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कविता

शब्द जो साथ नहीं चलते
विमलेश त्रिपाठी


शब्द जो साथ नहीं चलते
पेड़ों की ओट से देखते हैं हमारा चलना
और जब हम पहुँच जाते हैं एक जगह
वे चुपके से आ जाते हैं साथ-ऐसे
जैसे कहीं गये ही न हों

लोग जो साथ नहीं रोते
खिड़की की ओट में रोते हैं कातर होकर
धुँधलाई आँखों से
और हमारी खुशी में आ जाते हैं हँसते
जैसे कि कभी रोये ही न हों।

 


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