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कविता

बसन्त
विमलेश त्रिपाठी


एक लड़की
अपनी माँ की नजरों से छुपाकर
मुट्ठी में करीने से रखा हुआ बसन्त
सौंपती है
कक्षा के सबसे पिछले बेंच पर बैठने वाले
एक गुमसुम
और उदास लड़के को

एक बेरोजगार लड़का
अपनी बचपन की सहेली के होठों पर
पपड़ाया हुआ बसन्त आँकता है

एक बूढ़ा किसान पिता
तस्वीर भर रह गयी पत्नी की
सूनी आँखों से
दसबजिया बसन्त चुनता है

एक दिहाड़ी मजूर
रगों के दर्द भुलाने के लिए
मटर के चिखने के साथ
पीता है बसन्त के कुछ घूँट

एक औरत अँधेरे भुसौल घर में
चिरकुट भर रह गयी बिअहुति
साड़ी को स्तन से चिपकाए
महसूसती है एक अधेड़ बसन्त

एक बूढ़ी माँ
अपने जवान हो रहे बेटे के लिए
सुबह से शाम तक
उँगलियों पर गिनती है एक पियराया बसन्त

एक दढ़ियल गोरा साहित्यकार
बड़ी मुश्किल से शोधता है
निराला के गीतों से कुछ टुकड़े रंगीन बसन्त
और मैं अकेला इस महानगर में
अपनी माँ के गँवई चेहरे की झुर्रियों से
महुए के फूलों की तरह
बीनता हूँ कुछ उदास बसन्त
और रखता हूँ सहेजकर एक सफेद कागज के ऊपर

 


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