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कविता

महानगर में एक मॉडल
विमलेश त्रिपाठी


दो दिन पहले उसे देखा गया था रुपहले पर्दे पर
अधनंगी हालत में
एक विदेशी साबुन मलकर नहाते हुए
और चार दिन से चटकल खुलने का इन्तजार करते मजूर
उसकी देह की मांसलता के गुमान में भूल गये थे
पेट की ऐंठन
अपने मासूम बच्चों के बिलबिलाते चेहरे
एक अधबुझी चिनगारी सुलग आयी थी उनकी किंचरी आँखों में
कि देह की कोई एक नस तन गयी थी

ऐन चौबीस घंटे बाद उसे देखा गया
एक प्रसिद्ध चॉकलेटी अभिनेता के साथ
ईख के खेत में अभिसार करते हुए
और क्लोज-अप मुस्कान के सफेद धुन्ध में
अबूतर-कबूतर
तोता-मैना की तरह
ठोर से ठोर मिलाने का खेल खेलते हुए

एक रिक्शे वाले ने
अपनी लुंगी का पोज ठीक करते हुए टिटकारी ली थी
और भूल गया था
पता नहीं और कितने लोगों की तरह
अपनी दुखियारी पत्नी के झुरा गए होठों का नमकीन स्वाद
और झूल गए चेहरे का अर्द्धरूमानी सौन्दर्यशास्त्र

कुछ ही पल गुजरे थे
कि वह देखी गयी झलमल कपड़े में
लपलपाती नजरों की कामुक दुनिया के बीच
कैटवॉक करती हुई
उसकी कसी देह मचलती-सी चारों और फैल जाने को
बादलों को चीर कर निकलने वाली रोशनी की तरह
झिलमिलाते गुलाब खिले हुए हिलते-से
उसके इठलाते कदम पर
और उसके हर स्पंदन पर मदहोश होते लोग
भूल गये थे यह सोचना
कि एक स्त्री ने ही जन्म दिया था उन्हें भी
एक भयानक और पीड़ादायक स्थिति में

उसी रात एक सुनसान सड़क पर वह देखी गयी
लड़खड़ाती हुई
साथ में मिलिन्द सोमण जैसा एक मॉडलनुमा चेहरा
और लड़का अपनी छाती से उसे सम्हालता हुआ
दृश्य बदला तो वह पड़ी थी एक सफेद इण्डिका में
कोई नहीं था वहाँ उसके साथ उस समय
सिवाय माँ की हिदायत भरी चिट्ठियों
और जाम टूटे शराब की तरह बहती एक अपवित्र नहीं के

प्रिय पाठको! कहने वाले कहते हैं
कि आखिरी बार वह एक नर्सिंग होम में देखी गयी
आँखें उसकी असमय मसल दी गयी पंखुड़ियों-सी
और देह का उभार कुछ बढ़ गया था
दर्द के आवेश में चीखने की आवाज उसकी सुनी गयी -
मैं जीना नहीं चाहती
मार डालो मुझे
मेरे खून में इस शहर की मक्कार बदबू रेंग रही है
भर गया है मेरी देह में
महानगरी आधुनिकता का सफेद लांछन
मैं जीना नहीं चाहती...

प्रिय पाठको! उसकी यह अन्तिम आवाज थी
जिसे बहुत कम लोगों ने सुना
अब वह कहाँ है जिन्दा है कि मरी कोई नहीं जानता

उसके बाद आज तक वह कहीं भी नहीं देखी गयी

 


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