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रमता जोगी
अजित वडनेरकर


शब्दकोशों में तीर्थ शब्द का अर्थ है घाट, नदी पार करने का स्थल। बाद में इसमें मंदिर, धार्मिक-पवित्र कर्म करने के स्थल का भाव भी जुड़ता चला गया। इस संदर्भ में गौरतलब है कि प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं। यही वजह है कि नदी पार करने के स्थान ही मनुष्यों के समागम, विश्राम का केन्द्र बने। दूर-दूर से देशाटन करने निकले यायावरों का जमाव ऐसे ही घाटों पर होता जहाँ वे विश्राम करते थे

तीर्थ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की तृ धातु से हुई है जिसका मतलब हुआ बहना, तैरना, पार जाना, बढ़ना, आगे जाना आदि। तृ से तरलता के अर्थवाले कई शब्द बने हैं, जैसे तरल, तरंग, तर (गीला), तरंगिणी (नदी)। तीर्थ बना है तीरम् से जिसमें नदी या सागर के तट या किनारे का भाव शामिल है। त वर्णक्रम में ही आता है ध, सो तृ की तरह धृ धातु का मतलब भी चलते रहना, थामना आदि हैं। धृ से ही बना है धारा जिसका अर्थ होता है नदी, जलरेखा, सरिता, बौछार आदि।

त वर्णक्रम में ही आता है न वर्ण। तीर की तर्ज पर ही नीर का मतलब भी होता है पानी, जलधारा। यह बना है नी धातु से जिसमें ले जाना, संचालन करना आदि भाव शामिल हैं। नेतृत्व, निर्देश, नयन आदि शब्द इससे ही बने हैं क्योंकि इन सभी में गतिशीलता का भाव है। त वर्णक्रम की अगली कड़ी में द आता है। इससे बने दीर में भी बहाव, किनारा, धारा का ही भाव है। फारसी में नदी के लिए एक शब्द है दर्या (हिन्दी रूप दरिया), जो इसी दीर से बना है।
गति, बहाव और आगे बढ़ने की वृत्ति का बोध करानेवाले इन तमाम शब्दों की रिश्तेदारी अंततः तीर्थ से स्थापित होती है, जिसका संबंध तीर यानी किनारा और नीर यानी पानी से है। जाहिर है, कहावतें यूँ ही नहीं बन जातीं। रमता जोगी बहता पानी जैसी कहावत में यही बात कही गई है कि संन्यासी की चलत-फिरत नदी के बहाव जैसी है जिसे रोका नहीं जा सकता। पानी रुका तो निर्मल, पावन और शुद्ध नहीं रहेगा। इसी तरह जोगी के पैर थमे तो ज्ञान गंगा का स्रोत भी अवरुद्ध हो जाएगा।

सैलानी

सैलानी अरबी मूल का शब्द है और बरास्ता फारसी, हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। इस शब्द की व्युत्पत्ति देखें तो वहाँ भी बहाव, पानी, गति ही नजर आएँगे। अरबी में एक लफ्ज है सैल जिसके मायने हैं पानी का बहाव, बाढ़ या जल-प्लावन। किसी भी किस्म का प्रवाह - चाहे भावनाओं का या लोगों का, हिन्दी-उर्दू में सैलाब कहलाता है। सैल से ही बन गया सैलानी अर्थात जो गतिशील रहे। इसी कड़ी में आता है सैर जिसका मतलब है तफरीह, पर्यटन, घूमना-फिरना आदि। इससे बने सैरगाह, सैरतफरीह इत्यादि।

 

घुमक्कड़

यायावर के लिए घुमक्कड़ एकदम सही पर्याय है। घुमक्कड़ वह जो घूमता-फिरता रहे। यह बना है संस्कृत की मूल धातु घूर्ण् से जिसका अर्थ है चक्कर लगाना, घूमना, फिरना, मुड़ना आदि। घूमना, घुमाव, घुण्डी, घुमक्कड़, गर्दिश आदि शब्द इसी से उपजे हैं। आवारागर्द में जो गर्द है वह उर्दू का प्रत्यय है। आवारा से मिल कर मतलब निकला व्यर्थ घूमनेवाला । इसका अर्थविस्तार बदचलन तक पहुँचता है। यूँ उर्दू-हिन्दी में गर्द का मतलब है धूल, खाक। यह गर्द भी घूर्ण् से ही संबंधित है अर्थात घूमना-फिरना। धूल या या खाक भी एक जगह स्थिर नहीं रहती। इस गर्द की मौजूदगी भी कई जगह नजर आती है। जैसे गर्दिश जिसका अर्थ है घूमते रहना।


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हिंदी समय में अजित वडनेरकर की रचनाएँ