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कविता

थके हुए समय में
विमलेश त्रिपाठी


रात अपनी बाजुओं में
जकड़ती गयी
थकी हुई देह पर
अँधेरा बिछ गया
सन्नाटा सिर पर
सरकता रहा
तारे चेतना में बीतते रहे

शायद एक चिड़िया ने धीरे से
कहा था
कि संकट से पटा समय
दरअसल
संकट में नहीं था
कहीं कोई नहीं हुई थी दुर्घटना
मरा नहीं था कोई
कड़कड़ाती ठंड से
भूख ने विवश नहीं किया था
किसी बच्चे को
सड़क पर
भीख माँगने के लिए

कुल मिलाकर
रात गाभिन गाय की तरह अलसायी थी
और थके हुए समय में
उसे सचमुच
झपकी आ गयी थी

 


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