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कविता

वैसे ही आऊँगा
विमलेश त्रिपाठी


मन्दिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है।

किसी समय के बवंडर में खो गये
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार गये क्षणों में

हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होठों से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन आता है पुनः जैसे

कई उदास दिनों के
फाँके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अँतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है

जैसे लम्बे इन्तजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिये
प्लेटफार्म पर पैसेंजर आती है

वैसे ही आऊँगा मैं।

 


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