पर बहनापे की भावना नहीं जगेगी, भारत की सामाजिक संरचना में किसी परिवर्तन की संभावना नहीं हैं।

सबसे पहले बचपन से ही एक माँ को चाहिए कि अपने बेटे को एक स्त्री का सम्मान करने के संस्कार दे। उसके घर के काम को कमतर करके न आँका जाए। बेटों में शुरू से ही ऐसे संस्कार देने चाहिए कि बेटे अपने को अपनी बहनों से श्रेष्ठ न समझें, अपनी सहपाठिनी या मित्र लड़कियों को अपने से कमजोर न समझें, लैंगिक आधार पर काम का बँटवारा न हो। आज पुरुष के समकक्ष अगर स्त्रियाँ भी घर के लिए आर्थिक सहयोग दे रही हैं तो रसोई और बच्चे सिर्फ स्त्री की जिम्मेदारी क्यों हों। जब तक बराबरी की भावना पति पत्नी में नहीं पनपती, परिवार नाम की इकाई के ढाँचे का ध्वस्त होना तो निश्चित है।

आखिर रास्ता क्या है

पुरुष का वर्चस्व‍ स्थापित करनेवाली सामाजिक संरचना जब तक नहीं बदलती, तक तक स्त्रियों को अपने और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए कुछ सकारात्मक कदम तो उठाने ही होंगे।

भावात्मक लगाव अपनी जगह है परंतु इसका संबंध भी औरत की शारीरिक संरचना से है। मानसिक यातना से निबटने के लिए भी औरत को अपनी रणनीति तय करनी होगी। सिर्फ पति के स्वभाव या उसके परिवेश और संस्कारगत माहौल को जिम्मेदार ठहरा कर उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। संवादहीनता की कुंठाओं की पहचान भी जरूरी है। जब तक पहचान ही नहीं होगी, समस्या का निदान संभव ही नहीं है।

जिस तरह आक्रामकता के खिलाफ एक आम औरत को यह बता कर तैयार किया जाता है कि वह पहली ही बार हिंसा के लिए उठे हुए हाथ को रोके, ढीला सा प्रतिकार करना प्रकारांतर से उसे बढ़ावा देना ही है, यह बढ़ावा दे कर वह अपना पूरा जीवन एक जल्लाद के हाथों सौंप देती है और अपने शरीर में जरा भी ताकत रहने तक पिटती ही रहती है, उसी तरह उपेक्षा, संवादहीनता या चुप्पी भी एक तरह की हिंसा ही है, जिसे मैं चुप्पी की हिंसा या सायलेंट वायलेंस का नाम दे रही हूँ और इसे भी कन्फ्रंट या कॉर्नर करने - सामना करने या घेरने की जरूरत है। एक पुरुष बरसों अपना खाली समय क्रॉसवर्ड करने या सूडोकू के खाली चौकोर भरने या क्रिकेट के चौके-छक्के निहारते हुए काट देता है और अपने परिवार में माँ-बीवी-बच्चों से संवाद कायम करने की या तो जरूरत महसूस नहीं करता या हिटलरनुमा व्यवहार करता है तो निस्संदेह उसके आत्मकेंद्रित और निरंकुश स्वभाव को सामान्य व्यवहार की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए। इस व्यवहार को बढ़ावा तभी मिलता है जब इसे नजरअंदाज किया जाता है या इस पर सवाल नहीं उठाया जाता।

एक छोटा सा उदाहरण उन दो कामगारों का है जिसमें से एक डाँट सहता नहीं और फौरन जवाब दे देता है। मालिक उसके मुँह लगना नहीं चाहता। दूसरा, वह जो प्रतिकार नहीं करता और चुपचाप डाँट सुनता रहता है। मालिक हर छोटी बड़ी गलती पर उसे इत्मीनान से दुत्कारता रहता है क्योंकि उसे पता है कि यही वह मोहरा है जिसे आसानी से पैर से ठोकर मारी जा सकती है।

एक घटना का जिक्र करना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। मेरी एक मित्र की बेटी शादी के बाद अमेरिका चली गई। विदेशों में भारत की तरह घर का काम करने के लिए मदद सहज उपलब्ध नहीं होती। यह लड़की शादी से पहले अच्छी खासी नौकरी करती थी पर शादी के दो साल बाद बच्चा होने पर उसे घर के सारे काम करने और बच्चे की देखभाल के बीच समय ही नहीं मिलता था। शादी के चार साल तक कोई छोटा सा काम भी पूरा न होने पर, उसे हमेशा यही सुनना पड़ता कि तुम सारा दिन करती क्या हो - यह कार्पेट पर चावल का एक दाना क्यों पड़ा है, वाश बेसिन के पास तौलिया क्यों नहीं है, कमीज ठीक से प्रेस क्यों नहीं की, आखिर तुम सारा दिन घर में करती क्या रहती हो। चार साल तक रोज यही राग अलापा जाता रहा कि तुम सारा दिन करती क्या हो।

एक दिन जब पति काम से लौटा तो उसने देखा कि बिस्तर समेटा नहीं गया था, कपड़े मशीन में धोने के लिए डाले नहीं गए थे, खाना तैयार नहीं था, धुले हुए कपड़े आयरन बोर्ड पर वैसे ही पड़े थे, बर्तनों का ढेर वाश बेसिन में पड़ा था। पति ने गरजते हुए कहा - यह क्या तमाशा है, घर का ये हाल क्या बना रखा है? उसने कहा - 'आज मैंने सचमुच कुछ नहीं किया है, यही सारे काम मैं चार साल से चूँकि रोज करती आ रही हूँ, वे आपको दिखाई नहीं दे रहे थे।' यह अहसास पति को बिल्कुल नहीं होता कि घर गृहस्थी के कितने ढेर सारे काम हैं जो दिन का एक बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।

होता यह है कि गृहिणियों के जीवन में पुरुष के धन उपार्जन करने का अर्थ उसकी वर्चस्ववादी भूमिका को स्वीकार करना है क्योंकि भारतीय परिवारों में घर का कार्यभार सँभालने और घर चलाने की भूमिका को दोयम दर्जा दिया गया है और इसे पुरुष ही नहीं, घर की स्त्रियाँ भी सहमति देती हैं। एक गृहिणी घर को सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए जिस सम्मान की हकदार है, वह उसे इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि इसके लिए उसने हक कभी जताया ही नहीं।

पारिवारिक जीवन एक साहचर्य, तालमेल और सामंजस्य की माँग करता है, जिसमें पति और पत्नी दोनों की बराबर की हिस्सेदारी एक अनिवार्यता है। अगर यह स्थिति नहीं है तो इसे बातचीत द्वारा या खुल कर इस समस्या के हर कोण पर समय रहते चर्चा की जानी चाहिए वर्ना जिन बच्चों का भविष्य सँवारने के लिए एक औरत अपनी पूरी जिंदगी होम कर देती है, उसका सबसे बड़ा खामियाजा अंततः बच्चे ही भुगतते दिखाई देते हैं। वे डिप्रेशन से ले कर आत्महंता मनःस्थिति और ड्रग एडिक्शन तक के शिकार हो जाते हैं।

आर्थिक आत्मनिर्भरता बेशक प्रताड़ना की स्थिति में कोई बदलाव ला पाने में कारगर नहीं होती। पर इससे जीवन में निर्णय लेने और उन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता जरूर बढ़ जाती है। बहुत से समीकरण इस आर्थिक आजादी के चलते बदल जाते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने का, एक मध्यवर्गीय औरत को यह लाभ जरूर मिलता है कि गैर बराबरी और मानसिक यातना से पैदा होती भीषण स्थितियों से जूझना उसके लिए थोड़ा आसान हो जाता है, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह पति की कमाई पर आश्रित गृहिणी के लिए संभव ही नहीं है। जहाँ एक आम गृहिणी आर्थिक रूप से पराश्रित होने के कारण उपजी स्थितियों से या वैवाहिक जटिलताओं से पूरी तरह ढह जाती है और अपने को समेट पाना उसके लिए मुश्किल हो जाता है, वहीं आर्थिक आजादी के बूते पर, आत्मनिर्भर स्त्री के लिए, हिंसा या पति के इतर संबंधों से उपजी जटिल स्थितियों के भीषण स्वरूप की तीव्रता कुछ कम हो जाती है। वह अपने जीवन के नक्शे को फिर से अपने सामने फैला कर सुनियोजित कर सकती है। मानसिक गुलामी से बाहर आना उसके लिए आसान होता है। उसके सामने चुनाव की सुविधाएँ और जीने के विकल्प अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। इसलिए आर्थिक आजादी हर औरत के लिए सम्मान के साथ जीने की पहली शर्त है।

इसके लिए सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि एक औरत अपने 'होने' और अपने 'जीने' को पहली प्राथमिकता दे। पति और बच्चों के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाते हुए भी हमेशा अपने लिए थोड़ा सा स्पेस जरूर रखना चाहिए।

आम तौर पर औरतें - इनमें भी बाहर के कार्यक्षेत्र से अलग घर के लिए अपना एक एक पल होम करती गृहिणियाँ - अपने खुश होने और दुखी होने को पूरी तरह अपने पति से जोड़ देती हैं। अपने जीने के सारे अर्थ वे अपने प्रेमी पति पुरुष में तलाशती हैं। अपने 'होने' और 'साँस लेने' का मूल्य समझने के लिए वह उसकी ओर देखती है, जिसके भावात्मक कोने में उनके लिए कोई जगह ही नहीं है। वे हर वक्त पति के मूड और भावभंगिमा की ओर नजर टिकाए रहती हैं। अगर वह एक दिन चहक कर बात कर लेता है या नाराज नहीं होता तो पत्नी धन्य धन्य हो जाती है। जिस दिन वह नाराज हो कर या मुँह फुला कर घर से निकल जाता है, पत्नी सारा दिन उसकी अनुपस्थिति में भी उसके उपस्थित आक्रोश से संत्रस्त रहती है और उसके 'ठीक' होने की बाट जोहती रहती है। भारतीय समाज की यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक औरत का सुखी या दुखी होना उसके अपने मूड पर निर्भर नहीं करता। उसकी खुशी या हताशा उसके पति के चेहरे का भाव तय करता है।

जिस दिन एक औरत यह समझ लेगी कि उसकी अपनी जिंदगी और उसके अपने मूड का भी एक मूल्य है और इससे खेलने का अधिकार उस व्यक्ति को तो बिल्कुल नहीं है, जो उससे प्रेम नहीं करता, उस पर शासन और नियंत्रण करना चाहता है। इस समझ के बाद स्थितियाँ खुद ब खुद उलझी हुई गाँठों को सुलझाने में कामयाब हो जाएँगी। वह जिस दिन अपने पति के इंगित से परिचालित होना बंद कर देगी और अपना एक स्वतंत्र दायरा - जिसकी पहली शर्त आर्थिक आत्मनिर्भरता है - गढ़ लेगी, जिस दिन वह अपने मन पर सिर्फ अपना नियंत्रण स्वीकार करेगी, स्थितियाँ उर्ध्वमुखी होने लगेंगी।

औरतों की कई पीढ़ियों ने सहनशीलता को अपना सबसे खूबसूरत गहना माना और इसके बूते हिंदुस्तान की करोड़ों शादियाँ टिकी रह गईं। एक दिलचस्प घटना मुझे याद आ रही है जब एक महिला संगठन की कार्यशाला के बाद एक ग्रामीण महिला ने बेहद परेशान लहजे में पूछा - 'एक साल पहले मेरी बेटी की शादी हुई। तभी से उसे उसके ससुरालवाले बहुत परेशान कर रहे हैं। उसे ठीक से खाना भी नहीं देते। वह सूख कर काँटा हो रही है। मैं जाती हूँ तो मुझसे अकेले में बात भी नहीं करने देते। क्या करूँ?' एक बुजुर्ग कार्यकर्ता ने उसे सलाह दी - 'आप रात को दही जमाती हैं तो क्या सारी रात उसमें उँगली डाल कर देखती रहती हैं कि दही जमा है या नहीं? नहीं न? दही को जमने में एक रात चाहिए, उसी तरह नए माहौल में नई लड़की को अपनी तरह से तालमेल बिठा कर जमने दीजिए। वह अपने आप उसमें रचना-बसना सीख जाएगी। दरअसल अधिकांश माँ-बाप करते भी यही हैं। वह बार बार रोती-कलपती बेटी को लौट कर 'एडजस्ट' करने की सीख दे कर वापस उसी माहौल में रचने बसने के गुर सिखा कर भेज देते हैं। ...और एक दिन स्टोव फटने से उसके जल मरने की खबर पा कर पुलिस थाने और कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते हैं जिसका कोई परिणाम कभी नहीं निकलता। इन स्थितियों में ही आज सन 2011 में भी मुंबई शहर में हुई सी.ए. और एम.बी.ए. की शिक्षा प्राप्त लड़कियाँ भी प्रेम विवाह के बाद अपनी सारी यातनाओं का निदान आत्महत्या में तलाशती दिखाई देती हैं।

हमसे पिछली पीढ़ी की सबसे बड़ी गलती यह रही कि जहाँ बेटी को शादी करके विदा किया, माँ-बाप उसकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते थे। बेटियाँ जैसे तैसे पूरी जिंदगी काट देती थीं क्योंकि उन्हें मालूम था कि माँ-बाप से उन्हें किसी तरह के भावात्मक आधार या संबल की आशा नहीं रखनी है। जिस दहलीज को लाँघ कर बाहर निकल आई हैं, जरूरत पड़ने पर भी उसका किवाड़ खुला हुआ नहीं मिलेगा, इसलिए वह कभी अपने 'दुख' अपने माता पिता भाई बहन से बाँटती नहीं थीं। माँ बाप का भावात्मक संबल बेटी की शादी के बाद और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है ताकि उसे गैरजरूरी तनावों और दबावों से अनावश्यक सामंजस्य और तालमेल बनाने पर मजबूर न किया जा सके।

हमारी पीढ़ी की औरतें आज की युवा पीढ़ी की लड़कियों के लिए अक्सर चिंतित होती हैं कि आज तलाक की संख्या बहुत बढ़ गई है। क्या इस तरह विवाह संस्था के ही अस्तित्व को खतरा नहीं है? दरअसल हमारी पीढ़ी बहुत डरी हुई है क्योंकि उनकी स्पष्ट धारणा है कि तलाक के बाद एक लड़की को नीची निगाह से देखा जाता है। उसके लिए पुरुषप्रधान समाज में अकेले रहना बहुत आसान नहीं होता। अकेली लड़की को किराए पर घर नहीं मिलता। अकेली औरत को हर पुरुष गलत नजर से देखता है जैसे उपलब्ध होने का बिल्ला उसकी पोशाक पर टँगा है। इसलिए पिछली पीढ़ी की औरतें सोचती हैं कि भूखे भेड़ियों की जमात में अकेले अपने को ससम्मान बचा कर रखना मुश्किल होगा इसलिए बेहतर है कि हम एक ही पुरुष की ज्यादतियाँ सह लें पर विवाह की शुचिता और सुरक्षित होने के दायरे में बने रहें। दरअसल हम यह सोच ही नहीं पाते कि बराबरी और सौहार्दपूर्ण वातावरण में भी विवाह संबंध पनप सकता है जहाँ पति पत्नी दोनों एक दूसरे को सम्मान दें। प्रेम, समझदारी, बराबरी और सम्मान के साथ एक तनावरहित स्वस्थ संबंध जीवन को कितना तरल, कोमल और सुखद बना सकता है, यह हमारी कल्पना से बाहर हो गया है। हम ऐसे संबंध को भी प्यार का नाम दे देते हैं जहाँ एक पक्ष शासन करता है और दूसरा पक्ष नियंत्रण में रहता है। नियंत्रण और शासन तले दबे पक्ष का डर के साए तले रहना स्वाभाविक है। ऐसे में अगर युवा पीढ़ी की लड़कियाँ अपना पूरा जीवन इस शासन और नियंत्रण के तले बिताने को अस्वीकार कर जीने का एक स्वतंत्र रास्ता तलाशती हैं तो तलाक की ओर उनके बढ़ते कदमों से खौफ खाने की जरूरत नहीं है। बराबरी और सम्मान की आकांक्षा की ओर बढ़ती इस ललक को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।


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हिंदी समय में सुधा अरोड़ा की रचनाएँ