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कविता

अँधेरे में एक आवाज
विमलेश त्रिपाठी


अँधेरे में एक आवाज है
अँधेरे को
रह-रह कर बेधती

अँधेरे में तुम हो
अँधेरे से लड़ती

तुम्हारे होने को
झकझोरता हुआ बार-बार
मैं हूँ अँधेरे में

हम सभी हैं
अँधेरे में
और अँधेरे में
अँधेरा है
एक आवाज के साथ

 


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