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कविता

भूले हुओं का गीत
गिरिजा कुमार माथुर


बरसों के बाद कभी
हम तुम यदि मिलें कहीं
देखें कुछ परिचित से
लेकिन पहिचानें ना

याद भी न आए नाम
रूप रंग, काम, धाम
सोचें
यह संभव है
पर, मन में मानें ना

हो न याद, एक बार
आया तूफान, ज्‍वार
बन्‍द मिटे पृष्‍ठों को
पढ़ने की ठानें ना

बातें जो साथ हुईं
बातों के साथ गईं
आँखें जो मिली रहीं
उनको भी जानें ना।


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