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कविता

आजकल माँ
विमलेश त्रिपाठी


आजकल माँ के
चेहरे से
एक सूखती हुई नदी की
भाप छुटती है
ताप बढ़ रहा है
धीरे-धीरे
बस
बर्फानी चोटियाँ
पिघलतीं नहीं

 


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