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कविता

पत्नी
विमलेश त्रिपाठी


वह बासन माँजती है
जैसे स्मृतियों का धुँधलका साफ करती
खँगालती है अतीत
जैसे चीकट साफ करती दुनिया भर के कपड़ों के

चलती कि हवा चलती हो
जलती कि चूल्हे में लावन जलता हो
करती इन्तजार अपने हिस्से के आकाश पर टकटकी लगाए
कि खेत मानसून की पहली बूँद की राह तकते हों
हँसती कभी कि कोई मार खाई हँसती हो
रोती वह कि भादों में आकाश बिसूरता हो

याद करती कि बचपन की तस्वीर की
अनवरत स्थिर रह गयी हँसी याद करती हो

उसके सपने नादान मंसूबे गुमराह भविष्य के
मायके से मिले टिनहे सन्दूक में बन्द
नित सुबह शाम थकी दोपहर
उजाड़ रातों के सन्नाटे में

छूट गए अपने चेहरों की आवा जाही
छूट गये दृश्यों पर एकाकी समय के पर्दे
पहले प्रेमपत्र के निर्दोष कुँआरे शब्दों पर
गिरती लगातार धूल-गर्द
रातें लम्बी दिन पहाड़
सब चेहरे अँधेरी गुफा की तरह, अजनबी-भयानक

सहती वह
कि अनन्त समय से पृथ्वी सहती हो

रहती वह
सदी और समय और शब्दों के बाहर
सिर्फ अपने निजी और एकान्त समय में
सदियों मनुष्य से अलग
जैसे एक भिन्न प्रजाति रहती हो।

 


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