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कविता

चप्पल झोला पर्स घड़ी
मिथिलेश श्रीवास्तव


चप्पल झोला पर्स घड़ी अक्सर कहीं छूट जानेवाली चीजें हैं
अब यही मेरे जीवन के आधार हैं
इन्हीं को बचाए रखना मेरे जीवन का मकसद है साथी
यही हैं वे चीजें जो मुझे बचाए हुए हैं
चीजों की मनुष्यता को अब जाना है मैंने
कंधे से लटका हुआ झोला
अक्सर मुझे याद दिलाता है एक खोए हुए संसार का
जहाँ पहुचने से पहले बदल बरस जाते हैं
झोले के भीतर एक पैसे रखनेवाला पर्स है बिना चेहरे की तस्वीरें रहती हैं उसमें
बच्चा पूछता था पर्स तुमने खो तो नहीं दिया दिखाओ मुझे
साफ करता हूँ झोले को तो जिन्दगी की सारी गंदगी
मेरी आत्मा पर जम जाती है
मैं इतना काला तो नहीं था जितनी काली होती है कोयल
कुहुकती हुई पुकारती है किसी अदृश्य काल्पनिक असहाय प्रेमी को
उसे कोई कुछ नहीं कहता
कौन जानता पंख उसके कटे हों
चलते चलते भटकते भटकते
चप्पल के तलवे घिस गए हैं जैसे मेरी आत्मा
चप्पल तो ऐसे चरमरा रहा है जैसे मेरा शरीर
घड़ी टिक टिक करती है मेरे कानों में
जैसे कोई रहस्य बोलना चाहती है
जैसे कोयल की कूक में होता है
घड़ी जब बंद होती है तो एक पुरजा एक बैटरी एक बेल्ट
बदल जाने से चलने लगती है
चप्पल को सिलवाने की जरूरत अभी नहीं है
झोले के सीवन अभी उधरे नहीं हैं
झोले की ताकत मेरी चीजें सँभाल लेती हैं
मेरे कंधे पर लटका वही मुझे कन्धा देता है साथी
नश्वर हैं सब चप्पल झोला पर्स घड़ी
जैसे नश्वर है मेरा शरीर पंचतत्वों मै विलीन होने को व्याकुल
कोयल कब तक कूकेगी मेरे लिए उसका शरीर भी तो व्याकुल होगा
पंचतत्वों में विलीन होने के लिए

 


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