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कविता

चींटियाँ
मिथिलेश श्रीवास्तव


गौर से देखो चींटियाँ
धीमी चाल चलती हुई
कहीं भी दिख जाती हैं
चीनी के दाने मुँह में दबाए 
धीमी चाल को चाल आज मानते नहीं हैं लोग
लोग परन्तु जानते हैं
अपनी चाल की गति की निरर्थकता
पृथ्वी की चैल के सामने
चीटियाँ अपनी चाल चलती हैं
कछुए या खरहे की नहीं
चीटियों का इसीलिए मुहावरों में विजेताओं जैसा जिक्र नहीं हुआ
मांस खा कर अघाए हुए बाघ जैसा उनका विश्राम नहीं हुआ
दौड़ कर या दौड़ा कर या धोखे से शिकार करने का कौशल उन्हें नहीं आता
चींटियाँ मुफ्तखोरी नहीं करतीं
मेहनत करने की महान इच्छा अब भी बची है |

चींटियों के स्वभाव पर मुहावरे बना कर जहीन लोगों का मजाक उड़ाया गया
हक के लिए हुज्जत करनेवालों के बारे में कहा गया
कि चींटियों के पर निकल आए हैं
भारतीय अफसरशाही के दोगले सूरज को
कहीं दूर दफना देने की इच्छा होती है
रस्ते को जहाँ तहाँ खोद खोद कर
चींटियों के बिलों को तबाह करनेवालो
उनमें भी आ सकती है बदले की भावना एक दिन
घरों दीवारों बिस्तरों आटे चीनी के कनस्तरों
भोजन त्वचा नींद स्मृति गंध
कहीं भी पहुँच सकती हैं चीटियाँ
याद रखना
देह की त्वचा पर उग आए छोटे छोटे लाल लाल फफोले याद रखना
रोटिओं के रेशों में दम तोड़ चुकी चींटियों की वजह से
अपने भूख में भरे घिन को याद रखना|
कतारों पर पाँव रख कर एक साथ इतनी हत्याएँ करनेवालों
याद रखना हत्या करनेवाले पाँव को पहचान लेना मुश्किल नहीं है चींटियों की लिए |

 


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